प्रयोजनवाद क्या है? प्रयोजनवाद के सिद्धांत

प्रयोजनवाद पाश्चात्य दर्शन की वह विचारधारा है जो मनुष्य के केवल व्यावहारिक पक्ष पर विचार करती है। अंग्रेजी में इसे पे्रग्मेटिज्म (Pragmatism) कहते हैं जो ग्रीक भाषा के पे्रग्मा (Pragma) अथवा प्रेग्मेटिकोस (Pragmaticos) शब्द से बना है जिनका अर्थ व्यावहारिकता और क्रिया से होता है। चूँकि यह दर्शन मनुष्य के व्यावहारिक पक्ष पर ही विचार करता है और समस्त सृष्टि को क्रियाओं का परिणाम मानता है इसलिए अंग्रेजी भाषा में इसे पे्रग्मेटिज्म (Pragmatism) कहते हैं। तब हिंदी में इसे व्यावहारिकतावाद कहना चाहिए, परंतु अधिकतर भारतीय इसे प्रयोजनवाद की संज्ञा देते हैं और हमारे देश में यह इसी नाम से जाना-पहचाना जाता है।

पाश्चात्य जगत में प्रयोजनवादी विचारों की झलक सर्वप्रथम यूनानी दार्शनिक हेराक्लीटस 540-475 ई. पू. के विचारों में मिलती है। उन्होंने इस संसार को परिवर्तनशील बताया और कहा कि सभी वास्तविक चीजें परिवर्तनशील हैं इसलिए शाश्वत् सत्य कुछ भी नहीं हो सकता। प्लेटो के पूर्व विचारक सोपिफस्टों की विचारधारा में भी प्रयोजनवाद के दर्शन होते हैं। सोपिफस्ट वृत्तिग्राही शिक्षकों के रूप में ज्ञान चर्चा करते थे। इनमें प्रोटागोरस 500 ई. पू. का नाम विशेष उल्लेखनीय है। 

प्रोटागोरस का मूल कथन था-‘मनुष्य ही सब पदार्थों का माप है’ । ये मनुष्यों को सब वस्तुओं का मापदण्ड मानते थे और यह मानते थे कि पहले से किसी का अस्तित्व नहीं होता, सब क्रिया द्वारा निर्मित होता रहता है। ये यह भी मानते थे कि संसार में पूर्व निश्चित सत्य कुछ भी नहीं हैं, मनुष्य नित्य नए अनुभव करता है और सत्यों की खोज करता है। परंतु तभी पश्चिमी जगत प्लेटो 427-347 ई. पू. का प्रादुर्भाव हुआ और वहाँ के दार्शनिक चिंतन ने एक नया मोड़ लिया और 15वीं शताब्दी तक वहाँ जो भी दार्शनिक चिंतन हुआ वह सब प्लेटो के दार्शनिक चिंतन के आधार पर हुआ।

इस युग में प्रयोजनवादी चिंतन का शुभारंभ 16वीं शताब्दी में बेकन 1561-1626द्ध, ने किया। उन्होंने विज्ञान को समाज का मार्गदर्शक बताया। 18वीं शताब्दी के दार्शनिक काम्टे को भी इसका पूर्व विचारक माना जा सकता है क्योंकि उन्होने विज्ञान की व्यावहारिक उपयोगिता स्वीकार की थी। परंतु एक स्वतंत्रा दर्शन के रूप में इस विचारधारा का विकास 19वीं शताब्दी में अमेरिका में प्रारंभ हुआ। 

अमेरिका के चाल्र्स सेन्डर्स पियर्स1839-1914 तथा विलियम जेम्स 1842-1910 इस विचारधारा के प्रतिपादक माने जाते हैं। पियर्स के अनुसार कोई अवधारणा अंतिम नहीं होती, उसका अर्थ उसके व्यावहारिक प्रभाव से निर्धारित किया जाता है। जेम्स ने मानव अनुभव के महत्व को स्पष्ट किया और मानव को समस्त वस्तुओं और क्रियाओं की सत्यता की कसौटी बताया। जेम्स के बाद अमेरिका के ही जाॅन डीवी 1859-1952 ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाया। डीवी ने व्यक्ति की इच्छा शक्ति को सामाजिक परिपेक्ष्य में स्वीकार किया। 

उनके अनुसार मानव प्रगति का आधार सामाजिक बुद्धि ही होती है। डीवी के बाद अमेरिका में उनके शिष्य किलपैट्रिक ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाया और इंग्लैण्ड में शिलर ने आगे बढ़ाया। इन सबमें डीवी का योगदान सबसे अधिक है।

किसी भी दार्शनिक चिंतनधारा के स्वरूप को समझने के लिए उसकी तत्व मीमांसा, ज्ञान एवं तर्क मीमांसा और मूल्य एवं आचार मीमांसा को समझना आवश्यक होता है। यूँ प्रयोजनवादियों ने इन पक्षों पर बहुत स्पष्ट रूप से विचार व्यक्त नहीं किए हैं, परंतु इस सृष्टि और मनुष्य के संबंध में उनका जो चिंतन है उसी के आधार पर हम प्रयोजनवाद की तत्व मीमांसा, ज्ञान एवं तर्क मीमांसा और मूल्य एवं आचार मीमांसा को समझने का प्रयत्न करेंगे।

प्रयोजनवाद की तत्व मीमांसा

प्रयोजनवादी इस ब्रह्माण्ड की रचना के संबंध में विचार करने के स्थान पर मनुष्य जीवन के वास्तविक पक्ष पर ही विचार करते हैं। ये इस ब्रह्माण्ड के बारे में इतना ही कहते हैं कि यह अनेक वस्तुओं और क्रियाओं से बनता रहता है। ये वस्तुओं और क्रियाओं की व्याख्या के झमेले में नहीं पड़ते। इस इन्द्रियग्राह संसार के अतिरिक्त ये किसी अन्य संसार के अस्तित्व को नहीं मानते। ये आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व को भी नहीं मानते। इनके अनुसार नोट मन का दूसरा नाम आत्मा है और मन एक पदार्थजन्य क्रियाशील तत्व है। ये इस ब्रह्माण्ड के किसी अंतिम सत्य की खोज नहीं करते, ये तो प्रत्यक्ष को ही सत्य मानते हैं।

जेम्स के अनुसार यह जगत पूर्ण नहीं है, मनुष्य के प्रयास से यह पूर्णता की ओर अग्रसर अवश्य हो रहा है। जेम्स-और शिलर संसार की उन्हीं वस्तुओं और क्रियाओं को सत्य मानते थे जो मानव के जीवन के लिए उपयोगी हैं और उसकी प्रकृति को समग्र रूप से संतुष्ट करती हैं। इनकी दृष्टि से कोई भी वस्तु अथवा क्रिया मानव के लिए सदैव उपयोगी नहीं हो सकती इसलिए कोई भी पूर्व निश्चित सत्य नहीं हो सकता, सत्य परिवर्तनशील होता है। उनकी इस विचारधारा को मानवतावादी प्रयोजनवाद कहा जाता है। वुफछ प्रयोजनवादी केवल उसे ही सत्य मानते हैं जो प्रयोग की कसौटी पर खरा उतरता है। उनकी इस विचारधारा को प्रयोगवादी प्रयोजनवाद कहा जाता है। डीवी इस विचारधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं।

कुछ प्रयोजनवादी अनुभवसि( ज्ञान को ही सत्य मानते हैं, भले ही उसे किसी भी भाषा में व्यक्त किया जाए। इनका स्पष्टीकरण है कि भाषा ही तो भिन्न होती है, परिणाम तो समान होते हैं, इसलिए हमें भाषा की भिन्नता पर नहीं परिणाम पर ध्यान देना चाहिए। इसे नाम रूपी प्रयोजनवाद कहते हैं।

प्रयोजनवादियों का एक वर्ग मनुष्य को मनोशारीरिक प्राणी मानता है और केवल उन्हीं को सत्य मानता है जो मनुष्य की जीव वैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इसे जीवविज्ञानवादी प्रयोजनवाद कहते हैं। जीव विज्ञानवादी प्रयोजनवादी दार्शनिक मानव की उस शक्ति को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं जिसके द्वारा वह अपने आपको अपने पर्यावरण के अनुकूल बनाता है और आवश्यकता पड़ने पर पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाता है। डीवी मनुष्य को एक ऐसे जैविक प्राणी के रूप में देखते हैं जो स्वयं में एक ऐसा साधन, निमित्त कारण अथवा उपकरण है जो अपने को अपने पर्यावरण के अनुकूल बनाने और पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने में सक्षम होता है। इसलिए इस विचारधारा को साधनवाद, नैमित्तिकवाद अथवा उपकरणवाद भी कहते हैं।

प्रयोजनवाद की ज्ञान एवं तर्क मीमांसा

प्रयोजनवादियों के अनुसार अनुभवों की पुनर्रचना ही ज्ञान है। ये ज्ञान को साध्य नहीं अपितु मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने का साधन मानते हैं। इनके अनुसार ज्ञान की प्राप्ति सामाजिक क्रियाओं में भाग लेने से स्वयं होती है। कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को ये ज्ञान का आधार, मस्तिष्क तथा बुद्धि को ज्ञान का नियंत्रक और क्रियाओं को ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम मानते हैं।

प्रयोजनवाद की मूल्य एवं आचार मीमांसा

प्रयोजनवादी पूर्व निश्चित सत्य, आदर्श और मूल्यों में विश्वास नहीं करते इसलिए ये मनुष्य के लिए कोई निश्चित आचार संहिता नहीं बनाते। इनका स्पष्टीकरण है कि मनुष्य जीवन में निरंतर परिवर्तन होता रहता है इसलिए उसके आचरण को निश्चित नहीं किया जा सकता, उसमें तो वह शक्ति होनी चाहिए कि वह बदले हुए पर्यावरण में समायोजन कर सके। ये बच्चों में केवल सामाजिक कुशलता का विकास करना चाहते हैं। सामाजिक कुशलता से प्रयोजनवादियों का तात्पर्य समाज में समायोजन करने, अपनी जीविका कमाने, मानव उपयोग की वस्तु एवं क्रियाओं की खोज करने और नई-नई समस्याओं का समाधान करने की शक्ति से होता है।

प्रयोजनवाद का अर्थ

प्रयोजनवाद के लिये अंग्रेजी का शब्द ‘‘प्रैग्मेटिज्म’’ है। इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी शब्द प्रैग्मा से हुयी जिसका अर्थ है किया गया कार्य, व्यवसाय, प्रभावपूर्ण कार्य। 

कुछ विद्वानों ने इस शब्द की उत्पत्ति दूसरे यूनानी शब्द ‘‘प्रेग्मिटिकोस’’ से बताया है, जिसका अर्थ है प्रौक्टिकेबल अर्थात् व्यावहारिक इसके अनुसार प्रैग्मैटिज्म का अर्थ है व्यवहारिकता। इस दृष्टि से प्रयोजनवाद के अनुसार किसी कार्य और सिद्धान्त के लिये व्यावहारिकता और उपयोगिता आवश्यक है अन्यथा उसका को महत्व नहीं है। उपयेागिता पर बल देने के कारण इसे प्रयोजनवाद कहा गया। 

जीवन की व्यवहारिक क्रियाओं से उत्पन्न होने के कारण परिणाम पर बल देने के कारण कुछ लोगों ने इसे फलकवाद भी कहा है।

प्रयोजनवाद की परिभाषा

प्रयोजनवाद के अनेक रूप हैं और उनमें संसार और मानव जीवन की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूप से की गई है, परंतु मूल रूप में उनमें बड़ी समानता है। उस समानता के आधार पर विद्वानों ने इसे परिभाषा में बाँधने का प्रयास किया है। राॅस महोदय के शब्दों में- प्रयोजनवाद निश्चित रूप से एक मानवतावादी दर्शन है जो यह मानता है कि मनुष्य क्रिया में भाग लेकर अपने मूल्यों का निर्माण करता है और यह मानता है कि वास्तविकता सदैव निर्माण की अवस्था में रहती है।

परंतु इस परिभाषा में प्रयोजनवाद के पूर्ण दर्शन नहीं होते। प्रयोजनवाद की तत्व मीमांसा, ज्ञान एवं तर्क मीमांसा और मूल्य एवं आचार मीमांसा की दृष्टि से उसे अग्रलिखित रूप में परिभाषित करना चाहिए- प्रयोजनवाद पाश्चात्य दर्शन की वह विचारधारा है जो इस ब्रह्माण्ड को विभिन्न तत्वों और क्रियाओं का परिणाम मानती है और यह मानती है कि यह भौतिक संसार ही सत्य है और इसके अतिरिक्त कोई आध्यात्मिक संसार नहीं है। यह ईश्वर के विषय में विचार नहीं करती और आत्मा को पदार्थजन्य क्रियाशील तत्व के रूप में स्वीकार करती है और यह प्रतिपादन करती है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य सुखपूर्वक जीना है, जिसे सामाजिक जीवन जीने अर्थात् सामाजिक आदर्शों एवं मूल्यों के पालन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

जेम्स के अनुसार- ‘‘फलकवाद मस्तिष्क का एक स्वभाव है एक अभिवृत्ति है यह विचार और सत्य की प्रकृति का सिद्धान्त है और अन्तत: वास्तविकता के बारे में खोज का एक सिद्धान्तवाद भी है।’’

कैण्डल के अनुसार- ‘‘प्रयोगवाद अमरीकी मस्तिष्क की व्यावहारिकता की प्रतिच्छाया है जो नवागत लोगों की जीवन की समस्या और उनके समाधान के फलस्वरूप उत्पन्न हयु ी।’’

रस्क के अनुसार - ‘‘पय्रोगवाद पक्रतिवाद आरै हीगले के अथवा चरम आदर्शवाद दोनों का विरोध है।........प्रयोगवाद नवीन एक नवीन आदर्शवाद के विकास में केवल एक अवस्था है एक आदर्शवाद वास्तविकता के साथ तभी पूर्ण न्याय कर सकता है जबकि व्यावहारिक और आध्यात्मिक मूल्यों को एक साथ दें और एक संस्कृति का निर्माण कर दे जो कार्य क्षमता में फलित हो न कि उसकी निशेधता में।

प्रैट के अनुसार- ‘‘प्रयोजनवाद हमे अर्थ का सिद्धान्त, सत्य का सिद्धान्त ज्ञान का सिद्धान्त और वास्तविकता का सिद्धान्त देता है।’’

रोजन के अनुसार- ‘‘प्रयोजनवाद सत्य तथा अर्थ के सिद्धान्त को पध््राानता देने के कारण मूलत: ज्ञानवादी विचारधारा है। इस विचारधारा के अनुसार सत्य को केवल उसके व्यावहारिक परिणामों से जाना जा सकता है। अत: सत्य निरपेक्ष की अपेक्षा वैयक्तिक या सामाजिक वस्तु है।’’

प्रयोजनवाद के सिद्धांत

ब्राइटमैन का कथन है- ‘‘प्रयोजनवाद सत्य का मापदण्ड है। सामान्य रूप में यह वह सिद्धान्त है, जो समस्त विचार प्रक्रिया के सत्य की जॉच उसके व्यावहारिक परिणामों से करता है। यदि व्यावहारिक परिणाम संतोषजनक है तो विचार-प्रक्रिया को सत्य कहा जा सकता है।’’’प्रयोजनवाद के सिद्धान्त है-
  1. जो सिद्धान्त कार्य करते है, वे सत्य हैं। सत्य परिवर्तनशील है। 
  2. मानव प्रयासों का अत्यधिक महत्व है। 
  3. अनुभव अनेक प्रकार से सम्बंधित व बदलते रहते है। 
  4. जीवन और उससे सम्बंधित विभिन्न क्रियायें वास्तविक है। 
  5. सिद्धान्त की कसौटी उसकी वास्तविकता है। 
  6. प्रयोजनवाद प्रकृतिवादी सिद्धान्तों और आदर्शवादी निष्कर्णो का योग है। 
  7. सत्य मानव निर्मित हेाता है, और जीवन के मूल्य और सत्य बदलते रहते है। 
  8. दर्शन का मुख्य कार्य अनुभवों को, सम्भावनाओं को संगठित करना है। 
  9. अन्तिम अपरिवर्तित और सदैव ठीक उतरने वाली पद्धति की स्थापना साध् ान के रूप में उसका महत्व नष्ट कर देती है। 
  10. जो बात उद्देश्य पूरा करे इच्छाओं को संतुष्ट करे वही सत्य है। 
  11. समस्या के अर्थ को समझकर ही हल करने का प्रयास करें। 
  12. विचारों की सभी पद्धतियो का सम्बंध उस स्थिति और व्यक्तियों से है जिसमें वे उत्पन्न होती हैं, और जिसको वे सन्तुष्ट करती है। उनमे परिणामों द्वारा सदैव परिवर्तन हो जाता है। 
  13. जीव विज्ञान द्वारा यह सिद्ध है कि जीवन मनो शारीरिक प्राणी है, और विचार उस स्थिति से अनुकुलन करने का साधन है, जिनमे कठिनाइयां एवं समस्यायें उपस्थित होती है।

प्रयोजनवाद का दार्शनिक दृष्टिकोण

1. तत्व प्रदर्शन में प्रयोजनवाद -

 प्रयोजनवादी मन तथा पदार्थ एक पथ्श् ाक और स्वतंत्र तत्वों के रूप मे अस्वीकार करते हैं। वे अपने सत्ता-विज्ञान को अनुभव की धारणा पर आधारित करते हैं। प्रयोजनवादियों के अनुसार प्राकृतिक नियम की धारणा निर्देशात्मक हेाने के बजाय वर्णनात्मक है ये वास्तविकता को सूक्ष्म वस्तु नहीं मानते है। वे इसको कार्य सम्पादन की प्रक्रिया समझते है जिसमें दो बातें निहित हैं- कार्य करना और कार्य तथा उसके परिणाम से अर्थ निकालना। 

पियर्स का कथन है- ‘‘प्रयोजनवाद स्वयं में तत्व-दर्शन का सिद्धान्त नहीं और न यह वस्तुओं के सत्य को निर्धारित करने के लिये को प्रयास है। यह केवल कठिन शब्दों और अमूर्त धारणाओं के अर्थ को निश्चित करने की विधि है।’’

2. ज्ञान शास्त्र में प्रयोजनवाद -

ज्ञान अनुभव में निहित है। अनुभव तात्कालिक या मध्यस्थ हो सकता है। तात्कालिक अनुभव, अनुभूति की वस्तु है। तात्कालिक अनुभव मनुष्य तथा उसके मन की अपने वातावरण के प्रति की जाने वाली पारस्परिक क्रिया है। इसके लिये बुद्धि के प्रयोग की आवश्यकता है क्योंकि, बुद्धि के द्वारा ही इसकी दिणा का निर्धारण किया जाता है। प्रयोजनवादी प्रयोगात्मक विधि को ज्ञान प्राप्ति के साधन मानते हैं उन्होंने इस विधि के पांच पद या स्तर निर्धारित किये हैं। क्रिया परिस्थिति निर्माण, समस्या, सूचना या प्रदत्त, परिकल्पना या सम्भव समाध् ाान, परीक्षण एवं प्रयोग। 
डी0वी0 का कथन है- ‘‘जो परिपकल्पना व्यावहारिक रूप में कार्य करती है, वह सत्य है, जिसका प्रयोग उन वास्तविक और पूर्वअनुमानित वांछित तथ्यों के संकलन के लिये किया जाता है, जिनकी अपने परिणामों द्वारा पुष्टि होती है।’’

3. मूल्य मीमासां में प्रयोजनवाद

नैतिक मूल्य मानव एव समाज के मध् य होने वाली आदान-प्रदान की प्रक्रिया का प्रतिफल है। अच्छा वह है जो सर्वोत्तम ढंग से अनिण्चित परिस्थितियों का समाधान करती है। प्रयोजनवादी-समस्याओं के समाधान में बुद्धि के प्रयोग की अच्छा या सद् मानते हैं।

सुन्दर क्या है? इस सन्दर्भ में प्रयोजनवादी के अनुसार सुन्दर वहीं है जिसे हम अपने अनुभव से सुन्दर मानते हैं। कला की जो कृति हमें अपनी ओर आकृष्ट कर सकती है और गहन रूप से अनुभूति करने के लिये तत्पर बना सकती है, वही सुन्दर है।

धर्म क्या है? इस सन्दर्भ में डी0वी0 ने लिखा है कि ‘‘धर्म किसी बात की स्वीकृति है जो पृथक है और जिसका स्वयं के द्वारा अस्तित्व है। धार्मिक के अर्थ को स्पष्ट करते हुये डी0वी0 ने लिखा है कि इसके अन्तर्गत वे दृष्टिकोण आते हैं जो किसी वस्तु तथा किसी निर्धारित साध् य या आदर्श के प्रति बनाये जा सकते है।

श्वर क्या है? इस सन्दर्भ में डी0वी0 ने लिखा है कि श्वर आदर्श तथा वास्तविकता के मध्य सक्रिय सम्बंध है।

प्रयोजनवाद के विभिन्न सम्प्रदाय

1. पियर्स का व्यवहारवाद

अर्थ क्रियावाद अथवा प्रयोजनवाद शब्द का पय्र ागे सर्वप्रथम चाल्र्स सैण्डर्स पियर्स की पुस्तक में मिलता है। पियर्स ने तार्किक एवं दार्शनिक दृष्टि से प्रतीकों की व्याख्या की। पियर्स के मतानुसार को अभिधारणा अन्तिम नहीं है उसका अर्थ उसके प्रभाव से निर्धारित किया जाता है। फलत: वास्तविक व्यवहार में जो प्रत्यय अथवा अभिधारणायें एक-दूसरे से सम्बद्ध होती है, उनके इस पारस्परिक सम्बंध को उचित अर्थ में देखना ही उन्हें सीखना है। 

संक्षेप में पियर्स यह कहना चाहता है कि सत्य सम्बंधी सभी अभिधारणायें अस्थायी हैं उनमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, तथा व्यवहार के साथ उनके अर्थ बदलते रहते हैं।

2. विलियम जेम्स का अनुभववाद या फलानुमेय प्राण्यवाद

पियर्स के पग्े्रमेिटसिज्म को जेम्स ने शिष्य बनकर प्रेग्मेटिज्म संज्ञा प्रदान कर उसे क्रमबद्ध दर्शन का रूप प्रदान किया। जेम्स ने पियर्स का इस विषय में अनुमोदन किया कि अर्थ-क्रियावादी विधि बिना पूर्व-निर्धारित उत्तरों के प्रण्नों का हल ढूढने का प्रयत्न करती है। जेम्स के अनुसार विचार का प्रयोजन मानवीय रूचियों को सन्तुष्टि करना है। विचार अनुभव में अन्तर्निहित होता है। और अनुभव से परे को विचार नहीं हेाता। अनुभव सब कुछ है और जीवन के सभी मूल्य अनुभव के ही उद्भूत हेाते हैं सत्य निरपेक्ष नहीं है, अपितु अनुभवाश्रित है। सत्य का मूल्य व्यावहारिक है। चिरन्तन अपरिवर्तित सत्य को जेम्स स्वीकार नहीं करता। सत्य की प्रकृति के सम्बध में उसकी मान्यता है सत्य अनेक है जो निर्मित होते है। जेम्स जगत को पूर्ण नही मानते।

3. जान डी0वी0 के करणवाद प्रयोगवाद तथा पुनर्रचनावाद

शिक्षा की दृष्टि से डी0वी0 के करणवाद का बड़ा महत्व है इसने शिक्षा में क्रांति दी। यह व्यवहारवाद करणवाद के रूप में इसीलिये प्रसिद्ध हुआ क्येांकि इनके मतानुसार मस्तिष्क ज्ञान उपकरण के रूप में प्रयुक्त होते है वे अपने आप में साध्य नहीं है। उनके मतानुसार मस्तिष्क तथा बुद्धि का विकास प्राकृतिक ढंग से हुआ। जीवन के विविध सामाजिक परिस्थितियों का सामना करने के लिये मनुष्य को जो प्रक्रियायें करनी पड़ी उनके उप-उत्पाद्य के रूप से इसका विकास हुआ। 

डी0वी0 के अनुसार ज्ञान मस्तिष्क के परे नहीं है विचार मस्तिष्क की क्रिया मात्र है। डी0वी0 का दूसरा प्रमुख विचार प्रयोगवाद का है। डी0वी0 ने प्रयोगात्मक विक्रिा को जो वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रयुक्त होती है, मानवीय सामाजिक समस्याओं का हल करने के लिये उपयुक्त समझा। डी0वी0 के अनुसार हमारी चिन्तन प्रक्रिया में वे सभी चरण होते हैं जो वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रयुक्त होते है। यदि हमे अपने अनुभवों का लाभ प्रभावी ढंग से लेना है, तो प्रयोगात्मक विधि से करे। 

डी0वी0 प्रधानतया शिक्षा दार्शनिक था उसके अनुसार शिक्षा अनुभवों की पुनर्रचना मानी जाती है। इसी आधार पर उनके दर्शन को पुनर्रचनावाद भी कहा जाता है।

4. किलपैट्रिक का  प्रयोजनवाद

‘‘शिक्षा की दृष्टि से एक आरै महत्वपूर्ण नाम किलपैट्रिक का लिया जाता है। जिसने डी0वी0 की समस्या हल विधि या वैज्ञानिक विधि को प्रोजेक्ट प्रणाली के रूप में विकसित किया। किलपैट्रिक ने गैलिलियों द्वारा स्थापित वैज्ञानिक प्रतिमानों द्वारा विश्व की व्याख्या करने का प्रयत्न किया। इनके अनुसार मानवीय मूल्यों अनुभवों की प्रमुख उपलब्धि नैतिक मूल्य है। उसके अनुसार दर्शन जीवन के संघर्षत्मिक मूल्यों का समीक्षात्मक अध्ययन है। दर्शन का काम यह पता लगाना है कि संघर्षों के बीच जीवन कैसे जिया जाय। 

डी0वी0 के समान किलपैट्रिक की भी यही मान्यता है कि नैतिकता सामाजिक हेाती है।
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Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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