चंपारण सत्याग्रह क्या है(What is Champaran Satyagraha)?

चंपारण सत्याग्रह क्या है (What is Champaran Satyagraha)?

दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन में गाँधी की सफलता ने उन्हें भारत में एक नेता के रूप में प्रसिद्ध कर दिया, जिससे आम जनता के लिए औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध लड़ाई की। दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के पश्चात, शुरू में उन्होंने यह निश्चय किया कि वे गुजरात में अपना निवास बनाएंगे तथा लोगों के कल्याण हेतु कार्य करेंगे। उस समय भारत में राष्ट्रीय आंदोलन दो धड़ों में बंटा हुआ था - नरमपंथी और गरमपंथी। तथा कुछ इस तरह के लोग भी थे जो स्वतंत्रता हेतु लड़ने के लिए क्रांतिकारी तरीकों में विश्वास रखते थे। मुस्लिमों की जनसंख्या के एक भाग ने केवल मुसलमानों के हितों के लिए कार्य करने हेतु मुस्लिम लीग की स्थापना की थी। इस पृष्ठभूमि में गांधी ने जनता के अलग-अलग वर्गों के साथ संवाद स्थापित करके एक राजनीतिक आधार विकसित करने की कोशिश की। 

नरमपंथियों और गरमपंथियों की राजनीति स्वराज प्राप्ति हेतु गांधी को राजी नहीं कर सकी, ना ही उन्हें हिंसा की राजनीति में विश्वास था। दक्षिण अफ्रीका में उनके सफल राजनीतिक आंदोलन से सत्याग्रह की शक्ति में पैदा हुए उनके विश्वास ने उन्हें भारत में सत्याग्रह की शुरुआत के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने हेतु उत्साहित किया। बिहार के चंपारण में 1917 में नील बागान के मालिकों के विरुद्ध किसानों के आंदोलन ने गांधी को वह इच्छित अवसर मुहैया करा दिया।

चंपारण उत्तरी बिहार में स्थित था, जिसके अंतर्गत बड़े-बड़े गांव और दो महत्वपूर्ण शहर मोतिहारी और बेतिया सम्मिलित थे। 1793 के स्थायी बंदोबस्त के अनुसार बेतिया, रामनगर और मधुबनी स्टेट ये तीन मालिक जिले की अधिकांश जमीन का नियंत्रण रखते थे परन्तु जमींदारों ने जमीन के प्रत्यक्ष प्रबंधन के स्थान पर अस्थायी अवधि के लिए कुछ धारकों को जमीन किराये पर दे दी। यूरोपीय अवधि-धारकों ने कृषि योग्य जमीन के एक बड़े भाग को अपने कब्जे में कर लिया था और अधिक मुनाफे की वजह से उन्होंने नील की खेती करना शुरू कर दिया। यूरोपीय बागान मालिकों ने भूमि की जुताई या तो प्रत्यक्ष रूप से किया किसान ठेकेदारों के जरिए। इस प्लांटर राज के सबसे बुरे शिकार पट्टेदार ही थे। 

1917 में विश्व बाजार में नील की घटती हुई माँग ने पट्टेदारों पर दबाव और बढ़ाया और वे बाजार की गिरावट से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए। उस दौर की एक आधिकारिक रिपोर्ट कहती है ‘वह सब कुछ जिन्हें किसानों को बेचना पड़ा, चावल, तिलहन या गुड़ के दाम या तो कम हो गए या बढ़े ही नहीं जबकि उसे जो कुछ खरीदना पड़ा, जैसे- कपड़े, नमक, केरोसिन आदि अत्यधिक महंगे हो गये।’ पट्टेदारों की सामान्य आर्थिक कठिनाइयों के अलावा, ‘तीन कठिया’ व्यवस्था ने किसानों के मध्य आकस्मिक बेचैनी को जन्म दिया। ‘तीन कठिया’ उस व्यवस्था का नाम था जिसमें एक किसान की प्रति बीघा ज़मीन का तीन कट्ठा नील की खेती के लिए तय कर दिया जाता था। बागान मालिकों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि नील की खेती सर्वाधिक उपजाऊ ज़मीन में होनी चाहिए ताकि उत्पादन अत्यधिक हो। रैयत को अदा की जाने वाली राशि जमीन के क्षेत्रफल के आधार पर नियत की गयी, फसल के उत्पादन के परिणाम के आधार पर नहीं। यही वह कारण था कि किसानों को उपजाऊ ज़मीनों पर ही नील की उगाही के लिए मजबूर किया गया ताकि अधिकाधिक उपज को प्राप्त किया जा सके। किसानों ने आर्थिक और सामाजिक शोषण के अन्य रूपों का भी सामना किया जिसने उन्हें तत्कालीन प्लांटर राज के विरुद्ध आंदोलित कर दिया।

चंपारण की स्थिति भारत के उन अन्य भागों से काफी कुछ अलग नहीं थी जहां किसान शोषण के अलग-अलग तरीकों का सामना कर रहे थे परन्तु यह गांधी का हस्तक्षेप और नेतृत्व था जिसने चंपारण आंदोलन को अपवाद बना डाला।

स्थानीय कांग्रेसी नेता राजकुमार शुक्ला के निमंत्रण पर गांधी 1917 में चंपारण आये और पहली बार उन्हें चंपारण के किसानों की दुर्दशा का अनुभव हुआ। स्थानीय प्रशासन गांधी की गिरमिटिया मजदूरी को समाप्त करने की चिंताओं से वाकिफ था और चंपारण में गांधी की उपस्थिति से सहज नहीं था। संभाग के कमिश्नर से मिलने के पश्चात गांधी ने स्थानीय लोगों द्वारा नील की खेती कर रहे किसानों की जिन शिकायतों को प्रस्तुत किया गया था, उन पर ध्यान देने का इरादा व्यक्त किया। परंतु कमिश्नर का यह मत था कि गांधी शायद अशांति को और बढ़ा सकते हैं तथा उन्होंने बिहार एवं उड़ीसा सरकार के मुख्य सचिव को लिखा कि उन्हें गांधी को भारतीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत, जन सुरक्षा के आधार पर निर्वासित करने की अनुमति दी जाए। गाँधी को जिलाधीश ने चंपारण छोड़ने के लिए कहा क्योंकि उनके अनुसार गांधी की उपस्थिति जन शांति के लिए समस्या खड़ी कर सकती थी। 

चंपारण में गांधी की उपस्थिति पर सरकार की प्रतिक्रिया ने भारतीय प्रेस में विरोध को जन्म दिया। अमृत बाज़ार पत्रिका ने लिखा ‘मिस्टर गांधी ने अपनी बात प्राप्त कर ली है। इस सनसनीखेज मुद्दे में उन्होंने जो भूमिका निभाई है वह दक्षिण अफ्रीका में शुरू की गयी उनकी सहनशील प्रतिरोध की भूमिका से कम महत्व की नहीं है। वहां पर  उन्होंने पीड़ित मानवता हेतु कारावास तथा अधिकारियों की नाराजगी को सहन किया, यहां गाँधी का उदय पर भी उन्होंने वही किया।’ आम लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचने की गांधी की क्षमता और सादगी तथा गांवों में उनकी यात्रा ने जनसामान्य की आंखों में उन्हें मुक्तिदाता बना डाला। गांधी ने किसानों की शिकायतों पर सरकारी जांच की मांग की तथा यह मांग भी रखी कि सरकार किसानों से अवैध मांगें बंद करे। केंद्रीय सरकार के दबावों तथा अपनी इच्छा के विरुद्ध बिहार सरकार को चंपारण के किसानों की स्थिति पर विचार करने के लिए एक आयोग का गठन करना पड़ा जिसमें गांधी भी शामिल थे। 

केंद्रीय सरकार ने बिहार सरकार को लिखे एक पत्र में गांधी की मांगों को मानने के कारणों की व्याख्या करते हुए कहा ‘यदि आपके मुहावरे का प्रयोग करें तो, आयोग की नियुक्ति करके हम गाँधी से पीछा छुड़ा रहे हैं लेकिन ऐसा करते हुए हम इस आरोप से बचते हुए दिख रहे हैं कि हम अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग नहीं हैं। हम यह महसूस करते हैं कि यह ज्यादा युक्तिप्रद होगा कि हम उनकी यह बात मान लें बजाय इसके कि उन्हें पाँव तले दबा दें और इस आरोप में पड़ें कि हम पूरी जांच को अस्वीकार कर रहे हैं।’ सरकार की कार्रवाई के पीछे जो भी तर्क रहा हो, सरकार द्वारा गठित की गयी जांच समिति द्वारा की गई सिफारिशों के मद्देनजर 1917 में चंपारण कृषि अधिनियम बना। 

इस अधिनियम के तहत तीन कठिया व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया और पट्टेदारों की शिकायतों पर भी आंशिक रूप से ध्यान दिया गया। यद्यपि बागान मालिकों और पट्टेदारों में कोई भी पक्ष इस व्यवस्था से प्रसन्न नहीं था, परंतु निश्चित रूप से गांधी ने अपने हस्तक्षेप द्वारा चंपारण के किसानों के संघर्ष को भारतीय राजनीतिक आंदोलन में सत्याग्रह के प्रथम सफल प्रयोग के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। 

चंपारण आंदोलन में गाँधी के नेतृत्व के तरीके का विश्लेषण करते हुए ज्यूडिथ ब्राउन का अवलोकन है कि ‘जाने-पहचाने राजनेताओं को एक तरफ करके वे गांवों में उसी प्रकार के कपड़े पहनकर गए जैसा गांव वाले पहनते थे, देशज भाषा में बातचीत की, उन मामलों को उठाया जिनका संबंध उन ग्रामीण श्रोताओं से था, ऐसा करते हुए उन्होंने स्थानीय व्यवसाय और शिक्षित जनों को अपनी तरफ खींचा जिनकी कांग्रेस के राजनीतिक तरीकों में रुचि और प्रभाव न के बराबर था। उन्होंने इन अलग-अलग समूहों के लिए मध्यस्थ की तरह काम किया, जनजीवन के दो स्तरों के बीच मध्यस्थता की और बदले में उन्हें एक सशक्त प्रांतीय अनुयायियों का समूह मिला। वे वहां सफल हुए जहां पूर्ववर्ती राजनेता विफल हो चुके थे अथवा उन्होंने कभी इस समर्थन को लामबंद करने की कोशिश ही नहीं की।’ 

चंपारण सत्याग्रह के दौरान स्थानीय बुद्धिजीवी वर्ग का एक समूह, जैसे - राजेंद्र प्रसाद, राजकुमार शुक्ल, जे.बी. कृपलानी, इंदुलाल याग्निक आदि, गांधी के संपर्क में आए और उन्होंने आंदोलन को संगठित करने के लिए जनता में उनके दूतों का कार्य किया। चंपारण तक भारत में लोग गांधी को दक्षिण अफ्रीका में उनके वीरत्वपूर्ण संघर्ष के लिए जानते थे और गांधी ने कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन से एक दूरी बनाए रखी थी। चंपारण के किसानों के आंदोलन में गाँधी की भागीदारी तथा किसानों की शिकायतों के निवारण हेतु सरकार को मजबूर करने में जो भी सफलता उन्होंने प्राप्त की, उसने गांधी के नेतृत्व के गुण के संबंध में विभिन्न समूहों और प्रभागों के बीच एक चित्र निर्मित किया। 1918 का चंपारण कृषि अधिनियम जो आंदोलन का तात्कालिक परिणाम था, ने किसानों को कुछ राहत दी और बागान मालिकों पर कुछ अंकुश लगाया।

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