प्रयोजनवाद क्या है?

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प्रयोजनवाद के लिये अंग्रेजी का शब्द ‘‘प्रैग्मेटिज्म’’ है। इस शब्द की
उत्पत्ति यूनानी शब्द प्रैग्मा से हुयी जिसका अर्थ है किया गया कार्य, व्यवसाय,
प्रभावपूर्ण कार्य। कुछ विद्वानों ने इस शब्द की उत्पत्ति दूसरे यूनानी शब्द
‘‘प्रेग्मिटिकोस’’ से बताया है, जिसका अर्थ है प्रौक्टिकेबल अर्थात् व्यावहारिक
इसके अनुसार प्रैग्मैटिज्म का अर्थ है व्यवहारिकता। इस दृष्टि से प्रयोजनवाद के अनुसार किसी कार्य और सिद्धान्त के लिये
व्यावहारिकता और उपयोगिता आवश्यक है अन्यथा उसका को महत्व नहीं है।
उपयेागिता पर बल देने के कारण इसे प्रयोजनवाद कहा गया। जीवन की
व्यवहारिक क्रियाओं से उत्पन्न होने के कारण परिणाम पर बल देने के कारण कुछ
लोगों ने इसे फलकवाद भी कहा है।

  1. जेम्स के अनुसार- ‘‘फलकवाद मस्तिष्क का एक स्वभाव है एक अभिवृत्ति है
    यह विचार और सत्य की प्रकृति का सिद्धान्त है और अन्तत: वास्तविकता के बारे
    में खोज का एक सिद्धान्तवाद भी है।’’
  2. कैण्डल के अनुसार- ‘‘प्रयोगवाद अमरीकी मस्तिष्क की व्यावहारिकता की
    प्रतिच्छाया है जो नवागत लोगों की जीवन की समस्या और उनके समाधान के
    फलस्वरूप उत्पन्न हयु ी।’’
  3. रस्क के अनुसार – ‘‘पय्रोगवाद पक्रतिवाद आरै हीगले
    के अथवा चरम आदर्शवाद दोनों का विरोध है।……..प्रयोगवाद नवीन एक नवीन
    आदर्शवाद के विकास में केवल एक अवस्था है एक आदर्शवाद वास्तविकता के
    साथ तभी पूर्ण न्याय कर सकता है जबकि व्यावहारिक और आध्यात्मिक मूल्यों को
    एक साथ दें और एक संस्कृति का निर्माण कर दे जो कार्य क्षमता में फलित हो
    न कि उसकी निशेधता में।
  4. प्रैट के अनुसार- ‘‘प्रयोजनवाद हमे अर्थ का सिद्धान्त, सत्य का सिद्धान्त ज्ञान का
    सिद्धान्त और वास्तविकता का सिद्धान्त देता है।’’
  5. रोजन के अनुसार- ‘‘प्रयोजनवाद सत्य तथा अर्थ के सिद्धान्त को पध््राानता देने
    के कारण मूलत: ज्ञानवादी विचारधारा है। इस विचारधारा के अनुसार सत्य को
    केवल उसके व्यावहारिक परिणामों से जाना जा सकता है। अत: सत्य निरपेक्ष की
    अपेक्षा वैयक्तिक या सामाजिक वस्तु है।’’

प्रयोजनवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रयोजनवाद दर्शन की वह शाखा है, जो किसी पूव-सिद्ध सत्य को
स्वीकार नहीं करतीं। इसे अर्थ-क्रियावाद, व्यवहारवाद, करणवाद, पुनर्रचनावाद,
अनुभववाद, फलानुमेय-प्रामाण्यवाद, प्रयोगवाद आदि संज्ञाओं से भी अभिहित
किया जाता है। ये सभी संज्ञायें प्रयोजनवाद के लक्षणों की व्याख्या करती है, यह
अमरीकी जन जीवन से उद्भुत दार्शनिक प्रणाली है।

प्रयोजनवाद ने एक ओर आदर्शवाद द्वारा प्रतिपादित पूर्व-सत्य के विरूद्ध
आवाज उठायी, तो दूसरी ओर प्रकृतिवाद के अमानवीय वैज्ञानिक सत्य का विरोध किया। आदर्शवाद के अनुसार जगत पूर्व-निर्धारित तथा पूर्ण है और सत्य
सार्वकालिक है। दैवी आदर्शवाद तो मनुष्य की नियति को भी किसी अज्ञात
विण्वात्मा में स्थापित कर देता है ऐसी स्थिति में मानव निष्क्रिय हो जाता है, और
प्रकृतिवाद मनुष्य को एक प्रकृति का खिलौना मानकर अस्तित्व केा ही समाप्त
कर देता है। दूसरी ओर प्रयोजनवाद इन दोनों मान्यताओं को चुनौती देते हुये
अनेक न स्थापनायें प्रस्तुत करता है, जिनमें सर्वत्र एक नकारात्मकता झलकती
है तथा पूर्व-निर्धारित सभी सिद्धान्तों को इंकार करने की प्रवृत्ति दिखायी देती है।
अमेरिकी दर्शन के नाम से प्रचलित यह दर्शन प्रयोगवादी क्यो कहलाया है ?
इसका कारण अमरीकी उपनिवेश की स्थापना है। इंग्लैण्ड एवं यूरोप से निष्कासित
प्यूरिटन क्रिश्चन अमेरिका पहॅुचे और अपने समक्ष उपस्थित समस्याओं को अपनी
तरह से सोच कर हल निकालने का प्रयास किया और नवीन अनुभवों के
फलस्वरूप न विचारधारा निकली और यही प्रयोजनवाद के नाम से प्रसिद्ध हुयी।
यूरोप में ज्ञान-विज्ञान में पुरूत्थान एवं सुधार की लहर फैली और उसका
प्रभाव अमेरिका में भी आ पहॅुचा और लोगों ने प्रयोगकर उपयोगी तथ्यों और ग्रहण
करने की प्रवृत्ति ने जन्म दिया और इस प्रयोग की प्रवृत्ति ने प्रयोगवाद को आगे
बढ़ाया। प्रयोग की कसौटी पर आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद के सिद्धान्तों को
परखकर प्रयोगवाद ने अपना दार्शनिक अस्तित्व खड़ा किया। प्रयोजनवाद के
लिये अंग्रेजों में प्रयुक्त शब्द ‘‘प्रग्मैटिज्म’’ ग्रीक भाषा के शब्द प्रौमैटीकोस से लिया
गया जिसका अर्थ व्यवहार प्रयोग या क्रिया है। ग्रीक भाषा में मिला यह शब्द
प्राचीन दार्शनिकों के विचारों में मिला है।

इस शब्द का प्रयोग पांचवी से छठवीं शताब्दी सा पूर्व में हेराक्लिट्स के
विचारों में पाया जाता है। हेराक्लिटस के अुनसार वास्तविक चीजें परिवर्तनशील
है अत: साश्वत सत्य नहीं हो सकते। इसे प्रयोगवाद ने भी स्वीकार किया है।
हेराक्लिटस के बाद सोफिस्ट आते हैं। इनकी प्रस्थिति समाज में ऊँची
नहीं थी फिर भी ये दार्शनिक माने जाते हैं। प्लेटों की प्रोटोगोरस नामक एक
पुस्तक में प्रोटोगोरस नामक सोफिस्ट का चित्रण किया है प्रोटोगोरस तथा
गोरजियस और उनके शिष्यगणों ने विद्यालय तथा सामान्य जनता के बीच सम्पर्क
स्थापित करने का प्रयत्न किया। प्रोटोगोरस ने सिद्ध किया कि इन्द्रीय ज्ञान
उत्तेजना प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर निर्भर है। ज्ञान का आधार प्रत्यक्ष है और व्यक्ति
ही इन्द्रिय प्रत्यक्ष होता है।

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गोरिजियस का मत था कि पूर्व में केा भी अस्तित्व नहीं है, इससे
संदेहवाद की भावना गोरजियस में पायी जाती है।
जान डी0वी0 के मतानुसार सभी चिन्तन एक प्रकार का प्रयोग है। इसके
अलावा व्यक्ति को नहीं सामाजिक मन को डी0वी0 ने सभी चीजों का मापदण्ड
कहा है।

भारतीय दर्शन में भी प्रयोजनवादी विचारधारा पायी जाती है। इस
सम्बंध में डा0 सिन्हा ने अपने विचार व्यक्त करते हुये लिखा है कि ‘‘अन्त: यथार्थ
सत्य की परख है। न्याय प्रवृत्ति सामथ्र्य अथवा क्रियात्मक उपयोगिता को भी
सत्य की कसौटी मानता है।………. ………अत: क्रियात्मक अनुपयोगिता असत्य की
एक कसौटी है। न्याय तथ्य के साथ संमात की जो विषय वादियों की कसौटी है
तथा क्रियात्मक उपयोगिता को जो व्यवहारवादियों के सत्य की कसौटी है, इन
दोनों को मानता है। न्याय विषयवादियों व्यवहार को मानता है। न्याय का मत है
कि ज्ञान का प्रमाण्य, ज्ञान के कारणों के गुण से उत्पन्न होता है, न्याय के अनुसार
ज्ञान का प्रमाण्य और अप्रमाण्य दोनेां बाहरी कारणों से उत्पन्न तथा ज्ञात होते
हैं।’’

भारतीय परम्परा को तो मानना है कि बिना उद्देश्य या प्रयोजन के तो
मंदबुद्धि भी किसी काम में नहीं लगता प्रयोजनमनुधिण्य न मंदो अपि प्रवर्तते यानि
प्रयोजन कार्य की पहली शर्त है। इसके अलावा- यस्तु क्रियान्वयन पुरूष: स एवं
विद्वान यानि क्रियाणील या व्यवहारणील व्यक्ति ही असली विद्वान है और अर्थकारी
सा विद्या -विद्या च्छाओं को पूरा करने वाली है। पूरा भारतीय दर्शन धर्म सिखाने
से भरा पड़ा है और धर्म का अर्थ कर्तव्य भावना है, जिससे मनुष्य लगातार उन्नति
की ओर बढ़ता रहे। मीमांणा दर्शन के अनुसार तो धर्म प्रेरणा का साधन है मनुष्य
जीवन की उन्नति के दस लक्षणेां की महत्व देते हुये इन्हें ही धर्म का लक्षण बताया
गया।

घृति: क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं।।


धर्म के दस लक्षण- धैर्य, क्षमा, मन पर वण, सत्य वचन, क्रोध पर वश, चोरी न
करना, पवित्रता, इन्द्रिय नियंत्रण, बुद्धिमता, ज्ञान। (शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्)
शरीर इस साध्य को पाने का सबसे बड़ा साधन है। भारतीय दर्शन में प्रयोजनवादी
शाखा प्राचीन है।

बैाद्ध दर्शन में भी प्रयोगवाद की झलक मिलती हैं, योगाचार सम्प्रदाय क
दर्शन में प्रयोगवाद की छाया दिखायी पड़ती है। जिसमें यह लिखा गया है कि
जीवन में हमारी क्रियायें बाह्य पदार्थों के कारण हैं ज्ञानकारों के भिन्नता
विषयाकारों की भिन्नता के कारण है। वर्ण शब्द, गंध, स्वाद, तापमान इत्यादि का
ज्ञान बाह्य पदार्थों को देखता है। यह अनुभव उसके प्रयोग पर निर्भर है।
प्रयोगवाद की यदा-कदा झलक 16वीं शताब्दी में भी दिखायी देती है।
फ्रांसीसी बेकन ने अपने लेखों (नोवम आर्गेनम एडवासमेंट, आफ लर्निंग, न्यू
एटलांटिस) में आगमन प्रणाली विज्ञान को समाज मार्ग दर्शन के रूप में तथा
समाज द्वारा विज्ञान को सामान्य निधि स्वरूप सुरक्षित रखने के लिये तथा विज्ञान
को सामाजिक अनुसंधान क्रिया के रूप में मानने को कहा है।

अठारहवीं शताब्दी में आगस्ट काम्टे ने अपनी ‘‘पाजिटिवी फिलास्फी’’ में
विज्ञानों के अध्ययन पर जोर दिया और बताया कि भौतिक विज्ञान, रासायनिक
विज्ञान, शरीर विज्ञान तथा समाज विज्ञान ये सभी मानव के क्रियाओं से अन्त:
सम्बंधित है। इससे व्यावहारिक कार्यों ने काल्पनिक विचारों का प्रभाव कम हुआ
और मानवेत्तर एवं धार्मिक विश्वासों का प्रभाव कम होता गया। अध्यात्मशास्त्र का
व्यावहारिक उपयोग होने लगा और सामाजिक सम्बंधों पर बल दिया जाने लगा।
इससे नयी विचारधारा प्रयोजनवाद में आ गयी। प्रयोगवाद के सर्वप्रथम दार्शनिक
चाल्र्स सैण्डर्स पियर्स माने गये पियर्स का योगदान ज्ञान दर्शन के क्षेत्र में विचारों
के प्रयोगवादी अर्थ निश्चय करने की कसौटी निर्धारित की है। इसी दर्शन को
जेम्स व डी0वी0 आगे बढ़ाया।

पियर्स ने तर्क विज्ञान एवं गणित के सिद्धान्तों का प्रयोग किया इस
प्रयत्न में पियर्स ने कान्ट के आत्मगत मानसिक प्रक्रिया तथा संसार की वस्तुगत
यर्थाथताओं को कुछ हद तक जोड़ा है।पियर्स के पश्चात् विलियम जेम्स प्रयोगवादी दार्शनिक हुये इन्हेानें भी
अनुभव पर बल दिया पर मानव को सर्वोच्च नहीं स्वीकार किया है और डी0वी0
एवं जेम्स के दर्शन में अन्तर आ गया।

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डी0वी0 प्रयोगवाद के प्रबल समर्थक एवं प्रचारक हुये। डी0वी0 पर
यर्थाथवादी टोरी, आदर्शवादी मारिस, जाने केयर्ड तथा ग्रीन का और स्टेनली हाल
के प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का प्रभाव पड़ा। इसके फलस्वरूप प्रयोगात्मक वैज्ञानिक
विधि की और डी0वी0 का झुकाव है। डी0वी0 ने आदर्शवादी धारण के विरूद्ध
मनुष्य के आत्मा और इच्छा शक्ति को आध्यात्मिक रूप न होकर सामाजिक रूप
दिया। डी0वी0 के बाद उनके शिष्यों और सहयोगियों ने प्रयोजनवाद को आगे
बढ़ाया जिनमें किलपैट्रिक मांरिसन आदि अमरीका में तथा शिलर इंग्लैण्ड के
प्रमुख प्रयोजनवादी माने गये है।

प्रयोजनवाद का दार्शनिक दृष्टिकोण

तत्व प्रदर्शन में प्रयोजनवाद –

 प्रयोजनवादी मन तथा पदार्थ एक पथ्श् ाक
और स्वतंत्र तत्वों के रूप मे अस्वीकार करते हैं। वे अपने सत्ता-विज्ञान
को अनुभव की धारणा पर आधारित करते हैं। प्रयोजनवादियों के अनुसार
प्राकृतिक नियम की धारणा निर्देशात्मक हेाने के बजाय वर्णनात्मक है ये
वास्तविकता को सूक्ष्म वस्तु नहीं मानते है। वे इसको कार्य सम्पादन की
प्रक्रिया समझते है जिसमें दो बातें निहित हैं- कार्य करना और कार्य तथा
उसके परिणाम से अर्थ निकालना। पियर्स का कथन है- ‘‘प्रयोजनवाद
स्वयं में तत्व-दर्शन का सिद्धान्त नहीं और न यह वस्तुओं के सत्य को
निर्धारित करने के लिये को प्रयास है। यह केवल कठिन शब्दों और
अमूर्त धारणाओं के अर्थ को निश्चित करने की विधि है।’’

ज्ञान शास्त्र में प्रयोजनवाद –

ज्ञान अनुभव में निहित है। अनुभव
तात्कालिक या मध्यस्थ हो सकता है। तात्कालिक अनुभव, अनुभूति की
वस्तु है। तात्कालिक अनुभव मनुष्य तथा उसके मन की अपने वातावरण
के प्रति की जाने वाली पारस्परिक क्रिया है। इसके लिये बुद्धि के प्रयोग
की आवश्यकता है क्योंकि, बुद्धि के द्वारा ही इसकी दिणा का निर्धारण
किया जाता है। प्रयोजनवादी प्रयोगात्मक विधि को ज्ञान प्राप्ति के साधन
मानते हैं उन्होनें इस विधि के पांच पद या स्तर निर्धारित किये हैं। क्रिया
परिस्थिति निर्माण, समस्या, सूचना या प्रदत्त, परिकल्पना या सम्भव समाध्
ाान, परीक्षण एवं प्रयोग। डी0वी0 का कथन है- ‘‘जो परिपकल्पना
व्यावहारिक रूप में कार्य करती है, वह सत्य है, जिसका प्रयोग उन
वास्तविक और पूर्वअनुमानित वांछित तथ्यों के संकलन के लिये किया
जाता है, जिनकी अपने परिणामों द्वारा पुष्टि होती है।’’

मूल्य मीमासां में प्रयोजनवाद –

नैतिक मूल्य मानव एव समाज के मध्
य होने वाली आदान-प्रदान की प्रक्रिया का प्रतिफल है। अच्छा वह है
जो सर्वोत्तम ढंग से अनिण्चित परिस्थितियों का समाधान करती है।
प्रयोजनवादी-समस्याओं के समाधान में बुद्धि के प्रयोग की अच्छा या
सद् मानते हैं।

सुन्दर क्या है? इस सन्दर्भ में प्रयोजनवादी के अनुसार सुन्दर वहीं
है जिसे हम अपने अनुभव से सुन्दर मानते हैं। कला की जो कृति हमें
अपनी ओर आकृष्ट कर सकती है और गहन रूप से अनुभूति करने के
लिये तत्पर बना सकती है, वही सुन्दर है।

धर्म क्या है? इस सन्दर्भ में डी0वी0 ने लिखा है कि ‘‘धर्म किसी
बात की स्वीकृति है जो पृथक है और जिसका स्वयं के द्वारा अस्तित्व है।
धार्मिक के अर्थ को स्पष्ट करते हुये डी0वी0 ने लिखा है कि इसके
अन्तर्गत वे दृष्टिकोण आते हैं जो किसी वस्तु तथा किसी निर्धारित साध्
य या आदर्श के प्रति बनाये जा सकते है।

श्वर क्या है? इस सन्दर्भ में डी0वी0 ने लिखा है कि श्वर
आदर्श तथा वास्तविकता के मध्य सक्रिय सम्बंध है।

प्रयोजनवाद के विभिन्न सम्प्रदाय

पियर्स का व्यवहारवाद-

अर्थ क्रियावाद अथवा प्रयोजनवाद शब्द का पय्र ागे
सर्वप्रथम चाल्र्स सैण्डर्स पियर्स की पुस्तक में मिलता है। पियर्स ने तार्किक एवं
दार्शनिक दृष्टि से प्रतीकों की व्याख्या की। पियर्स के मतानुसार को अभिधारणा
अन्तिम नहीं है उसका अर्थ उसके प्रभाव से निर्धारित किया जाता है। फलत:
वास्तविक व्यवहार में जो प्रत्यय अथवा अभिधारणायें एक-दूसरे से सम्बद्ध होती
है, उनके इस पारस्परिक सम्बंध को उचित अर्थ में देखना ही उन्हें सीखना है।
संक्षेप में पियर्स यह कहना चाहता है कि सत्य सम्बंधी सभी अभिधारणायें अस्थायी
हैं उनमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, तथा व्यवहार के साथ उनके अर्थ
बदलते रहते हैं।

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विलियम जेम्स का अनुभववाद या फलानुमेय प्राण्यवाद- 

पियर्स के पग्े्रमेिटसिज्म
को जेम्स ने शिष्य बनकर प्रेग्मेटिज्म संज्ञा प्रदान कर उसे क्रमबद्ध दर्शन का रूप
प्रदान किया। जेम्स ने पियर्स का इस विषय में अनुमोदन किया कि अर्थ-क्रियावादी
विधि बिना पूर्व-निर्धारित उत्तरों के प्रण्नों का हल ढूढने का प्रयत्न करती है।
जेम्स के अनुसार विचार का प्रयोजन मानवीय रूचियों को सन्तुष्टि करना है।
विचार अनुभव में अन्तर्निहित होता है। और अनुभव से परे को विचार नहीं हेाता।
अनुभव सब कुछ है और जीवन के सभी मूल्य अनुभव के ही उद्भूत हेाते हैं सत्य
निरपेक्ष नहीं है, अपितु अनुभवाश्रित है। सत्य का मूल्य व्यावहारिक है। चिरन्तन
अपरिवर्तित सत्य को जेम्स स्वीकार नहीं करता। सत्य की प्रकृति के सम्बध में
उसकी मान्यता है सत्य अनेक है जो निर्मित होते है। जेम्स जगत को पूर्ण नही
मानते।

जान डी0वी0 के करणवाद प्रयोगवाद तथा पुनर्रचनावाद-

शिक्षा की दृष्टि
से डी0वी0 के करणवाद का बड़ा महत्व है इसने शिक्षा में क्रांति दी। यह
व्यवहारवाद करणवाद के रूप में इसीलिये प्रसिद्ध हुआ क्येांकि इनके मतानुसार
मस्तिष्क ज्ञान उपकरण के रूप में प्रयुक्त होते है वे अपने आप में साध्य नहीं है।
उनके मतानुसार मस्तिष्क तथा बुद्धि का विकास प्राकृतिक ढंग से हुआ। जीवन
के विविध सामाजिक परिस्थितियों का सामना करने के लिये मनुष्य को जो
प्रक्रियायें करनी पड़ी उनके उप-उत्पाद्य के रूप से इसका विकास हुआ।
डी0वी0 के अनुसार ज्ञान मस्तिष्क के परे नहीं है विचार मस्तिष्क की क्रिया मात्र
है। डी0वी0 का दूसरा प्रमुख विचार प्रयोगवाद का है। डी0वी0 ने प्रयोगात्मक विक्रिा को जो वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रयुक्त होती है, मानवीय सामाजिक समस्याओं का हल
करने के लिये उपयुक्त समझा। डी0वी0 के अनुसार हमारी चिन्तन प्रक्रिया में वे
सभी चरण होते हैं जो वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रयुक्त होते है। यदि हमे अपने
अनुभवों का लाभ प्रभावी ढंग से लेना है, तो प्रयोगात्मक विधि से करे। डी0वी0
प्रधानतया शिक्षा दार्शनिक था उसके अनुसार शिक्षा अनुभवों की पुनर्रचना मानी
जाती है। इसी आधार पर उनके दर्शन को पुनर्रचनावाद भी कहा जाता है।

किलपैट्रिक का  प्रयोजनवाद-

‘‘शिक्षा की दृष्टि से एक आरै महत्वपूर्ण नाम
किलपैट्रिक का लिया जाता है। जिसने डी0वी0 की समस्या हल विधि या
वैज्ञानिक विधि को प्रोजेक्ट प्रणाली के रूप में विकसित किया। किलपैट्रिक ने
गैलिलियों द्वारा स्थापित वैज्ञानिक प्रतिमानों द्वारा विण्व की व्याख्या करने का
प्रयत्न किया। इनके अनुसार मानवीय मूल्यों अनुभवों की प्रमुख उपलब्धि नैतिक
मूल्य है। उसके अनुसार दर्शन जीवन के संघर्षत्मिक मूल्यों का समीक्षात्मक अध्
ययन है। दर्शन का काम यह पता लगाना है कि संघर्षों के बीच जीवन कैसे
जिया जाय। डी0वी0 के समान किलपैट्रिक की भी यही मान्यता है कि नैतिकता
सामाजिक हेाती है।

प्रयोजनवाद के मुख्य सिद्धान्त

ब्राइटमैन का कथन है- ‘‘प्रयोजनवाद सत्य का मापदण्ड है। सामान्य रूप में यह
वह सिद्धान्त है, जो समस्त विचार प्रक्रिया के सत्य की जॉच उसके व्यावहारिक
परिणामों से करता है। यदि व्यावहारिक परिणाम संतोषजनक है तो विचार-प्रक्रिया
को सत्य कहा जा सकता है।’’’प्रयोजनवाद के सिद्धान्त है-

  1. जो सिद्धान्त कार्य करते है, वे सत्य हैं। सत्य परिवर्तनणील है। 
  2. मानव प्रयासों का अत्यधिक महत्व है। 
  3. अनुभव अनेक प्रकार से सम्बंधित व बदलते रहते है। 
  4. जीवन और उससे सम्बंधित विभिन्न क्रियायें वास्तविक है। 
  5. सिद्धान्त की कसौटी उसकी वास्तविकता है। 
  6. प्रयोजनवाद प्रकृतिवादी सिद्धान्तों और आदर्शवादी निष्कर्णो का योग है। 
  7. सत्य मानव निर्मित हेाता है, और जीवन के मूल्य और सत्य बदलते रहते
    है। 
  8. दर्शन का मुख्य कार्य अनुभवों को, सम्भावनाओं को संगठित करना है। 
  9. अन्तिम अपरिवर्तित और सदैव ठीक उतरने वाली पद्धति की स्थापना साध्
    ान के रूप में उसका महत्व नष्ट कर देती है। 
  10. जो बात उद्देश्य पूरा करे इच्छाओं को संतुष्ट करे वही सत्य है। 
  11. समस्या के अर्थ को समझकर ही हल करने का प्रयास करें। 
  12. विचारों की सभी पद्धतियो का सम्बंध उस स्थिति और व्यक्तियों से है
    जिसमें वे उत्पन्न होती हैं, और जिसको वे सन्तुष्ट करती है। उनमे
    परिणामों द्वारा सदैव परिवर्तन हो जाता है। 
  13. जीव विज्ञान द्वारा यह सिद्ध है कि जीवन मनो शारीरिक प्राणी है, और
    विचार उस स्थिति से अनुकुलन करने का साधन है, जिनमे कठिनाइयां
    एवं समस्यायें उपस्थित होती है।
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