प्रश्नावली का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

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अनुक्रम
प्रश्नावली अध्ययन विषय से सम्बन्धित प्रश्नों का एक संरचित समूह है जिसमें सूचनायें संकलित
करने के लिए वैकल्पिक प्रश्नों में कोश्ठक तथा लिखित उत्तरों के लिए खाली स्थान उपलब्ध
रहता है। इस माध्यम के द्वारा विस्तृत क्षेत्र से सूचनाएं प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए
उत्तरदाता का शिक्षित होना आवश्यक होता है। साथ ही प्रश्नो का चयन , शब्दावली ,प्रश्नों का
प्रकार , प्रश्नों की विषयवस्तु और प्रश्नों का क्रम आदि सभी प्रश्नावली की रचना में महत्वपूर्ण
होते है। सामाजिक अनुसंधान में प्राथमिक तथ्यों के संकलन हेतु प्रश्नावली विधि का प्रयोग होता है।
शिक्षित सूचना दाता एवं विशाल, विस्तृत क्षेत्र के सूचना दाता से तथ्य संकलन।
प्रश्नावली विषय अथवा समस्या से सम्बन्धित अनेक प्रश्नों की सूची होती है जिसे अध्ययन कर्ता
सूचनादाताओं के पास डाक द्वारा भेजता है। जिसे सूचनादाता स्वयं भरकर लौटाता है।

प्रश्नावली की परिभाषा 

  1. सिन पाओ येंग के अनुसार – ‘‘अपने सरलतम रूप में प्रश्नावली प्रश्नों की एक
    ऐसी अनुसूची है। जिसे की निदर्डान के रूप में चुने हुए व्यक्तियों के पास डाक द्वारा
    भेजा जाता है’’। 
  2. बोगार्डस के अनुसार – ‘‘प्रश्नावली विभिन्न व्यक्तियों को उत्तर देने के लिए
    प्रेशित की गई प्रश्नों की एक सूची है’’।
  3. गुडे एवं हाट के अनुसार –’’ सामान्यत: प्रश्नावली शब्द से तात्पर्य प्रश्नों के
    उत्तर प्राप्त करने के एक उपकरण से होता है। जिसमें एक प्रपत्र का प्रयोग किया
    जाता है। जिसे उत्तरदाता स्वयं ही भरता है’’। 

प्रश्नावली के प्रकार 

  1. तथ्य सम्बन्धी प्रश्नावली – इस प्रश्नावली का प्रयोग किसी समूह की सामाजिक
    आर्थिक दशाओं से सम्बन्धित तथ्यों को संग्रह करने के लिए किया जाता है। जब हम किसी
    व्यक्ति की आयु , धर्म, जाति, शिक्षा, विवाह,व्यवसाय,पारिवारिक रचना आदि के बारे में सूचनाएं
    एकत्र करना चाहते हैं तो इसकी रचना की जाती है ।
    उदाहरण (क) शिक्षा की स्थिति – साक्षर/निरक्षर
    (ख) व्यवसाय की स्थिति – प्राइवेट/सरकारी
  2. मत एवं मनोवृत्ति सम्बन्धी प्रश्नावली – जब किसी विषय पर सूचनादाता की रूचि ,राय,मत,विचाारधारा, विडवास एवं दृश्टिकोण जानना
    चाहते हैं तब इस प्रकार की प्रश्नावली का प्रयोग होता है। बाजारए सर्वेक्षण, जनमत
    संग्रह,विज्ञापन तथा टेलीविजन एवं रेडियो कार्यक्रम के बारे में लोगों के विचार जानने के लिए
    इस प्रकार की प्रश्नावली का निर्माण होता है ।
    उदाहरण (क) आप कौन सा अखबार पसन्द करते है।
    (ख) क्या आप सती प्रथा के पक्ष में है।
  3. संरचित प्रश्नावली –  इस प्रकार की प्रश्नावली का निर्माण अनुसन्धान प्रारम्भ करने से पूर्व विषय पर लोगों की
    राय,सामाजिक स्वास्थय जन कल्याण की योजनाऐं लोगों के रहन सहन की दडाा, आय व्यय
    आदि के बारे में सूचना एकत्र करने के लिए भी संरचित प्रश्नावली का प्रयोग किया जाता है।
    तथा अनुसन्धान कर्ता को उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की छूट नहीं होती है।
  4. असंरचित प्रश्नावली – असंरचित प्रश्नावली में पहले से प्रश्नों का निर्माण नही किया जाता वरन् केवल उन विषयों एवं
    प्रसंगों का उल्लेख किया जाता है। जिनके बारे में सूचनाएं संकलित करनी होती है। यह पथ
    प्रदर्शिका की तरह कार्य करती है। असंरचित प्रश्नावली में उत्तरदाता खुलकर अपने विचारों को
    अभिव्यक्त करता है।
  5. बन्द, सीमित या प्रतिबन्धित प्रश्नावली – इस प्रकार की प्रश्नावली में प्रश्नों के सामने कुछ निश्चित वैकल्पिक उत्तर लिखे होते है। और
    उत्तरदाता को उनमें से ही उत्तर छाँटकर लिखने होते है। इस प्रकार की प्रश्नावली में उत्तर
    देने में सूचनादाता को सुविधा रहती है।
    उदाहरण
    (क) आप राजनीति में जाति के हस्तक्षेप को मानते है- (उचित, उचित नहीं, क्षेत्र विशेष में
    जनसंख्या के आधार पर उचित)
    (ख) जातिगत आरक्षण उचित है – (हाँ /नहीं)
  6. खुली / असीमित, या अप्रतिबन्धित प्रश्नावली –  इस प्रकार की प्रश्नावली में सूचनादाता को अपने विचारों को खुलकर प्रकट करने की
    स्वतन्त्रता होती है। अप्रतिबंधित प्रश्नावलियों का प्रयोग व्यक्गित विचारों, भावनाओं, सुझावों एवं
    विषय से संबंधित प्रारम्भिक सूचनाओं को संकलित करने के लिए भी किया जाता है ।
    उदाहरण
    (क) महिलाओं का सशक्तिकरण कैसे हो सकता है ?——
    (ख) पंचायती राज में महिलाओं की भागेदारी कैसे बढ़ेगी ?——
  7. चित्रमय प्रश्नावली –  इस प्रकार की प्रश्नावली में प्रश्नों के सम्भावित उत्तर चित्र द्वारा प्रकट किये जाते है। और
    सूचनादाता अपने उत्तर का चयन उन चित्रों में से ही करके उस पर निशान लगा देता है।
    उदाहरण यह जानने के लिए कि आप गॉव और नगर में से कहॉ रहना पसंद करेंगे? इसके
    उत्तर को जानने के लिए गॉव एवं नगर के चित्र बना दिये जाते हैं।
  8. मिश्रित प्रश्नावली – इस प्रकार की प्रश्नावली उपर वर्णित सभी प्रकार की प्रश्नावलियों की विशेषताएं लिए होती है।
    इसमें बन्द व खुली प्रश्नावली का मिश्रण होता है। ऐसी प्रश्नावलियॉ कम और अधिक शिक्षित
    दोनो के लिए ही उपयोगी होती है । इनके द्वारा स्पष्ट तथा सटीक उत्तर के साथ ही
    उत्तरदाता के स्वतंत्र विचार जानना भी संभव होता है ।

    प्रश्नावली की विशेषताएं 

    1. प्रश्नावली अध्ययन किए जाने वाले विषय से संबंधित प्रश्नों की एक सूची होती है । 
    2. प्रश्नावली को डाक द्वारा सूचनादाताओं के पास भेजा जाता है । या स्थानीय स्तर पर
      वितरित भी किया जा सकता है । 
    3. यह प्राथमिक सूचना संकलित करने की एक अप्रत्यक्ष विधि है । 
    4. प्रश्न सरल, स्पष्ट तथा छोटे होने चाहिए एवं प्रश्न निडिचत अर्थ वाले होने चाहिए।
    5. प्रश्नों की संख्या आवडयकता से अधिक न हो। 
    6. यदि संभव हो तो प्रश्न का उत्तर हां नहीं में होना चाहिए। 
    7. प्रश्नों का चुनाव ऐसा हो कि इच्छित सूचना स्पष्ट रूप से प्राप्त की जा सके। 
    8.  दुरुह, अिडाष्ट एवं विषय से हटकर प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए। 
    9. ऐसे प्रश्नों की रचना की जानी चाहिए जिनमें अभिमति की संभावना न हो। 
    10. प्रश्नावली को सूचनादाता भरकर डाकद्वारा ही लौटाता है कभी कभी स्थानीय लोगों से
      इसका संग्रह व्यक्तिगत स्तर पर भी कराया जा सकता है ।

    प्रश्नावली बनाने के चरण

    प्रश्नावलियां विडाष्ट एवं व्यवस्थित तरीके से बनाई जाती हैं अत: यह प्रक्रिया अनेक अन्र्तसंबद्ध चरणों
    से गुजरती है जिनमें प्रमुख है।

    1. तैयारी: इसमें अनुसंधानकर्ता प्रश्नावली में शामिल विषय तथा उससे जुड़े अन्य शोधों, प्रश्नों
      पर विचार करता है। 
    2. प्रथम प्रारुप निर्माण: इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार जैसे प्रत्यक्षध्परोक्ष, मुक्तध्बंद,
      सीमित/असीमित, प्राथमिक/द्वितीयकध्तृतीयक प्रश्नों सहित अनेक प्रश्न बनाता है। 
    3. स्व मूल्यांकन: अनुसंधानकर्ता प्रश्नों की प्रासंगिकता, एकरुपता, भाषा में स्पष्टता आदि पर भी
      विचार करता है। 
    4. वाहय मूल्यांकन: प्रथम प्रारुप एक या दो सहयोगियोंध् विशेषज्ञों को जांच एवं सुझाव के लिए
      दिया जाता है। 
    5. पुनरावलोकन: सुझाव मिलने के बाद कुछ प्रश्न तो हटा दिये जाते हैं, कुछ बदले जाते हैं और
      कुछ नये प्रश्न जोड़े जाते हैं। 
    6. पूर्व परीक्षण या पायलट अध्ययन: समूची प्रश्नावली की उपयुक्तता की जांच के लिए पूर्व
      परीक्षण या पायलट अध्ययन किया जाता है। 
    7. पुनरावलोकन: पूर्व परीक्षण से प्राप्त अनुभव के आधार पर कुछ परिवर्तन किये जा सकते हैं।
      8 द्वितीय पूर्व परीक्षण: पुनरावलोकित प्रश्नावली का दुबारा परीक्षण होता है और आवडयकतानुसार
      उसमें सुधार किया जाता है। 
    8. अन्तिम प्रारुप तैयार करना: संपादन, वर्तनी जांच, उत्तरों के लिए जगह, पूर्व कोडिंग के बाद
      अंतिम प्रारुप तैयार होता है। 

    प्रश्नावली की रचना

    प्रश्नावली का निर्माण शिक्षित उत्तरदाता से सूचना प्राप्त करने में किया जाता है अत: इसके
    निर्माण में अधिक सतर्कता की आवश्यकता होती है। प्रश्नों का चुनाव ऐसे किया जाता है कि वह
    स्पष्ट एवं सरल हों, प्रश्नावली की रचना मुख्यत: तीन आधारभूत पक्षों के द्वारा की जाती है।

    अध्ययन की समस्या 

    किसी विषय पर शोध करने से पूर्व समस्या से संबंधित सभी सूचनाएं प्रारंभ में ही एकत्रित की
    जानी चाहिए। अनुसंधानकर्ता के पूर्व अनुभवों का उपयोग करने से ऐसे उपयुक्त प्रश्नों का चयन
    होता है जिनसे सूचनादाता को उत्तर देने में आसानी रहती है।

    प्रश्नों की उपयुक्तता 

    प्रश्नावली में प्रश्न को सम्मिलित करने से पूर्व यह देखा जाता है कि वह विषय के बारे में
    सूचना संकलित करने में कितना सहायक है प्रश्नों को क्रमबद्ध करना: प्रश्नों का क्रम कई बातों
    पर निर्भर करता है परन्तु कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु निम्न हैं।

    1. प्रश्न िवाय से संबंद्ध हो . प्रडमनों का समूह अध्ययन विषय से संबंद्ध होना चाहिए तभी वह
      शोध में सहायक होगा। उदाहरण: परिवार नियोजन के साधनों से आप कितने संतुष्ट हैं।
      (पूर्ण संतुष्ट/संतुष्ट /असंतुष्ट/पूर्णतया अंसतुष्ट) 
    2. अत्यन्त सामान्य प्रश्न न हों . जैसे आपने अखबार पढ़ना कब से शुरू किया के स्थापन पर
      उचित प्रश्न होगा जब आप दसवी कक्षा में थे तब क्या आपको अखबार पढ़ने में कोई रूचि थी। 
    3. आसानी से उत्तर योग्य प्रश्न पहले हों: प्रारम्भ में कठिन प्रश्न से उत्तरदाता थकान का
      अनुभव करता है ऐसे में यह सम्भव है कि वह गम्भीरता से अन्य प्रश्नों का उत्तर न दे। अत:
      आयु, आय, व्यवसाय, जाति, डिमाक्षा, वैवाहिक स्थिति, निवास, पृष्ठभूमि आदि से संबंधित प्रश्नों के
      उत्तर आसानी से दिये जा सकते हैं। 
    4. संवेदनडाील प्रश्न मध्य में होने चाहिए: ऐसे प्रश्न जो राजनैतिक भ्रष्टाचार के प्रति दृष्टिकोण,
      सरकार की डिमाक्षा नीति, व्यावसायिक डिमक्षा के सुधार के लिए प्रोत्साहन, आरक्षण नीति का
      पुनरावलोकन आदि से संबंधित हों मध्य में रखे जाने चाहिए ताकि उत्तरदाता इनपर अधिक
      ध्यान देने का इच्छुक हो तथा ठीक से उत्तर देने में थकान महसूस न करे। 

      प्रश्नावली का बाहय अथवा भौतिक पक्ष

      प्रश्नावली की सफलता प्रश्न चयन के साथ ही उसकी भौतिक बनावट पर भी निर्भर करती है।
      अत: सूचनादाता का ध्यान आर्कषित करने के लिए प्रश्नावली की भौतिक बनावट जैसे उसका
      कागज, आकार, छपाई, रंग, लम्बाई आदि आकर्षक होना चाहिए।

      1. आकार: सामान्यत: प्रश्नावली बनाने के लिए कागज का आकार 8″x 12″ अथवा 9″x 11″ का
        होना चाहिए। वर्तमान में छोटे आकार की प्रश्नावली जो कि पोस्टकार्ड साइज में होती है का
        प्रचलन भी बढ़ा है। कम पृष्ठों की प्रश्नावली होने पर उसका डाक व्यय कम लगता है तथा
        उसके भरकर लौट आने की संभावना भी अधिक रहती है।
      2. कागज: प्रश्नावली के लिए प्रयुक्त कागज कड़ा, चिकना, मजबूत एवं टिकाऊ होना चाहिए।
        विभिन्न प्रकार के विषयों से संबंधित प्रश्नावलियों मेंं भिन्न-भिन्न रंगों के कागज का प्रयोग
        करने से उनकी छंटाई आसान हो जाती है। 
      3. छपाई: प्रश्नावलियों को छपाया जा सकता है। छपाई स्पष्ट व शुद्ध होने चाहिए। ताकि उन्हें
        आसानी से पढ़ा जा सके। आकर्षक छपाई सूचनादाता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती है। 
      4. प्रश्नावली की लम्बाई: प्रश्नावली अधिक लम्बी होने पर उत्तरदाता भरने में ऊब और नीरसता
        महसूस करता है। अत: प्रश्नावली को भरने में आधे घंटे से अधिक समय न लगे इसलिए उसकी
        लम्बाई कम रखनी चाहिए।
        5 प्रसंगों की व्यवस्था: एक विषय से संबंधित सभी संबंधित सभी प्रश्नों को एक साथ क्रम में
        लिखा जाना चाहिए और यदि प्रश्नों की संख्या अधिक है तो उन्हें व्यवस्थित समूहों में बांट देना
        चाहिए। 
      5. प्रश्नों के बीच पर्याप्त स्थान: प्रश्नावली में प्रश्नों के बीच पर्याप्त जगह छोड़ी जानी चाहिए
        ताकि पढ़ने में सुविधा हो तथा मुक्त प्रश्नों के उत्तर लिखे जा सकें।
        प्रश्नावली में शीर्षक, उपशीर्षक, कॉलम तथा सारणियां आदि सही क्रम में छपे होने चाहिए ताकि
        उनके संपादन में अधिक समय, श्रम व धन नहीं लगाना पड़े। 

        प्रश्नावली का प्रयोग

        प्रश्नावली के प्रयोग की समस्त प्रक्रिया को चार भागों में विभाजित किया जा सकता हैं ।

        पूर्व परीक्षण

        प्रश्नावली को शोध के लिए उत्तरदाता के पास भेजने से पूर्व इसकी जांच एक छोटे निदर्शन को
        मानकर पूर्व परीक्षण करने से किसी भी प्रकार के संदेह की स्थिति नहीं रहती। पूर्व परीक्षण में
        निम्न बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

        1. परीक्षण प्रणाली तथा वास्तविक प्रणाली में अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। 
        2. इसके लिए निदर्शन उसी क्षेत्र से लिया जाना चाहिए जिसका कि अध्ययन करना है। 
        3. यह कार्य कम संख्या में प्रश्नावली छपवाकर किया जाना चाहिए। 
        4. लघुकार निदर्शन द्वारा समूह से प्राप्त उत्तरों एवं कठिनाइयों के आधार पर इसमें सुधार किया
          जाना चाहिए। 
        5. इस पूर्व परीक्षण द्वारा उत्तरदाता की योग्यता व उत्सुकता का ज्ञान हो जाता है तथा
          विश्वसनीय एवं प्रामाणिक सूचना प्राप्त करने में आसानी होती है। 

          सहगामी-पत्र

          प्रत्येक प्रश्नावली के साथ एक छपा हुआ सहगामी-पत्र संलग्न करना चाहिए। इस पत्र के द्वारा
          अध्ययन का उददेश्य तथा सूचनादाता के सहयोग पर प्रकाश डाला जाता है एवं शीघ्र भरकर
          लौटा देने का भी अनुरोध किया जाता है। इस पत्र में अध्ययनकर्ता का नाम, उसका विभाग,
          संबंधित व्यक्तियों का उल्लेख, अध्ययन के उददेश्य आदि का विवरण रहता है एवं प्राप्त सूचनाएं
          गुप्त रखी जाएंगी इसका भी आश्वासन रहता है।

          सहगामी-पत्र के मुख्य बिन्दु 

          1. अनुसंधानकर्ता एवं अनुसंधान प्रायोजक की पहचान 
          2. अध्ययन के सामाजिक महत्व पर प्रकाश 
          3. अध्ययन का मुख्य उद्देश्य बताना 
          4. अज्ञानता तथा गोपनीयता के प्रति आश्वस्त करना
          5. प्रश्नावली भरने के लिए अनुमानित आवश्यक समय बताना 
          6. पत्र के अंत में उत्तरदाता के सहयोग के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। 
          7. पत्र छोटा, आकर्षक तथा प्रभावशाली होना चाहिए। 
          8. शीघ्र प्रत्युत्तर पाने के उद्देश्य के साथ में जवाबी लिफाफा भी भेजना चाहिए। 

            डाक द्वारा प्रेषण

            1. एक क्षेत्र की प्रश्नावलियां डाक द्वारा एक साथ भेजी जानी चाहिए। ताकि उस
              क्षेत्र के सूचनादाताओं के उत्तर साथ ही प्राप्त हो सकें। 
            2. सूचनादाता के पते पूरे, सही, पिन कोड सहित लिखने चाहिए ताकि प्रश्नावली
              समय पर पहुंचे।
            3. प्रश्नावलियां ऐसे समय पहुंचे जब उत्तरदाता साप्ताहिक अवकाश आदि के
              कारण घर पर ही हो। ताकि वे उन्हें जल्दी भरकर भेज सकें।
            4. अपना पता लिखा व टिकट लगा लिफाफा अवश्य साथ में संलग्न रहना
              चाहिए। 

              अनुगामी-पत्र

              अनुगामी पत्र का प्रयोग उत्तरदाता को उत्तर देने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया
              जाता है। प्राय: ऐसा देखने में आया है कि सामाजिक सर्वेक्षणों में सूचनादाता प्रश्नावलियों को
              भरकर नहीं लौटाते हैं। अनुगामी पत्र भेजने की आवृत्ति इस प्रकार बताई गई है।

              1. प्रथम अनुगामी-पत्र सोलह दिन पश्चात। 
              2. द्वितीय अनुगामी-पत्र प्रथम अनुगामी-पत्र के एक सप्ताह बाद । 
              3. तृतीय अनुगामी-पत्र द्वितीय पत्र के दो सप्ताह बाद ।
                इस पर भी सूचना न मिले तो सूचनादाता का नाम सूची से हटा देना चाहिए। 

                प्रश्नावली की विश्वसनीयता 

                उत्तरदाताओं ने प्रश्नावली भरकर जो सूचना दी है वह कितनी विश्वसनीय है वह तभी पता
                लगेगा जब अधिकतर प्रश्नों के अर्थो में अंतर नहीं होगा। अविश्वसनीयता की समस्या उत्पन्न
                होने के निम्न कारण है-

                1. गलत एवं असंगत प्रश्न-जब प्रश्नावली में गलत एवं असंगत प्रश्न सम्मिलित होते है तो
                  उत्तरदाता उनके उत्तर अपने-अपने दृष्टिकोण से देते है ऐसी स्थिती में दी गई सूचनाए
                  विश्वसनीय नहीं होती। 
                2. पक्षपातपूर्ण निदर्डान- यदि निदर्डान के द्वारा सूचनादाताओं के चयन में शोधकर्ता प्रभावित
                  हुआ है तो निश्चित रूप से प्राप्त सूचना प्रतिनिधित्वपूर्ण नहीं हो सकती। 
                3. नियंत्रित व पक्षपातपूर्ण उत्तर प्रश्नावली विधि द्वारा प्राप्त- उत्तरों में बहुधा पक्षपात की
                  भावना होती है क्योंकि लोग गोपनीय एवं व्यक्तिगत सूचनाए सही नहीं देना चाहते।

                प्रश्नावली के गुण / लाभ 

                शोध के लिए आाधर सामन्ती संग्रह में प्रश्नावली महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके द्वारा प्राथमिक तथ्य
                ज्ञात किये जाते हैं। प्रश्नावली के लाभ हैं।

                1. कम खर्चीली: प्रश्नावली अन्य प्राथमिक तथ्य संग्रह करने वाला विधियों से कम खर्चीली होती है।
                  क्योंकि इन्हें डाक द्वारा या फिर एक या दो अन्वेषकों के द्वारा क्षेत्र में वितरित किया जाता है।
                  अत: अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल छपाई और डाक खर्च ही होता है।
                2. विशाल क्षेत्र एवं अधिक सूचनादाता से तथ्य संकलन: इस प्रविधि द्वारा जहां एक ओर विशाल
                  क्षेत्र में दूर-दूर फैले सूचनादाता से सूचना प्राप्त की जा सकती है वहीं समय परिश्रम तथा धन
                  की बचत भी होती है।
                3. समय की बचत: उत्तरदाता भौगोलिक दष्टि से फैले हुए तथा संख्या में अधिक हो सकते हैं।
                  इसलिए प्रश्नावली वापस मंगाने में समय लग सकता है। चूंकि सभी प्रश्नावलियां एक साथ भेजी
                  जाती हैं और अधिकतर उत्तर दस-पन्द्रह दिन में ही वापस आ जाते हैं। इस प्रकार समय की
                  बचत रहती है और प्रश्नावलियां शीघ्र नतीजे देती हैं।
                4. साक्षात्कारकर्ता का पूर्वाग्रह नहीं होता: चूंकि साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारदाता के स्थान पर
                  स्वयं उपस्थित नहीं होता इसलिए वह उत्तरों को प्रभावित नहीं कर सकता। ना तो उत्तर
                  बताकर और न अपनी राय देकर ना ही प्रश्न गलत पढ़कर।
                  स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं गुप्त सूचनाएं प्राप्त: चूंकि प्रश्न का उत्तर लिखते समय शोधकर्ता उपस्थित
                  नहीं होता अत: सूचनादाता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से विविध विषयों पर जानकारी दे सकता
                  है। उसे संकोच, हिचकिचाहट आदि भी नहीं होता। जिससे वह निभ्र्ाीक सूचना देता है।
                5. सुविधाजनक: जहां एक ओर शोधकर्ता को सूचना के लिए अनावश्यक भागदौड़ नहीं करनी पड़ती
                  वहीं दूसरी ओर उत्तरदाता भी अपनी सुविधानुसार खाली समय में प्रश्नावली भरता है तथा एक
                  ही बार में सभी प्रश्नों के उत्तर देने को बाध्य भी नहीं होता वरन पहले आसान प्रश्न तथा बाद
                  में कठिन प्रश्नों के उत्तर दे सकता है।
                  पुन: प्रश्नावली भेजना सम्भव: यदि किसी कारण प्राप्त उत्तरों में कमी रहती है तो पुन: प्रश्नावली
                  भेजकर उत्तर ज्ञात करना सम्भव होता है। अत: प्रभावी शोध के लिए उपयोगी विधि है।
                6. मानकीकृत शब्दावली: प्रश्नों का निर्माण एक ही व्यक्ति के द्वारा किया जाता है एवं छपाई के
                  बाद सभी सूचनादाताओं को एक से ही प्रश्नों का उत्तर देना होता है। अत: उत्तरदाता के
                  सामने एक से ही शब्द होते हैं जिससे प्रश्न समझने में कठिनाई नहीं होती तथा उत्तरों की
                  तुलना में सुविधा रहती है।
                  विविधता नहीं होती: प्रश्नावलियां स्थायी, निरंतर और एक सी होती हैं तथा उनमें कोई विविधता
                  नहीं होती।

                प्रश्नावली की सीमाएं व दोष

                1. चयनित प्रतिदर्डा पक्षपातपूर्ण सम्भव: उत्तर चयन में पक्षपात हो सकता है क्योंकि उत्तरदाता की
                  विषय में कोई रूचि न होने के कारण वह सभी प्रश्नों का उत्तर नहीं भी दे सकता है। चूंकि
                  कुछ विचारों को स्पष्ट करने के लिए वहां अनुसंधानकर्ता उपस्थित नहीं होता अत: उत्तरदाता
                  प्रश्नों को खाली छोड़ सकता है। डाक का पता सही न होने के कारण भी कुछ योग्य
                  उत्तरदाता छूट सकते हैं। इसलिए चयनित प्रतिदर्श को कई बार पक्षपातपूर्ण कहा जाता है।
                2. केवल शिक्षित लोगों के लिए उपयोगी: डाक प्रेषित प्रश्नावली केवल शिक्षित लोगों में काम आ
                  सकती है अत: उत्तरदाताओं की संख्या सीमित करती है। कभी-कभी विभिन्न उत्तरदाता प्रश्नों
                  को अलग-अलग तरीके से समझते हैं। ऐसी गलतफहमी ठीक नहीं की जा सकती है।
                3. प्रश्नावली कम संख्या में भरकर वापस: सभी उत्तरदाताओं का रुझान विषय में है या वे समय
                  पर उपलब्ध हैं, शिक्षित हैं, समय पर लौटाएं तथा पुन: याद दिलाने पर वापस करें ही ऐसा
                  सम्भव नहीं है। अत: प्रश्नावली उत्तरदाता के पास से 30 से 40 प्रतिडात ही वापस आती है
                  जिससे परेशान होकर डाोधकर्ता उनको लिखना छोड़ देता है। ऐसी स्थिति में वास्तविकता का
                  पता नहीं लग सकता।
                  अपूर्ण, आिडांक या अनउत्तरित प्रश्नावलियां: शोध के दौरान उत्तरदाताओं से बहुत सारी अपूर्ण,
                  आंशिकपूर्ण या अनुत्तरित प्रश्नावलियां शोधकर्ता को वापस मिलती हैं। दुबारा प्रश्नावली भेजने पर
                  भी उत्तर ज्ञात नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में ऐसी प्रश्नावलियां शोध के लिए लाभप्रद नहीं
                  होती।
                4. गहनता से जांच में अनुपयुक्त: चूंकि प्रश्नावलियों का आकार छोटा रखना होता है इसलिए
                  उत्तरदाता से पूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती। अत: अतिविशिष्ट शोध के लिए गहनता
                  से जांच नहीं की जा सकती।
                  उत्तरदाता की पृष्ठभूमि संबंधी जानकारी की पुष्टि संभव नहीं: मध्यम वर्गीय व्यक्ति अपने को
                  धनी कह सकता है या एक मध्यम जाति का व्यक्ति स्वयं को उच्च जाति का बता सकता है।
                  प्रश्नावली भरने से पूर्व उत्तरदाता अन्य लोगों से सलाह ले सकता है इसलिए उत्तरों को
                  उसकी अपनी राय नहीं माना जा सकता ।

                4 Comments

                Harun ahmad

                Feb 2, 2020, 12:22 am Reply

                Nice pasnwale

                Bhagvandas

                Dec 12, 2019, 7:20 am Reply

                Good

                Unknown

                Sep 9, 2018, 9:19 pm Reply

                prashana bali kis samprday ki den hai ?

                1-sanrachana bad 2-samgravad 3-vyavharbad 4-prakarybad

                Unknown

                Mar 3, 2018, 7:41 am Reply

                Prasnabli niraman ki smasya ko bhi btaya jaye ki nirman krte ya bnate smay kis2 smasyo ka smana hota h ya krna pdta h

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