भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास

भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास
कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह

मॉस्को में मार्च 1919 को तीसरा अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें रूस के कम्युनिस्ट नेता लेनिन ने शक्ति पर नियंत्रण हेतु अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। लेनिन के नेतृत्व में पहले समाजवादी गणराज्य की स्थापना सोवियत रूस में हो चुकी थी और वह सफलता पूर्वक सरकार का संचालन कर रही थी। यह सफलता पूरे यूरोप सहित एशिया के देशों को समाजवादी शासन की स्थापना के लिए आकर्षित कर रही थी। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत के साम्यवादी विचार वाले नेता जो जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका में रह रहे थे, वे सभी तीसरे अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलन में शामिल होने के लिए मॉस्को पहुँचे। इनमें एम.एन. राय, उनकी अमेरिकन पत्नी एल्विन राय, डॉ. भूपेन्द्र नाथ दत्त, अवानी मुखर्जी, नलिनी गुप्ता, पी.टी. आचार्य इत्यादि शामिल थे। यद्यपि एम.एन. राय ने भारतीय जनता की ओर से कम्युनिस्ट कांग्रेस में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 

अगले वर्ष 18 जुलाई से 7 अगस्त 1920 को रूस की कम्युनिस्ट पार्टी की द्वितीय कांग्रेस हुई, जिसमें एम.एन. राय ने भागीदारी की इसमें भारत का प्रतिनिधित्व अवानी मुखर्जी और पी.टी. आचार्य ने किया। इसी दौरान नवम्बर 1920 में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ, जिसके पहले महासचिव मोहम्मद शकील रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन को लेकर मतभेद रहे हैं। वर्तमान कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार उसकी स्थापना 1925 में कानपुर में हुई थी, तथा ताशकंद में गठित पार्टी में मुख्यत: वे लोग शामिल थे जो विदेशों में माक्र्सवाद के प्रभाव में आए। इनमें एम.एन. राय, एल्विन राय और मोहम्मद अली जैसे नेता थे, लेकिन 1925 में गठित कम्युनिस्ट पार्टी में एस.वी. घाटे और श्रीपाद अमृत डांगे जैसे नेता भारत में मजदूर संघों की परम्परा से निकले थे। एंजिल्स को लिखे पत्र में माक्र्स ने यह उल्लेख किया कि, “भारत की जनता की जो क्रान्ति है और जिस गंभीरता के साथ वे लड़ रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि वे भी हमारे संबंधी हैं।” 

1882 में माक्र्स ने काउट्रस्की को लिखा कि वास्तव में भारत में क्रान्ति की सम्भावना दिखती है तथा लेनिन का मत था कि भारत में भी जनमानस के बीच राजनीतिक जन आंदोलन की चेतना विकसित हो चुकी है। लेकिन लेनिन भारत में कभी भी कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के पक्ष में नही रहे। इस बात से एम.एन. राय से उनका मतभेद रहा। लेनिन के अनुसार सामंतवाद के विरुद्ध भारत में उपजे किसान आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं का समर्थन करना चाहिए; जबकि राय ने अपने ग्रन्थ ‘सोषलिस्ट रिवोल्यूशन’ में कहा कि भारत में स्वतंत्रता के लिए चल रहा संघर्ष बुर्जुवा हाथों में है। असल में यह आंदोलन बुर्जुवा लोकतांत्रिक आंदोलन रह गया है, जिसका गरीब किसानों और मजदूरों के शोषण से कोई सरोकार नहीं है। लेनिन के विचार को मानने वाले भारतीय कम्युनिस्टों ने राष्ट्रीय आंदोलन में सोवियत रूस को अपना आदर्श मानते हुए राष्ट्रीय आंदोलन में अपने शुरूआती दौर में भाग लिया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया। बहरहाल 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ की भूमिका को लेकर भारत के कम्युनिस्टों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया और उन्होंने सोवियत संघ के साम्राज्यवादी युद्ध को ‘जन युद्ध’ घोषित किया और उसके पक्ष में खड़े रहे। 

पी.सी. जोशी ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में 1945 के प्रोविन्षियल एसेम्बली चुनाव में पार्टी की भागीदारी का निर्णय लिया। लेकिन वी.टी. रानाडोव, जी.एच. अधिकारी और अजय घोष ने भारतीय संसद को बुर्जुवा प्रभुत्व संस्थान मानते हुए चुनाव में भाग नहीं लेने का निर्णय लिया। रानाडोव को छोड़कर बाकी दोनों ने जोशी की नीति का “लेनिन संरचना” में रखते हुए समर्थन किया। 28 फरवरी से 6 मार्च 1948 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा कलकत्ता में आयोजित दूसरी कांग्रेस में महासचिव पी.सी. जोशी को दक्षिणवादी संशोधनवाद का पक्षधर मानते हुए महासचिव के पद से हटा दिया गया और वी.टी. रानाडोव नए महासचिव घोषित हुए। जोशी ग्रुप और रानाडोव ग्रुप के बीच इस बात को लेकर संघर्ष छिड़ा कि राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करने की रणनीति क्या होगी? एक पक्ष संसदीय प्रणाली को स्वीकार करने पर बल देता रहा तो दूसरा पक्ष मजदूर वर्ग के साथ सर्वहारा क्रान्ति पर जोर देता रहा। वहीं रानाडोव का मत था कि भारत की आजादी वास्तविक आजादी नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा नव उपनिवेशवाद का ही रूपान्तरण कर दिया गया है। उन्होंने शहर आधारित सोवियत रूस की क्रान्ति की बात करते हुए, भारत के शहरों में मजदूरों के हड़ताल करने पर जोर दिया। इसी दौरान चीन में 1949 की माओ की क्रान्ति ने भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक नई धारा का सूत्रपात किया। 

आन्ध्र प्रदेश के कम्युनिस्ट नेता पी. सुन्दरैया और आर. राजेश्वर राव ने माओ की अवधारणा में विश्वास करते हुए भारत में ‘नए लोकतंत्र‘ की स्थापना की बात रखी। इस तरह मई 1950 में कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आर. राजेश्वर राव ने वी.टी. रानाडोव को पद्च्युत कर महासचिव का पद ग्रहण किया। यद्यपि राव चीन की लाइन में विश्वास करते थे जो क्रान्तिकारी संघर्ष का पक्षधर रहा। उन्होंने नौ सदस्यीय पोलित ब्यूरो में आन्ध्र प्रदेश के चार नेताओं को प्रमुखता दी। इस तरह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर तीन तरह के ग्रुप बने, जिसमें अति चरमपंथी गुट का नेतृत्व राजेश्वर राव के हाथों में रहा, जबकि वी.टी. रानाडोव केन्द्रीय पक्ष और पी.सी. जोशी को दक्षिणपंथी बताया गया। बाद में 1 जुलाई 1951 को केन्द्रीय ग्रुप के अजय घोष पार्टी महासचिव के पद पर काबिज हुए। आजादी के बाद प्रथम आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हुई जिसने लोकसभा में 26 सीटें प्राप्त की। 

कालांतर में भारत-चीन मुद्दे को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर विभिन्न मत प्रकट हुए। यद्यपि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद 1950 के बाद से ही मुद्दा बना रहा, वहीं 1956-57 में तिब्बती दलाई लामा की भारत यात्रा ने भारत और चीन के बीच विवादों को और गहरा किया। इसी बीच भारत-चीन ने पंचशील जैसा समझौता किया था, लेकिन 20 अक्टूबर 1959 को नौ भारतीय पुलिसकर्मियों की चीन द्वारा हुई हत्या, पहला गम्भीर तनाव का विषय बना और इन बातों को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कई समूहों में विभाजित हो गई। एक ओर अजय घोष ने भारत सरकार के बिन्दुओं का समर्थन किया तो वहीं दूसरी ओर आर. रामामूर्ति, ए.के. गोपालन और नम्बूदरीपाद जैसे नेता पार्टी की भूमिका के विरोध में रहे। 

1 नवम्बर 1962 को कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने चीन की भारत के प्रति भूमिका की आलोचना की; जबकि ज्योति बसु, पी. सुन्दरैया और हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसके विरोध में केन्द्रीय सचिवालय से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले 13 जनवरी 1962 को पार्टी महासचिव अजय घोष की मृत्यु के बाद एस.ए. डांगे को चेयरमैन बनाया गया जो दक्षिणी धारा के नेता थे; जबकि केन्द्रीय गु्रप के इ.एम.एस. नम्बूदरीपाद महासचिव बनें। उन्होंने तुरंत इस्तीफा दे दिया साथ ही पार्टी के 32 नेताओं ने नम्बूदरीपाद के साथ पार्टी बैठक का बहिष्कार किया। पार्टी की राष्ट्रीय परिषद् ने अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए पार्टी के सात सदस्यों को निष्कासित कर दिया और 25 सदस्यों को निलम्बित कर दिया। 7 जुलाई 1964 को ज्योति बसु ने उद्घोषणा की कि वे भारत के कम्युनिस्ट दल हैं जिन्हें दोनों ग्रुपों ने मान्यता नहीं दी। इसी परिप्रेक्ष्य में 31 अक्टूबर 1964 को कलकत्ता में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विखण्डन के बाद एक नई कम्युनिस्ट पार्टी बनी जिसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) कहा गया। 

कालांतर में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ही एक अन्य ग्रुप सक्रिय रहा जो चीन के नेता माओ को अपना आदर्श मानता था तथा संसदीय राजनीति का बहिष्कार करते हुए बंदूक से शक्ति प्राप्त करने में विश्वास करता था। उसका मानना था कि अमेरिका जहाँ साम्राज्यवादी है वहीं सोवियत संघ भी सामाजिक साम्राज्यवादी है, साथ ही भारत को अर्द्धसामंती और अर्द्धउपनिवेशी मानते हुए वर्ग संघर्ष का पक्षधर रहा। इस तरह विभिन्न मुद्दों को लेकर सी.पी.एम. से अलग होकर अप्रैल 1969 में एक नई पार्टी बनी जिसे भारतीय कम्युनिस्ट पाटी, (माक्र्सवादी लेनिनवादी) कहा गया जिसने किसानों का पक्ष लेते हुए मजदूर संघों से दूरी रखी। इसके प्रमुख नेताओं में चारू मजूमदार रहे जो पार्टी गठन के बाद सी.पी.आई. (एम.एल.) के महासचिव बने। वे माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में सिलीगुड़ी सबडीविज़न स्तर के नेता थे। इसके बाद कानू सान्याल, खोखन मजूमदार, आसीत सेन, असीम चटर्जी इत्यादि नेता रहे जो भारत में चीन की तरह कृषि क्रान्ति के पक्षधर रहे तथा चीन के नेता को अपना नेता मानते थे। बाद के दिनों में सी.पी.आई. (एम.एल.) के भीतर भी कई गुट प्रभावी रहे जिनमें आन्ध्र प्रदेश का टी. नागीरेड्डी का ग्रुप जहाँ चुनाव के बहिष्कार के पक्ष में नहीं रहा, वहीं परिमल दासगुप्ता जैसे नेता मजदूर संघों को भी दल से जोड़ने की बात करते रहे। नक्सलबाड़ी की घटना के बाद पार्टी का देश स्तर पर विस्तार हुआ, लेकिन चीन में माओत्सेतुंग और लिन बिआउ की धारा को मानने वालों का प्रभाव भारत में भी दिखा और बाद में पार्टी कई भागों में विभाजित हो गई। 

सन्दर्भ -
  1. Party Programme, Communist Party of India, available at http://www.communistparty.in.
  2. ‘Brief History of CPI’ Available at http://communistparty.in (accessed on June 8, 2013).
  3. Cited in Khan, Bande Ali, “A New Assessment of the History of the CPI: 1919-1920,” Liberation, Vol. 1, No. 4, February, 1968, p.51.
  4. Overstreet, G.D. and Wind, Miller, M., Communism in India, California University Press, Berkely, 1960, pp. 229-30.
  5. Communist Party of India, “The Political Thesis of the Communist Party of India Second Congress, Calcutta,”New Delhi, February 28 to March 6, 1948.www.bibliomania/11922.html.
  6. Gupta, B.S., Communism in Indian Politics, Columbia University Press, New York, 1972, p. 24.
  7. Ghosh, S., Socialism and Communism in India, Allied Publishers, Bombay, 1971, p. 325-39.
  8. Ram, M., Indian Communism: Split Within A Split, Vikash Publication, Delhi, 1969, p. 78.
  9. Fic, V.K., Kerala: Yenan of India, Nachiketa Publications, Bombay, 1970, p. 144.
  10. Sohail, Jawaid, The Naxalite Movement in India: Origin and Failure of Maoist Revolutionary Strategy in West Bengal, Associated Publishing House, New Delhi, 1979.
  11. Wood, J.B., “Observations on the Indian Communist Party Split,” Pacific Affairs, Vol. 8, No. 1, 1965.
  12. Fic, V.K., Kerala: Yenan of India, Nachiketa Publications, Bombay, 1970, p. 147.

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post