परामर्श की परिभाषा एवं विशेषताएँ

अनुक्रम
परामर्श शब्द एक प्राचीन शब्द है फलत: इसकी अनेक परिभाषायें हैं।
  1. राबिन्सन के अनुसार-’परामर्श शब्दो व्यक्तियों के सम्पर्क में उन सभी स्थितियों का समावेश करता है जिसमें एक व्यक्ति को उसके स्वयं के एवं पर्यावरण के बोध अपेक्षाकृत प्रभावी समायोजन प्राप्त करने में सहायता की जाती है।’
  2. कार्ल रोजर्स ने परामर्श को आत्मबोध की प्रक्रिया में सहायक बताते हुये लिखा है कि-’परामर्श एक निर्धारित रूप से स्वीकृत ऐसा सम्बन्ध है जो परामर्श प्राथ्री को, स्वयं को समझने में पर्याप्त सहायता देता है जिससे वह अपने नवीन जीवन के प्रकाशन हेतु निर्णय ले सकें।
  3. हैरमिन के अनुसार- परामर्श मनोपचारात्मक सम्बन्ध है जिसमें एक प्राथ्री एक सलाहकार से प्रत्यक्ष सहायता प्राप्त करता है या नकारात्मक भावनाओं को कम करने का अवसर और व्यक्तित्व में सकारात्मक वृद्धि के लिये मार्ग प्रशस्त होता है।
  4. मायर्स ने लिखा है- परामर्श से अभिप्राय दो व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को एक विशेष प्रकार की सहायता करता है।
  5. विलि एवं एण्ड्र ने कहा कि परामर्श पारस्परिक रूप से सीखने की प्रक्रिया है। इसमें दो व्यक्ति सम्मिलित होते है सहायता प्राप्त करने वाला और दूसरा प्रशिक्षित व्यक्ति जो प्रथम व्यक्ति की सहायता इस प्रकार करता है कि उसका अधिकतम विकास हो सकें।
  6. काम्बस  ने परामर्श को पूरी तरह से परामर्श प्रार्थी केन्द्रित माना है।
  7. ब्रीवर  ने परामर्श को बातचीत करना, विचार-विमर्ष करना तथा मित्रतापूर्वक वार्तालाप करना बताया है। वही जोन्स के अनुसार परामर्श प्रक्रिया में समस्त तत्वों को एकत्रित किया जाता है जिसमें छात्रों के समस्त अनुभवों का अध्ययन किया जाता है। छात्रों की योग्यताओं को एक विशेष परिस्थिति के अनुसार देखा जाता है
  8. इरिक्सन ने लिखा कि - ’परामर्श साक्षात्कार व्यक्ति से व्यक्ति का सम्बन्ध है जिसमें एक व्यक्ति अपनी समस्याओं तथा आवश्यकताओं के साथ दूसरे व्यक्ति के पास सहायतार्थ जाता है।
  9. स्ट्रैगं के अनुसार -’’परामर्श प्रक्रिया एक सम्मिलित प्रयास है छात्र की जिम्मेदारी अपने आपकों जिम्मेदारी समझने की चेष्टा करना तथा उस मार्ग का पता लगाना है जिस पर उसे आना है तथा जैसे ही समस्या उत्पन्न हो उसके समाधान हेतु आत्मविश्वास जगाना है।’’ विभिन्न परिभाषाओं से परामर्श के निम्न तत्वों के सम्मिलित होने का आभास मिलता है।
    1. दो व्यक्तियों में पारस्परिक सम्बन्ध आवश्यक है। 
    2. परामर्शदाता व प्रार्थी के मध्य विचार-विमर्ष के अनेक साधन हो सकते हैं।
    3. प्रत्येक परामर्शदाता अपना काम पूर्णज्ञान से करता है।
    4. परामर्श प्रार्थी की भावनाओं के अनुसार परामर्श का स्वरूप परिवर्तित होता है।
    5. प्रत्येक परामर्श साक्षात्कार-निर्मित होता है।

परामर्श की विशेषताएँ

  1. परामर्श मूलत: समस्यापरक होता है।
  2. यह दो व्यक्तियों के मध्य वार्तालाप का एक स्वरूप है।
  3. परामर्श का मूल परस्पर विश्वास है।
  4. परामर्शक परामर्शेच्छु को उसके हित में सहायता प्रदान करता है।
  5. मैत्रीपूर्ण अथवा सौहार्दपूर्ण वातावरण में परामर्श अधिक सफल होता है।
  6. जे0 ए0 केलर कहता है कि परामर्श का सम्बन्ध अधिगम से होता है। जिस प्रकार अधिगम से व्यक्ति के आचरण में परिमार्जन होता है उसी प्रकार परामर्श से भी व्यक्ति के आचरण में परिमार्जन होता है।
  7. परामर्श सम्पूर्ण निर्देशन प्रक्रिया का एक सशक्त अंश है।
  8. परामर्श का स्वरूप प्रजातान्त्रिक होता है। परामर्शेच्छु परामर्शक के सम्मुख अपने विचार रखने में स्वतन्त्र रहता है।
  9. परामर्श का आधार प्राय: व्यावसायिक होता है। विलियम कॉटिल ने परामर्श की विशेषताओं की चर्चा की हैं-
    1. दो व्यक्तियों के मध्य परस्पर सम्बन्ध आवश्यक है।
    2. परामर्शक एवम् परामर्शेच्छु के मध्य वार्तालाप के अनेक स्रोत हो सकते हैं।
    3. परामर्शक पूर्ण जानकारी के साथ परामर्श देता हैं।
    4. परामर्शेच्छु की रूचि को देखते हुए परामर्श की प्रकृति में परिवर्तन सम्भव होता है।
    5. प्रत्येक परामर्श में साक्षात्कार आवश्यक है।

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