सुभाष चंद्र बोस का जन्म कब और कहां हुआ था?

सुभाष चंद्र बोस

सुभाषचंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक महत्वपूर्ण नेता थे। उनकी देशभक्ति, शौर्य और आजादी के लिए उनका जुनून अद्भुत था। सुभाषचंद्र का जन्म 15 23 जनवरी, 1897 ई. को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। इनके पिता जी का नाम जानकीनाथ बोस था तथा इनकी माता प्रभावती थीं। सुभाषचंद्र बोस चौदह भाई-बहिन थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक में ही प्राप्त की। स्कूली शिक्षा के दौरान वे अपने ही स्कूल के प्रधान अध्यापक श्री बेनी माधवदास से प्रभावित हुए। स्वामी विवेकानंद का साहित्य अचानक ही एक दिन उन्हें मिल गया और वे स्वामी जी से बहुत प्रभावित हुए। लगभग 15 वर्ष की उम्र में सुभाष ने उनके साहित्य व विचारों को पढ़ा और उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए। 

स्कूली शिक्षा समाप्ति पर उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडंेसी काॅलेज में दाखिला लिया। सुभाष प्रतिभाशाली छात्र थे। काॅलेज में ही उनका विवाद अंग्रेज प्रो. ओटेन से हो गया था जिस कारण उन्हें काॅलेज से बहिष्कृत कर दिया। परिवार वालों द्वारा माफी मांगने के लिए कहा गया परंतु सुभाष स्वयं को गलत नहीं मानते थे क्योंकि मातृभूमि को अपमानित होते देखना अनुचित था। कुछ समय बाद कलकत्ता के ही स्काटिश काॅलेज में उन्हें दाखिला मिल गया और 1919 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। सुभाषचंद्र बोस का मन भारत माता को आजादी दिलाने के लिए बेचैन रहता। उनके क्रांतिकारी विचारों से सभी लोग परिचित थे। अतः उनके परिवार वालों ने उन्हें इस वातावरण से हटाने के लिए इंग्लैण्ड भेजने का मन बना लिया। इस तरह सुभाषचंद्र को I.C.S. के लिए इंग्लैण्ड जाना पड़ा। अल्प समय में ही I.C.S. की तैयारी कर उन्होंने सफलता प्राप्त कर ली। परिवार वालों की खुशी व कर्तव्य के लिए यह सुभाषचंद्र ने किया परंतु उनका मन ब्रिटिश सरकार की नौकरी करने का नहीं बल्कि देश सेवा करने का था। अतः उन्होंने अंतिम फैसला किया और आजादी के लिए संघर्ष करने का रास्ता चुना। 

16 जुलाई, 1921 को सुभाषचंद्र बोस भारत आये। सबसे पहले उन्होंने महात्मा गाँधी से मिलने का फैसला किया और उनके विचारों व कार्यप्रणाली से अवगत हुए। भारतीय स्वतंत्रता के विषय में उन्होंने कई प्रश्न महात्मा गाँधी से किए। परंतु उनके जबावों से सुभाषचंद्र संतुष्ट न हो सके। उनका मानना था कि गाँधी जी के मन में भारतीय स्वाधीनता के विषय में स्पष्ट कार्यक्रम की रूपरेखा नहीं थी। गाँधी जी से असंतुष्टि के पश्चात् उन्हीं के कहने पर वे देशबंधु चितरंजन दास से मिलने पहुँचे। 

देशबंधु चितरंजन दास उस समय देश सेवा में समर्पित व्यक्ति थे। बोस उनसे मिलने गए तो दास की पत्नी श्रीमती बासंती देवी से उनकी मुलाकात हुई क्योंकि दास प्रांत के दौरे पर थे। सुभाष, बासंती देवी की व्यवहार कुशलता से अत्यधिक प्रभावित हुए। कुछ समय बाद बोस की मुलाकात चितरंजन दास से हुई, उनसे मिलते ही सुभाषचंद्र के सभी प्रश्नों के उत्तर 16 मिल गए। मानो वे जिस व्यक्ति की तलाश कर रहे हों वह उन्हें मिल गए हो। सुभाषचंद्र बोस, चितरंजन दास के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके मार्ग पर चलने का पक्का मन बना लिया। इस तरह सुभाषचंद्र ने देशबंधु चितरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरू बना लिया। 

देशबंधु को अपना राजनीतिक गुरू बनाने के पश्चात् उन्होंने कार्य करना प्रारंभ किया। इसके लिए उन्हें कांग्रेस के मंच की आवश्यकता पड़ी इस कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष हेतु प्रयत्न किया और 1938 ई. को हरिपुरा अधिवेशन के अध्यक्ष बने। दोबारा उन्होंने 1939 ई. त्रिपुरी में भी अध्यक्ष पद हेतु प्रयास किया परंतु गाँधीवादी यह नहीं चाहते थे कि वे दोबारा अध्यक्ष बने। महात्मा गाँधी द्वारा पट्टाभिसीता रमैया का नाम कांग्रेस अध्यक्ष उम्मीदवार के रूप में घोषित कर दिया। लेकिन जनता के चहेते बोस गाँधिवादियों के विरोध के बाद भी भारी अंतर से चुनाव जीत गए। इस दौरान गाँधी-बोस वैचारिक मतभेद चरम पर थे। गाँधीवादियों ने बोस को असहयोग करना प्रारंभ कर दिया। जिससे बोस अपने वांछित लक्ष्य से दूर हो रहे थे। पंत प्रस्ताव भी पारित किया गया। अतः सुभाषचंद्र ने देशहित व अपने विचारों से समझौता न करने के कारण अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने नवीन दल ‘फाॅरवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की परंतु उसे अच्छी सफलता नहीं मिली।

बोस के सामने कठिन चुनौती थी इसी बीच उन्होंने देश से पलायन कर विदेशी सहायता से आई.एन.ए. का गठन कर भारतीय स्वतंत्रता हेतु प्रयास किया। अपने करिश्माई व्यक्तित्व से सभी को अचंभित कर उन्होंने ‘दिल्ली चलो’, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा’, आदि नारे दिए। आई.एन.ए. ने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया। सुभाषचंद्र बोस द्वारा प्रयास जारी था कि अचानक 18 अगस्त, 1945 को बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। वीरता व दृढ़ विचारों के धनी बोस की मृत्यु से सारा विश्व अचंभित रह गया।

अंततः यही कहा जा सकता है कि सुभाषचंद्र बोस व्यक्तित्व व देशभक्त सपूत विरले ही इस धरती पर जन्म लेते हैं। सुभाषचंद्र ने अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया। विपरीत स्थिति में कार्य करना, धैर्य, साहस, विचारों की दृढ़ता आदि गुणों से युक्त बोस का जीवन दर्शन युवा वर्ग के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायक बन सकता है। अतः प्रत्येक युवा को संकल्प लेना चाहिए कि सुभाषचंद्र बोस के आदर्शों पर चल कर देश सेवा करेगें। इसी संकल्प से बोस की आत्मा शांति प्राप्त करेगी व हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म कब और कहां हुआ था?

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 ई. को उड़ीसा में हुआ था। सुभाष चंद्र बोस के पिता का नाम जानकी नाथ बोस था और माता प्रभावती थी। सुभाष चंद्र बोस के पिता वकील थे। सुभाष चंद्र बोस अपने चौदह भाई बहनों में छठें पुत्र और नवीं संतान थे। सुभाष चंद्र बोस का परिवार एक मध्यमवर्गीय परिवार था। 

लगभग 5 वर्ष की उम्र में सुभाष चंद्र बोस को स्कूल भेजा गया उस समय वे बहुत खुश हुए। कटक के ही प्रोस्टेन्ट यूरोपियन मिशनरी स्कूल में सुभाष का दाखिला करा दिया गया। वे अपने प्रधानाध्यापक बेनी माधव दास से बहुत प्रभावित हुए।  स्कूली शिक्षा समाप्त करने के पश्चात कलकत्ते के प्रसिद्ध प्रेसीडेन्सी कॉलेज में उन्होंने दाखिला लिया। यह सरकारी कॉलेज था साथ इसका बहुत नाम भी था। इस में सभी प्रकार के छात्र पढ़ते थे। 

15 सितम्बर, 1919 को सुभाष चंद्र बोस इंग्लैण्ड रवाना हो गए। उनकी इच्छा देशसेवा करने की थी न कि ब्रिटिश सरकार की नौकरी। परंतु माता-पिता की इच्छा को शिरोधार्य कर उन्होंने इंग्लैण्ड जाने का मन बना लिया। इंग्लैण्ड का खुला वातावरण सुभाष चंद्र बोस को बहुत रास आया उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। सुभाष चंद्र बोस को आई.सी.एस. की परीक्षा की तैयारी हेतु केवल 8 माह का समय मिला परंतु अपनी प्रतिभा के दम पर कम समय में ही उन्हें चौथा स्थान प्राप्त हुआ। सबसे पहले उन्होंने अपने माता-पिता को यह सूचना दी।

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु

आजाद हिंद फौज की वीरता को कम नहीं कहा जा सकता क्योंकि जिन परिस्थितियों में उसने कार्य किया उनका प्रयास सराहनीय था। आजाद हिंद फौज की प्रासंगिकता और उसकी कार्यप्रणाली तथा सफलता, असफलताओं पर विभिन्न मत प्रकट किये गए हैं। इतिहासकार सुमित सरकार के अनुसार ‘केवल सैन्य दृष्टि से तो आजाद हिंद फौज का महत्व अधिक नहीं रहा और यदि वह अधिक प्रभावी रही भी होती तो उसका आगमन बहुत देर से हुआ था, क्योंकि 1944 तक धुरी शक्तियां सर्वत्र पीछे हटने लगी थी।’ इतिहासकार ताराचंद्र ने आजाद हिंद फौज के महत्व पर कई प्रकार से प्रकाश डाल है उनके अनुसार -”भारत का प्रबल ब्रिटिश साम्राज्य के संकुचित दायरे से निकल कर अंतराष्ट्रीय राजनीति के विस्तृत क्षेत्र में चला गया।” आजाद हिंद फौज के कार्यों को सदैव इतिहास में विशिष्ट स्थान प्राप्त रहेगा। जिस प्रकार आजाद हिंद सेना का प्रयास रहा संभवत: वैसा प्रयास दूसरा दृष्टिगोचर नहीं होता है।

वस्तुत: हमें दृष्टिगोचर होता है कि लगातार विपरीत परिस्थितियों में कार्य करते हुए भी आजाद हिंद फौज प्रयासरत थी परंतु जापानी सेना के पीछे हटने से आजाद हिंद फौज को भी पीछे हटना पड़ा और उनका प्रयास असफल हो गया। सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के प्रयासों को सफलता-असफलता से जोड़ कर देना अनुचित होगा। सेना के सामने कई तरह कि दिक्कतें थीं जिससे निश्चित रूप में उनका कार्य व प्रयास प्रभावित हुआ। एक तरफ साधनों से सुसज्जित सेना थी तो दूसरी ओर साधनहीन सैनिक। आजाद हिंद सेना के पास धन, परिवहन, चिकित्सा, हथयारों, बंदूकों, तोपखानों आदि की कमी थी। रसद संबंधी परेशानियों से भी दो चार होना पड़ा। इतिहासकार ताराचंद ने इस बात पर प्रकाश डालते हुए कहा “आजाद हिंद फौज के पास न तो वायुयान था न तोपखाना था उसके पास मोर्टर अर्थात् छोटी बंदूक भी नहीं थी जिनसे बड़े गोले फेंके जा सकें। इसकी मशीनगनें मध्यम आकार की थी और उनकी मरम्मत के लिए अतिरिक्त पुर्जे नहीं थे। अत्यंत आवश्यक संचार व्यवस्था के साधन नहीं थे और चिकित्सा की सुविधायें भी नहीं थे।” अत्यन्त आवश्यक संचार व्यवस्था के साधन नहीं थे और चिकित्सा की सुविधायें भी नहीं थी। “इस प्रकार आजाद हिंद सेना के पास देश भक्ति और देश पर मर मिटने का हौसला था परंतु युद्ध में विजय श्री का वरण करने के लिए केवल इतना ही काफी नहीं था।”

सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के संघर्ष को भुलाया नहीं जा सकता। संघर्ष करने का जो मनोवैज्ञानिक असर आजाद हिंद फौज ने छोड़ा उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से विपरीत से विपरीत समय में धैर्य रखकर कार्य करना अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्ति तक प्रयास करने की प्रेरणा हमें देता है। आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस के प्रयासों की प्रशंसा उनके आलोचक भी करते हैं। जापानी सेना के पीछे हटने के कारण आजाद हिंद सेना भी पीछे हटने लगी व उसकी पराजय हुई। ऐसी स्थिति में सुभाष चंद्र बोस ने स्थान छोड़ने का निर्णय किया।

आजाद हिंद सेना की शौर्य गाथा समाप्ति पर थी कि अचानक सबको चौका देने वाली बात सामने आई। सिंगापुर से जापान जाते हुए 18 अगस्त, 1945 को फारमोसा में विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। बोस की मृत्यु पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। यह सब इतनी तीव्र गति से हुआ कि अकल्पनीय ही था। भारतीय जनता अपने प्यारे नेता के विषय में ऐसी खबर सुन कर विसमित थी।

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु किस प्रकार हुई इस विषय पर जानकारी मिली कि बोस को हवाई जहाज द्वारा मंचूरिया के डेरिन नगर ले जाने का विचार किया गया क्योंकि अभी भी वह जापान के कब्जे में था। लेकिन समस्या इस बात की थी कि यह यात्रा एक छोटे बमवर्षक यान से करनी थी। जो आपत्तिपूर्ण था। विमान चालक ने भी विरोध किया पर फिर भी बोस ने यात्रा प्रारंभ कर दी। जापान के विरूद्ध स्थिति थी। जहाज ने पेट्रोल के तीन टैंकों के साथ उड़ान भरने का प्रयत्न किया और उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसी दुर्घटना में बोस की मृत्यु हो गयी।

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु एक रहस्य बनी रही है। सुरेश बोस के अनुसार 18 अगस्त, 1946 को ताइवान में किसी भी प्रकार की विमान दुर्घटना नहीं हुई। समय-समय पर अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में उनके जीवित होने की खबर छपती रही। उनकी मृत्यु कि जांच हेतु ‘शहनवाज समिति’ को भी गठित किया गया। उत्तर-बंगाल में शालापारी आश्रम में किसी साधू को देखा गया जो बोस की तरह ही दिखते थे। इस तरह सुभाष चंद्र बोस के जीवित होने पर कई सार्वजनिक सभाएं आयोजित की गई और कई अंग्रेजी और बंगाली पत्र-पत्रिकाओं में इस संबंध में लेख छपते रहे हैं। वर्तमान समय तक बोस की मृत्यु एक अनसुलझा प्रश्न बना हुआ है, परंतु अब समय इतना अधिक निकल चुका है कि सुभाष चंद्र बोस को जीवित होना असंभव ही है।

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Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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