बाल अपराध का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकृति

अनुक्रम
बाल अपराध का अर्थ एवं प्रकृति छोटी आयु अथवा बालकों द्वारा किए समाज विरोधी कार्यों या अपराधों को बाल-अपराध कहते हैं। जेनिस जोसफ (Janice Joseph) के मतानुसार-वर्तमान में बाल अपराध की दो परिभाषाएँ सामने आती हैं। पहली कानूनी परिभाषा जो इस विचार पर आधारित है कि बाल अपराधी वे बालक हैं, जिन्हें बाल-न्याय-व्यवस्था के द्वारा अपराधी चिन्हित किया है। दूसरी, व्यावहारिक परिभाषा, जो यह कहती है कि वे बालक भी अपराधी हैं जिनका व्यवहार, दण्ड संहिता (Penal Code) का उल्लंघन है, परन्तु उन्हें अधिकारिक रूप से बाल-अपराधी के रूप में चिह्नित नहीं किया गया है। वे कहते हैं कि ‘‘It emphasizes that a 'hidden' delinquency exists which may never come to the attention of the juvenile justice system’’ अत: बाल अपराध को आधुनिक युग की एक गम्भीर समस्या मानते हुए बाल अपराध (किशोर अपराध) बालक का लड़कपन या नटखटपन है, जिसके वशीभूत वह कानून का उल्लंघन करता है अथवा जनकल्याण में बाधा उत्पन्न करता है। 

सभी देशों में बाल अपराधियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि चिन्ता का एक विषय है क्योंकि जिन बालकों पर देश या राष्ट्र का भविष्य निर्भर करता है, यदि वही असामान्य बालक हो जायेंगे, तो देश के भविष्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। अपराध का जन्म सर्वप्रथम परिवार से ही उत्पन्न होता है एवं उसका स्वरूप समाज में बदलता चला जाता है एवं बालक अपराधी बन जाता है। बाल अपराध को अपराध का मुख्य द्वार कहा गया है तथा ऐसे अपराधों की संख्या में वृद्धि से चिन्ता होना स्वाभाविक है। 

बाल अपराध के संबंध में सभी समाजशास्त्री एक मत नहीं है। कानून के आधार पर भी इसकी एक सामान्य परिभाषा देना कठिन है, किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सभी देशों में बाल-अपराधियों की अधिकतम आयु, कानून द्वारा निर्धारित होती है। अब विश्व भर में एक सर्व आयु 18 से कम बाल अपराधी के लिए निर्धारित की गई है। इस आयु से कम के बच्चे जब कोई ऐसा कार्य करते हैं, जो लोक-कल्याण के लिए हानिकारक तथा कानून द्वारा निषिद्ध हो तो उसे हम अपराध न कहकर बाल अपराध कहते हैं। भारत में बाल अपराध का तात्पर्य ऐसे अपराधों से हैं जो 18 वर्ष से कम आयु वाली लड़की या लड़के द्वारा किए गए हों।

आधुनिक सभ्य देशों में किशोरापराधियों को पापी या बुरा व्यक्ति न समझकर एक मानसिक रोगी और परिस्थिति से बाध्य व्यक्ति समझा जाता है। एक समय था जबकि अपराध करने पर छोटे-छोटे बालकों को भी कठोर दण्ड दिया जाता था, परन्तु जैसे-जैसे मनोवैज्ञानिकों ने किशोरापराध के कारणों की ओर, सभ्य जगत का ध्यान आकर्षित किया, वैसे-वैसे किशोरापराधी को दण्ड देने का रिवाज कम हुआ और उसके सुधार का रिवाज बढ़ा। आजकल सभी सभ्य देशों में किशोरापराधी के सुधार की चेष्टा की जाती है। रिफार्मेट्री स्कूल, प्रोबेशन तथा अन्य उपायों से किशोरापराधियों को फिर से समाज के स्वस्थ नागरिक बनाने का प्रयत्न किया जाता है।

अपराध की प्रकृति तथा बाल-अपराधी की आयु को ध्यान में रखते हुए कानूनविदों, अपराधशास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों ने बाल-अपराध को अलग- अलग ढंग से परिभाषित किया है। कानून की दृष्टि से किशोरापराधी 15 से 21 वर्ष का वह बालक है जो कि समाजविरोधी कार्य करता है।

संयुक्त राज्य अमरीका के ओहियो प्रदेश की सरकार के बाल-कल्याण विभाग ने बाल अपराधी की व्याख्या की है कि बाल अपराधी वह है जो-
  1. प्रदेश के किसी अंग या उपांग या प्रदेश या देश के किसी नियम का उल्लंघन करता है।
  2. अपने माता-पिता, गुरुजन, अध्यापक, अभिभावक के वाजिब नियंत्रण में नहीं रहता, गलत रास्ते पर चलता है, उनकी आज्ञा का पालन नहीं करता।
  3. स्कूल या घर से अक्सर भाग जाया करता है।
  4. जिसके काम ऐसे हैं, जिनसे अपने तथा दूसरों के चरित्र तथा स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है तथा हानि होती है।
  5. बिना माता-पिता या अभिभावक या वैध अधिकारी की अनुमति के, इस प्रदेश द्वारा निश्चित नियमों के विपरीत, इस प्रदेश में या बाहर किसी के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करता है।
Ohio Code USA के अनुसार, ‘‘किशोरापराधी वह है जो कानून भंग करता है, आवारागर्दी करता है, आज्ञा का उल्लंघन करने में अभ्यस्त है, जिसके व्यवहार से उसका अपना तथा दूसरों का नैतिक जीवन खतरे में पड़ता है, अथवा जो अपने माता-पिता या अभिभावकों की अनुमति के बिना विवाह करने की कोशिश करता है।’’

पूर्व में किशोरापराधी कहलाने वाले बालकों की आयु सभी देशों में एक सी निश्चित नहीं की गयी थी। कहीं यह आयु 18 वर्ष थी तो कहीं 16 वर्ष कहीं 20 वर्ष तो कहीं 21 वर्ष। भारतवर्ष में किशोर न्याय अधिनियम 1986 के अनुसार किशोरापराधी की अधिकृत आयु लड़कों के लिए 16 वर्ष लड़कियों के लिए 18 वर्ष निश्चित की गयी थी परंतु इस अधिनियम में संशोधन करते हुए, किशोर न्याय अधिनियम 2000 के अनुसार लड़के एवं लड़की दोनों की आयु 18 वर्ष निश्चित कर दी गयी है। इस आयु से कम के बालक, यदि अपराध करते हैं तो वे बाल-अपराधी की श्रेणी में गिने जायेंगे।

बाल-अपराधी की मनोवैज्ञानिक परिभाषा उसकी कानूनी परिभाषा से भिन्न है। कानून की दृष्टि से ऐसे अपराधी छूट जाते हैं जो पकड़े न जायें। परन्तु मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये सभी अपराधी हैं, चाहे वे पकड़े जायें या कानून से बच निकलें। इस तरह बाल अपराधी वह बालक है जो दूसरों की सम्पत्ति छीनता है, या उसे हानि पहुँचाता है, असामाजिक कार्य करता है, दूसरों की जिन्दगी के लिए खतरा पैदा करता है या दूसरों के कार्यों में बाधा डालता है।

बाल अपराध निश्चित आयु से कम बच्चों के ऐसे व्यवहार को कहते हैं जिसे समाज अस्वीकार करता है अथवा बाल अपराध उनके ऐसे कार्यों को कहा जाता है जो कि समाज कल्याण के लिए हानिकारक हो सकते हैं। बाल अपराध से तात्पर्य बच्चों का उन असामाजिक तथा अनैतिक आचरण में लिप्त होना है जो प्रौढ़ों के लिए दण्डनीय होते हैं।

एम0जे0 सेठना के अनुसार, ‘‘बाल अपराध के अन्तर्गत किसी ऐसे बालक या तरुण के गलत कार्य आते हैं जो कि संबंधित स्थान के कानून (जो इस समय लागू हो) के द्वारा निर्दिष्ट आयु-सीमा के अन्तर्गत आता हो।’’

गिलिन और गिलिन के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक अपराधी या किशोर वह होता है जिसके कार्य को समूह द्वारा गिरा हुआ समझा जाता है और जो हानिकर होने के नाते निषिद्ध है।’’

माउरर के अनुसार, ‘‘बाल अपराधी वह व्यक्ति है जो जानबूझकर इरादे के साथ तथा समझते हुए, समाज की रूढ़ियों की उपेक्षा करता है, जिससे उसका संबंध है।’’

न्यूमेयर के अनुसार, ‘‘एक किशोर अपराधी निर्धारित आयु से कम का वह व्यक्ति है जो समाज-विरोधी कार्य करने का दोषी है और जिसका दुरचार कानून भंग करना है।’’

रॉबिन्सन के अनुसार, ‘‘बाल-अपराधी प्रवृत्ति के अन्तर्गत आवारागर्दी और भीख मांगना, दुर्व्यवहार, बुरे इरादे से शैतानी करना और उद्दण्डता आदि विशेषताओं को सम्मिलित किया जाता है।’’

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि बाल अपराध की प्रमुख रूप से दो विशेषताएं हैं- प्रथम, यह अपराध निश्चित आयु से कम के बच्चों के द्वारा किया जाता है, और द्वितीय बच्चों के वे व्यवहार जो कि लोक-कल्याण के लिए अहितकर सिद्ध होते हैं, बाल अपराध कहलाते हैं। साधारणत: बाल अपराध की परिभाषा देते समय आवारा, आदतन, आज्ञा का उल्लंघन करने वाला या सुधार से परे शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। बाल अपराध की आयु भिन्न-भिन्न समाजों में भिन्न-भिन्न है। बाल-अपराधियों की उच्चतम आयु सीमा मिस्र, इराक, लेबनान तथा सीरिया में 15 वर्ष, फिलीपाइन्स, लंका, बर्मा तथा इंग्लैण्ड में 16 वर्ष, भारत में लड़कियों के लिए 18 वर्ष, लड़कों के लिए 16 वर्ष थाईलैण्ड में 18 वर्ष तथा जापान में 20 वर्ष है। परन्तु वर्तमान में भारत में लड़के लड़कियों के लिए यह आयु 18 वर्ष निश्चित कर दी गई है।

अमेरिका में राष्ट्रीय परिवीक्षा समिति ने बाल अपराधी की परिभाषा इस प्रकार दी है-
  • (अ) किसी प्रान्त अथवा इसके किसी क्षेत्र के कानून अथवा मान्यता का उल्लंघन किया हो;
  • (ब) जो सुधार से परे, उद्दण्ड तथा अवज्ञाकारी हो और अपने माता-पिता, संरक्षक अथवा कानून अधिकारियों के नियंत्रण से परे हो;
  • (स) जिसको स्कूल से अनुपस्थित रहने की आदत पड़ गई हो; तथा
  • (द) जो इस प्रकार का व्यवहार करता हो जिसमें जानबूझकर स्वयं उसकी या अन्य व्यक्तियों की नैतिकता अथवा स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती हो। 
भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार बाल-अपराध की अवधारणा को निम्नांकित तीन विशेषताओं की सहायता से समझा जा सकता है :
  1. भारत में 7 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किए गए अपराध को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता क्योंकि इस आयु तक बच्चा अबोध होता है जो अपराधी इरादे को लेकर कोई अपराध नहीं कर सकता।
  2. भारत में बाल न्याय अधिनियम 1986 (Juvenile Justice Act, 1986) जो कि अक्टूबर 1987 से लागू किया गया, के अनुसार 16 वर्ष तक की आयु के लड़कों एवं 18 वर्ष तक की आयु की लड़कियों को अपराध करने पर बाल- अपराधी की श्रेणी में सम्मिलित किया गया था, परन्तु अब किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत संपूर्ण देश में लड़के एवं लड़कियों की आयु 18 वर्ष निश्चित कर दी गई है। 
  3. केवल आयु ही बाल-अपराध को निर्धारित नहीं करती वरन इसमें अपराध की गम्भीरता भी महत्वपूर्ण पक्ष है। 7 से 18 वर्ष का लड़का एवं लड़की द्वारा कोई भी ऐसा अपराध किया गया हो जिसके लिए राज्य मृत्यु-दण्ड अथवा आजीवन कारावास देता हो जैसे-हत्या, घातक आक्रमण, देशद्रोह आदि तो भी वह बाल अपराधी माना जाएगा। 
इस सम्बन्ध में एक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि किन कार्यों को हम बाल अपराध कह सकते हैं? इस संबंध में सीरिल बर्ट (Cyril Burt) ने लिखा है कि ‘‘किसी बच्चे द्वारा किया जाने वाला समाज-विरोधी व्यवहार जब इतना गम्भीर हो जाता है कि राज्य द्वारा उसे दण्ड देना आवश्यक हो जाए, केवल तभी उस व्यवहार को हम बाल अपराध कहते हैं।’’

इससे स्पष्ट होता है कि एक निश्चित आयु से कम के बच्चे द्वारा जुआ खेलना, जेब काटना, चोरी करना, तस्करी में सहायता करना, अव्यवस्था फैलाना, तोड़-फोड़ करना अथवा किसी पर साधारण आघात करना आदि बाल अपराध के उदाहरण हैं। बाल-अपराध की एक प्रमुख विशेषता यह है कि ऐसे अपराधों के लिए समाज और राज्य का दृष्टिकोण सुधारात्मक होता है। इसके पीछे यह मान्यता है कि एक निश्चित आयु से कम के बच्चों द्वारा किए जाने वाले अपराध साधारणतया एक निश्चित अपराधी इरादे को लेकर नहीं किए जाते अधिकांश बाल-अपराध आकस्मिक उत्तेजना अथवा बुरी संगति के कारण होते हैं। इस कारण उपचार और पुनर्वास के द्वारा ही बाल-अपराधियों का सुधार किया जा सकता है।

बाल अपराध की प्रकृति बाल अपराध की प्रकृति बाल अपराध की प्रकृति बाल अपराध की प्रकृति बाल अपराध नाना प्रकार के होते हैं तथा इनकी सूची बनाना एक कठिन कार्य है। अनैतिक और अशोभनीय व्यवहार करना, चोरी करना, जुआ खेलना, मद्यमान ओर मादक द्रव्यों का व्यसन करना, दंगा करना, विश्वासघात करना स्कूल से भाग जाना, अनैतिक एवं बुरे आदमियों की संगति में रहना, रात्रि को निरुद्देश्य घूमना तथा बीड़ी-सिगरेट पीना आदि विविध प्रकार के समाज विरोधी कार्य बाल-अपराध कहलाते हैं।

फ्रेडरिक बी0 सुसमन15 ने ऐसे कार्यों की एक सूची तैयार की है जिन्हें बाल अपराध के अन्तर्गत रखा जा सकता है-
  • (1) किसी कानून या अध्यादेश को भंग करना।
  • (2) स्कूल तथा घर से भागने की आदत।
  • (3) जानबूझकर चोर, कुकर्मी तथा अनैतिक व्यक्तियों के साथ रहना।
  • (4) पूर्णत: विकृत।
  • (5) माता-पिता अथवा संरक्षकों के नियंत्रण को न मानना।
  • (6) अकर्मण्यता, आलस्य एवं अपराधी पर्यावरण में पलना।
  • (7) ऐसे कार्य करना, जिनसे स्वयं को अथवा दूसरों को चोट पहुँच सकती है अथवा किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • (8) घर से बिना आज्ञा अनुपस्थित रहना।
  • (9) अनैतिक तथा भद्दा व्यवहार करना।
  • (10) स्वभावत: गन्दी भाषा (व गाली गलौज) का आदतन प्रयोग करना।
  • (11) जानबूझकर निन्दनीय व्यक्तियों (बदनाम) के घरों में जाना।
  • (12) क्रीड़ा स्थलों पर अड्डे बनाना।
  • (13) आदतन रेलवे स्टेशन या लाइनों पर निरुद्देश्य घूमना।
  • (14) चलती ट्रेन से कूदना, बिना किसी की आज्ञा से कार या इंजिन में घुस जाना।
  • (15) ऐसे स्थानों पर जाना जहाँ शराब बेची जाती है।
  • (16) बिना किसी वैधानिक रूप से स्वीकृत कार्य के रात को सड़कों पर अकारण आवारागर्दी करना तथा सड़कों व पार्कों में सो जाना।
  • (17) अनैतिक व अवैधानिक व्यवसाय करना या इनमें किसी प्रकार का सहयोग करना।
  • (18) सिगरेट पीना।
  • (19) शराब पीना।
  • (20) अन्य मादक द्रव्यों का व्यसन करना।
  • (21) यौन अनैतिकताओं में फंसे रहना।
  • (22) स्वभावत: नागा करना।
  • (23) स्कूल या अन्य किसी स्थान पर अनैतिक आचरण करना।
  • (24) ऐसे व्यवहार करना या उन दशाओं में पाया जाना जिनसे खुद को या दूसरे को नुकसान पहुँचे।
  • (25) उन स्थानों पर जाना जिन पर जाने के लिए वयस्कों को दण्ड दिया जाता है।
  • (26) उपद्रवी तथा उत्पाती होना।
  • (27) भिक्षावृत्ति करना।
  • (28) अशिष्ट प्रस्ताव रखना।
  • (29) राजकीय तथा निजी बाल सुधार संस्थाओं से भागना, तथा
  • (30) नशे में साईकिल, मोटर तथा स्कूटर चलाना।

अपराध एवं बाल अपराध में अन्तर

अपराध और बाल अपराध दोनों में ही राज्य और समाज के प्रचलित नियमों का ही उल्लंघन होता है फिर भी इन दोनों में अंतर है :-

(1) मुख्य रूप से इन दोनों में सर्वप्रथम अंतर आयु का है। बाल अपराधी 18 वर्ष से कम आयु के होते हैं, जबकि अपराधियों की आयु 18 वर्ष से ऊपर होती है। प्रत्येक समाज या राज्य एक न्यूनतम व अधिकतम सीमा निर्धारित करता है। इस अधिकतम सीमा की आयु से कम के बालकों द्वारा किया जाने वाला अपराध बाल अपराध कहलाता है, जबकि इस निर्धारित सीमा से अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला गैर सामाजिक व गैर कानूनी कार्य अपराध कहलाता है।

(2) बाल अपराधी अधिकतर संवेगता (उदाहरण के लिए खेल के मैदान में झगड़ा हो जाना, मारपीट हो जाना आदि) के कारण अपराध करते हैं जबकि अपराधी सामान्यत: जानबूझकर अपराध करता है (जैसे चोरी करना) अर्थात् अपराध के पीछे योजना होती है।

(3) प्राय: बाल अपराध कम गम्भीर होते हैं (जैसे किसी मोटर का शीशा तोड़ना, किसी बच्चे द्वारा भीख मांगना, या बुरे इरादे से शैतानी करना), जबकि सामान्यत: अपराध बाल अपराध से अधिक गम्भीर होते हैं (जैसे किसी की जान लेना, डकैती डालना या माल की चोरी करना आदि)

(4) बाल अपराध प्राय: स्वयं के लिए तथा परिवार के लिए अधिक हानिकारक होता है, जबकि अपराध का मुख्य उद्देश्य समाज के अन्य सदस्यों को हानि पहुंचाना है।

(5) बाल अपराधी का अपराध करते समय आर्थिक लक्ष्य नहीं होता है, जबकि अपराधी का मुख्य लक्ष्य प्राय: आर्थिक लाभ होता है। अल्बर्ट के0 कोहन के अनुसार बाल अपराधी का लक्ष्य अनुपयोगी होता है अर्थात् वह अपराध करने से पहले यह नहीं सोचता कि उसका उसके लिए क्या उपयोग या लाभ है? अधिकांश बाल-अपराधी अपने उद्देश्यों के बारे में पूर्ण रूप से सचेत नहीं होते और इतना अधिक नहीं सोच पाते कि अपराध से उन्हें कितना लाभ होगा एवं खेल खेल में जघन्य अपराध कर जाते हैं। जबकि अपराधी सामान्यत: अपने उद्देश्य के बारे में पूरी तरह सचेत होता है तथा उसका मुख्य उद्देश्य हो सकता है आर्थिक हो।

(6) बाल अपराधी बनने में मनोवैज्ञानिक तथा पारिवारिक कारकों का अधिक महत्व होता है, जबकि अपराधी के लिए मुख्य रूप से स्वयं की इच्छा या सामाजिक कारक महत्वपूर्ण होते हैं। अपराध को सामाजिक विघटन का प्रतीक माना जाता है, जबकि बाल अपराध सामाजिक विघटन का परिणाम है।

(7) बाल अपराधों में योजनाबद्ध ढंग या संगठन का अभाव पाया जाता है जबकि अपराधी अपने कार्य के बारे में योजना बना लेता है तथा संगठित तरीके से इसे पूरा करने का प्रयास करता है।

बाल अपराधियों का वर्गीकरण

बाल अपराधी अनेक प्रकार के हैं तथा विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न आधार पर इनका वर्गीकरण किया है। इनमें कुछ प्रकार हैं-

(अ) लावेल जे0 कार का वर्गीकरण

लावेल जे0 कार16 ने बाल अपराधियों की सात श्रेणियां बताई हैं- 
  • (1) किसी किशोर न्यायालय द्वारा दोषी पाए गए बाल अपराधी
  • (2) किसी समाज-विरोधी व्यवहार के लिए किशोर-न्यायालय के सम्मुख वेश किये गये बाल अपराधी,
  • (3) किसी संस्था द्वारा समाज विरोधी व्यवहार करने के लिए दण्डित बाल-अपराधाी।
  • (4) समाज विरोधी व्यवहार के लिए किसी संस्था के सम्मुख पेश किये गये बाल अपराधी।
  • (5) कानून-विरोधी व्यवहार करने के जुर्म में पकड़े गये बाल अपराधी 
  • (6) समाज-विरोधी व्यवहार करने की प्रवृत्ति वाले बाल-अपराधी, तथा
  • (7) कानून द्वारा निर्धारित आयु वाले समस्त बाल अपराधी।

(ब) हर्श का वर्गीकरण

बाल अपराधियों के आधार का वर्गीकरण करते हुए हर्ष ने किए हुए अपराधों के प्रकार के आधार पर छ: समूहों में वर्गीकृत किया है-
  • (1) असाध्यता (उदाहरण- देर से घर आना, आज्ञा उल्लंघन)
  • (2) भगोड़ापन (घर या स्कूल से)
  • (3) चोरी (छोटी चोरी से लेकर सशस्त्र लूटमार तक)
  • (4) सम्पत्ति का ध्वंस। (जिसमें सार्वजनिक एवं निजी दोनों सम्पत्तियों का सम्मिलित है)
  • (5) यौन अपराध।

(स) हंसा सेठ का वर्गीकरण

सेठ ने बम्बई में बाल अपराधियों का अध्ययन करके बाल अपराध के पाँच प्रकार बताए हैं-
  • (1) सम्पत्ति के विरुद्ध बाल अपराध
  • (2) राशनिंग नियमों के विरुद्ध बाल अपराध
  • (3) मद्यनिषेध के विरुद्ध बाल अपराध
  • (4) यौन आदर्शों के विरुद्ध अपराध; तथा
  • (5) अन्य अपराध।
इसके अतिरिक्त बाल अपराधियों की आयु के आधार पर 7 से 12 वर्ष के बाल अपराधी 12 से 16 वर्ष के बाल अपराधी, 16 से 18 वर्ष के बाल अपराधी अथवा बालक, किशोर-पूर्व, किशोर बाल अपराधी आदि श्रेणियों में भी विभाजित किया जा सकता है। लिंग के आधार पर इन्हें बालक अपराधी तथा बालिका अपराधी और क्षेत्र के आधार पर औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्र के बाल अपराधी तथा ग्रामीण क्षेत्र के बाल अपराधी आदि श्रेणियों में भी विभाजित किया जा सकता है।

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