सामाजिक विकास की अवधारणा एवं विशेषताएँ

अनुक्रम
सामाजिक संरचना के उन विभिन्न पहलुओं और सामाजिक कारकों का अध्ययन है जो समाज के त्रीव विकास में बाधा उत्पन्न करते है। इसका उद्देश्य किसी समुदाय के समक्ष उस आर्दश प्रारूप को भी प्रस्तुत करना है जो उस समुदाय के लोगों को विकास की ओर अग्रसर कर सके। जब से विभिन्न देशों में, विशेषत: तृतीय विश्व के देशों में, नियोजित आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई तब से यह आवश्यकता महसूस की ग कि इन परिवर्तनों के सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन किया जाए। समूह के आकार में वृद्धि, अर्थव्यवस्था में परिवर्तन, अस्थिर जीवन में स्थिर जीवन का प्रारम्भ, सामाजिक संरचना का रूपान्तरण, धार्मिक विश्वासों एवं क्रियाओं का महत्व, विज्ञान का विकास, नवीन दर्शन, कुछ ऐसे तत्व है जो इन परिवर्तनों से सम्बन्धित है। 

प्राचीन से वर्तमान समय तक समाज के लगभग प्रत्येक पहलू में परिवर्तन हुए है। यह बात आदिम और आधुनिक दोनों ही समाजों के लिए समान रूप से साथ है। तृतीय विश्व के ऐसे देश जो पूॅजीवादी औद्योगीकरण की संक्रमण प्रक्रिया से गुजर रहे है, के विश्लेषण हेतु सामाजिक सिद्धांतों का प्रयोग ही सामाजिक विकास है। विभिन्न विचारकों का मत है कि ‘विकास’ अपनी अन्तर्निहित विशेषताओं के कारण किसी एक विषय की अध्ययन वस्तु न होकर सभी विषयों की अध्ययन वस्तु है-अध्ययन के दृष्टिकोणों में भले ही अन्तर हो।

सामाजिक विकास की अवधारणा 

विकास ऐसे परिवर्तनों को लक्षित करता है जो प्रगति की ओर उन्मुख रहते है। विकास एक सामाजिक प्रक्रिया है। इसका सम्बन्ध आर्थिक पहलू से अधिक है। लेकिन सामाजिक विकास केवल आर्थिक पहलू से ही सम्बन्धित नहीं है अपितु सांस्कृतिक तत्वों तथा सामाजिक संस्थाओं से भी सम्बन्धित है।

‘सामाजिक विकास’ विकास के समाजशास्त्र का केन्द्र बिन्दु हैं अत: सामाजिक विकास की विवेचना करना आवश्यक है- जे.ए. पान्सीओ ने सामाजिक विकास को परिभाषित करते हुए कहा है कि-’’विकास एक आंशिक अथवा शुद्ध प्रक्रिया है जो आर्थिक पहलू में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। आर्थिक जगत में विकास से तात्पर्य प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से लगाया जाता है। सामाजिक विकास से तात्पर्य जन सम्बन्धों तथा ढॉचे से है जो किसी समाज को इस योग्य बनाती है कि उसके सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।’’ बी.एस.डीसूजा के अनुसार-’’सामाजिक विकास वह प्रक्रिया है जिसके कारण अपेक्षाकृत सरल समाज एक विकसित समाज के रूप में परिवर्तित होता है।’’ सामाजिक विकास का विशेष रूप से कुछ अवधारणाओं से सम्बन्धित है, ये अवधारणाए है-
  1. ऐसे साधन जो एक सरल समाज को जटिल समाज में परिवर्तित कर देते है। 
  2. ऐसे साधन जो सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करते है।
  3. ऐसे सम्बन्ध व ढॉचे जो किसी समाज को अधिकतम आवश्यकता पूर्ति के योग्य 

सामाजिक विकास की विशेषताएँ

  1. सामाजिक विकास सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके फलस्वरूप सरल सामाजिक अवस्था जटिल सामाजिक अवस्था में परिवर्तित हो जाती है।
  2. सामाजिक विकास की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि। 
  3. धर्म के प्रभाव में ह्रास, सामाजिक विकास की एक अन्य विशेषता है। 
  4. सामाजिक विकास में परिवर्तन प्रगति के अनुरूप होता रहता है। 
  5. सामाजिक विकास एक निश्चित दिषा का बोध करता है। 
  6. सामाजिक विकास में ‘निरंतरता’ का विशेष गुण होता है। 
  7. सामाजिक विकास की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसकी अवधारणा सार्वभौमिक है। 
  8. सामाजिक विकास का विषय-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। 
  9. सामाजिक विकास का प्रमुख केन्द्र बिन्दु आर्थिक है जो प्रौद्योगिकीय विकास पर निर्भर है। 
  10. सामाजिक विकास की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसके अन्तर्गत सामाजिक सम्बन्धों का प्रसार होता है। 

सामाजिक विकास की प्रकृति 

समाजिक विकास की प्रकृति वैज्ञानिक है। इसके अन्र्तगत सामाजिक तथ्यों का अध्ययन वैज्ञानिक विधि द्वारा किया जाता है। वैज्ञानिक विधि उस विधि को कहते हैं जिसमें अध्ययन निम्नलिखित सुनिश्चित विधियों से होकर गुजरता है।
  1. समस्या का निरूपण
  2. अवलोकन
  3. तथ्य संग्रह
  4. वर्गीकरण तथा
  5. सामान्यीकरण
उदाहरण के लिए यदि हम इस विकास प्रकिया में जनसहभागिता के महत्व का अध्ययन करना चाहते है। और सामान्यीकरण के सिद्धान्त के रूप में यह स्वीकार करतें हैं कि विकास-प्रकिया में जनसहभागिता महत्त्वपूर्ण हैं तो इस तथ्य की सत्यता को हम उपरोक्त वर्णित चरणों के माध्यम से ही प्रणामित करेंगे।

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  1. सामाजिक विकास का स्वरूप

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