मार्टिन लूथर किंग जूनियर द्वारा चलाए गए आंदोलन

मार्टिन लूथर किंग जूनियर (Martin Luther King Jr.) का जन्म अमेरिका के जॉर्जिया प्रदेश की राजधानी ऐटलान्टा में 15 जनवरी 1929 को हुआ था। उनकी माँ का नाम अल्बर्टा विलियम किंग और पिता का नाम माइकेल किंग था। पिता जी चर्च में पादरी थे तथा सोलहवीं सदी के जर्मन दार्शनिक एवं समाज सुधारक मार्टिन लूथर से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने न केवल अपना नाम बदल कर मार्टिन लूथर किंग रख लिया। घर में धार्मिक माहौल होने के कारण किंग जूनियर को बचपन से ही चर्च के क्रियाकलापों में शामिल किया जाने लगा। वे बहुत अच्छा गाते थे, इसलिए चर्च के प्रार्थना-गायन में हमेशा भाग लिया करते थे। माँ की संगीत शास्त्र पर अच्छी पकड़ थी, और उन्होंने किंग जूनियर को न केवल संगीत की शिक्षा दी बल्कि उन्हें अच्छा संगीतज्ञ बनने के लिए प्रेरित भी किया। 

स्कूल में उन्होंने दो बार एक साथ दो कक्षाओं की परीक्षा उत्तीर्ण की। साथ ही वे एक कुशल वक्ता भी थे, जिसके कारण उन्हें वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के लिए स्कूल की टीम में स्थान दिया जाता था। किंग जूनियर ने बाद में अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकार आन्दोलन में अपनी इस प्रतिभा का बखूबी इस्तेमाल किया। नियमित पढ़ाई खत्म करते ही वे चर्च की पूर्णकालीन सेवा में चले गये और फिर बोस्टन विश्वविद्यालय से धर्मशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त की। बोस्टन में शिक्षा के दौरान ही उनकी मुलाकात अपनी भावी पत्नी कोरेटा स्कॉट से हुयी। कोरेटा को संगीत में रुचि थी, और वे एक अच्छी गायिका थीं। १९५३ में विवाह के पश्चात कोरेटा ने अपनी संगीत की महत्वाकाँक्षा को किनारे करते हुए परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को अधिक महत्व देना उचित समझा। 

किंग सीनियर मानव समानाधिकार के समर्थक थे, और गोरी नस्ल के असमानता तथा भेदभाव के आचरण का अपने स्तर से विरोध प्रदर्शन भी किया करते थे। समानता के संघर्ष का पहला पाठ किंग जूनियर ने अपने पिता से ही सीखा। जैसे जैसे वे बड़े हुए, उन्होंने अनेको बार गोरों के भेदभाव और अपमानपूर्ण व्यवहार का दर्द सहा। 

अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों की नस्लीय प्रताड़ना की कथा वास्तव में अत्यन्त कष्टप्रद रही है। वे अपने शहर के अच्छे इलाकों में रह नहीं सकते थेय उनका स्थान केवल शहर की मलिन बस्तियों, जिन्हें गेटो कहा जाता है, तक सीमित था। उनके बच्चों का प्रवेश गोरों के स्कूल में वर्जित था। वे गोरों के लिए बनी जन-सुविधाओं या शौचालयों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। उन्हें बसों की अगली सीट पर बैठना मना थाय इतना ही नहीं, गोरे मुसाफिर के आने पर उन्हें अपनी सीट छोड़नी पड़ती थी। इस मसले पर उन्हें न्यायालय से भी कोई राहत नहीं मिली। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि व्यावहारिक स्तर पर नस्लीय अलगाव गैरकानूनी नहीं है, बशर्ते गोरी और काली दोनों नस्लों को समान सुविधाएं प्राप्त हों - यथा, दोनों नस्लों को बस में बैठने का अधिकार है, दोनों को स्कूल की सुविधा है, दोनों के पास घर और जन-सुविधाएं हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस आपत्तिजनक निर्णय के पश्चात अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों का आक्रोश मुखर हो उठा। हर जगह उन्होंने इस अलगाववादी व्यवहार का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। एक ऐसी ही घटना दिसम्बर १९५५ में ऐलबामा राज्य के मॉन्टगॉमरी शहर में घटी। रोजा पार्क्स नाम की एक अफ्रीकी-अमेरिकन महिला ने किसी गोरे मुसाफिर के लिए अपनी बस की सीट खाली करने से मना कर दिया। इस कृत्य को सम्पूर्ण गोरी नस्ल का अपमान करार करते हुए, रोजा पार्क्स को हिरासत में ले लिया गया और उसे एक रात सलाखों के पीछे बितानी पड़ी। रोजा पार्क्स के समर्थन में अफ्रीकी-अमेरिकन समुदाय ने बस सेवाओं का राष्ट्रव्यापी बहिष्कार प्रारम्भ कर दिया। इस राष्ट्रव्यापी आन्दोलन का नेतृत्व डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर और उनके मित्र ई.डी. निक्सन कर रहे थे। अमेरिका के इतिहास में यह आन्दोलन आज भी मॉन्टगॉमरी बस बायकाट के नाम से प्रसिद्ध है। इस आन्दोलन के दौरान गोरों ने काली नस्ल के लोगों को अनेकानेक प्रकार से प्रताडि़त किया - उन्हें बुरी तरह से पीटा गयाय उनकी बस्तियों मे बम फेंककर उनके घर जला दिए गयेय उनकी स्त्रियों का बलात्कार किया गयाय डॉ. किंग और उनके सहयोगियों को बार बार जेल में डाल दिया गया। परन्तु इतनी प्रताड़ना के बावजूद अफ्रीकी-अमेरिकन समुदाय ने हार नहीं मानी और उनका बस सेवाओं का राष्ट्रव्यापी बहिष्कार एक वर्ष के ऊपर चलता रहा। बस कम्पनियों का घाटा बढ़ता जा रहा था। अंत मे दिसम्बर १९५६ में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि बस सेवाओं मे नस्लीय भेदभाव असंवैधानिक है। अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों के लिए यह अभूतपूर्व विजय थी, और इस विजय से उनके समान नागरिक अधिकारों के संघर्ष को अत्यन्त बल मिला।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर द्वारा चलाए गए आंदोलन

1957 से 1968 में अपनी मृत्यु तक किंग जूनियर ने कई आन्दोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें प्रमुख हैं - 
  1. ऐलबानी आन्दोलन, 
  2. बर्मिंघम अभियान, 
  3. सेलमा से मॉन्टगॉमरी का जुलूस, और 
  4. वाशिंगटन मार्च। 
इन दस वर्षों के संघर्ष में किंग ने साठ लाख मील की यात्रा की, पाँच पुस्तकों की रचना की, और ढाई हजार से अधिक ओजस्वी भाषण दिये। १९६३ में वाशिंगटन मार्च के दौरान दिया गया उनका भाषण ‘मेरा एक स्वप्न है’ अत्यन्त प्रसिद्ध है। इसमें उन्होंने कहा- मित्रों, आज मैं आपसे कहता हूँ कि भले ही आज हम कठिनाइयों के दौर से गुजर रहे हों, फिर भी मेरा एक स्वप्न है , एक ऐसा स्वप्न जिसकी जडें अमेरिकी स्वप्न में निहित हैं। मेरा स्वप्न है कि एक दिन यह देश ऊपर उठेगा और सार्थक रूप से अपने इस सिद्धान्त को जी पायेगा कि “हमारी मान्यता है कि यह सत्य प्रत्यक्ष है, कि जन्म से प्रत्येक व्यक्ति समान है।” मेरा स्वप्न है कि एक दिन जॉर्जिया के लािलमा लिए पहाड़ों पर भूतपूर्व दासों के पुत्र और भूतपूर्व दास-स्वामियों के पुत्र भाइयों की तरह एक साथ मेज पर बैठ सकेंगे। मेरा स्वप्न है कि एक दिन यह ऐसा देश होगा जहाँ मेरे चारों छोटे बच्चों का मूल्यांकन उनकी त्वचा के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र की गुणवत्ता से किया जायेगा। आज यह मेरा स्वप्न है।

यह डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के संघर्षों का ही परिणाम है कि आज अमेरिकी समाज उत्तरोत्तर नागरिक समानता की ओर अग्रसर हो सका है। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने ‘नागरिक अधिकार अधिनियम १९६४’ तथा ‘मतदान अधिकार अधिनियम १९६५’ का कानून पास करके इस दिशा में अभूतपूर्व कदम उठाया है। १९६४ में मात्र पैंतीस वर्ष की आयु में डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर को नोबेल शान्ति पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार की सम्पूर्ण राशि उन्होंने नागरिक अधिकार आन्दोलन को दान कर दी। ४ अप्रैल १९६८ को जेम्स अर्ल रे नाम के एक सिरफिरे गोरे ने डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर की गोली मार कर हत्या कर दी, ठीक वैसे ही जैसे उनके आदर्श पुरुष महात्मा गाँधी की हत्या की गयी थी।

मृत्यु के बाद डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर को अनेक तरह से सम्मानित किया गया। उनके नाम पर वाशिंगटन राज्य के सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिले का नाम ‘किंग काउन्टी’ रखा गया। उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया है। उन्हें मृत्यु-पश्चात ‘प्रेसीडेन्शियल मेडल ऑफ फ्रीडम’ तथा ‘कॉग्रेसनल गोल्ड मेडल ऑफ फ्रीडम’ प्रदान किये गये। अनेक सड़कों, स्कूलों, इमारतों के नाम डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नाम पर रखे गये हैं। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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