रेडियो का उद्भव और विकास

रेडियो के आविष्कार ने जनसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी। रेडियो एक श्रव्य माध्यम है। इसका संबंध सुनने से है। हम रेडियो से प्रसारित सभी कार्यक्रम सुनते हैं। जनसंचार के क्षेत्र में जो क्रांति आई इसका आकाशवाणी ने भरपूर उपयोग किया। आकाशवाणी का जो विस्तृत स्वरूप और बढ़ता नेटवर्क दिखाई देता है, वह स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व नहीं था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही आकाशवाणी ने अपने नाम को सार्थक बनाया और जन साधारण को अपनी नयी-नयी सेवाएँ प्रदान कर सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से अपनी सामाजिक जनप्रसारण की सार्थक भूमिका का निर्वाह किया है।

रेडियो का उद्भव और विकास

रेडियो का आविष्कार

रेडियो का आविष्कार 1896 में इटली के एक वैज्ञानिक मारकोनी ने किया। इसके पूर्व रेडियो तरंगों का प्रायोगिक उपयोग जर्मन भौतिक शास्त्री हेनरिच हर्ज ने 1887 में किया था। इस संदर्भ में रदरफोर्ड, ऑलिवर लॉज के प्रयोगों ने भी उल्लेखनीय कार्य किए। लेकिन इटली के 27 वर्षीय वैज्ञानिक गुगलियो मारकोनी ने सबसे पहले संकेतों का संचार करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने इंग्लैण्ड के कार्नवाल इलाके के पोलघु नामक स्थान से अटलांटिक महासागर के पार कनाडा के न्यू फाउण्ड लैण्ड स्थित सन्त जॉन्स से भेजी गई आवाज को सुनने और पुन: अपनी बात दूसरी तरफ पहुँचाने में कामयाबी हासिल की। मारकोनी ने इसके पहले 1890 में बेतार के तार का आविष्कार करके इस दिशा में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। मारकोनी के बेतार के तार (वायरलेस टेलीग्राफ) की सहायता से एक छोर से दसूरी छोर तक के व्यक्ति से बातें होने लगी। ये बातें साकेंतिक भाषा में ही होती थी। धीरे-धीरे इस दिशा में विकास हुआ और इन सांकेतिक भाषाओं ने शब्द क्रांति को जन्म दिया।

आरंभ में रेडियो का उपयोग

शुरूआती दौर में रेडियो के संकेतों का उपयोग नौका चालकों की सुरक्षा के लिए किया जाता था। जब नाविक किसी समुद्री तूफान में फंस जाते थे जो वे दूसरे तट पर रहने वालों तक अपनी पुकार को पहुँचाने के लिए इसका उपयोग किया करते थे, ताकि उन्हें सुरक्षा प्राप्त हो सके। इसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इसका (रेडियो तरंगों का) उपयोग गोपनीय सूचनाओं को दूसरों तक पहुँचाने के रूप में किया जाने लगा।

विदेश में रेडियो का उद्भव

दुनिया में पहली बार 1916 में रेडियो के माध्यम से समाचार प्रसारित किया गया। यह समाचार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव की सूचना से संबंधित था। प्रिंट मीडिया से पहले चंद घंटों में संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों ने इस सूचना को सुना तो उनके कौतूहल का ठिकाना नहीं था। वे हतप्रभ थे। संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों को पहली बार यह अहसास हुआ कि इसका उपयोग संचार के क्षेत्र में किया जा सकता है। लोगों की उत्सुकता को देखते हुए 1919 में रेडियो कारपोरेशन ऑफ़ अमेरिका की स्थापना की गई। 21 दिसम्बर 1922 को ईस्ट पिट्सबर्ग में रेडियो ब्रॉडकॉस्टिंग का श्रीगणेश हुआ। प्रसारण की दिशा में अमेरिका में हो रहे प्रयासों को देखते हुए दुनिया के अन्य देशों जैसे - कनाडा, ब्राजील, फ्रांस, इटली और रूस ने भी प्रसारण के क्षेत्र में अपने कदम आगे बढ़ाए। रेडियो का प्रयोग राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगा। इस दिशा में ब्रिटेन भी पीछे रहने वाला नहीं था।

1922 में ब्रिटेन ने रेडियो प्रसारण के लिए एक कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी का नाम ब्रिटिश ब्रॉडकॉस्टिंग कम्पनी रखा गया। यही कम्पनी आगे चलकर जनवरी 1927 को ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के रूप में कार्य करने लगी तथा बी.बी.सी. के नाम से पूरे विश्व में विख्यात हुई।

अमेरिका में 1921 में पहला प्रसारण केन्द्र मेसाचुसेट्स नगर में शुरू किया गया था। इसके पूर्व प्रसारण को सुचारु रूप से चलाने के लिए 1919 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक निगम का गठन किया गया, जिसका नाम रेडियो कॉर्पोरेशन ऑफ़ अमेरिका रखा गया था। इस तरह विदेशों में रेडियो के विस्तार की कल्पना साकार होने लगी। ट्रांसमिटर खुलने लगे तथा 21 दिसम्बर 1922 को विश्व में पहले रेडियो केन्द्र का जन्म हुआ।

भारत में रेडियो प्रसारण का इतिहास

इस भाग में हम भारत में रेडियो प्रसारण के इतिहास से आपको परिचित कराने जा रहे हैं। इससे आपको भारत में हुए रेडियो विकास की जानकारी हो सकेगी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व रेडियो का स्वरूप

अमेरिका और ब्रिटेन में ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के गठन के बाद भारत में भी इस दिशा में सोचा जाने लगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भारत में रेडियो से पहला प्रसारण 23 जुलाई 1927 में बंबई से शुरू हुआ। भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इर्विन ने बंबई में इस केन्द्र का उद्घाटन किया। उसी वर्ष 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता केन्द्र का भी उद्घाटन बंगाल के गवर्नर सर स्टैनले जेक्सन ने किया।

बंबई प्रसारण केन्द्र का उद्घाटन भाषण देते हुए लार्ड इरविन ने कहा कि प्रसारण के लिए भारत में विशेष संभावनाएँ हैं। क्षेत्र का विस्तार और उसकी दूरियाँ इस देश को प्रसारण के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बना देती हैं। मनोरंजन और शिक्षा दोनों ही दृष्टियों से इसकी संभावनाएँ अधिक हैं, यद्यपि इस समय हम शायद उनकी सीमा का अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं।

इरविन का यह कथन सही निकला और भारत में प्रसारण के विस्तार की संभावनाएँ दिखाई देने लगी थीं। हालांकि भारत में रेडियो का प्रसारण 1927 के पूर्व प्राइवेट कम्पनियों और क्लबों द्वारा शुरू हो गया था। शुरू-शुरू में टाइम्स ऑफ़  इंडिया और डाक-तार विभाग ने आपस में मिल-जुलकर बंबई से प्रसारण का कार्य शुरू किया था। इन्हीं दिनों मद्रास प्रेसीडेन्सी रेडियो क्लब ने भी हल्के फुल्के मनोरंजन कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू कर दिया था। इस रेडियो क्लब का प्रसारण 21 जुलाई 1924 से शुरू हुआ था। क्लब के सदस्यों ने आपस में पैसा इकट्ठा करके एक किलोवॉट का एक ट्रांसमिटर भी लगाया था। लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह रेडियो क्लब अधिक समय तक प्रसारण कार्य जारी नहीं रख सका। सन 1926 में यह क्लब बंद हो गया था। लेकिन प्रसारण में रुचि रखने वालों की संख्या में वृद्धि होने लगी थी। रेडियो स्टेशन चालू करने के लिए क्या प्रक्रियाएँ अपनाई जाएँ इस संबंध में रेडियो निर्माताओं और प्रेस के प्रतिनिधियों ने सरकार से बातचीत करना शुरू कर दिया।

मार्च 1926 में इंडिया ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी बनाई गई और कम्पनी ने 13 सितम्बर 1926 को प्रसारण करने का लाइसेंस सरकार से प्राप्त कर लिया। इस कम्पनी ने बंबई और कलकत्ता में डेढ़-डेढ़ किलोवॉट क्षमता वाले ट्रांसमिटर लगाए। इन केन्द्रों से लगभग 55 किलोमीटर के दायरे में कार्यक्रम आसानी से सुने जा सकते थे। इस तरह भारत में प्रसारण की शुरूआत हुई। लेकिन आर्थिक संकट के कारण यह कम्पनी घाटे में चलने लगी थी। कम्पनी की आय लाइसेंसों से प्राप्त होती थी। लाइसेंसों से कम्पनी को इतनी आय नहीं होती थी कि वह अपना सारा काम सुचारु रूप से चला सके। कम्पनी ट्रांसमिटर का खर्चा, रखरखाव, कार्यक्रमों का खर्चा वहन नहीं कर पा रही थी। इसलिए कम्पनी ने सरकार से अनुरोध किया कि वह आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास करे। भारत सरकार ने कम्पनी को अपने अधीन कर लिया और इसका नाम इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस कर दिया। नाम बदल जाने पर आर्थिक दृष्टि से कोई सुधार नहीं आया। सरकार ने 9 अक्टूबर 1931 को इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस को बंद करने का निर्णय लिया तो इसका भारी विरोध हुआ। जनमानस की रुचि और आक्रोश को देखते हुए इस सर्विस को चालू रखने का निर्णय लिया गया और सरकार ने कम्पनी के विकास के लिए 40 लाख रुपये दिए। श्री पी.जी. एडमन्ड्स को कम्पनी के कन्ट्रोलर ऑफ़  ब्रॉडिकास्टिंग के पद पर नियुक्त किया गया।

दिल्ली में रेडियो स्टेशन की स्थापना के लिए सरकार ने जनवरी 1934 में ढाई लाख रुपए स्वीकृत किए। सरकार ने आय में वृद्धि के लिए ग्रामोफोन रिकार्ड तथा रेडियो सेट पर आयात शुल्क में 50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। परिणामस्वरूप ‘ब्रॉडकास्टिगं सर्विस’ की आय में दुगुनी वृद्धि हो गई। इसके अलावा सरकार को ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन की प्रसारण प्रणाली के बारे में भी पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो चुकी थी। अत: दिल्ली में रेडियो स्टेशन खोलने के लिए ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी श्री लायनेल फील्डन को सन 1935 में अगस्त माह में भारत भेजा गया। उन्होंने 30 अगस्त 1935 को कन्ट्रोलर ऑफ़  ब्रॉडकास्टिंग का पद सम्भाला।

भारत सरकार ने उनके लिए एक अलग ऑफिस खोला। उस समय यह ऑफिस उद्योग और श्रम विभाग के अधीन रखा गया था। भारत में रेडियो स्टेशन की शुरूआत के लिए फील्डन ने बी.बी.सी. के अनुसंधान विभाग के प्रमुख श्री एच.एल. किर्की की सेवाओं की मांग की। किर्की ने भारत आकर पहले तो विभिन्न स्थानों का दौरा किया और बाद में एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें पूरे देश में मध्यम तरंग (मीडियम वेब) के ट्रांसमिटर लगाने का सुझाव दिया। अगस्त 1936 में बी.बी.सी. के श्री सी. डब्ल्यू गोयडर भारत आए और उन्होंने चीफ इंजीनियर के रूप में पदभार संभाला।

उन्होंने यह अनुभव किया कि ट्रांसमिटरों के निर्माण के लिए जो धनराशि निर्धारित की गई है, वह पर्याप्त नहीं है। इसलिए उन्होंने मीडियम वेब तथा शॉटवेब की मिली-जुली सेवा प्रदान करने का प्रस्ताव किया। फील्डन के भारत आगमन के बाद प्रसारण के विकास में कार्य आरम्भ होने लगा और एक जनवरी 1936 को दिल्ली में इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिगं सर्विस ने प्रसारण आरम्भ कर दिया। दिल्ली में प्रसारण के इतिहास में यह महत्वपूर्ण घटना हुई। 8 जून 1936 में इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदल दिया गया और इसके स्थान पर आल इंडिया रेडियो रखा गया। दिल्ली केन्द्र से जब प्रसारण आरम्भ हुए तो इस बात का ध्यान रखा गया कि रेडियो से प्रसारित कार्यक्रम शहरों तक ही न हो इसका विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक हो। कार्यक्रमों में सुधार के लिए सलाहकार समितियाँ, सलाहकार परामर्श परिषद बनाई गई, जो कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर ध्यान देती थी। जनवरी 1937 को श्रोताओं की प्रतिक्रियाएँ जानने के लिए श्रोता अनुसंधान एकक खोला गया। इसी प्रकार दिल्ली में 9 सितम्बर 1937 को चाल्र्स बान्र्स को समाचार वाचक (न्यूज रीडर) के पद पर नियुक्त किया गया। आल इंडिया रेडियो के वे पहले समाचार संपादक (न्यूज एडीटर) थे जो बाद में सेन्टर न्यूज ऑर्गेनाइजेशन के प्रथम समाचार निदेशक (डायरेक्टर आफ न्यूज) बने।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद रेडियो का विकास

स्वतत्रं ता प्राप्ति के पूर्व 1944 में आल  इंडिया रेडियो के महानिदेशक अहमदशाह बुखारी के कार्यकाल के दौरान प्रसारण के विस्तार की योजना बनाई गई। स्वतंत्र भारत का पहला रेडियो स्टेशन 1 नवम्बर 1947 को जालंधर में खोला गया। पहली जुलाई 1948 को श्रीनगर में रेडियो स्टेशन से प्रसारण आरम्भ हुआ, इसके बाद से देश के विभिन्न क्षेत्रों में ट्रांसमिटर लगाए गये और प्रसारण को गति मिली।

1948 में पटना, कटक, अमृतसर, शिलांग, नागपुर, विजयवाड़ा और पणजी में प्रसारण के लिए केन्द्र खोले गए। 1950 के बाद प्रसारण केन्द्रों के लिए जो योजनाएँ बनाई गई उन्हें पंचवर्षीय योजनाओं में प्राथमिकताएँ दी गई। देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में रेडियो की भूमिका के महत्व को समझा गया। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने। उन्होंने भारतीय संदर्भ में प्रसारण को आगे बढ़ाने में नयी दिशा दी।

जिस समय देश का बँटवारा हुआ, (15 अगस्त 1947) तब छह रेडियो स्टेशन दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचि और लखनऊ भारत में रह गए और तीन रेडियो स्टेशन लाहौर, पेशावर और ढाका तत्कालीन पाकिस्तान में चले गए। लेकिन आजादी के बाद जब देश में स्थितियाँ अनुकूल हुई तब प्रसारण की योजना और विस्तार पर अधिक ध्यान दिया गया। प्रसारण केन्द्रों का विस्तार हुआ। बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना को ध्यान में रखते हुए देश के कोने-कोने में ट्रांसमिटर लगाने के काम को प्राथमिकता दी गई और सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का माध्यम बनकर रेडियो प्रसारण श्रोताओं के समक्ष उपस्थित हुआ। 1957 में आल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर भारतीय परम्परा और संस्कृति से अनुप्रेरित होकर इसका नाम ‘आकाशवाणी’ हो गया।

आजादी के बाद भारत में लोकतंत्र आया। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ बनाईं। इन योजनाओं में भारत के समग्र विकास की कहानी छिपी हुई थी। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, औद्योगिक, शैक्षिक और कृषि के क्षेत्र में विकास की योजनाएँ बनाकर उन्हें क्रियान्वित करने पर विशेष बल दिया गया। इस दिशा में प्रसारण के विकास को भी पंचवर्षीय योजनाओं में प्राथमिकता दी गई।

Comments