शोध प्रारूप क्या है शोध प्रारुप के प्रकार?

‘‘क्या तथ्य इकट्ठा करना है, किनसे, कैसे और कब तक इकट्ठा करना है और प्राप्त तथ्यों को कैसे विश्लेषित करना है कि योजना शोध प्रारूप है।’’ शोध प्रारूप शोध की ऐसी रूपरेखा होती है, जिसे वास्तविक शोध कार्य को प्रारम्भ करने के पूर्व व्यापक रूप से सोच-समझ के बाद तैयार किया जाता है। 

शोध की प्रस्तावित रूपरेखा का निर्धारण इन बिन्दुओं पर विचारो के बाद किया जाता है। 

इसे पी.वी. यंग (1977) ने शोध सम्बन्धित कई प्रश्नों के द्वारा इस तरह स्पष्ट किया है-
  1. अध्ययन किससे सम्बन्धित है और आँकड़ों का प्रकार जिनकी आवश्यकता है? 
  2. अध्ययन क्यों किया जा रहा है?
  3. वांछित आँकड़े कहाँ से मिलेंगे? 
  4. कहाँ या किस क्षेत्र में अध्ययन किया जायेगा? 
  5. कब या कितना समय अध्ययन में सम्मिलित होगा? 
  6. कितनी सामग्री या कितने केसों की आवश्यकता होगी? 
  7. चुनावों के किन आधारों का प्रयोग होगा?
  8. आँकड़ा संकलन की कौन सी प्रविधि का चुनाव किया जायेगा? 
इस तरह, निर्णय लेने में जिन विविध प्रश्नों पर विचार किया जाता है जैसे क्या, कहाँ, कब, कितना, किस साधन से अध्ययन की योजना निर्धारित करते हैं। 

भवन निर्माण से सम्बन्धित एक उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। भवन निर्माण करते समय सामग्री का आर्डर देने या प्रोजेक्ट पूर्ण होने की तिथि निर्धारित करने का को औचित्य नहीं है, जब तक कि हमें यह न मालूम हो कि किस प्रकार का भवन निर्मित होना है। पहला निर्णय यह करना है कि क्या हमें अति ऊँचे कार्यालय भवन की, या मशीनों के निर्माण के लिए एक फैक्टरी की, एक स्कूल, एक आवासीय भवन या एक कई खंडों वाले भवन की आवश्यकता है। जब तक यह नहीं तय हो जाता हम एक योजना का खाका तैयार नहीं कर सकते, कार्य योजना तैयार नहीं कर सकते या सामग्री का आर्डर नहीं दे सकते हैं। इसी तरह से, सामाजिक अनुसन्धान को प्रारूप या अभिकल्प की आवश्यकता होती है या तथ्य संकलन के पूर्व या विश्लेषण शुरू करने के पूर्व एक संरचना की आवश्यकता होती है। एक शोध प्रारूप मात्र एक कार्य योजना (वर्क प्लान) नहीं है। यह प्रोजेक्ट को पूर्ण करने के लिए क्या करना है कि कार्य योजना का विस्तृत विवरण है। 

शोध प्रारूप का प्रकार्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राप्त साक्ष्य हमें प्रारम्भिक प्रश्नों के यथासम्भव सुस्पष्ट उत्तर देने में सक्षम बनाये।

कार्य योजना बनाने के पूर्व या सामग्री आर्डर करने के पूर्व भवन निर्माता को यह निर्धारित करना जरूरी है कि किस प्रकार के भवन की जरूरत है, इसका उपयोग क्या होगा और उसमें रहने वाले लोगों की क्या आवश्यकताएं हैं। कार्य योजना इससे निकलती है। इसी तरह से, सामाजिक अनुसन्धान में निदर्शन, तथ्य संकलन की पद्धति (उदाहरण के लिए प्रश्नावली, अवलोकन, दस्तावेज विश्लेषण) प्रश्नों के प्रारूप के मुद्दे सभी इस विषय के कि ‘मुझे कौन से साक्ष्य इकट्ठे करने हैं’, के सहायक/पूरक होते हैं।

शोध प्रारूप की परिभाषा 

एफ.एन. करलिंगर (1964 : 275): ‘‘शोध प्रारूप अनुसंधान के लिए कल्पित एक योजना, एक संरचना तथा एक प्रणाली है, जिसका एकमात्र प्रयोजन शोध सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना तथा प्रसरणों का नियंत्रण करना होता है।’’

पी.वी. यंग (1977 : 12-13): ‘‘क्या, कहाँ, कब, कितना, किस तरीके से के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए किया गया अध्ययन की योजना या अध्ययन प्रारूप का निर्माण करता है।’’

आर.एल. एकॉफ (1953:5): ‘‘निर्णय लिये जाने वाली परिस्थिति उत्पन्न होने के पहले ही निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रारुप कहते हैं।’’

शोध प्रारुप के प्रकार

1. विवरणात्मक या वर्णनात्मक शोध प्रारूप 

इस प्रारूप में अध्ययन विषय के सम्बन्ध में प्राप्त सभी प्राथमिक तथ्यों का विवरण प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रारूप का मुख्य उद्देश्य अध्ययन की जा रही इकाई, संस्था, घटना, समुदाय या समाज इत्यादि से सम्बन्धित पक्षों का हूबहू वर्णन किया जाता है। यह प्रारूप वैसे तो अत्यन्त सरल लगता है लेकिन यह दृढ़ एवं अलचीला होता है इसमें विशेष सावधानी अपेक्षित होती है। वर्णनात्मक शोध का उद्देश्य मात्र अध्ययन समस्या का विवरण प्रस्तुत करना होता है। इसमें नवीन तथ्यों की खोज या कार्य-कारण व्याख्या पर जोर नहीं दिया जाता है। इस प्रारूप में किसी प्रकार करके प्रयोग भी नहीं किए जाते हैं। इसमें अधिकांशत: सम्भावित निदर्शन का ही प्रयोग किया जाता है। इसमें तथ्यों के विश्लेषण में क्लिष्ट सांख्यिकीय विधियों का भी प्रयोग सामान्यत: नहीं किया जाता है। अध्ययन समस्या के विषय में व्यापक तथ्यों को इकट्ठा किया जाता है, इसलिए ऐसी सतर्कता बरतनी चाहिए कि अनुपयोगी एवं अनावश्यक तथ्यों का संकलन न होने पाये। अध्ययन पूर्ण एवं यथार्थ हो और अध्ययन समस्या का वास्तविक चित्रण हो इसके लिए विश्वसनीय तथ्यों का होना नितान्त आवश्यक है।

इसमें शोध विषय के बारे में शोधकर्ता को अपेक्षाकृत यथेष्ट जानकारी रहती है इसलिए वह शोध संचालन सम्बन्धी निर्णयों को पहले ही निर्धारित कर लेता है। वर्णनात्मक शोध प्रारूप के अलग से को चरण नहीं होते हैं। सामान्यत: सामाजिक अनुसंधान के जो चरण हैं, उन्हीं का इसमें पालन किया जाता है। सम्पूर्ण एकत्रित प्राथमिक सामग्री के आधार पर ही अध्ययन सम्बन्धित निष्कर्ष निकाले जाते हैं एवं आवश्यकतानुसार सामान्यीकरण प्रस्तुत किये जाने का प्रयास किया जाता है।

2. व्याख्यात्मक शोध प्रारूप 

शोध समस्या की कारण सहित व्याख्या करने वाला प्रारूप व्याख्यात्मक शोध प्रारुप कहलाता है। व्याख्यात्मक शोध प्रारुप की प्रकृति प्राकृतिक विज्ञानों की प्रकृति के समान ही होती है, जिसमें किसी भी वस्तु, घटना या परिस्थिति का विश्लेषण ठोस कारणों के आधार पर किया जाता है। सामाजिक तथ्यों की कार्य-कारण व्याख्या यह प्रारूप करता है।

3. अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप

जब सामाजिक अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य अध्ययन समस्या के सम्बन्ध में नवीन तथ्यों को उद्घाटित करना हो तो इस प्रारुप का प्रयोग किया जाता है। इसमें अध्ययन समस्या के वास्तविक कारकों एवं तथ्यों का पता नही होता है। अध्ययन के द्वारा उनका पता लगाया जाता है। इसमें कुछ ‘नया’ खोजा जाता है इसलिए इसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारुप कहा जाता है। इस प्रारूप द्वारा सिद्धान्त का निर्माण होता है। कभी-कभी अन्वेषणात्मक और व्याख्यात्मक शोध प्रारुप को एक ही मान लिया जाता है। इसमें शोधकर्ता को अध्ययन विषय के बारे में सूचना नही रहती है। द्वैतियक स्रोतों के द्वारा भी वह उसके विषय में सीमित ज्ञान ही प्राप्त कर पाता है। अज्ञात तथ्यों की खोज करने के कारण या विषय के सम्बन्ध में अपूर्ण ज्ञान रखने के कारण इस प्रकार के शोध प्रारुप में सामान्यत: उपकल्पनाएँ निर्मित नहीं की जाती हैं। उपकल्पनाओं के स्थान पर शोध प्रश्नों का निर्माण किया जाता है और उन्हीं शोध प्रश्नों के उत्तरों की खोज द्वारा शोध कार्य सम्पन्न किया जाता है। 

विद्वानों ने तो व्याख्यात्मक शोध प्रारुप का उल्लेख तक नहीं किया है। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो यह कहा जा सकता है कि जिस सामाजिक शोध में कार्य- कारण सम्बन्धों पर बल देने की कोशिश की जाती है, वह व्याख्यात्मक शोध प्रारुप के अन्तर्गत आता है, और जिसमें नवीन तथ्यों या कारणों द्वारा विषय को स्पष्ट किया जाता है, उसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारुप के अन्तर्गत रखते हैं।

विलियम जिकमण्ड ने अन्वेषणात्मक शोध के तीन उद्देश्यों का वर्णन किया है 
  1. परिस्थिति का निदान करना 
  2. विकल्पों को छाँटना तथा, 
  3. नये विचारों की खोज करना। 

4. प्रयोगात्मक शोध प्रारुप 

ऐसा शोध प्रारुप जिसमें अध्ययन समस्या के विश्लेषण हेतु किसी न किसी प्रकार का ‘प्रयोग’ समाहित हो, प्रयोगात्मक शोध प्रारुप कहलाता है। यह प्रारुप नियंत्रित स्थिति में जैसे कि प्रयोगशालाओं में ज्यादा उपयुक्त होता है। सामाजिक अध्ययनों में प्रयोगशालाओं का प्रयोग नही होता है। उनमें नियंत्रित समूह और अनियंत्रित समूहों के आधार पर प्रयोग किये जाते हैं। ग्रामीण प्रयोगात्मक अध्ययनों में प्रयोगों के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि संचार माध्यमों का क्या प्रभाव पड़ रहा है, योजनाओं का लाभ लेने वालों और न लेने वालों की सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति में क्या अन्तर आया है, इत्यादि इत्यादि। इसी प्रकार के बहुत से विषयों/प्रभावों को इस प्रारूप के द्वारा स्पष्ट करने की कोशिश की जाती है। परिवत्र्यों के बीच कारणात्मक सम्बन्धों का परीक्षण इसके द्वारा प्रामाणिक तरीके से हो पाता है। इस प्रकार के प्रारुप का प्रयोग ग्रामीण समाजशास्त्र और विशेषकर कृषि सम्बन्धी अध्ययनों में ज्यादा होता है।

सुसन कैरोल (2010:1) ने शोध प्रारुप के आठ प्रकारों का उल्लेख किया है। ये हैं-
  1. ऐतिहासिक शोध प्रारूप (Historical Research Design)
  2. वैयक्तिक और क्षेत्र शोध प्रारूप (Case and Field Research Design) 
  3. विवरणात्मक या सर्वेक्षण शोध प्रारूप (Descriptive or Survey Research Design) 
  4. सह सम्बन्धात्मक या प्रत्याशित शोध प्रारूप (Correlational or Prospective Research Design)
  5. कारणात्मक, तुलनात्मक या एक्स पोस्ट फैक्टों शोध प्रारूप (Causal Comparative or Ex- Post Facto Research Design) 
  6. विकासात्मक या समय श्रेणी शोध प्रारूप (Developmental or Time Series Research Design) 
  7. प्रयोगात्मक शोध प्रारूप (Experimental Research Design)
  8. अर्द्ध प्रयोगात्मक शोध प्रारूप (Quasi Experimental Research Design) 
न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लास वेबसाइट (2010 : 10) में ‘शोध प्रारूप क्या है?’ अध्याय के अन्तर्गत चार प्रकार के शोध प्रारुपों का उल्लेख किया गया है-
  1. प्रयोगात्मक प्रारूप 
  2. वैयक्तिक अध्ययन प्रारूप 
  3. अनुलम्ब प्रारूप प्रारूप 
  4. अनुप्रस्थ काट प्रारुप  प्रारूप
कुछ विद्वानों ने कई प्रकारों का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर शोध प्रारूप को चार प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. विवरणात्मक प्रारुप या वर्णनात्मक शोध प्रारूप। 
  2. व्याख्यात्मक प्रारूप 
  3. अनवेषणात्मक प्रारूप, और 
  4. प्रयोगात्मक प्रारूप 
किसी विशिष्ट प्रारूप का चयन शोध की प्रकृति पर मुख्यत: निर्भर करता है। कौन सी सूचना चाहिए, कितनी विश्वसनीय सूचना चाहिए, प्रारूप की उपयुक्तता क्या है, लागत कितनी आयेगी, इत्यादि कारकों पर भी प्रारूप चयन निर्भर करता है।

शोध प्रारुप के उद्देश्य

मैनहाम (1977 : 142) के अनुसार शोध प्रारुप के पाँच उद्देश्य होते हैं-
  1. अपनी उपकल्पना का समर्थन करने और वैकल्पिक उपकल्पनाओं का खण्डन करने हेतु पर्याप्त साक्ष्य इकट्ठा करना। 
  2. एक ऐसा शोध करना जिसे शोध की विषयवस्तु और शोध कार्यविधि की दृष्टि से दोहराया जा सके। 
  3. परिवत्र्यों के मध्य सहसम्बन्धों को इस तरह से जाँचने में सक्षम होना जिससे सहसम्बन्ध ज्ञात हो सके। 
  4.  एक पूर्ण विकसित शोध परियोजना की भावी योजनाओं को चलाने के लिए एक मार्गदश्र्ाी अध्ययन की आवश्यकता को दिखाना। 
  5. शोध सामग्रियों के चयन की उचित तकनीकों के चुनाव द्वारा समय और साधनों के अपव्यय को रोकने में सक्षम होना। 
एक अन्य विद्वान ने शोध प्रारूप के उद्देश्यों का उल्लेख किया है-
  1. शोध विषय को परिभाषित, स्पष्ट एवं व्याख्या करना। 
  2. दूसरों को शोध क्षेत्र स्पष्ट करना। 
  3. शोध की सीमा एवं परिधि प्रदान करना। 
  4. शोध के सम्पूर्ण परिदृश्य को प्रदान करना।
  5. तरीकों (modes) और परिणामों को बतलाना 
  6. समय और संसाधनों की सुनिश्चितता। 

शोध प्रारूप का महत्व

शोध प्रारूप के महत्व का स्पष्ट अनुमान हो जाता है। ब्लैक और चैम्पियन के शब्दों में कहा जाये तो-
  1. शोध प्रारुप से शोध कार्य को चलाने के लिए एक रूप रेखा तैयार हो जाती है।
  2. शोध प्रारूप से शोध की सीमा और कार्य क्षेत्र परिभाषित होता है। 
  3. शोध प्रारूप से शोधकर्ता को शोध को आगे बढ़ाने वाली प्रक्रिया में आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान लगाने का अवसर प्राप्त होता है।

शोध प्रारूप बनाम तथ्य संकलन की पद्धति

न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लास वेबसाइट (पृ. 10) में ‘शोध प्रारूप क्या है?’ इसके अध्याय के अन्तर्गत शोध प्रारूप और तथ्य संकलन की पद्धतियों में सम्बन्ध को दर्शाया गया- इसी तरह से प्रारुपों को अक्सर गुणात्मक और गणनात्मक शोध पद्वतियों से जोड़ा जाता है। सामाजिक सर्वेक्षण और प्रयोगों को अक्सर गुणात्मक शोध के मुख्य उदाहरणों के रुप में देखा जाता है और उनका मूल्यांकन सांख्यिकीय, गुणात्मक शोध पद्वतियों और विश्लेषण की क्षमता और कमजोरियों के विरुद्ध किया जाता है। दूसरी तरफ वैयक्तिक अध्ययन को अक्सर गुणात्मक शोध के मुख्य उदाहरण के रूप में देखा जाता है- जोकि तथ्यों के विवेचनात्मक उपागम का प्रयोग करता है, ‘चीजों’ का अध्ययन उनके सन्दर्भ के अन्तर्गत करता है और लोग अपनी परिस्थितियों का जो वस्तुगत अर्थ लगाते हैं को विचार करता है। 

किसी विशिष्ट शोध प्रारुप को गुणात्मक या गणनात्मक पद्वति से जोड़ना भ्रान्तिपूर्ण या गलत है। वैयक्तिक अध्ययन प्रारुप की एक सम्मानित हस्ती यिन (1993) ने वैयक्तिक अध्ययन के लिए गुणात्मक/गणनात्मक विभेद की अप्रासंगिकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि वैयक्तिक अध्ययन पद्वति तथ्य संकलन के किसी विशिष्ट स्वरूप को अन्तर्निहित नहीं करती है। वह गुणात्मक या गणनात्मक को भी हो सकती है

न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लास वेबसाइट (पृ. 11.12) में ‘शोध प्रारूप क्या है?’ अध्याय के अन्तर्गत व्याख्या में संशयवादी उपागम को अपनाने की आवश्यकता का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि, ‘‘शोध प्रारुप की आवश्यकता शोध के संशयवादी उपागम के तने और इस दृष्टिकोण से कि वैज्ञानिक ज्ञान हमेशा अस्थायी होता है, से निकलती है। शोध प्रारुप का उद्देश्य शोध के बहु साक्ष्यों की अस्पष्टता को कम करना होता है।’’

हम हमेशा कुछ साक्ष्यों को लगभग सभी सिद्धान्तों के साथ निरन्तर पा सकते हैं। जबकि हमें साक्ष्यों के प्रति संशयपूर्ण होना चाहिए और बजाये उन साक्ष्यों को प्राप्त करना जो हमारे सिद्धान्त के साथ निरन्तर उपलब्ध हों। हमें ऐसे साक्ष्यों को प्राप्त करना चाहिए जो सिद्धान्त के अकाट्य परीक्षण को प्रदान करते हों।

शोध प्रारुप निर्मित करते समय यह आवश्यक है कि हमें आवश्यक साक्ष्यों के प्रकारों को चिन्हित कर लेना चाहिए जिससे कि शोध प्रश्नों का उत्तर विश्वासोंत्पादक हो। इसका तात्पर्य यह है कि हमें मात्र उन साक्ष्यों को इकट्ठा नहीं करना चाहिए जो किसी विशिष्ट सिद्धान्त या व्याख्या के साथ लगातार बने हुए हों। शोध इस प्रकार से संरचित किया जाना चाहिए कि उससे साक्ष्य वैकल्पिक प्रतिद्वन्दी व्याख्या दें और हमें यह चिन्हित करने में सक्षम बनाये कि कौन सी प्रतिस्पर्द्धी व्याख्या आनुभविक रूप से ज्यादा अकाट्य है। इसका यह भी तात्पर्य है कि हमें अपने प्रिय सिद्धान्त के समर्थन वाले साक्ष्यों को ही मात्र नहीं देखना चाहिए। हमें उन साक्ष्यों को भी देखना चाहिए जिनमें यह क्षमता हो कि वे हमारी वरीयतापूर्ण व्याख्या को नकार सकें।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

4 Comments

  1. इस ज्ञानवर्धक लेख के लिए साधुवाद।
    शोध से सम्बंधित अन्य जानकारी हेतु यहाँ भी देखें।
    https://vkmail93.blogspot.com/2017/11/blog-post_19.html?m=1

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