राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना और संघ के उद्देश्य

on
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक देशव्यापी सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है। देशभर में सभी राज्यों के सभी जिलों में 58,967 हजार से शाखाओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य चल रहा है। प्रत्येक समाज में देशभक्त, अनुशासित, चरित्रवान और नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों की आवश्यकता रहती है। ऐसे लोगों को तैयार करने का, उनको संगठित करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में एक संगठन ना बनकर सम्पूर्ण समाज को ही संगठित करने का प्रयास करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

प. पू. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण किन परिस्थितियों में किया, सर्वप्रथम हम इस पर विचार-विमर्श करेंगे कि ऐसा क्या हुआ, अथवा किसके अभाव या कमी के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विकास करना पड़ा। हेडगेवार एक देशभक्त व सक्रिय क्रान्तिकारी, एक चिन्तनशील व्यक्ति थे। उन्होंने इतिहास में पढ़ा था कि किस प्रकार हमारे देश की संस्कृति व सभ्यता, विश्व की सर्वोपरि संस्कृति है और कैसे हमारी हिन्दू संस्कृति को विदेशी आक्रमणों व अंग्रेजों के द्वारा धराशायी की जा रही है। इसके पीछे उन्होंने जो कारण पाया वह था राष्ट्रीय एकता की कमी व हमारा समाज हिन्दुत्व की श्रेष्ठता, गौरवशाली अतीत व सामाजिक समरसता के भाव का विस्मरण करता जा रहा है। व्यक्ति आत्मकेन्द्रित, व्यक्ति बनकर स्वार्थ में लिप्त हो रहा है, जिसके कारण सामूहिक अनुशासन का अभाव हो रहा है। हमारे समाज में भाषा, शिक्षा, जीवन मूल्यों व हिन्दू में व्यक्ति हीनता की भावना का विकास हो रहा था।

अंग्रेजों से अपने देश को आजाद करने के लिए भी आदि कारण रहे, जिसकी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। सही मायने में हमारा देश जो गुलाम हुआ, कभी मुस्लिम, कभी अंग्रेजों के द्वारा इसका सही कारण हमारे देश की सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता की कमी ही रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा उस जड़ को ही समाप्त करना था ताकि भविष्य में हमें ऐसी समस्या से जूझना ना पड़े।

27 सितम्बर, 1925 को विजयादशमी के दिन प्रखर राष्ट्रवादी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने विश्वस्त साथियों के साथ विचार-विमर्श कर नागपुर में एक नए संगठन एवं कार्यपद्धति का श्रीगणेश किया। 

हर रविवार को समता संचालन का प्रशिक्षण प्रारम्भ हुआ जबकि हर गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर भाषण प्रारंभ हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का लिखित रूप में कोई उद्देश्य नहीं था, आश्चर्य होता है। इस संगठन ने अपना कोई प्रचार नहीं किया था। 6 महीने तक तो नामकरण भी नहीं हुआ था। 17 अप्रैल 1926 को संगठन का नामकरण किया गया। नागपुर के मोहित बाड़ा में प्रतिदिन 1 घण्टे की मिलन नित्य शाखा 28 मई, 1926 से प्रारम्भ हुई और आज भारतवर्ष के प्रत्येक राज्य एवं प्रत्येक जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 58,967 शाखाओं के माध्यम से सामाजिक कार्य कर रहा है।

इस प्रकार डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से सम्पूर्ण देश को जागृत करना व उपर्युक्त कमियों, जो देश में थी, उनको दूर करने के लिए डॉक्टर जी ने स्वाभिमानी, संस्कारित, अनुशासित, चरित्रवान, शक्तिसम्पन्न, विशुद्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत, व्यक्तिगत अंहकार से मुक्त व्यक्तियों का ऐसा संगठन बनाया। जो स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ होने के साथ ही राष्ट्र व समाज पर आने वाली प्रत्येक विपत्ति का सामना भी कर सकेगा आज विश्व के अन्य 471 देशों में भी यह संगठन हिन्दू संस्कृति की रक्षा कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य

हर समुदाय या संस्था, संगठन की जब स्थापना की जाति है तो सबसे पहले उसके उद्देश्य ही निर्धारित किये जाते हैं। उसके उद्देश्यों के अनुरूप ही उसके कार्यक्रमों, कार्यपद्धति को निर्धारित किया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी अपना एक उद्देश्य है, जिसको लेकर डॉ. हेडगेवार जी ने इसकी स्थापना की थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है कि हमारा भारत विश्व का सर्वश्रेष्ठ देश बने व आर्थिक दृष्टि से यह स्वावलम्बी और सम्पन्न हो। भारत ने कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं किया है, लेकिन भारत पर युद्ध लादा जाए तो युद्ध में भारत हमेशा अजेय हो। मा. स. गोलवलकर के शब्दों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुओं के राष्ट्रीय चरित्र का साक्षात्कार कर उनमें भारत व उसकी राष्ट्रीय प्रकृति के प्रति प्रखर निष्ठा का संचार करने, उनमें सद्गुण, सच्चरित्र एवं पूर्ण समर्पण की भावना जगाने, सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने, प्रस्थ-सद्भाव, सहयोग एवं स्नेह का भाव उद्बुद्ध करने, राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च मानने एवं जाति, भाषा तथा पंथ को गौण स्थान देने की मनोवृत्ति विकसित करने और उसे आचरण में उतारने, उनमें विन्रमता एवं अनुशासन के साथ समस्त सामाजिक दायित्वों के निर्वहन हेतु शारीरिक सौष्ठव एवं कठोरता के महत्व का अभ्यास कराते हुए जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त अनुशासन द्वारा हिमालय से कन्याकुमारी पर्यंत संगठित, समरस राष्ट्र के निर्माण हेतु योजनाबद्ध प्रयास कर रहा है।’’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, स्वयंसेवकों को अपने आचरण में लाना होगा समरसता की बात करते हैं तो स्वयंसेवकों को समरसता का व्यवहार करना होगा राष्ट्र की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए हमारी हिन्दू संस्कृति के प्रति सम्मान रखना चाहिए समाज में हो रही कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए

‘हम सब एक हैं’, इस भावना को सबके अन्दर जगाना चाहिए स्वयंसेवक सभी के साथ ऐसा व्यवहार करेंगें तो धीरे-धीरे समाज के अन्य व्यक्ति भी उस से प्रभावित होंगे। और एक राष्ट्र की भावना का जन्म होगा, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है। देश के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्पूर्ण देश में निवास करने वाले बन्धु-बान्धवों के प्रति एकात्मता का बोध कराने वाले मंत्रों का उच्चारण शाखा में कराया जाता है, जैसे-

‘‘रत्नाकराधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम्।

ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम्।।’’

सागर जिसके चरण धो रहा है, हिमालय जिसका मुकुट और जो ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि रूपी रत्नों से समृद्ध है। ऐसी भारत माता की मैं वन्दना करता हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में राष्ट्र की एकता की भावना के लिए मंत्रों का उच्चरण भी नित्य पाठ में कराया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक

सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सर्वोच्च अधिकारी होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन व निर्देशन इनके द्वारा ही किया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करके ही, सर्वसम्मति के आधार पर ही सरसंघचालक कार्य करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आजतक के प्रमुख सरसंघचालकों का व्यक्तित्व का वर्णन इस प्रकार है-

आद्य सरसंघचालक

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम आद्य सरसंघचालक वेदपाठी परिवार में 1 अप्रैल 1889 में नागपुर में हुआ। उस दिन विक्रम संवत् 1946 की वर्ष प्रतिपदा थी। उनकी माता का नाम रेवती बाई, पिता का नाम बलिराम था। आनन्द आदीश के शब्दों में:-

‘‘भरपूर मिला साहस-संबल

नैतिक बल भली प्रकार मिला,

संस्कार मिले अतिशय निर्मल

माता का अतुल दुलार मिला।’’

कम उम्र में ही केशव जी के माता-पिता उन्हें छोड़कर चले गए इतने कम समय में ही उन्हें साहसी व संस्कारी बना गये थे।

केशव के मन में बाल्यकाल से ही देश की स्वतंत्रता की आकाँक्षा इतनी तीव्र हो चुकी थी कि आठ वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी के राज्यारोहण की हीरक जयन्ती पर दी गई मिठाई उन्होंने कूड़े में फेंक दी। ‘वन्देमातरम’ के नारे को सम्मान दिया न कि स्कूल में पढ़ना। उस स्कूल में इस नारे के कारण विद्याथ्र्ाी को स्कूल से निकाल दिया था परन्तु बाद में हेडगेवार जी ने उनके साथ कोई समझौता नहीं किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार उनके मन में स्वतंत्रता को प्राप्त करने की आकांक्षा थी। देश फिर से गुलाम न हो उन कारणों का पता लगाकर डॉ. हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, 1925-1940 तक का समय उनका था। इस दौरान 1930-31 तक डॉ. लक्ष्मण वामन परापजंपे को अल्प सरसंघचालक बनाया गया था। क्योंकि 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था।

अकोला कारागर में उनका संपर्क अन्य देशभक्त नेताओं से हुआ और उसके बाद शाखा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखएँ विदर्भ से प्रारम्भ हुई। इस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर उन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दिया था, जिससे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का विस्तार होता गया। 9 जून 1940 को नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग के दीक्षान्त समारोह में डॉक्टर जी ने कहा था, ‘आज अपने सम्मुख में हिन्दू राष्ट्र के छोटे स्वरूप को देख रहा हूँ।’

इस प्रकार से भारत, देश को हिन्दू राष्ट्र के जिस रूप में वे देखना चाहते हैं, उसका एक लघुरूप उनके सामने ही तैयार हो गया था।

अपने छोटे से जीवन काल में ही वो बहुत बड़े- कार्य कर, हमें छोड़कर 21 जून 1940 को अमरतत्व में विलीन हो गये थे और दिवंगत होने से पूर्व ही अपना कार्यभार माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सौंप गये थे।

द्वितीय सरसंघचालक -श्री गुरुजी

श्री गुरुजी का पूरा नाम माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर था। प्राणिशास्त्र के अध्यापक के रूप कार्य करने के कारण उनको यह उपनाम मिला था। आगे चलकर यही नाम अधिक प्रसिद्ध हो गया।

विक्रम संवत् 1962 फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन गुरुजी का जन्म हुआ। ईसाई दिनांक के अनुसार 19 फरवरी 1906 को। पिता जी का नाम सदाशिव व माता का नाम लक्ष्मीबाई था। गुरुजी की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा अनेक स्थानों से जुड़ी है, कारण पिता का नौकरी में स्थानांतरण था। नागपुर के हिस्लाप कॉलेज से उन्होंने इण्टर साइन्स की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद काशी विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में एम.एस.सी. की और बाद में वही पर प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए वहीं से उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ।

श्री गुरुजी, डॉ. हेडगेवार से बहुत प्रभावित हुए और उनसे घनिष्ठता भी बढ़ गई। परन्तु उनका ध्यान आध्यात्मिक की तरफ अधिक था, जिसके कारण वे बंगाल के सारगाछी आश्रम में पहुँचे। स्वामी विवेकानन्द के गुरु भाई स्वामी अखण्डानन्द इस आश्रम के प्रमुख थे। गुरुजी ने उनसे संन्यास की दीक्षा ली। स्वामी अखण्डनाद ने उन्हें डॉ. हेडगेवार के साथ मिलकर देश की सेवा करने को कहा और उनकी मृत्यु के पश्चात् वह नागपुर लौट आये। अब गुरुजी का सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक हो गया था। 1938 के नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी नियुक्त हुए 1939 में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार्यवाह बनाया। डॉ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद, उनके आज्ञानुसार सरसंघचालक बनाया गया।

अभी तक सभी सरसंघचालकों में से सबसे अधिक समय, 33 वर्ष, श्री गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार में इनका योगदान बहुमूल्य है। इन्हेांने अनेक समविचारी संगठनों की स्थापना की ताकि हम समाज के अन्य व्यक्तियों से जुड़ सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहला प्रतिबन्ध 1948 में लगा, उसका सामना किया।

भारत-चीन के युद्ध में, कश्मीर की समस्या में अपनी अह्म भूमिका निभाई। समाज में आई अनेक विपदाओं का सामना किया। उनके गुरु ने कहा था, ‘‘नर-सेवा, नारायण सेवा’’, जिसके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर सदा समाज-सेवा के कार्यों में वे अग्रणी भूमिका में रहे। कर्क रोग के कारण 5 जून 1973 को उन्होंने इस संसार में अन्तिम सांस ली और अपने उत्तराधिकारी के रूप में श्री बालसाहब देवरस को मनोनीत कर गये।

तृतीय सरसंघचालक – श्री बालासाहब देवरस

इनका पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था। ‘बालासाहब’ उपनाम से ही उन्हें अधिक लोग जानते थे। इनका जन्म विक्रम संवत 1985 मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन हुआ। ईसाई दिनांक के अनुसार- 11 दिसम्बर 1915 को। बालासाहब को बचपन में सब ‘बाल’ कहकर गोद में उठाते थे, जिसके कारण आगे ही नाम प्रचलित हो गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाखा में प्रथम बाल स्वयंसेवकों में इनका नाम आता है। यह 10 वर्ष की आयु में ही स्वयंसेवक बन गये थे। बालासाहब प्रथम बाल स्वयंसेवकों की टोली के नेता थे। उनकी सारी शिक्षा भी नागपुर में हुई थी। शिक्षा के साथ शाखा में जाना उनका नित्य कार्यक्रमों में शामिल हो गया था। बालासाहब एक बुद्धिमान बालक था, जिसके कारण उनके पिता भय्या जी उन्हें आई.सी.एस. होकर उच्च शासकीय पद का सम्मान दिलाने चाहते थे, लेकिन बालासाहब को तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जाना था, वह देश की सेवा करनी थी, जिसके कारण पिता से कई बार डांट भी खाई, परन्तु माँ पार्वतीबाई सदा ही उन्हें बचा लेती थी। देश सेवा के लिए बालासाहब जाते हैं, कोई गलत काम करने नहीं जाते है। माँ का आशीर्वाद सदा उनके साथ रहा और बाल व उसका भाई भाऊ दोनों ने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर खूब नाम कमाया, जिसके कारण उत्तर भारत में एक बार उनके पिता आये तो उनको बहुत मान सम्मान हुआ, जिसके कारण भय्याजी ने डॉ. हेडगेवार का धन्यवाद किया कि उनके बच्चों को ऐसे संस्कार दिये।

बालासाहब बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गये थे, जिसके कारण उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से ही इनकी गतिविधि देख रहे थे। अनेक गतिविधियों में इन्होंने भी भाग लिया। डॉ. हेडगेवार ने इन्हें प्रथम बार बंगाल में प्रान्त कार्य के लिए भेजा। 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बनाया गया। 1965 में सरकार्यवाह और 1973 में श्री गुरुजी के बाद सरसंघचालक बने। 21 वर्षों तक बालासाहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस पद पर कार्यरत रहे। बालासाहब ने श्री गुरुजी के साथ मिलकर अनेक कार्य किये थे। और अपने समय में नये समविचारी संगठन की रचना की, जैसे- सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, बाल संस्कार केन्द्र, आदि।

बालासाहब देवरस जी के समय में सबसे बड़ी विपत्ति आपातकालीन समय 1975 की थी, जिसके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा इस समय पर अनेक स्वयंसेवकों को यातनाएँ सहन करनी पड़ी। बिना कारण के ‘मीसा’ कानून के तहत जेल में डाल दिये गये। इन सबके खिलाफ व जनतंत्र को दोबारा लाने के लिए अनेक आन्दोलन करके इसे सफल बनाया, जो बालासाहब जी की देखरेख में हुए इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार में इनका अह्म योगदान रहा है।

सन् 1992 से बालासाहब का स्वास्थ्य बिगड़ता गया, जिसके चलते उन्होंने स्वयं को निवृत्त कर 1994 में प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी अर्थात् सरसंघचालक नियुक्त किया। ‘मैं कार्य नहीं कर सकता’, यह देखते ही दायित्व से हटने की उत्तम पद्धति बालासाहब ने आरम्भ की। 17 जून, 1996 के दिन पूणे के ‘रूबी शल्य क्लीनिक’ चिकित्सालय में उनका निधन हुआ।

चतुर्थ सर संघचालक- प्रो. राजेन्द्र सिंह

प्रो. राजेन्द्र सिंह, जिसे सारे लोग ‘रज्जू भैया’ के नाम से जानते हैं। 11 मार्च 1994 में चतुर्थ सरसंघचालक बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में यह पहली घटना थी कि सरसंघचालक के जीवित रहते उनके उत्तराधिकारी की घोषणा की गई।

प्रो. राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी 1922 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ अभियन्ता के घर में हुआ। उनके पिता जी श्री कुंवर बलवीर सिंह सिंचाई विभाग में अभियन्ता थें। उनकी माता जी का नाम ज्वाला देवी था, जिन्हें वे ‘‘जियाजी’’ कहकर पुकारते थे। प्राथमिक शिक्षा उनकी नैनीताल में हुई थी। बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में व एम.एस.सी. भौतिक शास्त्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की। यहाँ पर ही 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रति उनका प्रथम आकर्षण हुआ था। एम.एस.सी. करने के बाद वही पर इनको प्राध्यापक नियुक्त कर दिया गया।

1966 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आवश्यकता को देखते हुए, इन्होंने स्वेच्छा से इस पद से त्यागपत्र दे दिया और वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये। 1978 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह बने। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण यह पद छोड़ा व 1987 में हो. वे. शेषाद्रि के सह-सरकार्यवाह बने। 11 मार्च 1994 में बालासाहब देवरस जी ने इन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक बनाया।

प्रो. राजेन्द्र सिंह पहले सरसंघचालक हैं, जिन्होंने विदेश में जाकर हिन्दू स्वयंसेवक संघ के कार्य का निरीक्षण किया। इस हेतु इंग्लैण्ड, मॉरिशस, केनिया आदि देशों में उनका प्रवास हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन व समय-समय पर करते रहे। उनको इस बात का बड़ा दु:ख था कि रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नाम पर भारत में कोई स्मारक नहीं है। 1999 में पूणे में में अचानक गिर जाने से उनकी कमर की हड्डियां टूट गई, जिसके कारण वह अस्वस्थ हो गये और 10 मार्च 2000 को श्री सुदर्शन जी को सरसंघचालक का भार सौंप दिया। 6 वर्ष के कार्यकाल में उनका योगदान अह्म है। 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पूणे में स्वर्गवास हो गया।

पंचम सरसंघचालक- श्री कुप. सी. सुदर्शन

इनका पूरा नाम श्री कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन था। 18 जून 1931 में रायपुर, छत्तीसगढ़ में इनका जन्म हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा चन्द्रपुर, रायपुर में ही हुई थी। 1954 में जबलपुर, सागर विश्वविद्यालय से बी.ई. (ऑनर्स) दूरसंचार विषय में उपाधि प्राप्त की। वहीं से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक भी बन निकले। 1964 में उन्हें मध्य भारत प्रान्त-प्रचारक का दायित्व मिला।

1969 से 1971 तक अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षण प्रमुख का दायित्व तथा 1979 में अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख का दायित्व मिला। 1990 में सह सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया।

अन्ततोगत्वा स्वास्थ्य के कारणों से ही नागपुर में मार्च, 2009 में सम्पन्न हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री सुदर्शन जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गौरवशाली परम्परा का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक की नियुक्ति परम्परा, उसमें हुए परिवर्तनों का संदर्भ देते हुए नवीन सरसंघचालक के रूप में श्री मोहनराव भागवत जी घोषणा कर दी। और स्व. बबुआ जी का कथन उद्धृत किया, ‘इन्हें देखते हुए डॉक्टर साहब की याद आती है।’1 श्री सुदर्शन जी ने भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्ग दर्शन में अपनी अह्म भूमिका निभाई है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी देशभर में प्रचार करते रहे थे। 15 सितम्बर 2012 को अपने जन्म के स्थान रायपुर में ही अकस्मात् उनका निधन हो गया।

षष्टम् सरसंघचालक- श्री मोहनराव भागवत

इनका जन्म 11 सितम्बर 1950 को चन्द्रपुर, महाराष्ट्र में हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिले थे। उनके पिता नाम मधुकरराव भागवत था जो कि गुजरात में प्रान्त प्रचारक के रूप में कार्यरत थे। मोहनराव भागवत जी ने चन्द्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नात्कोत्तर अध्ययन अधूरा छोड़ वे आपातकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए 1977 में अकोला में प्रचारक बने।

1991 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रमुख बने और 1999 तक इस कार्य को संभाला। सन् 2000 में वे सरकार्यवाह के पद पर निर्वाचित हुए और सन् 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छठे सरसंघचालक के रूप में नियुक्त हुए वे अविवाहित हैं। आज भी वही कार्यरत हैं। भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन करते हुए 9 वर्ष हो गए हैं और हम देख भी रहे हैं कि आज अधिकतर व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानते हैं। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व की दृष्टि को समझ भी रहे हैं। भागवत जी ने राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका, समरसता, जातिवाद, धर्म, अस्पृश्यता, देशभक्ति ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें समाज में स्पष्ट करके, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक अच्छी छवि प्रस्तुत की है। हम आशा करते हैं, हिन्दू संस्कृति के प्रति वो इस तरह कार्य करते रहे हैं।

संदर्भ –

  1. अमर उजाला, 11 मार्च 2018, पृ.-8 2 विषय बिन्दु, शरद प्रकाशन, आगरा, पृ.-15
  2. सी.पी भिशीकर, केशव: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निर्माता, पृ.-36
  3. श्री गुरुजी, दृष्टि और दर्शन, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-268
  4. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघगाथा, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-10
  5. अमर उजाला, 11 मार्च, 2015, पृ.-8
  6. अमर उजाला, दिसम्बर 2015, पृ.-1
  7. हरिश्चन्द्र बथ्र्वाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ 11-12
  8. विजय कुमार गुप्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रार्थना, पृ 13-14
  9. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाथा, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-27
  10. मा.स. गोलवलकर, गुरु दक्षिणा, पृ.-3
  11. मा.स. गोलवलकर, विचार नवनीत, पृ.-173
  12. शाखा सुरभि, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-12
  13. हरिश्चन्द्र बथ्र्वाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ.-27

Comments