लोकतंत्र किसे कहते हैं?

अनुक्रम
लोकतंत्र अंग्रेजी शब्द “डेमोक्रेसी” का हिन्दी पर्याय है। डेमोक्रेसी शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा के डेमोक्रेशिया (demokratisa) से लिया गया है, जो दो शब्दों डेमॉस (demos)”जनता” और क्रेटस (kratos)”शासन” से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है “जनता का शासन”। शुरू-शुरू में लोकतंत्र शब्द का प्रयोग प्राचीन यूनान में अनेक लोगों के शासन के रूप में किया गया था न कि आज जैसे सकारात्मक रूप में। इस प्रकार तब सत्ता की शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथों में न रहकर कई व्यक्तियों में समाहित होती थी। अरस्तु ने छ: प्रकार की शासन पद्धतियों का वर्णन किया था-राजतंत्र, निरंकुशतंत्र, कुलीनतंत्र, वर्गतंत्र, लोकतंत्र और भीड़तंत्र । अरस्तु ने डेमोक्रेसी शब्द का प्रयोग भीड़तंत्र के लिए किया था न कि लोकतंत्र के लिए जबकि आजकल डेमोक्रेसी को लोकतंत्र का पर्याय माना जाता है। अरस्तु ने डेमोक्रेसी का तात्पर्य, निर्धन, अज्ञानी और अशिक्षित लोगों के शासन को बताया था, जिसमें लोगों की संख्या बहुत अधिक यानि भीड़ की भांति होती है।

ब्राइस ने लोकतंत्र को सरकार का वह रूप कहा है जिसमें योग्यता प्राप्त नागरिकों को बहुमत की इच्छा के अनुसार शासन करना होता है। इनका मानना है कि योग्यता प्राप्त व्यक्तियों की संख्या कम-से-कम तीन चौथाई अवश्य होनी चाहिए, जिससे सामान्य नागरिकों का भौतिक बल उसकी मतदान शक्ति के बराबर बना रहे। लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनता की वह इच्छाशक्ति है, जिसमें शासक की नियुक्ति, राज्य में निवास करने वाली जनता के बहुमत की सहमति के आधार पर होती है जो जनता के कल्याण को ध्यान में रखते हुए शासन का संचालन करता है।

लोकतन्त्रीय प्रणाली राजनीतिक प्रश्नों के निर्णय करने की उस व्यवस्था का नाम है जिसमें कुछ व्यक्ति जनता के समर्थन के लिए परस्पर प्रतियोगिता द्वारा निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। लोकतंत्र मूलत: ‘स्वतन्त्रता के विचार’ की राजनीतिक धरोहर है। यह या तो प्रत्यक्ष (समस्त जनता के द्वारा) हो सकती है अथवा अप्रत्यक्ष (प्रतिनिधि संस्थाओं द्वारा) हो सकती है। सीले ने ‘लोकतंत्र को एक ऐसी सरकार माना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सरकार में अपनी हिस्सेदारी रखता है।’ डायसी के अनुसार, ‘लोकतंत्र एक ऐसी सरकार है, जिसमें शासकीय व्यवस्था का सूत्र तुलनात्मक रूप में सम्पूर्ण राष्ट्र के वृहद् समूह में निहित है।

माइकल मूर के अनुसार लोकतंत्र एक देखा जाने वाला खेल नहीं हैं, यह एक सहभागिता वाली घटना है। यदि हम इसमें भाग नहीं लेते हैं, तो लोकतंत्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार सारटोरी ने लोकतांत्रिक युग को प्रजातांत्रिक भ्रांति का युग कहा है क्योंकि लोकतंत्र राजनीतिक सिद्वान्तों की सबसे भ्रमपूर्ण धारणा है। लोकतंत्र केवल सरकार को चुनने अथवा शासन प्रणाली का एक तरीका, ही नहीं बल्कि इसे एक तरह का समाज तथा जीने का तरीका एक आदर्श अथवा एक उद्देश्य के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक युग में लोकतंत्र न केवल प्रशासनिक पक्ष, बल्कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि सभी पक्षों का वर्णन करता है। यह व्यक्तियों की समानता, सुरक्षा व स्वतन्त्रता पर बल देता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोकतंत्र में राजनीतिक व्यवस्था से सम्बन्धित सत्ता जनता के पास होती है। यह जनता प्रतिनिधियों को निर्वाचित कर अपनी ओर से उन्हे शासन का अधिकार प्रदान करती हैं। इससे हर प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधि ही व्यवहार में शासन शक्ति के धारणकर्ता एवं प्रयोगकर्ता दोनों हो जाते हैं। विषाल जनसंख्या, विस्तृत भूमि-क्षेत्र तथा व्यापक कार्य-क्षेत्र के कारण आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन में सहभागी हो, ऐसा असम्भव है। इसलिए इसके विकल्प के रूप में ही प्रतिनिधि मूलक प्रजातंत्र का विकास हुआ है। इस तरह के प्रजातांत्रिक राज्य में जनता अपनी शासन शक्ति का प्रयोग प्रतिनिधियों को चुनकर उनके माध्यम से करती है। इस तरह प्रतिनिधित्व का महत्व प्रजातंत्र के विकास के साथ ही बढ़ता गया है।

आधुनिक लोकतंत्र मुख्यत: प्रतिनिध्यात्मक है जिसमें जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को शासन के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है। इस शासन पद्धति में संरचनात्मक और कार्यात्मक स्तर पर प्रतियोगी राजनीतिक दलों की उपस्थिति में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से प्रतिनिधियों के चुनाव की व्यवस्था, सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के आधार होती है और इसमें निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं परन्तु यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि अल्पमत के हित को भी सुरक्षा की गारंटी प्राप्त हो सके, क्योंकि बहुमत निर्णय की प़द्धति है न कि शासन की। प्रतिनिध्यात्मक राजव्यवस्था में निर्वाचन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया हो गयी है, लेकिन इस व्यवस्था में निहित वास्तविक प्रक्रियाओं के बारे में जितना कुछ स्पष्ट होता है उससे कहीं अधिक बातें अस्पष्ट रह जाती हैं और कई विकृतियाँ सामने आती हैं। कभी-कभी तो लगता है कि लोकतंत्र जिन संस्थाओं तथा एजेंसियों के द्वारा ठोस स्वरूप ग्रहण करता है, वे ऐसी रहस्यमयी भूलभुलैया हैं जिनके तमाम दरवाज़े बंद हों। लोकतंत्र की कई संस्थाओं में जहाँ जनसाधारण के लिए प्रवेश और परिवर्तन लाना कठिन हो सकता है, वहाँ निर्वाचन प्रक्रिया के रूप में इसका सूत्र जनता के हाथों में ही रहता है। इसी से लोकतंत्र में निर्वाचन प्रक्रिया का महत्व निहित है। अनेक विफल लोकतंत्रों के खंडहरों और अन्य कई लोकतंत्रों की सफलताओं के अन्वेषण से यह स्पष्ट होता है कि निर्वाचन प्रक्रिया की जटिल बारीकियों से ही लोकतंत्र की आधारषिला तैयार होती है या फिर इसकी पताका लहराने के लिए आवश्यक ऊर्जा और जीवन-शक्ति का प्रवाह सुनिश्चित होता है।

भारत में प्राचीनकाल में भी प्रतिनिधिक संस्थाएं किसी न किसी रूप में काम कर रही थीं लेकिन मध्यकालीन सल्तनत एवं मुगलकालीन भारत में दरबार की प्रथा के अन्तर्गत जमींदारों तथा सामंतों को ही आमन्त्रित किया जाता था। उन्हें प्रतिनिधि का स्थान नहीं प्राप्त था और न ही उस समय जनभावनाओं को किसी प्रकार का आदर दिया जाता था। बिटिष भारत में 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह महसूस किया कि भारतीयों के सहयोग के बिना शासन चलाना असम्भव है। अत: भारतीय परिषद् अधिनियम, 1861 के द्वारा गवर्नर जनरल तथा गवर्नर की परिषदों में कुछ भारतीयों को स्थान दिया गया। पुन: 1892 में भारतीय परिषद अधिनियम के द्वारा भारतीयों की संख्या में वृद्धि की गयी तथा परोक्ष निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई। मार्ले-मिण्टो सुधार अधिनियम, 1909 के द्वारा भारतीयों के प्रतिनिधित्व को बढ़ा दिया गया तथा मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई।

माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार 1919 इस दिशा में एक प्रमुख कदम था। इसका लक्ष्य क्रमश: उत्तरदायी शासन की स्थापना था। विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गयी तथा शासन को नियन्त्रित करने की शक्ति भी बढ़ा दी गयी। प्रान्तों के ‘हस्तान्तरित भाग’ को प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों के हाथों में सौंप दिया गया। इसके द्वारा साम्प्रदायिक तथा वर्गीय हितों के प्रतिनिधित्व पर अधिक बल दिया गया। 1935 के भारत शासन अधिनियम ने प्रतिनिधि संस्थाओं की जड़ को काफी मजबूत कर दिया तथा प्रतिनिधियों की संख्या भी बढ़ा दी गयी। प्रान्तों में निर्वाचित हुए प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी मंत्रिमण्डलीय सरकारों की स्थापना हुई।

किसी भी स्थिति में उत्तरदायी सरकार की आकांक्षा सर्वोपरि है और जनता सिर्फ प्रतिनिधित्व से ही सन्तुष्ट न होकर सीधे सरकार के निर्माण एवं विघटन में अपनी स्वीकृति चाहती है। प्रतिनिधित्व के सम्बन्ध में दो सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है- आदिष्ट प्रतिनिधित्व तथा आदेशहीन प्रतिनिधित्व। आदिष्ट प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि प्रतिनिधि निर्वाचकों के अधीन है, उसकी निजी इच्छा कुछ नहीं है। वह निर्वाचकों की इच्छा को अभिव्यक्त करता है। यह किसी प्रकार का संशोधन निर्वाचकों की आज्ञा से ही ला सकता है। प्रतिनिधित्व का यह रूप पुराना पड़ चुका है और व्यवहार में भी सम्भव नहीं है। आदेशहीन प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि प्रतिनिधिगण निर्वाचकों के अभिकर्ता नहीं हैं, वे निर्वाचकों के अधीनस्थ नहीं हैं तथा केवल उनके आदेश के अनुसार कार्य नहीं करते। यह सिद्धान्त निर्वाचक तथा प्रतिनिधियों के सम्बन्ध को निर्धारित करता है। आज यह सर्वमान्य है कि प्रतिनिधि निर्वाचकों का केवल अभिकर्ता नहीं है बल्कि उनके हित के लिए स्वैच्छिक नीतियों का निर्धारक भी है। प्रतिनिधित्व की कार्यावधि के सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं है। अलग-अलग देशों में जनप्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग अवधियाँ अपनायी गयी हैं।

आधुनिक काल में प्रतिनिधि सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। वह किसी धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, वर्ग या समाज का केवल प्रतिनिधि नहीं होता है। यदि वह इस आधार पर चुना भी जाता है तो वह चुने जाने के बाद सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधि बन जाता हैतथा ऐसे प्रतिनिधि को स्वविवेक से कार्य करना चाहिए। साथ ही उसे अपने निर्वाचकों की मनोवृत्ति को ध्यान में रखते हुए तथा अपनी वैधानिक सीमा में रहते हुए अपनी स्वतन्त्र शक्ति का परिचय देना चाहिए।

मताधिकार का क्या आधार होना चाहिए यह हमेशा विवाद का विषय रहा है। कुछ विद्वानों का कहना है कि मताधिकार व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। दूसरी तरफ कुछ विद्वानों का कहना है कि यह केवल उन नागरिकों को प्राप्त होना चाहिए, जो अपने पवित्र अधिकार को समझ सकें। जे.एस. मिल का मत है कि ‘‘जिसे साधारण लिखना-पढ़ना, जोड़-घटाव करना भी नहीं आता उसे मताधिकार देना व्यर्थ है। सार्वजनिक मताधिकार देने से पहले सबको शिक्षा देना जरूरी है। जो लोग अपने मत का सही उपयोग नहीं कर सकते उन्हें उससे अलग रखना उचित है।’’ अनेक विद्वानों का मानना है कि राज्य ही नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है। इसलिए यह प्रत्येक को नहीं दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार मताधिकार एक पवित्र अधिकार है, जिसमें प्रतिनिधियों के चुनाव का निर्णय करने में विवेक के प्रयोग की आवश्यकता होती है। इसे अज्ञानी, मूर्ख और कमजोर जनता तक विस्तृत करना लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय बना देना है। कुछ विद्वान मताधिकार के लिए सम्पत्ति, शिक्षा के आधार को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। साथ ही कुछ विद्वान महिला मताधिकार के भी विरुद्ध हैं।

वर्तमान युग लोकतंत्र का युग है। यह सर्वविदित हो चुका है कि जनता ही शासन की सम्पूर्ण शक्तियों का आधार है। अत: सभी वयस्क नागरिकों को प्रतिनिधियों के चुनाव में समान रूप से भाग लेने का अधिकार है।लोकतान्त्रिक राज्य में धर्म, जाति, लिंग, जन्म-स्थान, शिक्षा इत्यादि के आधार मताधिकार देने में कोई विभेद नहीं किया जाता। भारत में वयस्क नागरिकता की आयु 18 वर्ष निर्धारित की गयी है, जो पहले 21 वर्ष थी। प्रतिनिधियों को चुनने की दो विधियाँ हैं,प्रथम यदि मतदाता चुनाव में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेते हैं और अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं तो यह चुनाव की प्रत्यक्ष विधि कहलाती है। इनमें मतदाता मतदान स्थल पर जाकर अपना मत देता है। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलता है, वह निर्वाचित घोषित किया जाता है। चुनाव की यह विधि सर्वाधिक लोकप्रिय है। भारत में लोकसभा एवं विधानसभा, ब्रिटेन में हाउस ऑफ कामन्स, अमेरिका में प्रतिनिधि सभा इत्यादि का चुनाव इसी विधि से होता है। दूसरा जब मतदाता अपने प्रतिनिधियों के चुनाव में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लेकर निर्वाचक मण्डल को चुनते हैं और निर्वाचक मण्डल अन्तत: प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं तो यह पद्धति अप्रत्यक्ष विधि कहलाती है। भारत में राज्य सभा एवं विधान परिषद के कुछ सदस्यों का चुनाव इसी विधि से होता है। भारत के राष्ट्रपति तथा अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भी इसी विधि से होता है।

भारतीय निर्वाचन प्रणाली की विशेषताएँ

भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा नागरिकों के राजनीतिक हितों की रक्षा हेतु भारतीय संविधान में निर्वाचन व्यवस्था के सम्बन्ध में एक पूरा अध्याय ही जोड़ दिया। मौलिक अधिकार समिति के अनुसार स्वतंत्र निर्वाचन और निर्वाचनों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को रोकना एक मौलिक अधिकार है। संविधान सभा ने यह स्वीकार किया कि यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है किन्तु साथ ही उसने यह भी निर्णय दिया कि इससे सम्बद्ध उपबन्धों का मौलिक अधिकार सम्बन्धी अध्याय में रहना उचित नहीं है, इसका स्थान अलग है। इसलिए प्रारूप समिति ने इससे सम्बद्ध सभी उपबन्धों को एक अलग अध्याय में रखा।

सच्चे लोकतंत्र की स्थापना स्वतंत्र तथा निष्पक्ष निर्वाचन के द्वारा ही सम्भव है। लोकतन्त्रीय प्रणाली की सफलता की यह एक बड़ी शर्त है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान मेंएक स्वतन्त्र अभिकरण की व्यवस्था की गयी है जिसे निर्वाचन आयोग के नाम से जाना जाता है। भारतीय संविधान के भाग-15 के अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 329 तक चुनाव से सम्बन्धित व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 324 में चुनावों के संचालन के लिए निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गयी है, और निर्वाचन आयोग को संसद, राज्यों के विधानमण्डलों, राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन तथा नियन्त्रण के अधिकार सौंपे गये हैं तथाइन शक्तियों के अतिरिक्त निर्वाचन आयोग को यह भी शक्ति दी गयी है कि वह निर्वाचनों में उत्पन्न होने वाले तथा निर्वाचनों के सम्बन्ध में उठने वाले विवादों का निर्णय करें। अनुच्छेद 324(6) में यह व्यवस्था की गयी है कि निर्वाचन आयोग की प्रार्थना पर राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्त को ऐसे कर्मचारियों की व्यवस्था करेगा जो उसे संविधान द्वारा दिये गये अपने कायोर्ं की पूर्ति के लिए आवश्यक है।

संविधान का अनुच्छेद 324 इसकी विशद व्याख्या करता है। निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त एवं राज्य स्तर पर एक मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी की व्यवस्था है। राष्ट्रपति समय-समय पर अन्य निर्वाचन आयुक्तों की संख्या निर्धारित करता है, साथ ही निर्वाचन आयोग एवं इसके पदाधिकारियों को कार्यपालिका के नियन्त्रण से मुक्त रखा गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों को उसी प्रकार पद से हटाया जा सकता है, जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

निर्वाचन आयोग का कार्य चुनाव सम्पन्न कराना, चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करना, मतदाता सूची तैयार करना, राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना, राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह प्रदान करना, चुनाव आचार-संहिता तैयार करना, चुनावी खर्च पर नियन्त्रण करना, मतदाताओं को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करना, चुनाव का संचालन, निर्देशन तथा देख-रेख इत्यादि से सम्बन्धित हैं।

भारतीय संविधान वयस्क मताधिकार के आधार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की व्यवस्था करता है। संविधान के अनुच्छेद 326 में कहा गया है कि लोकसभा तथा राज्य विधान मण्डलों के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किये जायेंगे। इसके अनुसार प्रत्येक स्त्री-पुरूष को जिनकी उम्र 18 वर्ष की है, लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदान का अधिकार प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 327 के द्वारा संसद तथा अन्य विधान मण्डलों के निर्वाचन से सम्बद्ध मामलों में कानून बनाने की सर्वोच्च सत्ता भारतीय संसद को सौंपी गयी है। इस सम्बन्ध में राज्य विधानमण्डलों को बहुत सीमित अधिकार प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 328 में यह भी व्यवस्था की गयी है कि राज्य विधानमण्डलों द्वारा पारित कोई भी कानून भारतीय संसद द्वारा पारित विधि के विरुद्ध नहीं हो सकता।

वास्तव में अगर देखा जाये तो भारतीय संविधान में किसी भी स्थान पर नागरिकों को सरकार के निर्माण का अधिकार स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है परन्तु जनता का सरकार बनाने या लोकप्रिय सरकार की स्थापना का अधिकार लोकतंत्र का मुख्य स्तम्भ होता है। यह अधिकार किसी भी नागरिक की उस सर्वोच्च स्वतंत्रता को परिलक्षित करता है, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मूल अधिकारों की श्रेणी में रखा गया है।

भारतीय संसद ने निर्वाचन से सम्बन्धित अनेक कानून बनाये हैं और समय-समय पर उनमें संशोधन भी किये हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के द्वारा निर्वाचन-क्षेत्र को परिसीमित करने की प्रक्रिया, संसद में प्रत्येक राज्य के स्थानों की संख्या तथा प्रत्येक राज्य के विधानसभाओं में सदस्यों की संख्या निर्धारित की गई है तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 निर्वाचन के संचालन और प्रबन्ध से सम्बद्ध प्रशासनिक व्यवस्था, मतदान, उप चुनाव इत्यादि की व्यवस्था करता है। इन दोनों अधिनियमों के आधार पर केन्द्रीय सरकार ने कुछ परिनियम भी बनाये हैं- इन अधिनियमों और परिनियमों में समय-समय पर आवश्कतानुसार संशोधन होते रहे हैं। पहले यह निश्चित किया गया था कि संसद और राज्य विधानमण्डलों के निर्वाचन के लिए अलग-अलग मतदाता सूची बनायी जायेगी किन्तु बाद के संशोधन के द्वारा एक ही मतदाता सूची तैयार करने का फैसला किया गया। 1956 के एक संशोधन द्वारा चुनाव याचिकाओं के निर्णय की जिम्मेदारी उच्च न्यायालयों को सौंप दी गयी। पुन: 1975 ई0 में संवैधानिक संशोधनों द्वारा चुनाव कानूनों में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाये गये।

संविधान में संशोधन लाकर यह व्यवस्था की गयी कि राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी विवादों का निपटारा संसदीय कानून द्वारा निर्मित निकाय से होगा। ऐसी ही व्यवस्था प्रधानमंत्री व लोकसभा अध्यक्ष के लिए भी की गयी, लेकिन भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस व्यवस्था को अवैध घोषित कर दिया गया। आज समस्त भारत के लिए चुनाव संसद द्वारा निर्मित कानून से ही सम्पन्न होते हैं। 44वें संविधान संशोधन की धारा 10 द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समस्त अधिकारों की बहाली की गयी। यह अधिकार राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित विवाद के निपटारे से सम्बद्ध है।

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