योग का अर्थ, परिभाषा एवं स्वरूप

अनुक्रम
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के युजिर् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-’सम्मिलित होना’ या ‘एक होना’। इस एकीकरण का अर्थ जीवात्मा तथा परमात्मा का एकीकरण अथवा मनुष्य के व्यक्तित्व के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक पक्षों के एकीकरण से लिया जा सकता है। 

(i) पतंजलि के अनुसार:- योग सूत्र’ के प्रथम भाग में पतंजलि के योग की परिभाषा इस प्रकार दी है: ‘योगश्चित्तवृत्तिर्निरोध’ अर्थात ‘चित्त वृति का निरोध करना ही योग है।’ मन में उठने अनेक विचारों के अनवरत प्रवाह को चित्त वृत्ति अथवा मन की विचार-शक्ति कहते है। 

(ii) वेदान्त के अनुसार:- जीव और आत्मा के मिलन को ‘योग’ नाम दिया गया है। 

(iii) सर्वपल्ली राधकृष्णन के अनुसार:- ‘‘योग वह पुरातन पंथ है जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। 

योग के स्वरूप 

(i) पतंजलि योग:- योग दर्शनाकार ऋषि पतंजलि ने योग साधना को क्रमश: आठ भागों में बाँटा है, जिसे अष्टांग योग के नाम से भी पुकारते हैं। योग के ये आठ अंग है। 
  • यम:-यम पाँच प्रकार के है:- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह । 
  • नियम:- आचरण सम्बन्धित बातों के पालन को नियम कहते हैं। ‘‘पातंजल योग दर्शन’’ ने नियम के पांच भेद किये हैं। 1. शौच, 2. संतोष, 3. तप, 4. स्वाध्याय, 5. ईश्वर प्रर्णिधान। 
  • आसन:-जिस रीति से स्थिरतापूर्वक बिना हिले डुले दीर्घ काल तक सुख के साथ बैठ सके वही आसन है। 
  • प्राणायाम:- आसन केसिद्ध हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति को यथाशक्ति नियंत्रित करना प्राणायाम कहलाता है। 
  • प्रत्याहार:-प्रत्याहार दो शब्दो के सयांेग से बना है। प्रति  आहार व प्रत्याहार अर्थात इंद्रियों द्वारा अपने-अपने विषयों का योग न करना ही प्रत्याहार है। 
  • धारणा:-धारणा से चित्त की चंचलता दूर होती है। इसके लिए शरीर के किसी एक विशेष भाग में अथवा ब्राह्म प्रदेश में एक बिन्दु पर स्थिर (एकाग्र) करने की क्रिया ‘धरणा’ कहलाती है।
  • ध्यान:- विश्व मे बिखरे हुए सब विचारों को समेट कर किसी एक ही विषय पर जमा देना-वहाँ से हटने न देना-हट जाने पर बार-बार खींच कर उसी विषय पर लगना-इसका नाम ध्यान है। 
  • समाधि- समाधि अष्टांग योग की अन्तिम अर्थात् आठवीं सीढ़ी है इस अवस्था मे आत्मा एव परमात्मा का मेल होता जाता है अथवा आत्मा एव परमात्मा एक हो जाते है। 
(ii) ज्ञान योग:- गीता के भगवान् जिस योग की शिक्षा देते हैं, वह योग ज्ञान पर आधरित होने के कारण ‘ज्ञान योग’ कहलाता है। 

(iii) कर्मयोग:- कर्म शब्द ‘कृ’ धतु से उक्त हुआ है। जिसका तात्पर्य करना होता है। जो कुछ भी किया जाता है, वही कर्म होता है। 

(iv) भक्तियोग:- परम भक्त नारद मुनि भक्ति योग की परिभाषा देते हुए कहते हैं ‘सा तस्मिन परमप्रेम रूपा’ अर्थात् भगवान के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। 

(v) मन्त्र योग:-मन्त्रयोग एक प्रकार का विज्ञान है, जिससे हम इस ससांर-सागर से पार हो जाते है। मन्त्ऱ - इन दो अक्षरों के संयोग से मन्त्रा शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता हैं मनन करने से त्राण होना (मननात् त्रायते इति मन्त्रा:)। शर्मा शिवदत्त, (1935) मंत्र के सहारे जीवात्मा और परमात्मा का मिल मंत्रयोग है। मन्त्रयोग का लक्ष्य दीर्घकाल तक मंत्रों का जप करना तथा अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त ज्ञान को प्राप्त करना है। 

मंत्रयोग के अनुसार जीव के देह में प्राणशक्ति नि:श्वास और प्रश्वास के रूप मे कार्य करती है। श्वांस बाहर निकलते समय ‘हम्’ रूप में आवाज करता है और भीतर प्रवेश करते समय ‘स:’ रूप मे। यही हंसविद्या, हंसमंत्र या अजपाजाप है। प्रत्येक जीवन निरन्तर इसका जप करता रहता है। सामान्यत: प्रत्येक जीव में यह ‘हंस’ इस रूप में रहता है। गुरूकृपा से येाग-लाभ करने पर यह मंत्र ‘सोSहम्’ हो जाता है। जब श्वास-प्रश्वास से ‘सोहम्’ का जप होने लगता है तब मंत्रयोग की यथार्थ साधना आरम्भ होती है। 

(vi) मंत्र वर्णात्मक :- या शब्दात्मक होते हैं। शब्द को ही अवस्था-भेद से नाद, विन्दु और कला कहा जाता है। 

(vii) राजयोग:-राज का अर्थ सम्राट को माना जाता है। राज योग को विशेष रूप से लाभदायक योग माना जाता है। यह मनुष्य को अपनी मानसिक शक्तियों का उपयोग करने हेतु विशेष रूप से प्रोत्साहित करती है। 

उर्पयुक्त सभी योगो का लक्ष्य राजयोग है। राजयोग वेदान्त का साधन-मार्ग है। श्रवण, मनन निदिध्यासन और साक्षात्कार इस योग के चारसोपान हैं। इससे कैवल्य या मोक्ष की प्राप्ति होती है (शर्मा जयप्रकाश., 2006) 

(viii) कुण्डलिनी योग:- कुण्डलिनी को ही शब्दमयी ज्ञानरूपा होने के कारण सरस्वती भी कहते हैं, कुण्डलिनी जागने पर जब वह नीचे से ऊपर मस्तिष्क मे चढ़ती है तब कुण्डलिनी की क्रियायें साध्क को पत्यक्ष अनुभव में आती हैं।

(ix) हठयोग:-ह और ठ प्रतीकात्मक वर्ण हैं। ह दाहिने ओर के श्वास-प्रवाह तथा ठ बाएँ ओर के श्वास-प्रवाह को व्यक्त्त करता है। शर्मा जय प्रकाश, एट अल., 2007 के अनुसार हठयोग मूलत: शारीरिक और श्वास सम्बन्धी व्यायामों का विवचेन करता है। हठयोग का अर्थ है देह-स्थित सूर्य ह) और चन्द्र (ठ) का एक्ेय साधना। इस साधना से देह के सभी दोष तथा जड़ता दूर होते हैं। देह-शुद्धि इसका लक्ष्य है। इसक े बीस अंग है। प्रथम आठ अंग मे हैं जिनका वर्णन पांतजलि योग के प्रसंग में हुआ है। उनक े अतिरिक्त बारह अंग हैं महामुद्रा, महाबन्ध, महाबोध, खेचरी और जालंधन, उड्डीयन, मलबन्ध, नादानुसंधान, सिद्धान्त-श्रवण, वज्रोली, अमरोली और सहजोली। इस सभी अंगों का वर्णन हठयोग-प्रदीपिका में विस्तार से किया गया है। हठयोग के अभ्यास से राजयोग में प्रवेश होता है। 

हठयोग के द्वारा कुण्डिलिनी-शक्ति को जगाया जाता है और उसको सहस्त्रार-चक्र तक ले जाया जाता है। गुडिलिनी आधार-शक्ति है। वह समस्त जगत् का आधार है। उसकी कल्पना सर्प-रूप में की गयी है। साधारण पुरूषों में वह नाभि के नीचे सोई हुई अवस्था मे विद्यमान रहती है। योगी लोग सबसे पहले उसको जगाते हैं और फिर जगाकर उसको क्रमश: मूलाधार-चक्र, स्वधिष्ठान-चक्र, मणिपुर चक्र, विशुद्ध चक्र और आज्ञा-चक्र तक ऊपर ले जाते हैं। ये चक्र प्रत्येक मनुष्य के शरीर में नाभि प्रदेश के ऊपरी भाग से लेकर दोनों भौहो के मध्य तक थोड़-ेथोड़े अन्तर मे मेरूदण्ड के ऊपर स्थित है। फिर शिर के ऊपरी भाग के मध्य में ब्रहृन्ध है-वहीं सहस्त्रार-चक्र है। वह प्रतिक्षण अमृत गिराता रहता है। जब कुण्डलिनी आज्ञा-चक्र से उठकर सहस्त्रार-चक्र में जा बैठती है तब जीव को अमृत रस पीने को मिलता है। तब वह सिद्ध हो जाता है यही हठयोग की साधना का संिक्षप्त वर्णन हैं। 

(x) लययोग- लययोग चित्त का निरोध है। वह अनेक उपयो स ेसिद्ध होता है। जिस किसी उपाय से चित्त का निरोध हो और तत्पश्चात् परमात्मा का ध्यान हो, तब सब लययोग के अन्तर्गत आता है। मनुष्य के देह मे तीन मुख्य नाड़ियां हैं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इड़ा और पिगंला में प्राण-प्रवाह से जीव बहिर्मुखी होता है और वह लय-योग का अरम्भ करने लगता है। “ाण्मुखी मुद्रा के अभ्यास से लय-योग की साधना की जाती है।

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