अष्टछाप के कवियों के नाम और सामान्य परिचय

अष्टछाप के संस्थापक विट्ठलनाथ थे। ग्रन्थ रचना की अपेक्षा विट्ठलनाथ द्वारा किये गये सम्प्रदाय संगठन सम्बन्धी कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। पिता के और अपने चार-चार शिष्यों को मिलाकर विट्ठलनाथ जी ने ‘अष्टछाप’ नाम से गायक कवियों का एक दल बनाया। 

हिन्दी साहित्य में अष्टछाप के इन कवियों का विशेष महत्व है। अष्टछाप के इन कवियों का परिचय आगे प्रस्तुत है।

अष्टछाप के कवियों के नाम

अष्टछाप के कवियों के नाम और सामान्य परिचय इस प्रकार है -
  1. सूरदास
  2. कुम्भनदास
  3. परमानन्ददास
  4. परमानन्ददास
  5. गोविन्दस्वामी
  6. छीतस्वामी
  7. चतुर्भुजदास
  8. नन्ददास

(1) सूरदास

सूर का जन्म सम्वत् 1535 (1478 ई.) वैशाख शुक्ल 5 को हुआ। उनका जन्म दिल्ली मथुरा रोड पर सीही नाम के ग्राम के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था।

नेत्रविहीन होते हुए भी उन्होंने दृश्य.जगत का ऐसा यथार्थ वर्णन किया है कि उनकी जन्मान्धता पर सन्दहे होता है। उन्होंने यमुना के कछारो, कृष्ण की बाल.क्रीड़ाओं एवं ब्रज के सामान्य जीवन का जितना सजीव चित्रण किया है, उतना कोई नेत्रयुक्त कवि भी आज तक नहीं कर सका है। प्रारम्भ में उनकी विशेष रुचि गायन.वादन में थी। प्रभावोत्पादन मधुर कंठ के गाये गये उनके विनय और दीनता के पदों को सुनकर लोग मन्त्रमुग्ध से हो जाते थे। 
सं. 1553 (1496 ई.) तक वे सीही तथा उसके निकटवतीर् ग्राम में रहे और इसके बाद मथुरा आगरा मार्ग पर स्थित गऊघाट नामक स्थान पर आ बसे। वहाँ वे प्राय: 12 वर्ष तक रहे। इस बीच उनकी काफी ख्याति हो गयी तथा अनेक व्यक्ति उनके शिष्य सेवक बन गये। 

सं. 1567 (1510 ई.) के लगभग पुष्टि सम्प्रदाय के प्रवर्तक बल्लभाचार्य जी अपने नवनिर्मित श्रीनाथ जी के मन्दिर की देखभाल करने गोवर्धन जाते हुए गऊघाट पधारे और वहाँ सूर से उनकी भंटे हुई। सूर ने महाप्रभु के समक्ष अनेक विनय आरै दीनता के पद गाय े जिन्हें सुनकर महाप्रभु इस अन्धकवि के हाथों बिक से गये और प्यार भरे शब्दों में इनसे कहने लगे. ‘सूर ह्वैके ऐसे काह घिघियात हौ। कछु भगवत् लीला बरनन करौ।’ कहते हैं कि तभी से कृष्ण की विविध लीलाओं का गान करना सूर का मुख्य लक्ष्य बन गया।

सूरदास की प्रारम्भिक रचनाओं में एक विचित्र प्रकार की दीनता का भाव है। वह बार.बार अपने को पतित, पापी एवं अधम कहते हैं तथा कृष्ण से यह प्रार्थना करते हैं कि वह अपने सेवक का उद्धार करे। दासता के भावों से भरे हुए उनके ये पद ‘विनय’ के पद कहे जाते हैं। विनय के पदों में आत्म. हीनता, सांसारिक भोग.विलास में लिप्त जीवन की तुच्छता, इस संसार की नश्वरता, हरि.भजन का आग्रह और निर्गुण ईश्वर की अनुकम्पा आदि का वर्णन है। 
महाप्रभु बल्लभाचार्य के दर्शन के बाद सूर की यह दीनता समाप्त हो गयी और वह श्रीकृष्ण को साकार रूप से भजने लगे। फिर तो उनकी भक्ति सख्य.भाव की हो गयी और अपने कृष्ण से वह हठ, जिद और आग्रह करने लगे। उनके ऐसे पदों में बड़ा खुलापन है- ‘सरू ‘ कबहूं न द्वार छांड़ े डारिहौं कढ़राई। अगर कृष्ण उन्हें दरवाजे से निकाल दें ताे भी वह वहीं रहेंगे और भगवत्कृपा प्राप्त किये बिना नहीं मानेंगे ।

सूर की रचनाएँ- नागरी प्रचारिणी सभा की खोज.रिपोर्ट में सूर के सोलह ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। परन्तु शैली और विषय की भिन्नता के कारण ये सब ग्रन्थ सूरदास के नहीं हो सकते। अधिकांश साहित्य इतिहासकारों ने ‘सूरसारावली’, ‘साहित्यलहरी’ और ‘सूरसागर’ काे ही सूरदास की रचनाएँ माना है। ‘सूरसारावली’ ‘सूरसागर’ की विषय.सूची सी है और ‘साहित्यलहरी’, ‘सूरसागर’ से लिए गए रस.रीति के दृष्ट कूट पदों का संग्रह मात्र है। ‘सरू सागर’ श्रीनाथ जी के मन्दिर में अनवरत रूप से गाये गये कीर्तन के पदों का संग्रह काव्य है। 

(2) कुम्भनदास

महाप्रभु बल्लभाचार्य ने सबसे पहले कुम्भनदास को दीक्षित किया था। कुम्भनदास गोवर्धन पर्वत के पास ठेठ किसान परिवार में सन् 1468 ई. में जन्मे थे। वह स्वाभिमान की जीवन्य मूर्ति थे। ‘सन्तन कहा सीकरी सों काम’ जैसे प्रसिद्ध पद के रचयिता कुम्भनदास को श्रीकृष्ण की लीला का रूप अत्यन्त प्रिय था। उनके पदों में श्री कृष्ण की चित्तचारे चितवन का बार.बार उल्लेख हुआ है। अनुमान है कि उनका परलाके वास 1582 ई. में हुआ था। उनके द्वारा रचित किसी स्वतंत्र गं्रथ का उल्लेख नहीं मिलता। विभिन्न संग्रहों में उनके पद संकलित हैं।

(3) परमानन्ददास

अष्टछाप के प्रसिद्ध संगीतज्ञ और कवि परमानन्ददास का जन्म 1493 ई. में हुआ था और उनका परलोकवास 1583 ई. में माना जाता है।

महाप्रभु बल्लभाचार्य से दीक्षा प्राप्त करने के पहले ही वह संगीत, कीर्तन और काव्य के क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुके थे। स्वामी परमानन्ददास पहले विरह और वैराग्य के पद गाया करते थे। महाप्रभु बल्लभाचार्य की दीक्षा प्राप्त करने के बाद कृष्ण के बाल.रूप से उन्होंने आत्मीयता स्थापित की और फिर बालकृष्ण की सम्मोहक लीलाओं का ऐसा अनुप वर्णन किया है कि सूरदास के बाद वात्सल्य की दृष्टि से दूसरा स्थान उन्हीं का माना जाता है। ‘परमानन्दसागर’ में इनके पद संगृहीत है। इसके अतिरिक्त इनकी अन्य कई रचनाओं का भी उल्लेख मिलता है।

(4) कृष्णदास

इनका जन्म सन् 1495 ई. में और देहावसान सन् 1575 ई. माना जाता है। ये शूद्र थे, पर इनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर बल्लभाचार्य ने इन्हें श्रीनाथ जी के मन्दिर का भेटिया बनाया। इनके त्याग और कर्त्तव्य की अनेक कहानियाँ प्रचलित है। कविता में ये सूरदास से प्रतियोगिता करते थे। इनका कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। शताधिक फुटकर पद ही इनके नाम से मिलते हैं।

(5) गोविन्दस्वामी

गोविन्दस्वामी का जन्म सन् 1504 ई. में हुआ था। ये गोस्वामी विट्ठलनथ के शिष्य थे। कहा जाता है कि गोस्वामी जी के देहान्त का समाचार सनुकर ये गोवर्धन की कन्दरा में गये थे और उसी कन्दरा में इन्होंने जीवनलीला समाप्त कर दी। गोस्वामी  विट्ठलनाथ के संप्रदाय में दीक्षित होने से पूर्व ही ये संगीत, कीर्तन और काव्य के अधिकारी बन गये थे। स्वयं पदों की रचना करते थे और गाया करते थे। किंवदन्ती है कि इतिहास प्रसिद्ध गायक तानसेन इनसे संगीत की शिक्षा लेने आया करता था। 
गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा प्रापत करने के बाद श्री कृष्ण की भक्ति इन्होंने सख्य भाव से की। भजन कीर्तन के लिए जो पद समय.समय पर इन्होंने रचे वे ‘गोविन्दस्वामी  के पद’ नाम से संकलित हैं। इनके पदों में साहित्यिक सांदैर्य की अपेक्षा संगीत माधुर्य की प्रधानता है।

(6) छीतस्वामी

इनका जन्म सन् 1510 ई. में हुआ थज्ञ। कहते हैं इन्होंने भी गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के मृत्यु का समाचार सुनकर प्राण विसर्जन कर दिया। अपनी युवावस्था में ये कपटी और लम्पट स्वभाव के थे, पर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के सम्पर्क में आने के बाद इनका जीवन ही बदल गया। ये भी संगीत के मर्मज्ञ और प्रसिद्ध गायक थे। इनके लगभग 200 पद ‘पदावती’ नाम से मिलते हैं।

(7) चतुर्भुजदास

इनका जन्म 1527 ई. में और देहावसान 1585 ई. में हुआ था। गृहस्थ.जीवन बिताते हुए भी ये श्रीनाथ जी के सेवा में लगे रहते थे। भक्ति और कतिवा इन्हें उत्तराधिकार के रूप में मिली थी। इनके स्फुट पदों को ‘चतुर्भुजदास कीर्तन.संग्रह’, ‘कीर्त्तनावली’, ‘दानलीला’ आदि शीर्षकों से प्रकाशित किया गया है।

(8) नन्ददास

इनका जन्म सन् 1533 ई. में माना जाता है। कहते हैं 53 वर्ष की अवस्था में इनका देहान्त हो गया था। ये ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। एक किंवदन्ती के अनुसार नन्ददास अकबर की बांदी रूपमंजरी पर रीझ गये थे।

अष्टछाप के कवियों में प्रखरता, रसिकता आरै कवित्व की दृष्टि से सूरदास के बाद इन्हीं का स्थान माना जाता है। इनके विषय में प्रसिद्ध है- “और कवि गढ़िया नन्ददास जड़ियाँ।” कहते हैं कि नन्ददास महाकवि तुलसीदास के भाई थे। तुलसीदास ने इन्हें राम.भक्त बनाने का प्रयास किया था, “पर विफल रहे। नन्ददास.कृत ‘रासपंचाध्यायी’ और ‘भंवरगीत’ सर्वोत्कृष्ट माने जाते हैं। ‘रासपंचाध्यायी’ में कृष्ण की रास.लीला का वर्णन मनोहर छन्दों और ललित भाषा में किया गया है। भाषा के लालित्य और वर्णन कौशल के कारण कुछ आलोचक इस कृति को जयदेव.कृत ‘गीतगोविन्द’ के समकक्ष मानते हैं। ‘भंवरगीत’ को उद्धव.गोपिका.संवाद के कारण स्वतन्त्र खंडकाव्य के रूप में माना गया है। सूरदास के भ्रमर गीत की तुलना में इस कृति का महत्त्व कम है। 

आलोचकों के अनुसार नन्ददास के भंवरगीत में बुद्धिगमय वार्तालाप और तर्कपद्धति अवश्य है, पर भाव की तत्लीनता नहीं मिलती है। नन्ददास की गोपियाँ उद्धव को न्यायदर्शन के तर्कों से परास्त करना चाहती हैं। नन्ददास की अन्य कृतियों में ‘सिद्धान्तपंचाध्यायी’, ‘स्यामसगाई’ और ‘रसमंजरी’ प्रमुख हैं।

Bandey

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