बेरोजगारी के प्रकार एवं कारण

अनुक्रम
बेरोजगारी के कई रूप है। प्रो. चेपमैन ने बेरोजगारी को दो वर्गो में विभाजित किया है- भावगत एवं वस्तुगत। भावगत बेरोजगारी मनुष्य के शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही कारणों से उत्पन्न होती है, चाहे ये दोष जन्मजात हों या प्राप्त किए हुए। चाहे ये दोष उपचार योग्य हो या ठीक न होने वाले हो। इसमें अनिश्चित बेरोजगारी भी सम्मिलित रहती है। दूसरे प्रकार की बेरोजगारी उन कारणों से उत्पन्न होती है जो मनुष्य के वश में नहीं होती, जैसे- व्यापार चक्र से उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी मौसमी मांग एवं पूर्ति के कारण उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी आकस्मिक बेरोजगारी इत्यादि इस प्रकार वस्तुगत बेरोजगारी के निम्नांकित रूप हो सकते हैं: 

बेरोजगारी के प्रकार 

(अ) मौसमी बेरोजगारी

इस प्रकार की बेरोजगारी उत्पादन में मौसमी परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है। कृषि में इस प्रकार की बेरोजगारी मुख्य रूप से पाई जाती है। औद्योगिक क्षेत्र में भी कुछ उद्योगों, जैसे- चीनी उद्योग के साथ यह बात विशेष रूप से पाई जाती है।

(ब) चक्रीय बेरोजगारी 

इस प्रकार की बेरोजगारी आय तथा उत्पादन मे तेजी एवं मन्दी काल में परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होती है। इस प्रकार की बेरोजगारी प्रधानत: पूंजीवादी देशों में पायी जाती है।

(स) सामान्य बेरोजगारी

सामान्य बेरोजगारी वह है जो श्रमिकों की स्वतंत्र गतिशीलता के कारण उत्पन्न होती है तथा जो प्रत्येक समय में ही वर्तमान रहती है। श्रमिक एक स्थान से दूसरे स्थान को एक उद्योग से दूसरे उद्योग को आने-जाने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र रहते हैं। अपनी इस गतिशीलता के कारण वे कभी-कभी बेकार हो जाते है। साधारणतया एक स्थान से नौकरी छोड़कर दूसरे स्थान पर पहुँचने पर शीघ्र ही काम नही मिल जाता, इसलिए जब तक उन्हें काम नही मिलता वे बेकार ही रहते हैं, किन्तु इतनी बेरोजगारी तो हर समय एवं हर समाज में मौजूद रहेगी ही। बेवरीज इस सीमा को वह न्यूनतम सीमा बतलाते हैं, जिसे कम नहीं किया जा सकता और पीगू इसे न मालूम होने वाली सीमा कहते हैं, जिससे नीचे बेरोजगारी का प्रतिशत कभी नही गिरता।

(द) औधोगिक ढाँचे सम्बन्धी बेरोजगारी

देश के औधोगिक ढाँचे में विभिन्न उद्योगों का आकार एवं महत्व अलग-अलग होता है और यह महत्व समय-समय पर बदलता रहता है। एक उद्योग समाप्त होता है या क्षीण होता है और दूसरा उद्योग पनपता या आगे बढ़ता है। इस प्रकार समय-समय पर बदलता रहता है। क्षीण होने वाले उद्योग के श्रमिक बेकार हो जाते हैं, अतएव इन्हें दूसरे उद्योग को जानने और काम सीखने में कुछ समय लगता है। कुछ व्यक्ति तो इतने पुराने रहते हैं कि वे नये वातावरण में तथा नई मशीनों पर एवं उनमें स्थानों में काम ही नहीं कर पाते। इस प्रकार के श्रमिक क्षीण होने वाले उद्योग में आधिक्य में होंगे, जबकि दूसरे उद्योगो में कमी होते हुए भी श्रमिक नहीं मिल पाते और ऐसी बेरोजगारी समाज में रहती है। इसे औधोगिक ढाँचे सम्बन्धी बेरोजगारी कहते हैं।

बेरोजगारी के विभिन्न रूपों में चक्रीय बेरोजगारी ही विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रधान कारण विनियोजन में परिवर्तन है। साधारणतया यह देखा जाता है कि मन्दी के समय मूल्य तल में निरन्तर कमी होने से पूंजीपतियों के लाभ की मात्रा घटने लगती है जिससे उत्पादन के कार्य में शिथिलता आ जाती है। ऐसी स्थिति में कारखानों से श्रमिकों की छंटनी होने लगती है। इस प्रकार कुछ लोग बेरोजगार हो जाते हैं, इससे समाज की क्रय शक्ति में कमी आ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप मांग में पुन: कमी हो जाती है, मांग की कमी के कारण मूल्य कुछ और घटता है, जिससे उत्पादन की मात्रा और भी घटानी पड़ती है। फलत: कुछ और व्यक्ति तथा साधन बेकार हो जाते हैं।

बेरोजगारी के कारण

आज सभी इस बात से सहमत है कि बेरोजगारी एक सामाजिक बुराई है किन्तु सब लोग इसके लिए अलग-अलग कारण बतलाते है मोटे तौर पर बेरोजगारी के कारणों के सम्बन्ध में निम्नलिखित विचारधाराएँ मिलती है :

(1) निजी लाभ की प्रवृत्ति का सिद्धान्त

सामाजवादियों के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी प्रधानतया पूँजीवाद की एक आवश्यक विशेषता निजी लाभ की प्रवृत्ति का परिणाम है, अतएव इनका कहना है कि जब तक पूंजीवादी अर्थव्यव्था को समाप्त नहीं किया जाएगा तब तक बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। अपने इस कथन की पुष्टि में वे 1929-32 ई. की आर्थिक मन्दी का उदाहरण होते हैं। भयानक विश्व आर्थिक मन्दी के समय में ब्रिटेन, जर्मनी और अमरीका जैसे पूंजीवादी देशों में बेकारों की संख्या क्रमश: 30, 60 और 130 लाख थी, जबकि उस समय में सामान्य तौर पर सोवियत संघ में काम करने वाले की कमी अनुभव हो रही थी। किन्तु जैसा कि प्रो0 पीगू का कथन है - अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह उदाहरण अयुक्तिसंगत जान पड़ता है। वास्तव में सन् 1928 ई0 में रूस ने अपनी प्रथम पंचवष्र्ाीय योजना का कार्यान्वयन आरम्भ किया था। आर्थिक योजनाओं तथा वृहत पूंजी विनियोजन के कल में बेरोजगारी कम होती ही है, चाहे वह पूंजीवादी देश हो अथवा समाजवादी, इस प्रकार बेरोजगारी की समस्या का निदान इतना सुगमतापूर्वक नहीं हो सकता। अतएव हमें इस समस्या पर और अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा।

(2) स्वतन्त्र प्रतियोगिता सम्बन्धी सिद्धान्त

एक विचारधारा के अनुसार बेरोजगारी पूर्ण स्पर्द्धा तथा स्वतंत्र व्यापार के सिद्धान्त से विचलित होने का परिणाम है। इसके अनुसार यदि उत्पादन स्वतंत्रत रूप में हो तथा उस पर किसी भी प्रकार का सरकारी नियन्त्रण नहीं हो एवं यदि बाजार में एकाधिकार की स्थिति नहीं रहे अथवा सरकार द्वारा हस्तक्षेप न किया जाए तथा मांग के अनुसार ही पूर्ति की जाय और वस्तुओं का उत्पादन किया जाए। बेरोजगारी अपने आप ही समाप्त हो जाएगी। एकाधिकार की स्थिति और हस्तक्षेप के कारण उत्पादन पर एक प्रकार का प्रतिरोध हो जाता है और विनियोग के लिए उपलब्ध साधनों में कमी आ जाती है। यदि उत्पादन के क्षेत्र में स्वतंत्रता रहे और पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति रहे तो बेरोजगारी बहुत अंशों में दूर हो सकती है, पर वास्तविक जीवन में एकाधिकार की स्थिति भी पाई जाती है तथा सरकार द्वारा हस्तक्षेप भी होता है इस कारण उत्पादन उचित रूप से नहीं हो पाता और बेरोजगारी की मात्रा में वृद्धि होती है। यदि इन बातों को दूर किया जा सके और प्रतियोगिता की स्थिति लाई जा सके तो बेरोजगारी बहुत अंशों में दूर की जा सकेगी। अनेकों व्यवसायी उद्योगपति तथा अर्थशास्त्र ज्ञात इस सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। जब पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति आ जायेगी तब श्रमिकों का पारिश्रमिक भी ऐसे बिन्दु अथवा स्तर पर निश्चित होता है जहाँ पर उत्पादक के लिए उतना पारिश्रमिक देना सम्भव हो सकेगा तथा उत्पादक प्रणाली में वुद्धि हो सकेगी। इस प्रकार बेरोजगारी की समस्या का समाधान कुछ अंशों में सकेगा, किन्तु अनेक देशों में लोगों में इस सिद्धान्त अथवा कारण को बेरोजगारी का सही कारण नहीं माना है।

(3) बेरोजगारी का व्यापार चक्र सम्बन्धी सिद्धान्त

प्राय: डेढ़-सौ वर्ष में औधोगिक देशों में इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि उसमें अनेकों बार समृद्धि के बाद मन्दी और मन्दी के बाद समृद्धि के काल नियमित रूप से आते रहे हैं। इसको अर्थशास्त्रियों ने व्यापार चक्र का नाम दिया है, इन चक्रों में समय की अवधि का अन्तर इतना नियमित होता है और इनकी प्रकृति इतनी समान होती है कि इनके विषय में पिछले कुछ वर्षो में सिद्धान्तों की निरन्तर रचना होती ही रही है जो प्राचीन अर्थ-शास्त्रियों के विचारों के पूर्णतया प्रतिकूल है, वैसे तो इन सिद्धान्तों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं, किन्तु इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने बेरोजगारी के विभिन्न कारणों के विश्लेषण करने का विशेष रूप से सफल प्रयास किया है।

विशेष रूप से इस सम्बन्ध में दो प्रवृत्तियाँ हमें देखने को मिलती हैं। एक के अनुसार आय अथवा रोजगार में जो नियमित रूप से उतार-चढ़ाव होते है वे मुख्य रूप से वाह्य कारणों, जैसे- फसलों की कमी एवं वृद्धि व्यापारिक थी। आशा एवं निराशा आविष्कारों के चलते परिवर्तन इत्यादि के कारण होते हैं, दूसरी प्रवृत्ति के अनुसार ये चक्र समय की प्रगति के साथ-साथ अन्य आर्थिक कारणों से स्वयं ही उत्पन्न हो जाते हैं। यह सिद्धान्त समय विलम्ब के तत्व पर आधारित है। कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि पूंजीवाद के अन्तर्गत विस्तार की प्रवृत्ति आनुपातिक विकास को ओर रहती है, जिनमें कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत तेजी के साथ होता है तो कुछ का बिल्कुल नहीं होता, इससे कीमतों के उतार-चढ़ाव को प्रोत्साहन मिलता है।

(4) मांग का अभाव का सिद्धान्त

बेरोजगारी के सम्बन्ध में दिये गये विभिन्न सिद्धान्तों में मांग का अभाव सिद्धान्त विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बेरोजगारी का प्रधान कारण किसी विशेष समय में देश में प्रभावपूर्ण मांग की कमी है, पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था में उत्पादन का कार्य विभिन्न उत्पादकों द्वारा स्वतंत्र निर्णय के आधार पर किया जाता है।

इन उत्पादकों को बाजार की कुल मांग का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता, इससे कभी-कभी मांग की तुलना में पूर्ति अधिक हो जाती है। पूर्ति की इस अधिकता के कारण मूल्य में कमी होती है, जिससे लाभ की मात्रा घट जाती है। लाभ में कमी के कारण पूंजीपति अपना विनियोजन घटा देते हैं, जिनकी वजह से उत्पादन का स्तर गिर जाता है। उद्योगों का संकुचन होने लगता है और उत्पादन के साधनों को बेरोजगार रहना पड़ता है। इसका कारण यह है कि जब उद्योग धन्धों का संकुचन होता है तो कम ही श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार मांग में कमी से बेरोजगारी का सर्जन होता है, इसे दूसरी तरह से इस प्रकार से भी स्पष्ट किया जा सकता है।

मांग की वृद्धि के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- आय में वृद्धि, फैशन में परिवर्तन तथा सामाजिक स्थिति एवं रहन-सहन के स्तर में वृद्धि इत्यादि। इसका प्रभाव सम्पूर्ण उत्पादन में पड़ता है, जिससे अधिक व्यक्तियों को रोजगार मिल सकता है। इसके विपरीत यदि व्यक्तियों की आय घट जाय। फैशन में परिवर्तन हो अथवा रहन-सहन के तरीकों में अन्तर हो जाये तो इससे मांग कम हो जायेगी जिसका प्रभाव उत्पादन पर पड़ेगा और बेरोजगारी की मात्रा में वृद्धि होगी, वस्तुओं के मूल्य में अन्तर का प्रभाव भी मांग पर पडे़गा और इसका प्रभाव उत्पादन पर पडे़गा।

यदि समाज स्थित हो, यानी उसी जनसंख्या लोगों की अभिरूचि उत्पादन की प्रणाली तथा आय आदि अपरिवर्तनशील हो तो इस सिद्धान्त के अनुसार विनियोजन की मात्रा को एक ऐसे स्तर पर निश्चित किया जा सकता है जहाँ पर उत्पादन का कोई भी साधन बेकार नहीं रह सकता और इस प्रकार देश में पूर्ण रोजगार की स्थिति कायम की जा सकती है, किन्तु वास्तव में हम गतिशील समाज में रहते है।, यहाँ सभी चीजें गतिशील हैं तथा जनसंख्या सामाजिक परम्परा, रीति-रिवाज एवं आय आदि में सदा परिवर्तन होते रहते हैं, अतएव ऐसी स्थिति में बेरोजगारी की समस्या भी यदा-कदा उत्पन्न होती ही रहती है। विलियन बेवरिज ने बेरोजगारी के निम्नलिखित तीन कारण बतलायें है :
  • (अ) उद्योग की वस्तुओं की कुल मांग में निरन्तर होने वाली कमी।
  • (ब) मांग का अनुचित दिशाओं की ओर स्थानान्तरण, और
  • (स) श्रम बाजार का अकुशल संगठन, जिसके परिणामस्वरूप कभी पर्याप्त और कभी अत्यधिक मात्रा में मनुष्य नौकरी की तलाश में इधर-उधर फिरते हैं, बेरोजगारी रोकने के लिए इन तीन दिशाओं में एक साथ ही उपाय होने चाहिए। यद्यपि पहली दिशा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

Comments

Post a comment