निकोलस प्रथम की गृह नीति और विदेश नीति

निकोलस प्रथम की गृह नीति(Home Policy of Nicholas first) 

निकोलस ने अपने शासन काल मे केन्द्रीयकरण और रूसीकरण की नीति अपनाई। उदारवादियों व क्रान्तिकारियों के दमन के लिए पुलिस और गुप्तचर विभाग को मजबूत किया। गुप्तचरों का जाल फैलाया गया, संदिग्ध गतिविधियों में लगे लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश था। प्रो. लिप्सन के अनुसार “रूसी गुप्तचर संस्था स्पेन के इक्वीजिशन से बढ़कर शायद न हो लेकिन उसके बराबर तो थी।” (यूरोप इन नाइटिंथ एंड ट्वेन्थीथ सेंचुरी- पृ. 87) 1832 से 1852 ई. के मध्य विद्रोही स्वभाव के डेढ़ लाख रूसी देश से निष्कासित किए गये। गणतंत्रवादियों से रूस को बचाने लिए यह करना जार के लिए आवश्यक था।

प्रगतिशील विचारों के रूस में प्रवेश को रोका गया। सीमा पर चौकियाँ बढ़ाई गई। पश्चिमी राजनीतिक व दार्शनिक साहित्य रूस में प्रवेश नहीं कर सकता था। सरकारी अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं हो सकती थी। समाचार पत्रों पर सेंसर लगाया गया।

विधि संहिता का संकलन(Compilation of Code of Law)-

निकोलस प्रथम की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में विधि संहिता का संकलन को प्रस्तुत किया जाता है। दिसम्बर वादियों के असफल विद्रोह ने जार को महसूस कराया कि विद्यमान प्रशासन में कुछ न कुछ खामियां हैं, जिन्हें दूर करना है। दिसम्बर वादियों की दृष्टि में रूस में विधियों की किसी पद्धति का न होना एक दोष था। इस दोष के कारण रूसी न्यायालयों की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठता था।

जार निकोलस ने विधियों के संग्रह के लिए एक समिति का गठन किया। महान राज मर्मज्ञ व विधि के नेता स्पेशन्स्की को यह कार्य सौंपा गया। जार अलेक्सिस की सन 1649 की संहिता से लेकर निकोलस प्रथम के राज्याभिषेक तक की अवधि तक के विधियों का संग्रह किया गया 42 खंडों में इसे प्रकाशित किया गया। सन 1832 ई में एक व्यवस्थित रूसी साम्राज्य विधि संहिता प्रकाशित की गई। जार्ज वर्नादस्की ने लिखा है - “इस प्रकार विधियों के संहिता करण का कार्य, जो न तो कैथरीन द्वितीय और न अलेक्जेंडर प्रथम द्वारा ही पूरा किया जा सका था, निकोलस प्रथम के शासनकाल में पूरा हुआ।” (रूस का इतिहास पृ.196) इस प्रकार के संहिता करण से भविष्य में न्यायिक सुधारों के लिए ठोस पृष्ठभूमि निर्मित हो गई। निकोलस प्रथम यदि न्याय पालिका के अन्य दोषों के दूर करने का प्रयास करता तो उसे और प्रसिद्धि मिलती।

कृषि दासों व कृषकों की दशा सुधारने के प्रयत्न(Efforts to improve the condition of agricultural slaves and farmers) -

दिसम्बरवादियों से पूछताछ करने पर यह पता चला कि रूसी जीवन में कृषक दास प्रथा का गंभीर दोष है। जार अलेक्जेंडर प्रथम ने इस दिशा में कार्य प्रांरभ किया था। निकोलस यह मानता था कि कुलीनवर्ग के विरुद्ध संघर्ष में कृषक एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। कृषक दास प्रथा को सीमित करने के लिए निकोलस ने अनेक सुधार किए। भूमि से संबधित कृषकों संबधी विधि का 1842 ई में घोषणा की गई। यह अपेक्षा की गई कि भू-स्वामी कृषकों के कर्तव्य निर्धारित करें। दुर्भाग्यवश यह अनिवार्य नहीं किया गया। रूस के जिलों में ही कृषक दास श्रमिकों के संबध में उत्तरदायित्व निश्चित करने का प्रयास किया गया। निकोलस प्रथम कृषक दासों की दशा सुधारने के संबध में अगला कदम उठाने वाला था, मगर पूरी सफलता नहीं मिली क्योंकि कुलीन वर्ग कृषक दासों के शोषण की व्यवस्था को बदलना नहीं चाहते थे। 1833 ई. में कृषक दासों को बेचा जाना प्रतिबंधित कर दिया गया। जार की हजारों एकड़ की जमीन पर कार्य करने कृषकों की दशा सुधार के लिए कांउट किसलेव की अध्यक्षता में एक विभाग बनाया गया। कृषकों की दश में सुधार नहीं हुआ। इसका प्रतिफल किसानों के विद्रोह के रूप में जार को भुगतना पड़ा।

आर्थिक सुधार(Financial improvement) -

दिसम्बरवादियों ने रूसी शासन व्यवस्था में जो दोष बतलाये उनमें से एक वित्त व्यवस्था संबंधी संभ्रांति भी थी। पूर्ववर्ती जार अलेक्जेंडर प्रथम के दीर्धकालीन युद्धों के फलस्वरूप रूबल का अवमूल्यन हुआ थां वित्त मंत्री के रूप में क्रान्किन ने कागजी मुद्रा का मूल्य 3.5:1 पर स्थिर कर दिया। इसके पश्चात नई कागजी मुद्रा प्रारंभ की गई जो स्वर्ण संचिति द्वारा समर्थित थी। जार निकोलस रूसी उद्योगों को बढ़ाना चाहता था। वित्त मंत्री ने इस दिशा में कार्यवाही की। 1853 ई तक रूस का विदेश व्यापार पिछले वर्षो की तुलना में दुगुना हो गया। रेल लाइनों का निर्माण रूस में किया गया। वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। मशीनों का प्रयोग विभिन्न उद्योगों में जिस गति से बढ़नी थी वैसी बढ़ी नहीं।

साहित्य, शिक्षा क्षेत्र में प्रगति(Progress in literature, education) -

निकोलस रूसवादी था। अत: रूसी साहित्य के संवर्धन के लिए उसने प्रयास किया। पुश्कीन, गोगोल, लार्मान्तान, दोस्तविस्की, तुर्गनेव आदि प्रसिद्ध रूसी लेखक हुए। साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई। शिक्षामंत्री काउंट उवरोव ने रूसी भाषा में इतिहास, भूगोल व पुरातत्व के मौलिक ग्रंथों का प्रकाशन कराया। सरकारी प्राध्यापक ही देश के विश्वविद्यालयों में अध्यापन के लिए नियुक्त किए गये।

निकोलस प्रथम की विदेश नीति(Foreign Policy of Nicholas first)

यूरोप मे तुर्की मुस्लिम राष्ट्र था। सन 1453 ई में मोहम्मद द्वितीय ने रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। बालकमन प्राय: द्वीप के अधिकांश भाग तुर्की के अधिकार में थे। तुर्की (टर्की) साम्राज्य की सीमा पश्चिम में जर्मन राज्य की सीमा से आ लगी थी। टर्की के विशाल साम्राज्य के विभिन्न भागों में गवर्नर शासन करते थे जो पाशा कहलाते थे। ये पाशा तुर्की सम्राट के कमजोर होने पर स्वतंत्र थे। आस्ट्रिया ने 1683 ई में तुर्की के आक्रमण को विफल कर यूरोपीय राष्ट्रों को तुर्की के आक्रमण के भय से मुक्त किया। 1699 से 1812 ई. के बीच धीरे-धीरे तुर्की साम्राज्य से हंगरी, ट्रांसल वेनिया, अजव, क्रीमिया, कृष्ण सागर की उत्तरी तटवर्ती प्रदेश, वेसारेविया निकल गये। उन्नीसवी शताब्दी के प्रारंभ में यूरोप में रूस के बाद तुर्की साम्राज्य सबसे अधिक विस्तृत था। 1815 ई के पश्चात तुर्की साम्राज्य भी छिन्न भिन्न होने लगा। तुर्की साम्राज्य के प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करने के लिए यूरोप की शक्तियां एक दूसरे का विरोध कर रही थी।

यूनान की स्वतंत्रता(Greek independence) -

जार अलेक्जेंडर के काल में यूनान ने टर्की के विरुद्ध विद्रोह किया था। टर्की सुल्तान ने क्रोध में आकर हजारों यूनानी विद्राहियों को मार डाला था। समस्त यूरोप की सहानुभूति यूनान के साथ थी। मेटरनिख के क्रान्ति विरोधी होने के कारण यूरोप के शासक यूनानी स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उदासीन रहे।

मिश्र के टर्की गवर्नर मोहम्मद अली ने अपने पुत्र इब्राहिम को एक विशाल सेना के साथ यूनानियों के दमन के लिए भेजा। इस सेना ने त्राहि मचा दी। 1826 ई. में उसने विद्रोहियों को परास्त कर मिसोलोंधी पर अधिकार कर लिया। एथेन्स भी जीत लिया गया।

रूस का जार निकोलस शांत बैठने वाला नहीं था। उसने यूनानियों को सहायता देने का निश्चिय किया। 1827 में रूस, ब्रिटेन तथा फ्रांस के बीच लंदन मे संधि हुई। टर्की के सुल्तान से यूनान को स्वतंत्र करने का अनुरोध किया गया। न मानने पर मित्रराष्ट्रों ने यूनानियों की सहायता के लिए नौसेना भेजी। 1827 ई में नेवेरिनो नामक स्थान पर टर्की का नोसैना परास्त हुआ। ब्रिटेन युद्ध से अलग हो गया। रूस ने युद्ध जारी रखा और कस्तुनतुनिया तक पहुंच गया एड्रियानोपेल की संधि से शांति हुई। तुर्की साम्राज्य के पतन में इस संधि का महत्वपूर्ण स्थान है। यूनानियों को स्वतंत्रता दी गई। सर्बिया, माल्डेनिया, वेलेखिया, को स्वतंत्र शासन दिया गया। वियना कांग्रेस के बाद क्रान्तिकारियों की यह सर्वप्रथम सफलता थी। रूस का जार निकोलस प्रथम की इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका रही। जार ने उदारता की अभिव्यक्ति तो की ही बालकान के समुद्री तट पर अधिपत्य स्थापना करने की नीति का यह अंग था।

रूस की टर्की के प्रति नीति बदलती रहती थी, मगर हमेशा उसका लक्ष्य टर्की के प्रदेश की प्राप्ति रहती थी। अपने ही गवर्नर मिश्र के पाशा से पराजित होकर टर्की के सुल्तान ने यूरोपीय शक्तियों से सहायता मांगी। रूस ने सहायता दी। ब्रिटेन, फ्रांस, आस्ट्रिया ने मोहम्मद अली का साथ दिया। तुर्की सुल्तान को अपने साम्राज्य से सिरिया, पेलेस्टाइन, दमिश्क, एलप्पो और अदन पर मोहम्मद अली का अधिपत्य स्वीकार करना पड़ा।

रूस ने सहायता की कीमत मांगी। तुर्की सुलतान से उनिकयार स्केलेसी की संधि 8 जुलाई 1833 ई को हुई। तुर्की ने रूस को बासफोरस और डर्डानेल्स के जल डमरू मध्य तक अपने जहाज ले जाने का अधिकार दिया। रूस ने संकट के समय तुर्की केा सहायता का वचन दिया। अब तुर्की पर रूस का प्रभाव बढ़ने लगा। इंग्लैंड और फ्रांस को यह सह्य नहीं था। मोहम्मद अली की बढ़ती शक्ति और महत्वाकांक्षा से रूस और ब्रिटेन चिंतित हुए। ब्रिटेन के लिए तुर्की पर रूसी प्रभाव और मिश्र पर फ्रांसीसी प्रभाव सह्य नहीं था। तुर्की को अधिक कमजोर भी होने नहीं देना चाहता था।

जार निकोलस ने समयोचित निर्णय लिया और ब्रिटेन के साथ 15 जुलाई 1840 को लंदन की संधि की। प्रशा, रूस, अस्ट्रिया, इंग्लैण्ड ने इस पर हस्ताक्षर किए। ब्रिटेन की यह कूटनीतिक विजय थी। फ्रांस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा भी बना और रूस को तुर्की में अधिक अधिकार भी नहीं दिए। मोहम्मद अली को पाशा पद वंशानुगत दिया गया और वह फ्रांस की चंगुल से मुक्त कराया गया। रूस के बासफोरस और डार्डानेल्स जल डमरू मध्य तक जहाज ले जाने का अधिकार समाप्त किया गया। रूस की तुर्की पर से संरक्षता भी नष्ट हो गई। जार निकोलस युद्ध के मैदान में जो जीता था उसे संधि के टेबल पर हार गया। उसका पाला ब्रिटेश मंत्री पामस्र्टन से पड़ा था जो समकालीन यूरोप का सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ था। मैरियट ने लिखा है “यदि पामस्र्टन विदेश मंत्री न बना होता तो काला सागर रूसी झील बना रहता और भूमध्य सागर के पूर्वी भाग पर जार के जहाजी बेड़े का प्रभुत्व स्थापित हो जाता। 1841 ई की लंदन की संधि ने उन्किमार स्केलेसी की संधि को समाप्त कर दिया और उसने रूस को अंसदिग्ध शब्दों में बतला दिया कि पूर्वी समस्या के अंतिम समाधान में इंग्लैण्ड प्रभाव शाली भाग लेगा।” (वाटरलू के पश्चात इग्लैण्ड पृ. 253)

रूस के जार निकोलस के लिए तुर्की एक असाध्य रोगी के समान था जो किसी समय काल के गाल में समा सकता था। सन 1844 ई में जार ने तुर्की के बंटवारे के संबंध मे ब्रिटेन से बात की। ब्रिटेन रूस को एशिया में अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी समझता था, इसलिए कस्तुनतुनिया में रूस का प्रभाव नहीं बढ़ने देना चाहता था। सन 1853 ई में जार ने पुन: तुर्की के बंटवारे का प्रस्ताव रखा परन्तु ब्रिटेन ने ठुकरा दिया। वास्तव में ब्रिटेन तुर्की के अस्तित्व एवं स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहता था। रूसी महत्वाकांक्षा को रोकने का यह सही उपाय भी था।
क्रीमिया का युद्ध 1853 ई. -

जार तुर्की से उलझने के लिये बहाना ढूंढ़ रहा था। जेरूसलेम का तीर्थ रोमन चर्च या यूनानी चर्च के अधिकार में रहे इस पर पादरियों मे विवाद हो गया। फ्रांस ने रोमन चर्च का और रूस ने यूनानी चर्च का पक्ष लिया। रूस, तुर्की के सुलतान की समस्त ईसाई प्रजा की संरक्षता की मांग कर रहा था। हेजन के अनुसार -”यदि यह मांग स्वीकार कर ली गई होती तो इसका अर्थ होता कि तुर्की के आंतरिक मामलों मे रूस को सदा हस्ताक्षेप करने का अधिकार प्राप्त हो जाता और अंत में तुर्की रूस का एक प्रकार का अधीन देश बन जाता।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास पृ. 412)

1853 ई में रूस और तुर्की के मध्य युद्ध प्रारंभ हो गया। जार निकोलस प्रथम ने आशा की थी कि यह युद्ध कुछ दिनों तक सीमित रहेगा। उसकी यह आशा भ्रमात्मक सिद्ध हुई। इंग्लैण्ड और फ्रांस तथा तुर्की के स्थान पर तुर्की, ब्रिटेन, फ्रांस व पीडमेंट को पाया - हेजन के अनुसार “इंग्लैण्ड युद्ध में इसलिये सम्मिलित हुआ कि वह आक्रमण तथा विस्तारवादी रूस से भारत के मार्ग के विषय में भयभीत था। फ्रांस नेपोलियन प्रथम के मास्को अभियान का बदला लेना चाहता था।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 421)

यह युद्ध मुख्य रूप से दक्षिणी रूस में काले सागर में स्थित क्रीमिया प्राय:द्वीप में लड़ा गया। यह युद्ध इसलिये भी महत्वपूर्ण था कि यहां पर सेवेस्टापोल में रूस का एक विशाल सामुद्रिक अस्त्रागार था। रूसी बेड़ा वहां उपस्थित था। सेवेस्टापोल लेने और रूसी सामुद्रिक बेड़े को डुबा देने से कई वर्षों के लिए रूस की शक्ति नष्ट हो जावेगी और इस प्रकार वह शस्त्र नष्ट हो जाएगा जिससे रूस तुर्की को गंभीर आघात पहुंचा सकता था। 11 माह तक सेवेस्टापोल का घेरा चला, टोडिलबर्न ने इसकी रक्षा के लिये बहुत बुद्धि लगाई। बड़े और छोटे सैनिक टुकड़ियों के मध्य युद्ध के लिए यह स्मरण किया जावेगा। कड़ी सरदी, रसद व्यवस्था के छिन्न भिन्न होने औषधि व अस्पताल की कमी के कारण मिश्र राष्ट्रों की सेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा। 336 दिनों के घेरे के बाद 8 दिसम्बर 1855 ई को सेवेस्टापोल का पतन हो गया। बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ।

पेरिस की संधि(Treaty of paris) -

30 मार्च 1856 ई. को पेरिस की संधि द्वारा शांति स्थापित हुई। शर्तें थीं -
  1. काले सागर की तटस्थता बनाए रखा गया। युद्धपोतों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके किनारे अस्त्रागार नहीं बनाया जावेगा।
  2. प्रत्येक राष्ट्र के व्यापारिक जहाज यहां जा सकेंगे।
  3. मोल्डेविया और वेलेशिया पर से रूसी संरक्षण समाप्त किया गया। तुर्की सुलतान की संप्रभुता के अंतर्गत ये स्वतंत्र घोषित किए गये।
  4. तुर्की को यूरोपीय राज्यों के परिवार में सम्मिलित कर लिया गया। इस परिवार से अब तक उसे असभ्य राष्ट्र कहकर बाहर रखा गया था। तुर्की के आंतरिक मामलों मे हस्तक्षेप न करने का वचन यूरोपीय राष्ट्रों ने दिया।
मैरियट के अनुुसार - “पूर्वकालीन घटनाओं पर विचार करने वाले आलोचकों का यह मत रहा है कि क्रीमिया युद्ध यदि एक अपराध नहीं था तो कम से कम भारी भूल अवश्य था और इसको टालना चाहिए था और यह टाला जा सकता था।”¦(वाटरलू के पश्चात इंग्लैण्ड- पृ. 260)

एक महान कूटनीतिज्ञ ने अपना सोचा विचारा मत सुसाहित्यिक शब्दों में व्यक्त किया - “क्रीमिया के युद्ध में इग्लैण्ड ने अपना दांव उचित घोड़े पर नहीं लगाया था।” मैरियट - “धीरे धीरे इग्लैण्ड ने उचित अथवा अनुचित यह धारणा बनाई कि तुर्की का मामला यूरोप के लिए महत्वपूर्ण था और उसके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था कि जार शक्ति के द्वारा अपनी मांगों को प्रस्तुत करने के लिए कृतसंकल्प था और केवल शक्ति के द्वारा ही उसकी सेनायें खदेड़ी जा सकती थी। क्रीमिया का युद्ध इस धारणा का तर्क सम्मत एवं अनिवार्य परिणाम था।” (वाटरलू के पश्चात इग्लैण्ड- पृ. 216)

हेजन - “क्रीमिया युद्ध के द्वारा पश्चिमी यूरोप की ईसाई शक्तियों ने तुर्की को सहायता देकर नष्ट होने से बचाया। क्योंकि वे कस्तुनतुनिया पर रूस का अधिपत्य नहीं होने देना चाहती थी। पूर्वी प्रश्न का हल के रूप में यह युद्ध पूर्ण असफल रहा। अपनी ईसाई प्रजा की दशा सुधारने के लिए दिया हुआ तुर्की सुल्तान का वचन कभी पूरा नहीं किया गया। उसकी दशा और बिगड़ गई।

सोलहवीं शताब्दी के धार्मिक युद्धों की तरह क्रीमिया का युद्ध धार्मिक प्रश्न को लेकर प्रारंभ हआ। मिश्र राष्ट्र विजयी हुये। उनका सम्मान बढ़ा मगर एक लाख व्यक्तियों की जानें गई। कुछ समय के लिए बालकान प्रदेशों पर रूस का प्रभाव कम हुआ। रूस का जार निकोलस इन पराजयों से ऐसा टूटा कि उसकी मृत्यु हो गई। फ्रांस के 75 हजार सैनिक मारे गए, इग्लैण्ड के 24 हजार सिपाही मारे गये। फ्रांस का 1 अरब रूपया खर्च हुआ और इग्लैण्ड पर 4 करोड़ 10 लाख पौ. का ऋण चढ़ गया। रूस की जन धन की हानि का अनुमान लगाना कठिन है। “क्रीमिया युद्ध में कौन विजयी हुआ तथा कौन पराजित हुआ यह बतलाना कठिन है।” जार निकोलस प्रथम की कूटनीतिक हार के रूप में भी इसे देखा जाता है।

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