मैत्रेयी पुष्पा का जीवन परिचय, व्यक्तित्व, कृतित्व और उपलब्धियाँ

अनुक्रम
मैत्रेयी पुष्पा का जीवन परिचय
मैत्रेयी पुष्पा 

कथाकार मैत्रेयी पुष्पा का जन्म 30 नवंबर 1944 को अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गाँव के एक गरीब किसान ब्राह्मण के घर में हुआ। मैत्रेयी पुष्पा का आरंभिक जिला झाँसी के ‘खिल्ली’ गाँव में व्यतीत हुआ। मैत्रेयी पुष्पा का नाम पुष्पा हीरालाल पांडेय है। पिता मैत्रेयी कहकर पुकारते थे तो माता पुष्पा कहकर। मैत्रेयी पुष्पा ने पीहर और ससुराल के दोनों नाम त्यागकर पिता और माता के प्रिय नाम मैत्रेयी पुष्पा से साहित्य क्षेत्र में प्रवेश किया।

मैत्रेयी पुष्पा के पिता का नाम पंडित हीरालाल पांडेय तथा माता का नाम कस्तूरी। हीरालाल का जन्म उपाध्याय गोत्र के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मैत्रेयी के पिता अड़तालिस बीघे खेत के मालिक थे। परन्तु पिता खेती के काम करने के बदले लड़कियों की खरीद-फरोख्त करने में ही अपना सारा समय गवाँ देते थे। परिश्रम कर अनाज उगाने की अपेक्षा लड़कियों का सौदा करने का धंधा अच्छा लगता था। बदचलनी और दुष्चरित्र के चलते हीरालाल को कोई अपनी बेटी देने के लिए राजी न होता।

मात्र आठ सौ रुपये हीरालाल पांडेय अपनी गृहस्थी चलाने के लिए कस्तूरी को पत्नीस्वरूपा खरीद लेता है। पिता के देहांत के समय मैत्रेयी मात्र अठारह महीने की थी। मैत्रेयी की माँ कस्तूरी कर्मठ और ईरादों की दृढ़ थी। पति की अचानक मृत्यु के उपरांत विधवा माँ पर पढ़ने की धुन सवार हो गई। बूढ़े तथा गठिया से ग्रस्त ससुर के पास अपनी दुधमुँही बेटी को छोड़कर ढाई कोस पैदल चलकर स्कूल पढ़ने जाती थी। माँ का एक ही लक्ष्य था कि शिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़ा होना। शिक्षा प्राप्त कर मैत्रेयी की माँ ने ग्रामसेविका की नौकरी की। शिक्षा और नौकरी के कारण मैत्रेयी का बचपन और बच्चों जेसे लुभावना और मनभावन नही था। माँ की मीठी आवाज से अंगड़ाई लेते हुए उठना और रात में राजा-रानी की कहानियों को सुनते-सुनते माँ की बाँहों में सोना मैत्रेयी के नसीब में था ही नही। वह तो माँ के ईशारों पर उठती-बैठती तथा माँ उनके लिए ईश्वर की जीती-जागती प्रतिमा थी।

मैत्रेयी पुष्पा की शिक्षा

खिल्ली गाँव से दो कोस पर मोंठ के स्कूल में मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आरंभिक शिक्षा पूर्ण की। मैत्रेयी एक मात्र पढ़ने वाली लड़की थी। माँ का मकसद था कि मैत्रेयी पढ़-लिखकर विदुषी बने और पुरुषों की गुलामी करने की बजाए स्वाभिमान से अपना जीवन जीए। मैत्रेयी पुष्पा ने इंटरमीडिएट की परीक्षा डी.वी. इंटर कॉलेज मोंठ से सन 1960 में पास की। बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी से सन 1962 में बी. ए. और सन् 1964 में हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया।

मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी शिक्षा के दौरान गाँव से मोंठ के स्कूल के रास्ते पर, लड़कों द्वारा अलीगढ़ में संयोजिका के बेटे द्वारा माँ ने अलीगढ़ में रिश्तेदार के घर पर ठहरने के लिए प्रबंध किया वहाँ भी वृद्ध रिश्तेदार द्वारा, डी.बी. कॉलेज के प्रिंसिपल द्वारा एक्स्ट्रा क्लास के बहाने आदि हर मोड़, हर गली, हर चौराहे पर शारीरिक शोषण का प्रयास किया गया। माँ की बेरहमी और कड़े अनुशासन में रोते-रोते, पुरुषों की हवसभरी दृष्टि और शोषण के संकटों से जूझते हुए, ठोकरे खाते हुए अपना बचपन और स्कूली तथा कॉलेज का जीवन बीत गया।

मैत्रेयी पुष्पा का वैवाहिक जीवन 

सत्रह वर्ष की उम्र में मैत्रेयी पुष्पा ने माँ से अपने विवाह की इच्छा जताई। पिता के न होने और माँ की नौकरी के चलते मानसिक और शारीरिक व्याभिचारों से छुटकारा पाने के लिए मैत्रेयी के पास विवाह ही एक मात्र परिहार्य था। इस उम्र में शादी कर गृहस्थी संभालना माँ को कतई पसंद नही था। वह चाहती थी कि मैत्रेयी आगे और पढे तथा अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। बेटी की शादी तय करने के लिए कस्तूरी जहाँ भी जाती वहाँ जन्मपत्री की जगह माक्र्सशीट लेकर जाती थी। स्त्री द्वारा रिश्ता ले जाने पर न जाने कितनी बार कस्तूरी को उपहास का पात्र बनना पड़ा, समाज के ताने सहे। कस्तूरी भी सिद्धांतों की पôी थी उसने अपनी बेटी को ऐसे घर में ब्याहने की ठानी थी जहाँ मैत्रेयी को दहेज नही बल्कि उसकी काबलियत और शिक्षित होने के आधार पर स्वीकारे। मैत्रेयी की बुआ विद्या द्वारा लाया गया डॉ. रमेश चन्द्र शर्मा का रिश्ता और प्रस्ताव कस्तूरी को पसंद आने पर मैत्रेयी का विवाह निश्चित हो गया। बिदाई के समय कस्तूरी ने अपनी बेटी को सूटकेस में घर-गृहस्थी की उपयोगी वस्तुओं की अपेक्षा किताबें दी थी और कहा था लाली वहाँ जाने के बाद पीएच.डी. करने के बारे में सोचना।

विवाह के समय वह उन्नीस वर्ष की थी। विवाह के उपरांत मैत्रेयी पुष्पा अलीगढ़ में रहने लगी। पति रमेशचंद्र शर्मा को दिल्ली के एम्स अस्पताल में नौकरी मिलने के बाद वे दिल्ली में रहने लगे। मैत्रेयी जी का अधिकांश जीवन गाँव में बिताने के कारण दिल्ली जेसे महानगर में रहना थोड़ा-सा कठिन हुआ।

मैत्रेयी पुष्पा की संतान 

कथाकार मैत्रेयी पुष्पा जी की गोद तीन पुत्रियों से अलंकृत हुई। बड़ी बेटी नम्रता, मझली मोहिता तथा सबसे छोटी सुजाता। मैत्रेयी जी की तीनों बेटियाँ अपने पिता की तरह ही डॉक्टर हैं। वैवाहिक जीवन : मैत्रेयी पुष्पा जी ने 27 मार्च 2008 के देनिक जागरण समाचार पत्र में विज्ञान भूषण को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘मैंने अपने पात्रों और चरित्रों की तरह खुद को भी नही छोड़ा है। सच तो ये है कि साहित्य में ईमानदारी बरतने के लिए मैंने अपनी जिंदगी को भी दांव पर लगा दिया।”

शादी के बाद दिल्ली जेसे शहर में रहना थोड़ा-सा मुश्किल था। क्योंकि मैत्रेयी का अधिकांश जीवन गाँव में ही बाता था। दिल्ली जैसे महानगर में अन्य पुरुषों के साथ बातचीत करना आम बात है। मैत्रेयी पुष्पा का डॉ. सिद्धार्थ से बातचीत करना और लोगों का बातें बनाने से मैत्रेयी के पति डॉ. शर्मा को अपमान महसूस होता था। डॉ. शर्मा पत्नी मैत्रेयी से शिकायत करते हुए कहते हैं, ‘‘सुनो लोग कह रहे हैं, मिसेज शर्मा को डॉ. शर्मा नही भा रहे हैं। लोग कह रहे हैं मिसेज शर्मा को डॉ. सिद्धार्थ डुगडुगी की तरह नचा... (रहे हैं)।”

डॉ. शर्मा की इन बातों से मैत्रेयी को उनका पुरुष भाव स्पष्ट नजर आता है। पाटÊ में डॉ. सिद्धार्थ के साथ नाचने पर डॉ. शर्मा मैत्रेयी पर अपने मनोभाव जताते हुए कहते हैं, ‘‘ध्यान रखना, मैं इतना अंग्रेज भी नही कि अपनी बीवी को पराये मर्दों के साथ... आखिर हमारे भी तो संस्कार हैं।” मैत्रेयी पुष्पा जी ने अपने वैवाहिक जीवन यात्र में ऐसे अनेक तथ्यों को भोगा है।

मैत्रेयी पुष्पा का साहित्य लेखन की प्रेरणा

मैत्रेयी पुष्पा को साहित्य के प्रति रूझान तो लगभग बचपन से ही था। उन्हें तीसरी कक्षा से ही कविता पढ़ना अच्छा लगता था। छोटी उम्र में ही उन्होंने ऐसे पत्र लेखन आरंभ कर दिये थे। जिससे उधार पटाने वाले लोग पत्र पढ़कर उनकी माँ को स्वयं ही लगान के पैसे दे जाया करते थे। मैत्रेयी जी ने वास्तविक रूप से साहित्यिक लेखन का आरंभ विवाह के उपरांत ही किया। मैत्रेयी जी का प्रथम काव्य संग्रह ‘लकिरे’ हैं। उस काव्य संग्रह को छपवाने का प्रयास किया।

मैत्रेयी जी को लेखिका के रूप में पहचान दिलाने में राजेंद्र यादव ने सहायता की है। उनकी लेखन प्रतिभा को निखारने का और उसे हंस पत्रिका के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर प्रसिद्धी दिलाने का पूरा श्रेय राजेंद्र यादव जी को ही जाता है।

मैत्रेयी पुष्पा जी जब इंटर में पढ़ रही थी उस वक्त ‘बाड़े की औरतों के लिए’ नामक कविता लिखकर निम्न वर्ग की महिलाओं के प्रतिहीन भावनाओं और उच्च वर्गों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने वाली कुप्रथा का पर्दाफाश किया। कविता अखबार में क्या छपी, मकान मालिक ने लेखिका को घर से बाहर निकाल दिया। बाड़े के सभी लोग मैत्रेयी से मानहानि की बातें करने लगे। लेखिका ने जब भी ईमानदारी से अपनी कलम को रफ्तार देने की कोशिश की तभी बदनामी का सामना करना पड़ा।

मैत्रेयी के काव्य से कथा के सफर में बेटी नम्रता का हाथ नजर आता है। कविताएँ पढ़ने के उपरांत बेटी नम्रता ने कहा, ‘‘कहानी लिखो मम्मी, कविता में आप खुद को विस्तार से व्यक्त नही कर पाती। याद है, हमारी स्कूल मैग्जीन के लिए आपने एक कहानी लिखी थी ‘हबेली’।”

लेखिका ने अपने साहित्यिक यात्र का शुभारंभ इस प्रकार किया और आज साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं। 1990 में ‘स्मृति दंश’ नामक उपन्यास से लेखिका मैत्रेयी ने साहित्य जगत में पदार्पण किया। लघु उपन्यास ‘स्मृति दंश’ को अगनपाखी नाम से फिर से लिखा गया। 

मैत्रेयी पुष्पा का कृतित्व

उपन्यास

1) स्मृतिदंश
2) बेतवा बहती रही
3) इदन्नमम
4) चाक
5) झूला नट
6) अल्मा कबूतरी
7) अगनपाखी
8) विजन
9) कस्तूरी कुण्डल बसै
10) वही ईसुरीफग

कहानियाँ

1) चिहनार
2) ललमनियाँ
3) गोमा हँसती है
4) दस प्रतिनिधि कहानियाँ

नारी विमर्श

1) खुली खिड़कियाँ
2) सुनो मालिक नारी विमर्श सुनो
3) फइटर की डायरी

आत्मकथा

1) गुड़िया भीतर गुड़िया

नाटक

1) मंदाक्रांता

मैत्रेयी पुष्पा की उपलब्धियाँ

मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी लेकनी से जिस बेबाकी तौर से इस भ्रष्ट, अश्लील, पुरुषप्रधान समाज का चित्रण किया है तथा नारी संबंधी समस्याओं का उजागर तो किया सथा ही उनका निवारण भी अपनी लेखनी से व्यक्ति किया है, इसी अनोखे लेखन को पाठकों ने सराहा है। लेखन की सरल, सुगमता, सौंदर्यता केुलस्वरूप उन्हें अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
  1. हिन्दी अकादमी द्वारा साहित्य कृति सम्मान।
  2. कथा पुरस्कार ‘फैसला’ कहानी के लिए।
  3. उत्तर प्रदेश द्वारा प्रेमचंद सम्मान 1995 में ‘बेतवा बहती रही’ कृति के लिए।
  4. ‘इदन्नमम’ उपन्यास पर नंजनागुड्डू तिरूमालंबा पुरस्कार 1996 (शाश्वती संस्था, बैंगलूर)
  5. मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा वीर सिंह जू देव पुरस्कार व कथा सम्मान।
  6. साहित्य सम्मान हिन्दी अकादमी, दिल्ली
  7. सार्क लिटरेरी अवार्ड।
  8. ‘द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायतीराज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार।
  9. ‘सुधा साहित्य सम्मान 2008’ हंसाक्षर ट्रस्ट और गालिब इंस्टीटयूट दिल्ली।

Comments