लोकनाट्य के प्रकार

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लोकनाट्य, लोक मनोरंजन का एक ऐसा साधन है, जिसमें मंचीय नाटकों जैसी शास्त्रीयता नहीं होती और न ही किसी तरह का दिखावा। अधिक तामझाम के बिना भी ये दर्शकों से सीधा तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं।’’ 

एक अन्य परिभाषा के मुताबिक ‘‘ मनोरंजन एवं सामाजिक शिक्षा के लिए की गई सामूहिक अभिव्यक्ति ही लोकनाट्य है, जिसमें नाट्य दल अथवा कलाकारों के योगदान के साथ-साथ दर्शकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होती है।’’

प्राय: लोकनाट्यों की कथावस्तु से दर्शक परिचित होता है। इनमें कथानक या कथा प्रसगों का अधिक महत्व नहीं होता है। वास्तव में लोक नाट्यों के प्रसंगों के मूल्य स्थाई होते हैं और कलाकार के प्रदर्शन के जरिए वे साकार रूप में दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत होते हैं। लोकनाट्यों में दर्शकों को आकर्षित करने की जबरदस्त शक्ति होती है। कथा के आरम्भ, मध्य एवं अन्त के विकास की इसमें विशेष चिन्ता नहीं की जाती। 

इनमें कहानी का विकास स्वत: ही होता रहता है। लोकनाट्य में पात्रों और दर्शकों के बीच किसी तरह का दुराव छिपाव नहीं होता है। जहां आधुनिक मंच का पात्र अपनी अभिनय क्षमता, वेशभूषा, निर्देशकीय प्रभावों से सज्जित होकर मंच पर खुद को नाटक का पात्र दिखाने के लिए सायास प्रसास करता है, वहीं लोकनाट्यों का पात्र बिना किसी आवरण के दर्शकों की कल्पना शक्ति के सहारे उन्हें यह जताता है कि वह किस पात्र का अभिनय या उसकी नकल पर रहा है। आधुनिक मंच की मान्यता के विपरीत लोकनाट्यों में सादगी और अनौपचारिक अधिक होती है। 

गीत और संगीत लोकनाटयों का प्रधान अंग है। कभी-कभी इसमें नृत्य को भी प्रधानता दी जाती है लेकिन इनका संगीत शास्त्रीय नहीं होता। इसे जनसंगीत कहा जा सकता है। प्रत्येक लोकनाट्य की अपनी अलग गायन व नर्तन शैली होती है। इनमें इस्तेमाल होने वाले वाद्य भी विभिन्न प्रकार के होते हैं और लोकनाट्यों की प्रस्तुति में वादकों की अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 

प्रस्तुति के लिहाज से सभी लोकनाट्यों में प्राय: आरम्भ होते समय गणपति वन्दना या कोई अन्य वन्दना अवश्य होती है। 

लोकनाट्य के प्रकार

लोकनाट्यों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा जा सकता है :-
  1. नृत्य प्रधान लोकनाट्य
  2. संगीत प्रधान लोकनाट्य
  3. अभिनय प्रधान लोकनाट्य ।
नृत्य प्रधान लोकनाट्यों में रासलीला, विदेशिया, कीर्तिनिया आदि प्रमुख हैं। संगीत प्रधान लोकनाट्यों के उदाहरणों में तमाशा, शेखावटी तथा अभिनय प्रधान लोकनाट्यों में नकल, बहुरूपिया आदि प्रमुख हैं।

कथ्य के आधार पर भी लोकनाट्यों का वर्गीकरण किया जाता है। इस आधार पर लोक नाट्यों के प्रमुख वर्ग इस प्रकार हैं :-
  1. धार्मिक नाटक- जैसे रामलीला।
  2. ऐतिहासिक नाटक- जैसे राजा हरिश्चन्द्र ।
  3. नृत्य प्रधान नाटक - जैसे रासलीला ।
  4. प्रेम प्रधान नाटक - जैसे नौटंकी ।
  5. हास्य प्रधान नाटक - जैसे बहुरूपिया ।
लोकनाट्य की सबसे बड़ी खूबी उनका लोकधर्मी होना है। यह मिले जुले समाज का जन मंच होते हैं जिनके जरिए सहज रूप से जनसंचार भी होता है। भारत में इसकी परम्परा काफी पुरानी है। भरत मुनि ने तो नाट्य कला के लिए पूरा नाट्यशास्त्र ही रच डाला था। 

यूरोप में लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व विकसित हुए यूनानी रंगमंच को उसी काल में जनसंचार के एक उपयोगी माध्यम के रूप में जन स्वीकृति मिल चुकी थी। भारत में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार की लोकनाट्य शैलियां और रूप प्रचलित हैं। नौटंकी उत्तर प्रदेश में तो जात्रा बंगाल में प्रचलित है। भवाई गुजरात का प्रमुख लोकनाट्य है। तमाशा महाराष्ट्र का और यक्षगान कर्नाटक का लोकप्रिय लोकनाट्य है। इसी तरह रामलीला समूचे ग्रामीण भारत का लोकप्रिय लोकनाट्य है जो अलग-अलग स्वरूपों में लोक मनोरंजन के साथ-साथ जनसंचार का कार्य भी करता है।

बंगाल तथा असम, त्रिपुरा, बिहार और उड़ीसा के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय जात्रा का आरम्भ 15वीं सदी के आस-पास से माना जाता है। पहले जात्रा में सिर्फ धार्मिक कथाएं ही होती थीं। उन्नीसवीं सदी से इनकी विषय वस्तु में सामाजिक विषय भी शामिल होने लगे। जात्रा मुख्यत: गीत प्रधान नाट्य है परन्तु अधिकारी यानी सूत्रधार के जरिए इसमें गद्य भी प्रयोग होता है तथा संवादों का भी। पहले जात्रा में 60-70 तक गीत होते थे और यह पूरी-पूरी रात चलतीं थीं लेकिन अब इनमें 10-15 गीत ही इस्तेमाल किए जाते हैं और प्रस्तुति का समय भी कुछ घंटों तक सीमित हो गया है। भवाई 15वीं सदी से ही प्रारम्भ हुई मानी जाती है। 

गुजरात के इस लोकप्रिय लोकनाट्य में कई छोटी नाटिकाओं को गीत और नृत्यों के जरिए जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है और इनका मुख्य विषय सामाजिक सन्दर्भो पर केन्द्रित होता है। नायक यानी सूत्रधार और रंगीलो यानी जोकर इसके प्रमुख पात्र होते हैं।

महाराष्ट्र में प्रचलित तमाशा कृष्ण और उनके ग्वाल सखाओं पर केन्द्रित कथा नाट्य है जिसमें सूत्रधार और विदूषक मुख्य पात्र होते हैं। हास्य, व्यंग और प्रतिस्पर्धा तथा ईष्र्या के भावों को संवादों के जरिए तेज गति से प्रस्तुत करना इसकी विशेषता है। लेकिन वर्तमान में अश्लीलता भरे संवादों के कारण इसकी काफी आलोचना भी होने लगी है।

उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में प्रचलित नौंटकी प्राचीन भारतीय लोकनाट्यों में से एक है। संगीत घरानों की तरह नौटंकी के भी कई घराने हैं, कई शैलियां हैं। जिनमें हाथरस शैली और कानपुर शैली प्रमुख है। इसी तरह रामलीला भी एक ऐसा लोकनाट्य है जिसकी अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग शैलियां हैं। रामलीला उत्तराखण्ड का भी सर्वाधिक लोकप्रिय लोकनाट्य है जिसमें गायन, अभिनय और संवाद का सुन्दर संयोजन होता है। लोकनाट्यों के प्रस्तुतिकरण की अपनी कुछ औपचारिकताएं भी होती हैं। जिनका निर्वाहन प्रस्तुतियों में अनिवार्य समझा जाता है। अधिसंख्य लोकनाट्यों का आरम्भ गणपति वन्दना से होता है हालांकि उसका तरीका हर जगह अलग-अलग होता है। 

भारतीय लोकनाट्यों में प्रयुक्त होने वाले लोक वाद्यों में तुर्रा, कलंगी, नक्कारा, नफीर, ढ़ोलक, चंग, तुरही, तुनतुना, भूगंत, चंडे, तथा चिमटा आदि प्रमुख हैं।

इनमें वेशभूषा या दृश्य संयोजन का कोई विधान नहीं होता है। लोकनाट्यों में बड़े-बड़े महल, उद्यान, नदी, पेड़, पहाड़, देव दरबार, जंगल आदि का निर्माण क्षण भर में मात्र गीत एवं अभिनय से ही कर दिया जाता है। इनमें पात्रों के लिए भी किसी तरह के बंधन अथवा सीमाएं नहीं हैं। पुरुष पात्र महिला भी हो सकता है अथवा मूँछों वाला पात्र महिला का अभिनय करता दिख सकता है। 

इनके पात्र वृक्ष, वन, फल, फूल, नदी, पहाड़, जानवर आदि कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन इनके दर्शकों का कथावस्तु और अभिनय से ऐसा तारतम्य बन जाता है कि सब कुछ बेहद अनौपचारिक और बेहद सहज हो जाता है।

लोकनाट्य के प्राय: सभी स्वरूप सदियों से लोगों से जुड़े हुए हैं और आज भी एक लोकमाध्यम के रूप में उनकी पकड़ बरकरार है। जनसंचार के साधन के रूप में उनकी भूमिका अब भी कम नहीं हुई है और अब तो उसका व्यावसायिक उपयोग भी किया जाने लगा है। लेकिन व्यावसायिकता की इस दौड़ में इस बात का खतरा भी छिपा हुआ है कि कहीं लोकनाट्य अपनी मूल स्वाभाविकता और अपनी आत्मा ही न खो दें।

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