आपूर्ति का नियम और इसके अपवाद

आपूर्ति किसी वस्तु की उन मात्राओं को दर्शाती है जिनका उत्पादक विभिन्न कीमतों पर, प्रति समय इकाई, उत्पादन कर बिक्री करने को तैयार होते हैं। ‘आपूर्ति’ शब्द के ये अभिलक्षण होते हैं :

आपूर्ति का नियम

यदि आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों में कोई परिवर्तन नहीं हो तो उच्चतर कीमत का अर्थ होगा उच्चतर लाभ। अत: यदि उत्पाद को किसी वस्तु की उच्चतर कीमत प्राप्त होने की आशा होगी तो वह उसकी आपूर्ति में वृद्धि करने को अधिक उत्सुक भी होगा। इसी प्रकार, कीमत में कमी की आशंका से ग्रस्त उत्पादक उसकी कम मात्रा की आपूर्ति करना चाहेगा। अत: हम पाते हैं कि किसी भी वस्तु की कीमत और उसकी आपूर्ति की मात्रा के बीच एक सीधा संबंध रहता है। इसी प्रत्यक्ष संबंध को हम आपूर्ति का नियम कहते हैं।

इस नियम के अनुसार जब किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है तो उसकी आपूर्ति की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है (कीमत में कमी पर मात्रा में कमी होगी), शर्त यही है कि आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य सभी कारक अपरिवर्तित रहें।

एक बार फिर, ध्यान रहे कि यह नियम तभी व्यवहार्य होता है जब अन्य सभी कारक अपरिवर्तित रहते हैं।

इस कीमत और आपूर्ति के प्रत्यक्ष संबंध की एक और विलक्षणता है। आपूर्ति की मात्रा में परिवर्तन कीमत में परिवर्तन के कारण आता है। मात्रा में परिवर्तन यहाँ प्रभाव है और कीमत में परिवर्तन उसका कारण है। हम इस संबंध को एक फलन के रूप में निरूपित कर सकते हैं। यहां आपूर्ति की मात्रा एक निर्भर चर है और कीमत ‘स्वतंत्र‘ चर है। अर्थात्

S = f (P)

यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ‘‘कीमत में वृद्धि से आपूर्ति की मात्रा में वृद्धि’’ एक सटीक कथन होगा, जबकि आपूर्ति की मात्रा में वृद्धि के कारण कीमत में वृद्धि की बात गलत होगी। यहां कीमत की वृद्धि एक स्वतंत्र चर है तथा आपूर्ति की मात्रा एक निर्भर चर है।

1. आपूर्ति फलन 

आपूर्ति फलन संक्षिप्त सूत्र में वस्तु की आपूर्ति की मात्रा को प्रभावित करने वाले कारकों को निरूपित कर देता है। अतः हम कह सकते हैं कि वस्तु की आपूर्ति की मात्रा उसकी अपनी कीमत, अन्य सभी वस्तुओं की कीमतों, उत्पादन के कारकों की कीमतों, प्रौद्योगिकी, उत्पादकों के ध्येयों तथा अन्य कारकों पर निर्भर करती है। इसी संबंध को संकेत चिन्हों का प्रयोग कर इस प्रकार दर्शाया जा सकता है: 

Qs = f(P1, P2, P3... Pn, F1… Fn, T, G, Ei, ….)

यहाँ Qs = वस्तु की आपूर्ति की मात्रा; 
P1 = वस्तु की अपनी कीमत; 
P2, P3...Pn = अन्य वस्तुओं की कीमतें; 
F1 …… Fn = सभी उत्पादन कारकों की कीमतें; 
T = प्रौद्योगिकी का वर्तमान स्तर; 
G = उत्पादक के ध्येय/लक्ष्य; तथा 
Ei …… द्वारा हम आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों की ओर इंगित कर रहे हैं। 

आपूर्ति के नियम से हमारा सरोकार केवल Qs तथा f(P1) से रहता है, हम अन्य सभी कारकों को अपरिवर्तित मानते हैं। अधिक स्पष्ट रूप से इस नियम से हमारा तात्पर्य यह रहता है कि अन्य बातें स्थिर रहने पर किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसकी अधिक मात्रा का उत्पादन कर उसे विक्रय के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। 

2. आपूर्ति तालिका

एक आपूर्ति तालिका में हम अन्य बातें पूर्ववत् रहने पर विभिन्न कीमतों पर वह मात्राएं दिखाते हैं जो हमारा उत्पादक निर्मित कर प्रति समय की अवधि में बेचने को तैयार होता है। कल्पित आंकड़ों पर आधारित एक आपूर्ति तालिका हम तालिका में दर्शा रहे हैं। यह वस्तु की कीमतों और मात्रा के बीच आपूर्ति नियम के उदाहरण को दर्शाने वाले आंकड़े हैं।

तालिका : एक पैन निर्माता की आपूर्ति तालिका

प्रति पैन की कीमत (रुपयों में) आपूर्ति की संख्या (1000 पैनों प्रति मास
2 25
3 40
4 50
5 60
6 70

तालिका में प्रस्तुत आंकड़े दर्शाते हैं कि रु. 2/- प्रति पैन की कीमत पर हमारा उत्पादन प्रतिमास 25 हजार पैन बनाकर आपूर्ति करने को तैयार है। उच्चतर कीमत रु.3/- पर तो वह 40 हजार पैन बेचने को तैयार होगा। जैसे-जैसे पैन की कीमत में वृद्धि होती है वह उत्पादक प्रतिमास और अधिक संख्या में पैन बनाकर बेचने को तैयार रहता है। यह आपूर्ति तालिका इस प्रकार बनाई गई है कि प्रति पैन कीमत और प्रतिमास आपूर्ति के लिए प्रस्तुत पैनों की संख्या के बीच सीधा संबंध स्पष्ट रूप से दिखाया जा सके।

3. आपूर्ति वक्र

अब आप चित्र पर दृष्टि डालिए। इसमें तालिका के आंकड़ों को ही अंकित किया गया है। हमने कीमत को Y-अक्ष पर दिखाया है तथा मात्रा या पैनों की संख्या को X-अक्ष पर अंकित किया है।

आपूर्ति वक्र

हमारे चित्र में ‘a’ द्वारा निर्दिष्ट बिंदु वही जानकारी दे रहा है जो तालिका की पहली पंक्ति में थी, अर्थात् रु. 2/- प्रति पैन कीमत पर उत्पादक प्रतिमाह 25,000 पैन बनाकर बेचने को तैयार है। इसी प्रकार, बिंदु b, c, d, e हमें क्रमशः तालिका की अगली पंक्तियों की जानकारी दिखा रहे हैं। 

हमारा आपूर्ति वक्र S एक सतत् रेखा है जिसे हमने बिंदु b, c, d, e और म को मिलाते हुए अंकित किया है। यह वक्र दिखाता है कि प्रत्येक कीमत पर पैनों की कितनी संख्या उत्पादन कर बिक्री के लिए उत्पादनकर्ता तैयार होगा। 

मांग वक्र की ही भांति हमारा आपूर्ति वक्र भी एक सरल रेखा या फिर ऊपर की ओर उठता हुआ किंतु नीचे की ओर ऊतल वक्र हो सकता है। 

संक्षेप में कहें तो आपूर्ति वक्र वस्तु की कीमत और उसकी उस मात्रा के बीच सीधा संबंध दर्शाता है जिसका उस कीमत पर निर्माण कर उत्पादक बेचने को तत्पर होता है। इस वक्र को बनाते समय हमारी मान्यता होती है कि आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य सभी कारकों के मान अपरिवर्तित रहते हैं। आपूर्ति वक्र का धनात्मक ढाल या दाहिनी ओर ऊपर उठता हुआ स्वरूप यही बताता है कि कीमत अधिक होगी तो उत्पादक अधिक मात्रा बाज़ार में लाने को तैयार होगा। आपूर्ति वक्र को Y-अक्ष की ओर विस्तारित करने पर उसका अक्ष केंद्र से गुजरना निश्चित नहीं होता। यदि वह अक्ष केंद्र से गुजरती है तो तात्पर्य यही होगा कि कीमत शून्य होने पर आपूर्ति भी शून्य होगी। यदि वक्र Y-अक्ष को काटता है तो इससे हमें यही जानकारी मिलती है कि कीमत के एक निश्चित स्तर तक पहुंचने से पूर्व आपूर्ति शून्य ही रहती है। हमारे चित्र में यदि कीमत एक रुपया प्रति पैन हो तो उत्पादक बाज़ार में कुछ भी नहीं बेचना चाहेगा। ऐसी कीमत को ’रिज़र्व कीमत’ कहा जाता है। उत्पादक तभी बाज़ार में माल बेचना प्रारंभ करता है जब कीमत इस ’रिज़र्व कीमत’ से कुछ अधिक हो। ऊपर की ओर उठता हुआ आपूर्ति वक्र हमारे आपूर्ति के नियम का एक चित्रांकन ही है।

आपूर्ति के नियम के अपवाद 

सामान्यतः कीमत के साथ आपूर्ति का सीधा संबंध होता है। किंतु यहां हम कुछ ऐसी अपवाद स्वरूप स्थितियों की भी चर्चा कर रहे हैं जहां आपूर्ति का यह नियम लागू नहीं हो पाता। 

यदि लाभ अधिकतम करना उत्पादक का लक्ष्य नहीं हो तो वह कीमत में वृद्धि नहीं होने पर भी अधिक माल बाज़ार में बिक्री के लिए पेश कर सकता है। उदाहरण के लिए, फर्म का लक्ष्य अपनी बिक्री को ही अधिकतम करना हो सकता है। वह कीमत अपरिवर्तित रहने पर भी अधिक माल ला सकती है। यह बिक्री की मात्रा को बढ़ाकर भी अपनी कुल आगम में वृद्धि करने का निर्णय ले सकती है। 

इसी प्रकार, यदि किसी फर्म का कई कंपनियों के समूह पर नियंत्रण हो तो वह अलगअलग वस्तुएं नहीं केवल समूचे समूह के लाभ को अधिकतम करने का लक्ष्य रखकर काम कर सकती है। ऐसी दशा में प्रत्येक उत्पाद पर आपूर्ति का नियम लागू नहीं हो पाएगा। 

कीमत से इतर कारक स्थिर नहीं रह पाने की दशा में भी हमारे आपूर्ति के नियम की एक आधारभूत मान्यता का उल्लंघन हो जाता है। वास्तव में ऐसा कई बार हो सकता है कि अन्य कारकों के मान स्थिर नहीं रह पाते। यदि अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही हो और विचाराधीन वस्तु की कीमत स्थिर रहे तो इसकी आपूर्ति में कमी हो सकती है। दूसरी ओर, प्रौद्योगिकी के परिवर्तन वस्तु की आपूर्ति की मात्रा में बदलाव का कारण बन सकते हैं, भले ही उस वस्तु की कीमत स्थिर रहे।

आपूर्ति के निर्धारक

वस्तु की आपूर्ति को प्रभावित करने वाले अनेक कारक होते हैं। हम आपूर्ति या आपूर्ति की मात्रा को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने वाले कुछ मुख्य कारकों की इस प्रकार पहचान कर सकते हैं :

1) आपूर्ति की जा रही वस्तु की कीमत : किसी भी वस्तु की बाज़ार कीमत का निर्धारण मांग और आपूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। वस्तु की कीमत में हुए प्रत्येक परिवर्तन का उसकी आपूर्ति की जा रही मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: कीमत जितनी अधिक होती है अन्य बातें स्थिर रहने पर वस्तु का उत्पादन कर उसे बाज़ार में लाना उतना ही अधिक लाभप्रद रहता है। वस्तु की कीमत और उसकी आपूर्ति की मात्रा में यह सीधा संबंध ‘आपूर्ति का नियम’ भी कहलाता है।

2) उत्पादक संसाधनों की कीमतें या उत्पादन की लागत : उत्पादन के साधनों की कीमतों में वृद्धि से वस्तु की उत्पादन लागत में वृद्धि हो जाती है। परिणामस्वरूप विक्रय से प्राप्तियाँ अपरिवर्तित रहने पर तो फर्म के लाभ कम रह जाएंगे। अत: वस्तु की उत्पादन लागत में वृद्धि से उसकी उत्पादक फर्म आपूर्ति का सिद्धांत एवं आपूर्ति की लोच हतोत्साहित होती है। इसके विपरीत उत्पादन लागत में कमी फर्म को उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है। केवल एक कारक की कीमत में परिवर्तन से विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन की सापेक्ष लाभप्रदता में परिवर्तन हो जाते हैं। यह उत्पादकों को एक वस्तु को छोड़ किसी अन्य का उत्पादन करने को प्रेरित कर सकता है। परिणामस्वरूप विभिन्न वस्तुओं की आपूर्ति में परिवर्तन होंगे। उदाहरण के लिए, भूमि की कीमत में कमी से कृशि पदार्थों की उत्पादन लागत में बड़ी कमी होगी किंतु टेलीविज़न की उत्पादन लागत तो बहुत कम प्रभावित हो पाएगी।

3) अन्य वस्तुओं की कीमतें : अन्य बातें पूर्ववत् रहने पर अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से संदर्भित वस्तु के उत्पादन और आपूर्ति में कमी होगी (अन्य वस्तुओं की कीमत में कमी का प्रभाव विपरीत होगा)। इसका मुख्य कारण यही है कि उत्पादक उसी वस्तु का निर्माण करना चाहता है जिससे उसे सर्वाधिक लाभ होता है।

4) प्रौद्योगिकी की अवस्था : हमारे ज्ञान के स्तर में परिवर्तन के साथ.साथ किसी भी वस्तु के उत्पादन के लिए प्रयुक्त विधियाँ भी बदल जाती है। उत्पादन साधनों और विधियों विशयक ज्ञान के स्तर में सुधार से वर्तमान उत्पादों की उत्पादन लागतों में कमी आती है तथा अनेक अन्य नई वस्तुओं का उत्पादन भी होने लगता है।

5) उत्पादक के लक्ष्य : उत्पादक के ध्येयों का भी वस्तु की आपूर्ति पर प्रभाव रहता है। संभव है कि उत्पादक का लक्ष्य लाभ को अधिकतम करना हो या बिक्री को या फिर दीर्घकाल में पूरे बाज़ार पर अधिकार करने का ध्येय रखकर वह आपूर्ति बढ़ा रहा हो।

6) अन्य कारक : अन्य अनेक कारक आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें से कुछ हैं : सरकारी नीतियों में परिवर्तन की आशाएं, युद्ध की आशंका, अप्रत्याशित मौसमी परिवर्तन, कीमतों में अपेक्षित परिवर्तन आदि। आय की विषमताओं में वृद्धि से कुछ चीज़ों की मांग में उछाल आने से उनका उत्पादन अधिक लाभदायक प्रतीत होने लगता है।

हमारे लिए सभी निर्धारक कारकों में एक साथ आए परिवर्तनों के किसी वस्तु की आपूर्ति पर प्रभावों का आकलन विश्लेशण बहुत कठिन होगा। इसीलिए हम सामान्यत: ऐसी स्थिति की कल्पना करते हैं जहाँ एक कारक में परिवर्तन होते समय अन्य सभी कारक पूर्ववत् ही रहते हैं। इस मान्यता के आधार पर हम किसी उत्पादक या उत्पादक समूह द्वारा की गई किसी वस्तु की आपूर्ति पर उस परिवर्तित कारक के प्रभाव का विश्लेशण कर पाते हैं

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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