संप्रत्यात्मक विकास क्या है?

सभी प्रकार के सीखने का आधार प्रत्यय है। शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक मनुष्य अनेक नए प्रत्ययों का निर्माण करता है तथा प्रतिदिन के जीवन में पुराने निर्मित प्रत्ययों का प्रयोग करता है। व्यक्ति स्वयं आयु, अनुभव व बुद्धि के आधार पर प्रत्यय निर्माण के अलग-अलग स्तर पर होते है। उदाहरणार्थ - एक चार साल के बच्चे का पौधे का प्रत्यय जीव विज्ञान के शिक्षक के पौधे के प्रत्यय से भिन्न होगा। प्रत्यय चिन्तन प्रक्रिया में सहायक होते है। यह चिन्तन शक्ति बच्चे में अचानक उत्पन्न नही होती है, इसका विकास क्रमिक व नियमित होता है। जन्म के समय बच्चे को अपने वातावरण का ज्ञान नही होता है। धीरे-धीरे परिपक्वता व सीखने के परिणामस्वरूप बच्चा जो देखता है उसे समझना आरम्भ करता है। इस प्रकार उसका वातावरण उसके लिए अर्थपूर्ण हो जाता है। अलग-अलग ज्ञानेन्दियों से प्राप्त अनुभव को एक में बाधने से प्रत्यय बनते है। डी सीको के अनुसार - उत्तेजनाओं का वर्ग जिसमें समान विशेषताएँ हो प्रत्यय कहलाते है। उदाहरणार्थ- वर्ग एक विशेष वस्तु को बताता है जो घेरा तथा त्रिभुज से भिन्न है।

प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया

बच्चे का ज्ञान ऐन्द्रिय ज्ञान से आरम्भ होता है अर्थात वह वातारवरण का अनुभव इन्द्रियों द्वारा ग्रहण करता है। इसी को संवेदना कहते है। संवेदना व्यक्ति के दिमाग की चेतन प्रतिक्रिया है। प्रत्ययों का निर्माण संवेदना से प्रारम्भ होता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है उसका ऐन्द्रिय ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है। बच्चा जो कछ देखता, सुनता व चखता है उसका अर्थ समझने लगता है। इसी को प्रत्यक्षीकरण कहते है। प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया द्वारा विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं को अर्थ मिलता है। संवेदना व प्रत्यक्षीकरण दोनो एक साथ घटित होते है। संवेदना व प्रत्यक्षीकरण के पश्चात प्रत्यय निर्माण होता है। सामान्य प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया के पॉच चरण होते है-
  1. निरीक्षण - एक जाति के सभी पदार्थो का भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में निरीक्षण किया जाता है। उदाहरणार्थ- बच्चा एक विशिष्ट परिस्थिति में विशेष कार को देखता है और उसका चित्र उसके मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। भविष्य में ‘कार’ शब्द सुनकर उसके मस्तिष्क में वही कार की प्रतिमा आ जाती है। यही से प्रत्यय निर्माण का आरम्भ होता है।
  2. तुुलना- उस पदार्थ के विभिन्न गूणों का विश्लेषण करता है तथा विभिन्न पदार्थो से उसकी तुलना समानता व असमानता के आधार पर करता है। जैसे-बच्चा विभिन्न कारों को आपस में तुलना करता है। 
  3. प्रत्याहार- समान गुणों को प्रथक कर लेता है। अथार्त बच्चा सभी प्रकार की कारों में समान गुणों का विश्लेषण व संश्लेषण करके उसमें एकरूपता का ज्ञान प्राप्त करता हैं। 
  4. सामान्यीकरण- समान गुणों का संयाजेन कर लिया जाता है। 
  5. नामकरण - उस पदार्थ को एक विशेष नाम से पुकारा जाता है। नामकरण ऐसे शब्दों द्वारा किया जाता है जो उसके नाम का बोध कराते है। प्रत्यय के विकास के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के अलग-अलग मत है। कुछ के अनुसार प्रत्यय का विकास भाषा विकास से पहले ही हो जाता है। कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भाषा एवं प्रत्यय का विकास साथ-साथ होता है।

बच्चों के प्रत्ययों की विशेषताएँ

बड़ो के प्रत्ययों से बच्चों के प्रत्ययों में अन्तर प्रकार का नही, वरन मात्रा का होता है। क्योकि बच्चों को कम अनुभव व ज्ञान होता है। जैसे-जैसे बच्चे की अवस्था बढ़ती है बच्चों के प्रत्ययों में धीरे-धीरे परिवर्तन आता है। ये परिवर्तन इस प्रकार होता है-
  1. प्रत्यय सरल से जटिल की ओर विकसित होते है। प्रारम्भ में बच्चे सामान्य प्रत्यय रखते है जैसे पहले वे प्रत्येक खाने की चीज को एक समान समझते है बाद में रोटी, दाल, चावल आदि को अलग-अलग समझते है। 
  2. प्रत्यय सामान्य से विशिष्ट की ओर विकसित होते है। सर्वप्रथम बच्चा सम्पूर्ण परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करता है उसके अलग-अलग भागों को नही। जब बच्चा वस्तु को सम्पूर्ण रूप में देखता है तो उसके बारीकियों को इतनी जल्दी नही देख पाता है। Binet ने शब्दों के अर्थ परीक्षण के आधार पर बताया कि बच्चों बडो की प्रतिक्रिया में अन्तर था जैसे- गाउन का अर्थ बच्चों ने बताया “यह एक पोशाक है” जब कि बडे़ बच्चों ने कहा “यह एक रात में पहनने वाली पोशाक है”। 
  3. प्रत्यय संचंयी होते है- कभी-कभी एक प्रत्यय को समझने के लिए दूसरे प्रत्यय का ज्ञान आवश्यक होता है जैसे- रेखागणित में त्रिभुज का ज्ञान होने से पहले भुजा एवं कोण का प्रत्यय स्पष्ट होना चाहिए।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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