महिला सशक्तिकरण कानून

अनुक्रम
सरकार कानूनी विधानों के द्वारा भी महिला सशक्तिकरण को प्रेरित करने का प्रयास कर रही है। 

महिला सशक्तिकरण कानून

भारतीय संविधान, कानून, अधिनियम, विशिष्ट अध्यादेश, महिला आरक्षण, पंचायती राज व्यवस्था एवं विकास कार्यों द्वारा महिलाओं के सशक्तिकरण सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु प्रदत्त अधिकार-

1. अनु० 14 समता का अधिकार - इसके तहत महिला और पुरुष दोनों को राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान किये गए हें।

2. अनु० 15(3) - के द्वारा महिलाओं को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान कर शिक्त्त सम्पन्न (अधिकार सम्पन्न) बनाने की विशेष व्यवस्था की गई है। अनु० 15 द्वारा अवसर की समता प्रदान की गई हे। इसमें धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध है। इसके तहत सार्वजनिक स्थानों में जाने एवं सार्वजनिक के लिए बनाये गए कुँओं, तालाबों, स्नानघरों इत्यादि के प्रयोग पर कोई प्रतिषेध न होगी। इस अनुच्छेद की या अनु० 29 के खण्ड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक ओर शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किसी भी वर्ग की उन्नति के लिए या महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।

3. अनु० 16: - लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता - (1) राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी। (2) राज्य के अधीन किसी भी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी एक के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न ही उससे विभेद किया जाएगा। (3) इस अनु० की कोई भी बात संसद को ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो किसी भी राज्य या संघ, राज्य क्षेत्र की सरकार के या उनमें से किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या राज्य क्षेत्र या संघ के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा निहित करती है। (4) इस अनु० की कोई बात राज्य के पिछड़े नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। (5) इस अनु० की कोई बात ऐसी विधि के प्रवर्त्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी जो यह उपबंध करती है कि किसी भी धार्मिक या सम्प्रदायिक संस्था के कार्यकाल से संबंधित कोई पद्धारी या उसके शासीनिकास का कोई सदस्य किसी विशिष्ट धर्म को मनाने वाला या विशिष्ट सम्प्रदाय का ही हो।

4. अनु० संख्या (19) - के अनुसार समान रूप से सभी महिलाओं ओर पुरुषों के सभी अभिव्यक्तियों की स्वतंत्रता प्रदान की गई हे।

5. अनु० 21 - में प्रावधान हे सभी नागरिकों को समान रूप से प्राण एवं दैहिक स्वाधीनता से संबंधित व्यवस्था का अधिकार प्राप्त होगा।

6. अनु० 23 - के अन्तर्गत मानव समुदाय के व्यापार तथा मनुष्य से भीख मंगवाने या इसके समकक्ष कार्य करवाने, जबरन बंधुआ मजदूरी करवाने को निषेध किया गया है। तथा इस व्यवस्था का किसी भी प्रकार से उल्लंघन कानूनी अपराध हे एवं इसके लिए कानून के द्वारा सजा का प्रावधान है। क्योंकि मानव समुदाय का व्यापार अवैध हैं स्त्री एवं पुरुष का वस्तु की तरह या अन्य तरह से उपयोग करना, बेचना या इसका निपटारा करना तथा स्त्री एवं बच्चों का अनैतिक उद्देश्यों से इस्तेमाल कानूनन अवैध घोषित किया गया है।

7. अनु० 39 (अ) - के तहत राज्य अपनी नीतियों द्वारा महिला ओर पुरुष दोनों के लिए रोजगार के समान अवसर सुनिश्चित करेगा।

8. अनु० 39 (ग) - इसके द्वारा समान कार्य हेतु महिलाओं के लिए पुरुषों के समान ही वेतन की सुनिश्चित व्यवस्था की गई है।

9. अनु० 40 - इसके तहत पंचायती राज संस्थाओं में 73वें, 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से महिलाओं के लिए राजनीतिक ‘आरक्षण’ की व्यवस्था की गई हे। 

10. अनु० 42 - यह राज्य को निर्देशित करता है कि वह सुनिश्चित करें कि महिलाओं से मानवीय आधार पर कार्य लियें जाए तथा प्रसव काल के दौरान उन्हें प्रसव अवकाश एवं आर्थिक सहायता दी जाए।

11. अनु० 47 - इसके तहत महिलाओं के लिए पोषाहार, जीवन स्तर तथा लोक-स्वास्थ्य में सुधार करना सरकार का दायित्व है।

12. अनु० 51 (क) - वैसी अपमान जनक प्रथाओं को छोड़ने एवं त्यागने को विवश करता हे, जो अर्पतिष्ठाजनक हो तथा महिलाओं की गरिमा के विरूद्ध हो।

13. अनु० 330 - की व्याख्यानुसार 84वें संविधान संशोधन के जरिये लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण की उचित अनुपात में व्यवस्था सुनिश्चित करना।

14. अनु० 332 (क) - के आधार पर यह व्यवस्था की गई हे कि 84वें संविधान के जरिये राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करना जिससे पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति तथा जनजातीय समाज की महिलाएँ आगे बढ़ सके।

15. प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 का मुख्य उद्देश्य गर्भावस्था में बालिका भ्रूण की पहचान कराने वाले तकनीक पर रोक लगाना।

16.73वाँ ओर 74वाँ संविधान संशोधन, 1993 - के माध्यम से महिलाओं को त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था करने हेतु प्रावधान सुनिश्चित किया गया हे।

17. वैश्य वृति निवारण (संशोधन 1956 का) अधिनियम, 1986 - के द्वारा भारत महिलाओं को अनैतिक कार्यों में दुरुपयोग करने वालों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाना।

18.स्त्री अशिष्ट निरूपण निषेध अधिनियम, 1986 - के माध्यम से महिलाओं के अश्लील चित्र प्रदर्शन एवं आपत्तिजनक बैनर पोस्टर आदि पर रोक लगाना।

19. अन्तर्राज्यिक प्रवासी कर्मकार अधिनियम, 1979 - द्वारा कुछ विशेष नियोजन स्थलों में महिलाओं के लिए सुविधा जनक स्थल पर अलग से शौचालय तथा स्नानगारों की व्यवस्था सुनिश्चित करना।

20. बाल विवाह निषेध अधिनियम, 1976 - में प्रावधान किया गया है कि कम उर्म की बालिकाओं के विवाह पर रोक लगे।

21. प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 - में प्रावधान किया गया है कि 80 कार्य दिवस पूरे होने पर महिला कर्मियों को प्रसव। गर्भपात हेतु आवश्यक रूप से निर्धारित अवकाश तथा चिकित्सा सुविधा दिया जाना।

22. कर्मचारी राज्य बीमा विनियमन अधिनियम, 1952 - के आधार पर प्रसूति लाभ के लिए दावा को चिकित्सकीय र्पमाण-पत्र की तिथि से मान्य किया जाना।

23. खान अधिनियम, 1952 - यह सुनिश्चित करता हे कि भूमिगत खानों में महिलाओं के नियोजन पर प्रतिबंध लगाया जाय।

24. बगान श्रम अधिनियम, 1951 - के द्वारा इस बागान में काम के मध्य में महिला कर्मकारों को अपने बच्चों को दूध पिलाने हेतु अवश्य ही अवकाश दिया जाना चाहिए। 

25. विशेष विवाह अधिनियम 1954 - इस अधिनियम के अनुसार विवाह करने वाले अपने धर्म, सम्प्रदाय और जाति में बिना परिवर्त्तन किये किसी भी धर्म सम्प्रदाय ओर जाति में शादी आपसी सहमति के आधार पर कर सकते हें और समाज में वह शादी वैध मानी जाएगी।

26. हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 - यह भारतीय संसद द्वारा सन् 1955 में पारित किया गया और इसे 18 मई 1955 से जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में लागू किया गया। इसके अन्तर्गत शादी की उर्म निर्धारित की गई हे। देश में यह अधिनियम केवल अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता हे। इस अधिनियम के पूर्व हिन्दू-विवाह संबंधी कानून संहितावद्ध नहीं था। वह श्रुति, स्मृति, टीकाओं ओर रीति रिवाजों पर आधारित था। उसमें स्त्रियों को बहुत कम अधिकार दिये गए थे। पुरुष बहु विवाह कर सकते थे पर महिलाएं नहीं। इस अधिनियम में अन्तर्जातीय विवाह, तलाक, विवाह की अकृतता या समाप्ति, न्यायिक पृथक्करण, दाम्पत्य अधिकारों की पुन: स्थापना इत्यादि का प्रावधान नहीं था। इस अधिनियम के पारित हो जाने के बाद विवाह संबंधी वे सभी नियम शर्तें विधि प्रथाएँ जो इनके पारित होने के पूर्व लागू नहीं थी, परन्तु जिनके स्थान पर इस अधिनियम में उपबंध किया गया हे प्रभाव शून्य माने जाएंगे।

27. भरण-पोषण अधिनियम 1956 - इस अधिनियम के तहत एक हिन्दु पत्नी को चाहे वह इस अधिनियम के लागू होने के पूर्व या बाद में ब्याही गई हो, अपने जीवन काल में अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार हे। इन सभी सामाजिक विधानों से समाज में स्त्रियों को न केवल सुरक्षा प्राप्त होता हे, बल्कि उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने में सहायता देते हैं। ये अधिनियम और प्रावधान महिलाओं को राजनीतिक आर्थिक क्षेत्र में प्रवेश कराने में बहुत ही सहायक है।

28. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम - इसके अन्तर्गत महिलाओं को पुरुषों के समान हक अपने पिता की सम्पति में दिया गया हे, लेकिन पूर्वजों की सम्पति में बेटी का हक बेटे से अभी भी न्यून हे। जबकि महाराष्ट्र राज्य ने कानून बना कर बेटे-बेटी की भिन्नता को दूर किया है।
29. देश में महिलाओं को हक देने वाला कानून - इस अधिनियम में पिता को अपनी सम्पति का वसीयतनामा बनाने का भी हक है। महिला भी पति की म ृत्यु के बाद अपने हिस्से में प्राप्त सम्पति का हस्तांतरण वसीयत द्वारा कर सकती हे।

30. हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956(95) (संशोधन कानून-2005) - हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अनुसार अब पारिवारिक सम्पति पर लड़का-लड़की, महिला-पुरुष को एक समान अधिकार प्राप्त हे। 
  • (क) भारत में सभी राज्यों के ईसाई, मुस्लिम, पारसी तथा यहूदी धर्म को मानने वालों को छोड़ कर हिन्दु धर्म के सभी वर्ग तथा बौद्ध धर्म, जैन धर्म या सिक्ख धर्म मानने वालों पर लागू होता हे। 
  • (ख) हिन्दू उत्तराधिकारी (संशोधन) कानून-2005 सेक्शन 6 के अनुसार बेटी को संयुक्त हिन्दु परिवार में वे सभी सम्पति अधिकार उनको प्राप्त होंगे जो बेटे को हे। 
  • (ग) यह कानून खेती ओर बासगीत जमीन पर महिला एवं पुरूष को बराबरी का हक दिलाता हे। जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार हे। 
  • (घ) एक बेटी को इस प्रकार की सम्पति के मामले में वे सभी दायित्व होगें जो कि एक बेटे को प्राप्त होते हैं। (Section 6) 
  • (ड़) हिन्दू उत्तराधिकार कानून-1956 (संशोधन कानून 2005) के अनुसार महिला अपने सम्पति के संबंध में किसी प्रकार का निर्णय ले सकती हे। 
  • (च) हिन्दू उत्तराधिकार (मुख्य) कानून-1956 lssection 23 को रद्द करने के बाद, अब महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त हे कि वे सम्पति बंटवारे की मांग कर सकती है। 
  • (छ) यह प्रमाणित करता है कि विवाह पश्चात भी लड़की अपने पैतृक घर की सम्पति में समान रूप से हकदार रहेगी।
31. दहेज निषेध अधिनियम - 1961 में संशोधन कर 1984 ओर 1986 के दहेज निषेध अधिनियम के अन्तर्गत दहेज लेने देने के लिए उसकाने को संज्ञेय अपराध घोषित किया गया हे। इस अपराध के लिए 5 वर्ष के कारावास तथा 15,000 रूå जुर्माना की व्यवस्था की गई हे। इस अधिनियम द्वारा अपराध को गैरजमानतीय घोषित किया गया हे। दहेज हत्या के अपराध को भारतीय दंड संहिता में आंशिक संशोधन द्वारा सम्मिलित किया गया है। शादीशुदा महिला की शादी के 7 वर्ष के अन्दर संदिग्ध अवस्था में मौत को अपराध संहिता की धारा-498-ए. के अन्तर्गत शामिल किया गया है। इसके अन्तर्गत 3 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना है। इसमें जमानत नहीं हो सकती, न ही कोई समझोता हो सकता हे।

32. सती प्रथा निषेध संशोधित अधिनियम 1987 - इसके तहत धर्म के नाम पर विधवा को जलाने व सती होने के लिए उसकाने तथा सती के महिमा मंडन को अपराध मानते हुए कठोर दण्ड की व्यवस्था करता है।

33. डाक्टर गर्भपात कानून - 1972 - इस कानून से कोई महिला अवांछित बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती हो तो अपनी इच्छानुसार डाक्टर के परामर्श से गर्भपात करवा सकती हे, लेकिन 12 सप्ताह तक के गर्भपात को ही वैध माना जाता है।

34. मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961(96) - महिलाओं को संसार में, मानव अस्तित्व को बनाये रखने के लिए उसे मातृत्व की स्थिति से गुजरना पड़ता है। प्रसव के पूर्व व बाद में महिलाएँ कुछ समय के लिए कार्य करने में सक्षम नहीं रह पाती हैं। किसी भी संस्थान में कार्यरत महिलाओं को प्रसव की स्थिति में विशेष सुविधा एवं सुरक्षा की आवश्यकता होती है। अत: महिलाओं को प्रसव की स्थिति से उत्पन्न कठिनाइयों को देखते हुए भारत में सर्वप्रथम ‘मुम्बई मेटरनिटी एक्ट 1929’ बनाया गया। इसके बाद विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्य के लिए अलग-अलग मेटनिटी एक्ट पारित व लागू किये हें।

मातृत्व लाभ का पहला ब्रिटिश कानून, 1941 में बनाया गया। उसके बाद कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अन्तर्गत अंशदान की शर्त पूरी करने पर, पूरे देश के लिए मातृत्व लाभ का प्रावधान रखा गया। कुछ प्रशासनिक दोष, नियोजकों की चालाकी, सामाजिक ओर भोगोलिक दशाएँ इस तरह से प्रमाणित करती थी कि महिला श्रमिक ठीक ढंग से मातृत्व लाभ या अवकाश प्राप्त नहीं कर पाती थी। अंशत: भारत सरकार ने कामकाजी महिलाओं को मातृत्व लाभ नियमन में एक रूपता लाने के लिए तथा प्रसव की स्थिति में महिला श्रमिकों को विशेष सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से एक कानून पारित किया गया। जिसे ‘मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961’ के नाम से हम जानते हैं। यह केन्द्र सरकार द्वारा 1 नवम्बर 1961 से ही लागू हो गया तथा कुछ संशोधन के बाद आज भी लागू हे।

35. हिन्दु अल्पवयस्क तथा अभिभावक अधिनियम - 1956 - इसके अनुसार हिन्दू अल्पवयस्क बेटे का अभिभावक उसका पिता होता है ओर अविवाहित बेटी का भी अभिभावक पिता ही होता है। नाजायज बच्चों की अभिभावक माँ होती हे ओर उसके नहीं रहने पर अभिभावक पिता होता है। अभिभावक प्राकृतिक होते है। जैसे पिता ओर माता, जबकि विवाह के बाद पत्नी का अभिभावक पति होता है।

36. गोद लेना और निर्वाह भत्ता अधिनियम - 1956 - कोन गोद ले सकते हैं ओर किसे गोद में दिया जा सकता हे के संदर्भ में हिन्दू गोद लेना अधिनियम की धारा 7 द्वारा एक हिन्दू पुरुष या महिला पुत्र या पुत्री दोनों में से किसी को भी गोद ले सकते हें। 37. निर्वाह भत्ता अधिनियम - के संदर्भ में उस पत्नी को निर्वाह भत्ता का हक दिया गया हे, जिसके पति ने उसका परित्याग कर दिया हे या उसके साथ र्कूरता का व्यवहार किया हे। अथवा वह कुष्ठ रोग से पीड़ित हे या वह दूसरी शादी कर नयी पत्नी के साथ रहता हे या उसी घर में दूसरी रखेल ले आया हे तो उसे पति से निर्वाह भत्ता पाने का हक है। जो पति की आमदनी में तीन में एक हिस्सा हो सकता हे।

38. आपराधिक दण्ड संहिता की धारा, 125 - के अन्तर्गत निर्वाह भत्ता का अधिकार असमर्थ हिन्दू पत्नी, नाबालिग बच्चों तथा वृद्धों को भी उनके बच्चों से हे, बच्चा चाहे जायज हो या कानून सम्मत हो, उसे अपने बाप अथवा माँ से निर्वाह भत्ता पाने का हक हे। इस अधिनियम में सौतेली माँ को भी निर्वाह भत्ता का दायित्व उसके सौतेले बेटे या बेटी पर डाला गया है अगर उसके अपने बच्चे न हो तो निर्वाह भत्ता की अधिकतम सीमा 500 रुपये तक ही है।

39. समान मजदूरी अधिनियम - 1976 - में भी महिलाओं के लिए सुविधाजनक संशोधन करते हुए महिला एवं पुरुष दोनों को एक समान कार्य के लिए एक समान वेतन की व्यवस्था की गई हे। ठेका मजदूरी अधिनियम 1978 ठेका मजदूरों के कार्य (श्रम) की शर्तों को सुव्यवस्थित करता हे तथा इन्हें कल्याणकारी सुविधा प्रदान करता हे। वैसी महिला श्रमिकों के लिए जो निर्माण के कार्य से जुड़ी हे उनके बच्चों के लिए शिशु सदन की व्यवस्था करता है।

40. वेदी एवं सीजर कर्मचारी अधिनियम - 1966 - इसकी धारा 14 के अनुसार बच्चों, वयस्क महिला एवं पुरुषों से सुबह 7 बजे से रात्रि 10 बजे तक ही कार्य लिया जा सकता है, वैसे प्रतिष्ठान जहाँ 7 बजे सुबह एवं रात्रि 10 बजे के पश्चात कार्य होते हें वहाँ बच्चों एवं महिलाओं से कार्य लिया जाना वर्जित हे।

41. महिलाओं का अश्लील प्रदर्शन निषेध अधिनियम - 1986 - यह कानून विज्ञापनों में ओरतों के अपमानजनक प्रदर्शनों पर रोक लगाता हे। कोई व्यक्ति ऐसे विज्ञापनों को प्रकाशित नहीं करवा सकता हे, जो महिलाओं का अश्लील प्रदर्शन करता हो। इस कानून की धारा 4 के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, पर्चे, स्लाइड, फिल्म, विज्ञापन, चित्र, फोटो, लेख, आकार आदि का प्रकाशन, बिक्री, आवंटन, प्रसार-प्रचार, डाक द्वारा भेजने व किराये पर देने का काम कदापि नहीं कर सकता हे।

इस कानून का उल्लंघन करने वाले को पहली बार दोषी पाने पर दो साल की सजा और दो हजार रूपये तक का जुर्माना हो सकता है। ओर दूसरी बार या ज्यादा बार दोषी पाये गए व्यक्ति को कम से कम छ: महीने ओर अधिकतम 5 साल तक जेल की सजा ओर जुर्माने के रूप में कम से कम 10 हजार रूपये व ज्यादा से ज्यादा 1 लाख रूपये हो सकते हैं।

42. मुस्लिम महिला (तलाक से सुरक्षा) अधिनियम - 1986 - इस अधिनियम के अनुसार तलाक शुदा मुस्लिम महिलाओं को निम्नलिखित हक प्रदान किये गए है : (क) इदत्त की अवधि तक का निर्वाह भत्ता (ख) देन मेहर की रकम (ग) लड़की की शादी में जो भी सम्पति दी गई हो तथा (घ) उसके बच्चों को दो वर्ष की उम्र तक का खाना खर्चा इत्यादि की व्यवस्था करना।

43. बलात्कार विरोधी अधिनियम 1987 (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 एवं 376) - अपराध संहिता कानून 1983 में संशोधन कर बलात्कार के सामान्य मुकदमों में 7 वर्ष तथा हाजत या बंदी गृह में बलात्कार के मामले में 10 वर्ष की सजा की व्यवस्था की गई है। इसमें अधिकतम सजा उम्र कैद भी हो सकती हे। बलात्कार अधिनियम 1987 में महिला की रक्षा हेतु बल दिया गया हे। यह अधिनियम इनके विरूद्ध शोषण का निषेध कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करता हे।

44.राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1980(97) - द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग बनाने की व्यवस्था की गई हें। इसके वैधानिक शिखर नेतृत्व ने समीक्षोपरांत महिलाओं के संविधानिक एवं कानूनी अधिकारों की सुरक्षा हेतु र्पतिकारी (उपकारी) विधान निर्माण का सुझाव दिया है।

45.73वाँ ओर 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 - में पारित हुआ। जिसके द्वारा ग्रामीण पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में सदस्यों एवं सभापति के लिए 46. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम - 1997 के अगस्त माह में सरकारी ओर निजी क्षेत्र की संस्थाओं में कामकाजी महिलाओं के कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण को रोकने के लिए सर्वोच्य न्यायालय पांच सूत्री दिशा निर्देश जारी किये हैं ओर कानून बनाने तक इनके अनुपालन का प्रावधान किया है। इसमें दोषी व्यक्तियों के लिए सजा का भी प्रावधान है। यौन शोषण के अन्तर्गत निम्नलिखित बातें शामिल हो सकती हैं - शारीरिक स्पर्श तथा आगे बढ़ना, यौन अनुग्रह की माँग का प्रार्थना, योनेच्छा से जुड़ी टिप्पणियाँ, अश्लील सामग्री दिखाना, कई अन्य अनचाहा यौन, प्राकृतिक, शारीरिक, मौखिक तथा गैर-मोखिक व्यवहार आदि।

47. घरेलू हिंसा विरोध अधिनियम/महिला संरक्षण कानून - 2005 - इस कानून के अन्तर्गत घरेलू हिंसा से तात्पर्य ऐसी हिंसा से है जो घरेलू रिश्तों में किसी भी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, हित, जीवन, शारीरिक अंग को चोट या मानसिक रूप से हानि पहुँचाती हो, दहेज व अन्य सम्पति की मांग भी इस कानून के तहत दण्डनीय हे। घरेलू हिंसा के अन्तर्गत शारीरिक, योनिक, भावनात्मक, मानसिक या मोखिक तथा आर्थिक हिंसा शामिल हें।

48. र्भूण हत्या निषेध कानून - 1955 - PCPNDT एक्ट 1994 के अन्तर्गत गर्भस्थ शिशु का लिंग जाँच करना/करवाना कानूनन अपराध हे। गर्भवती महिला पर र्भूण जाँच के लिए दबाव डालने वाले किसी भी व्यक्ति को सजा हो सकती हे। भ्रूण की लिंग जाँच करने वाले चिकित्सक को 5 वर्ष तक जेल की सजा और 50,000 रू तक का आर्थिक जुर्माना हो सकता हे। इसके अन्तर्गत सभी अल्ट्रासाउण्ड क्लिनिक का निबंधित होना अनिवार्य हे, फिर भी नगरों या महानगरों में गुप्त रूप से भ्रूण की जाँच कुछ न कुछ की जा रही है।

49. सूचनाधिकार अधिनियम - 2005(98) - ‘सूचनाधिकार अधिनियम’ 13 अक्तूबर 2005 से पूरे देश में लागू हो गया है। भारत में आम लोगों को सूचना का यह अधिकार हासिल करने में वर्षों लगे हैं। वर्तमान समाज में सूचना पाने का अधिकार सबको हे। कोन सी सूचना सही ओर कौन सी सूचना गलत हे, इसके बारे में कोई भी सूचना के अधिकार के तहत संबंधित विभागों से इसकी छान-बीन कर सकता है। RTI व्यक्ति को सरकार से उन सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है जो भ्रष्टाचार को उजागर कर सकती है ओर इसके तहत हम अपनी शिकायत दर्ज भी करा सकते हें।

इस अधिनियम के तहत हम सरकारी समझोते, तनख्वाह, अनुमानित खर्च मशीनरी कार्यों के मानदंड आदि की मांग कर सकते है। सरकारी विभागों से संबंधित सूचनाओं की मांग भी कर सकते है। जिसका संबंध उनके किसी विभाग से है। रोड, निकासी मार्ग, भवन निर्माण, आदि में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्रियों के सरकारी नमूनों की मांग कर सकते हैं, इसके अलावा हम किसी भी सार्वजनिक विकास कार्य के देख रेख की मांग कर सकते हें जो या तो बन चुका हो या निर्माणाधीन हो। हम सरकारी दस्तावेज, कंस्ट्रक्शन, ड्राइंग, रिकार्डबुक और रजिस्टर आदि के निरीक्षण की मांग कर सकते हैं। यदि किसी विभाग में कोई शिकायत या निवेदन किया गया है, तो उस पर क्या कार्यवाई हो रही है इससे संबंधित सूचनाओं को जानने का अधिकार भी आम जनता को है।

‘सूचनाधिकार अधिनियम’ की धारा 2ए ओर 2एच के तहत जनता को केन्द्र सरकार के किसी भी विभाग, पंचायती राज संस्थान, अन्य संगठनों और संस्थानों (NGO) सहित से सूचना प्राप्त करने का अधिकार है जो राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा र्पत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्थापित, संगठित, पूरी तरह से आर्थिक सहायता प्राप्त करते हें। धारा 5(1) के तहत विभागों के P.R.O. से जनता को सूचना प्राप्त करने का अधिकार होगा। धारा 5(2) के अन्तर्गत हर उप जिला स्तर पर असिस्टेंट पी.आर.ओ. होते हें जो पीåआरåओå के निर्णयों के खिलाफ सूचनाओं ओर अनुरोधों के लिए निवेदन स्वीकार करते हें और उन्हें संबंधित अधिकारियों को भेज देते हैं। 

50. अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकार- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ द्वारा देश धर्म लैगिक-भेदभाव ओर जातिगत-भेदभाव के बिना सम्पूर्ण विश्व के प्रत्येक मानव को मूलभूत अधिकार दिलाने के लिए ‘‘मानवाधिकार घोषणा-पत्र‘‘ के नाम से एक महत्वपूर्ण प्रयास किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को जारी ‘‘मानवाधिकार घोषणा-पत्र‘‘ में सभी देशों के प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह महिला हो या पुरुष हो को कम से कम 30 अधिकारों को प्रदान करने की घोषणा की गई है। देश में इसी आधार पर महिलाओं ओर पुरुषों को सहज ओर प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले इन 30 अधिकारों को दिलाने के लिए सरकार द्वारा त्वरित प्रयास किये गए है। अमानवीय त्रासदी से पीड़ित महिलाओं के प्रति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की सजग, निष्पक्ष एवं सार्थक हे। 

(क) राजनैतिक मानवाधिकार - राज. मानवाधिकार किसी भी लोकतंत्रात्मक राष्ट्र या समाज के आधार स्तम्भ माने जाते हैं। इसलिए इसे मानवाधिकारों के सार्वभोमिक घोषणा-पत्र में एक निश्चित स्थान प्रदान किया गया हे, जिन्हें राष्ट्रीयता और ऋण पाने का अधिकार, शांतिपूर्वक सभा एवं संघ गठित करने का अधिकार, सरकार में शामिल होने व आन्दोलन करने की स्वतंत्रता का अधिकार एवं विचार अभिव्यक्ति का अधिकार समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्रदान किया गया है। 

(ख) आर्थिक मानवाधिकार - मानवाधिकार के सार्वभोमिक घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 22 से 27 में वे सभी सामाजिक और आर्थिक अधिकार दिये गए हैं जिनके सभी मनुष्य हकदार है। इनमें सामाजिक सुरक्षा, कार्य करने, आराम करने, अवकाश प्राप्त करने, स्वास्थ एवं सकुशल सुरक्षित जीवन जीने के लिए आवश्यक मानव जीवन स्तर को बनाये रखने के अधिकार वर्णित हैं।

51. अपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 - इसे 2 अप्रैल 2013 को मंजूरी प्रदान की बलात्कार, छेड़छाड़, तेजाब हमला आदि से संबंधित। 

52. विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 17 जुलाई, 2013 को स्वीकृति प्रदान की गई। विधेयक में यह प्रावधान है कि तलाक के बाद महिला की आर्थिक स्थिति में सुधार की गुंजाइश न होने पर विवाह विच्छेद के बाद महिला, पति की पैतृक सम्पति में मुआवजे की हकदार होगी।

53. तेजाब बिक्री के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता - लगातार बढ़ रही तेजाब से हमले की घटनाओं को देश की शीर्ष अदालत ने गंभीरता से लेते हुए 18 जुलाई 2013 को देश के सभी राज्यों ओर केन्द्रशासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया कि वे न तो तेजाब की खुदरा बिक्री पर रोक संबंधी कायदे कानून बनाये, बल्कि एसिड अटैक को गैर जमानती अपराध के दायरे में लाने के लिए भी कानून बनाएँ।

54. विवाह पंजीकरण अब अनिवार्य - 12 अगस्त 2013 को राज्य सभा द्वारा जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2012 को पारित कर दिया गया। इस विधेयक के अनुसार भारत में सम्पन्न किये गए किसी भी विवाह, तो वह किसी भी धर्म के लोगों से संबंधित हो का पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य होगा। इस विधेयक का उद्देश्य महिलाओं को वैवाहिक एवं रख-रखाव संबंधी मामलो में अनावश्यक प्रताड़ना से सुरक्षा।

55. संज्ञेय अपराधों (हत्या, अपहरण, बलात्कार व चोरी आदि) में एफआईआर (FIR) अनिवार्य - सर्वोच्च न्यायालय ने 12 नवम्बर 2013 को फैसला दिया। इसमें यह कहा गया कि इस प्रकार के गंभीर अपराधों में पुलिस यह नहीं कह सकती कि वह जाँच पड़ताल के बाद रिपोर्ट दर्ज करेगी। इसमें पुलिस को किसी प्रकार की ढील नहीं दी जा सकती।

56.21 अप्रैल 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.एस. चौहाण ओर जे. चेलेमेश्वर की खण्ड पीठ ने ‘उदय गुप्ता बनाम आयशा’ मामले में स्पष्ट किया है कि लिव इन रिलेशनशिप अपराध नहीं है तथा इस दोरान संसर्ग से उत्पन्न बच्चे को वैध संतान का दर्जा प्राप्त होगा।

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