मानव पारिस्थितिकी क्या है ?

on
जैव मण्डल के जीवधारियों को अपने परिस्थितिकी तंत्र में दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है - पहली अपने वैयक्तिक जैविक गुणों के अनुसार पर्यावरणीय अन्तरप्रक्रिया द्वारा जीवन संचार, जिसे हम स्वपारिस्थितिकी (Autoecology) के नाम से जानते है, और दूसरी सामूहिक रूप में प्रकृति के तत्वों तथा अन्य जीवों से परस्पर अंतरप्रक्रिया जिसे हम समुदाय पारिस्थैतिकी (Synecology) के नाम से पुकारते है। इन दोनों परिस्थितियों में जीव अपना अस्तित्व बनाये रखने का प्रयास करते है। जैव-अजैव घटकों की संतुलित अंतरप्रक्रिया से पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित बना रहता है। चूँकि प्रकृति जीवों की जननी है अत: वह यथासम्भव ढंग से पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता जैविक विकास के लिये बनाये रखने का प्रयास करती है।

जब मनुष्य का सामाजिक प्राणी के रूप में प्रकृति के जैव-अजैव घटकों के साथ परस्पर अंतरप्रक्रिया के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाता है तो उसे ‘मानव पारिस्थितिकी’ कहा जाता है अर्थात् मानव और प्रकृति के अंतरसम्बन्धों की व्याख्या मानव पारिस्थितिकी है। वस्तुत: पृथ्वी के जैव-अजैव घटकों के सन्दर्भ में मानव के स्थान का निर्धारण मानव पारिस्थितिकी का मूल उद्देश्य है। 

अमेरिकी विद्वान एच0एच0 बैरोज (1923) ने अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं के संघ के समक्ष अपने उदगार में भूगोल को ‘मानव पारिस्थितिकी’ कहा था। इससे पूर्व जर्मन विद्वान हम्बोल्ट (1859) ने भी कुछ इसी ढंग से मानव-प्रकृति के सम्बन्धों की व्याख्या की थी। 

1960 में मानव पारिस्थितिक की संकल्पना भूगोल में नये सन्दर्भ में पुनर्जीवित हुई तथा 1967 में स्टोडार्ट महोदय ने इसे तंत्र विश्लेषण का अंग बना दिया।

स्पष्ट है कि मनुष्य एवं पर्यावरण की जटिल अंतरप्रक्रिया की व्याख्या तथा परस्पर प्रभावों का मूल्यांकन मानव पारिस्थितिकी का मूल उद्देश्य है, जैसा कि रूसी विद्वान लिसिटिसिन का भी कहना है कि- ‘‘मानव पारिस्थितिकी का परम उद्देश्य मानव पर्यावरण की अंतर प्रक्रियाओं में शोध द्वारा मानव के जीवन और उसकी भौतिक एवं आध्यात्मिक योग्यता के विकास हेतु आवश्यक दशाओं की खोज करना है।’’

Comments