अंतर्राष्‍ट्रीयता की अवधारणा एवं विशेषताएं

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जब दो या दो से अधिक व्यक्ति क्षेत्र, जाति, लिंग, धर्म, संस्कृति, व्यवसाय अथवा अन्य किसी आधार पर ‘हम’ की भावना से बंधे रहेते हैं तो इसे भावात्मक एकता कहते हैं। मनुष्य आरम्भ से केवल अपने बारे में सोचता था धीरे-धीरे उसने दूसरो के विषय में सोचना प्रारम्भ किया जब समाज का निर्माण हुआ फिर एक निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोग राजनैतिक विशेषताओं के कारण वर्गीकृत हेाते गये और सम्पूर्ण भू-मण्डल देशों में बंट गया। ये सभी देश अपने नागरिकों के ‘‘हम की भावना’’ अर्थात् राष्ट्रीयता की भावना पर निर्भर करते हैं, क्योंकि इससे ही राष्ट्रों का अस्तित्व है। परन्तु जब राष्ट्रीयता से भावना ऊपर उठकर मनुष्य सम्पूर्ण विश्व के विषय में सोचता है प्रेम करता है, अपना सम्बंध जोड़ता है, तब मानसिक तौर पर राष्ट्र के बंधन टूट जाते हैं, तो यही भावना अन्तर्राष्ट्रीयता कहलाता है। यह भावना विश्व मैंत्री और विश्व बन्धुत्व की महान भावनाओं पर आधारित है। मानव मात्र का कल्याण हो, प्राणी मात्र पर समानता रहे, विश्व में शान्ति हो, प्राणीयों में सद्भावना हो, पारस्परिक मित्रता हो, राष्ट्रो के मध्य भाचारे का सम्बंध हो यही अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना है। एच0 लेबेज ने शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीय बोध को स्पष्ट करते हुये लिखा है- ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना एक ऐसी योग्यता है जो आलोचनात्मक रूप से सभी देशों के लोंगों के आचार-विचार का निरीक्षण करती है, तथा उन अच्छाइयों की जिनमें वे अपनी राष्ट्रीयता और संस्कृति का ध्यान नहीं रखते, दूसरों से प्रशंसा करती है।’’ आगे उन्होनें इस बात को और स्पष्ट करते हुये कहा कि - ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय भावना इस ओर ध्यान दिये बिना कि व्यक्ति किस राष्ट्रीयता या संस्कृति के है एक-दूसरे के प्रति सब जगह उनके व्यवहार का आलोचनात्मक और निष्पक्ष रूप से निरीक्षण करने और आंकने की योग्यता है।’’अर्थात् व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम करते हुये भी दूसरे राष्ट्रों के प्रति भी प्रेम कर सकता है। यही सच्ची राष्ट्रीयता एवं अन्तर्राष्ट्रीयता है।

अंतर्राष्‍ट्रीयता की विशेषताये

  1. यह भावना उदार एवं विस्तृत होती है।
  2. इस भावना में उदार राष्ट्रीयता की भावना की झलक मिलती है।
  3. अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना मनुष्य को ‘स्व’ से बहुत उपर उठाती है, विश्व से जोड़ती है।
  4.  यह भावना मनुष्य को मानवता के सर्वोत्कृट गुणों से परिपूर्ण बनाती है।
  5. यह विश्व शान्ति और विश्व विकास की ओर प्रमुख आधार प्रदान करती है।
  6. यह भावना सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों को मानसिक रूप में बांधती है।
  7. यह भावना विश्व मेंं प्राणी मात्र को मानसिक बंधन व संवेदना से बांधने का आधार है।
  8. यह भावना संघर्ण की समाप्त कर स्नेह और णान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
  9. यह भावना मनुष्य को द्वेण, घृणा, श्र्या और असहयोग की निम्न भूमि से उठाकर प्रेम सहानुभूति और सहयोग की उच्च भूमि पर लाकर खड़ा करती है।

वर्तमान मे अंतर्राष्‍ट्रीयता के बोध का औचित्य

अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना हमारे लिये नूतन भावना ही नहीं यह तो हमारे धर्म में पहले से है। धर्म ने ‘‘वैसुधैव कुटुम्बकम’’ का पहले ही मानव का आदर्श दृष्टिकोण के रूप में प्रतिस्थापित किया। आधुनिक युग उपनिवेशवाद ने मानवता को कुचलकर रख दिया। सम्पूर्ण विश्व क भागों एवं गुटों में बंट और सबल देशों ने निर्बल एवं शान्त देशोंं को अपना बाजार बनाया अपने अधीन किया और सम्पूर्ण विश्व धार्मिक क्रांतियों के चपेट में भी आ गया था। पुरातन धर्मों पर नये धर्मों ने अपने प्रचार के लिये पांव पसार लिया। औद्योगीकरण और भूमण्डलीकरण का प्रभाव सम्पूर्ण विश्व में स्वार्थपरता एवं बर्चस्व की होड़ लग गयी और इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व सबल-निर्बल, रिपन्न, सम्पन्न, मालिक व नौकर के रूप में बंटा। 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में सम्पूर्ण विश्व अशान्ति के आग में झुलस रहा था। अनेक देश भारत की तरह अपने स्वतंत्रता के लिये छटपटा रहे थे। इसी समय बर्चस्व की लड़ा में दो विश्व युद्ध हुये और जन-धन की अपूर्णनीय क्षति हुयी। सम्पूर्ण विश्व अन्धी राष्ट्रीयता के चपेट में है विश्व के अधिकांश राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों की बलि देकर अपनी सुख समृद्धि प्राप्त करने की इच्छा रखता है, और तीसरे महायुद्ध का सम्भावित संकट तथा आंतकवाद इसके परिणाम है। धार्मिक कट्टरता एवं संकुचित राष्ट्रीयता का परित्याग कर अन्तर्राष्ट्रीय भावना का विकास करके ही मानव का कल्याण हो सकता है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के विकास हेतु बहुत लम्बे समय से प्रयास किया है आज से करीब 620 वर्ष पूर्व पियरे डयूबियस ने अन्तर्राष्ट्रीय भावना के विकास के लिये अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालयों को खोले जाने की संस्तुति की थी। कामेलियस ने इसी विचार को आगे बढ़ाया और अन्तर्राष्ट्रीय उपबोध के लिये पैनासोफिक कालेज खोले जाने की संस्तुति दी। अमेरिका में राष्ट्रपति टेफ्ट ने 1921 में हेग एक सम्मेलन इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया परन्तु यह उपाय बहुत कारगर नहीं रहा। इस बीच प्रथम विश्व युद्ध की विभिषिका विश्व झेल रहा था।

श्रीमती इन्ड्रूज ने अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा विभाग को राष्ट्र संघ में मिलाने का प्रयास किया। सन् 1926 में ‘‘बौद्धिक सहयोग आयोग’’ की स्थापना तो की गयी परन्तु धनाभाव में यह प्रयास असफल रहा।

 इस बीच में हिटलर के जर्मनी में जातिवाद व मुसोलिनी के इटली में फांसीवाद के सिद्धान्तों के प्रचार के कारण यूरोप पुन: द्वितीय विश्वयुद्ध की विभिषिका झेलने पर मजबूर हुआ। इस युद्ध के समाप्ति पर सम्पूर्ण विश्व आतंकित हो गया शान्ति का उपाय ढूढना लगा और अपने विचारों को साकार रूप देने के लिये एक नये अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की ओर कदम बढ़ाया। सन् 1945 में एक नये अन्तर्राष्ट्रीय संगठन ने ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ के रूप में स्थापित हुआ।

इस संघ की स्थापना विश्व शान्ति के ध्येय से की गयी है, ओर अपने इस उद्देश्य को ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ के अधिकार पत्र में कहा कि - ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय स्थिरता का विकास करने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक और शैक्षिक सहयोग को विकसित करेंगा।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ (यू0एन0ओ0) के प्रमुख संगठन यूनेस्को का आधारभूत सिद्धान्त यही है कि- ‘‘क्योंकि युद्ध मनुष्यों के मस्तिष्क में आरम्भ होते हैं इसलिये शान्ति की सुरक्षा के साधनों का निर्माण भी मनुष्य के मस्तिष्क में ही किया जाना चाहिये।’’
  1. यूनेस्को यह बात मानता है कि राष्ट्रों के मध्य भेद का प्रमुख आधार- संस्कृति की विभिन्नता ही है। अत: शिक्षा विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्रो में विविध राज्यों में सहयोग स्थापित करने व उनकी आपस की विभिन्नताओं तथा विरोध के कारणों को मिटाने के लिये यह बहुत आवश्यक है कि विश्व संस्कृति का विकास किया जाये।
  2. विश्व के प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशेषतायें एवं क्षमतायें हैं कुछ प्रकृति प्रदत्त है वो कुछ मानव निर्मित। को देश कपास पैदा करता है तो दूसरा देश कपड़ा अच्छा बनाता है, प्रत्येक देश एक-दूसरे पर कच्चा माल व बाजार के लिये निर्भर है। अन्तर्राष्ट्रीयता आर्थिक दृष्टिकोण से भी सहायक है।
  3. विश्व के राष्ट्रों के मध्य आर्थिक व शैक्षिक स्तर में विभिन्नता है। राष्ट्रों के मध् य अच्छी समझ सभी देशों को इन परिस्थितियों में उचित सहयोग प्रदान कर वहां के नागरिकों को विकास का अवसर देता है।
  4. के0जी0 सैयदेन ने एक उदारहण देते हुये लिखा था कि- ‘‘युद्ध यूरोप में आरम्भ होता है, और बंगाल के तीन लाख व्यक्ति अकाल से मर जाते हैं, लाखों लोग बेघर हो जाते हैं, अपने साधारण कार्यों से पृथक हो जाते हैं, और सभी सुख से वंचित हो जाते हैं।’’ इसी प्रकार हम दूसरा उदाहरण देखे कि - अमेरिका के आर्थिक मंदी ने विश्व बाजार को हिलाया और भारत भी उससे प्रभावित हुआ इसका अभिप्राय यह है कि शिक्षा बालकों को यह सिखाये कि सब सम्पूर्ण विश्व एक है।

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