गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नबम्बर, 1917 में म.प्र. के शिवपुरी में हुआ था । इन्होंने बी.ए. तक अध्ययन प्राप्त किया । आर्थिक संकटों के बावजूद इन्होंने अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच एवं वैज्ञानिक उपन्यासों में विशेष रूचि ली । 11 सितम्बर 1964 में मृत्यु हुई ।  13 नवंबर 1917 को ग्वालियर के मुरैना जिले में श्योपुर नामक गाँव में अवतरित ‘मुक्तिबोध’ का मृत्युपर्यंत जिया गया पूरा जीवन साहित्य के लिए अमूल्य निधि बन गया। परदादा ‘वासुदेव’ जलगाँव से ग्वालियर राज्य में बस गये थे। दादा टोंक में दफ़्तरदार थे और अपने फारसी ज्ञान के कारण मुंशी जी के नाम से मशहूर थे। पिता, माधव मुक्तिबोध कई स्थानों पर थानेदार रहकर इंस्पेक्टर पद से रिटायर हुए। 

मुक्तिबोध को दादा, परदादा और पिता पक्ष से फारसी साहित्य एवं अनुशासन प्रियता, न्याय प्रियता की परम्परा मिली थी। माताजी बुंदेलखण्ड की ही ईसागढ़ के एक किसान परिवार की बेटी थीं। हिन्दी वातावरण का इन पर गहरा असर था। “मराठी के ‘हरि नारायण आप्टे’ और हिन्दी के ‘मुंशी प्रेमचंद’ उनके प्रिय लेखक थे, इनके उपन्यास वे आजीवन पढ़ती रहीं। मुक्तिबोध को हिन्दी के प्रति लगन उनकी माँ से प्राप्त हुआ था।” चार भाइयों में इनके अनुज शरच्चन्द मुक्तिबोध मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं।  “पिता के पुलिस सब-इंस्पेक्टर होने के कारण बार-बार बदली होने से मुक्तिबोध की पढ़ाई का सिलसिला टूटता-जुड़ता रहा; फलत: 1930 में उज्जैन में मिडिल परीक्षा में असफलता मिली जिसे कवि अपने जीवन की ‘पहली महत्वपूर्ण घटना’ मानता है।” उज्जैन में ही इनका एक सहपाठी था शान्ताराम, जो गश्त की ड्यूटी पर तैनात हो गया था। 

गजानन उसी के साथ रात को शहर की घुमक्कड़ी को निकल जाते। बीड़ी का चस्का तभी से लगा। रात को सन्नाटा, पुलिस की सीटियाँ, एक अकूत रहस्य का वातावरण। सामन्ती और उसकी आड़ में कहीं छिपा, बन्दूक सँभाले, गोराशाही का आतंक। जुर्मों, भीषण अत्याचारों, जघन्य कृत्यों और सजाओं की कहानियाँ उनकी जिज्ञासा को प्रकट करती। ऐसे वातावरण ने इनके कोरे मन पर प्रश्न की लकीरों से चित्र उकेरना आरम्भ कर दिया। ‘तार सप्तक’ के वक्तव्य में ‘गजानन माधव मुक्तिबोध’ ने लिखा है, “सन् 1935 में (माधव कॉलेज, उज्जैन) साहित्य-लेखन आरम्भ हुआ। 1938 में बी.ए. पास किया; 1939 में विवाह उसके बाद निम्न मध्यवर्गीय निष्क्रिय मास्टरी, जो अब तक है।”


गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय


इंदौर के होल्कर कॉलेज में बी.ए. के दौरान गजानन माधव मुक्तिबोध का परिचय प्रभाकर माचवे से हुआ जो क्रिश्चियन कॉलेज में बी.ए. के छात्र थे। ये गजानन माधव मुक्तिबोध के सहपाठी और साहित्यिक मित्र भी थे, जिनके साथ वे नयी सौन्दर्य संवेदना से भरे हुए साहित्य लोक में विचरण करते थे। गजानन माधव मुक्तिबोध के प्रथम काव्य सोपान में ‘प्रभाकर माचवे’ का मिलना अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुआ। दोनों एक दूसरे की कविता सुनते, आलोचना करते और एक दूसरे की कमियों को दिखाते थे। गजानन माधव मुक्तिबोध के सहपाठी मित्रों में रोमानी कल्पना के कवि ‘वीरेन्द्र कुमार जैन’ और ‘प्रभागचन्द्र शर्मा’ जो ‘कर्मवीर’ में सहायक सम्पादक थे। कविता की ओर रमाशंकर शुक्ल ‘हृदय’ ने गजानन माधव मुक्तिबोध को काफी प्रोत्साहित किया। बीस-इक्कीस वर्ष की आयु में मुक्तिबोध ने दास्तायवस्की, फ्लाबेअर और गोर्की का अध्ययन कर लिया था। मनोविज्ञान, तर्कशास्त्र और दर्शन में इनका मन रमने लगा था। पिताजी चाहते थे मुक्तिबोध एक वकील बनें, खूब पैसे कमायें, बड़े-बड़े मुकदमें लें। लेकिन मुक्तिबोध का मन इसमें नहीं लगा, इन्हें धन की अपेक्षा ज्ञान कमाना अधिक पसंद था। नयी दृष्टि, नया अनुभव और काव्य की विलक्षण अनुभूतियों में रमे रहे। आर्थिक मार को झेलते हुए निरूपाय वे अपनी साहित्यिक दुनिया में मशगूल रहे।

इंदौर में ही गजानन माधव मुक्तिबोध का मिलन शांताबाई से हुआ, छोटा-सा परिचय प्रेम में बदल गया। “गजानन माधव मुक्तिबोध ने बहुत साहस के साथ जातिकुल और सामाजिक वैषम्य के अवरोधों को एक तरफ ठेलकर प्रेम विवाह कर लिया, और स्पष्ट है कि पूरे परिवार एवं सम्बन्धियों का घोर विरोध झेला।” माता-पिता इस रिश्ते से खुश नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि नौकरानी की लड़की से उनका विवाह हो। सन् 1939 की बात है इनका विवाह बहुत ही साधारण तरीके से एक मंदिर में सम्पन्न हुआ। “माता-पिता काफी दिनों तक उनसे क्षुब्ध रहे पारिवारिक वातावरण में एक तनाव आ गया था। उसे दूर करने में गजानन माधव मुक्तिबोध किसी हद तक कामयाब हो सकते थे, लेकिन प्रकटत: उससे असंपृक्त वे अपने चिंतन जगत में डूबे रहे।” 20 अक्टूबर सन् 1945 को लिखे पत्र में नेमिचंद्र जैन को लिखा कि-”मैंने शादी क्या कर ली आजादी का मुहताज हो गया।

सन् 1939 में गजानन माधव मुक्तिबोध के पिता रियासत की नौकरी से अवकाश प्राप्त किये। अवकाश पाते ही पारिवारिक स्थिति में एकाएक भारी परिवर्तन आया। कोतवाली का महलनुमा आवास छूट गया। पूरे परिवार को किराये के छोटे मकान में आ जाना पड़ा। फिर भी मुक्तिबोध आर्थिक मार को झेलते हुए निरूपाय वे अपनी वैचारिक और साहित्यिक दुनिया में मशगूल रहे। मुक्तिबोध का गृहस्थ जीवन उनकी नौकरियों में स्थानान्तरण और पदांतर की घटनाओं से जाना जाता है। समझौता न करने की प्रवृत्ति और र्इमानदारी इन दो प्रकृतियों के कारण गजानन माधव मुक्तिबोध जीवन भर भटकते रहे। 20 वर्ष की उम्र में ही नौकरी करना आरम्भ कर दिये और अगले 20 वर्षों में बड़नगर, उज्जैन, शुजालपुर, कलकत्ता, बम्बर्इ, बंगलौर, इलाहाबाद, जबलपुर और नागपुर आदि स्थानों पर तरह-तरह की नौकरियाँ की। आर्थिक मार और नौकरियों से असंतुष्ट इनका व्यक्तित्व ब्रह्मराक्षस के व्यक्तित्व की भाँति बन गया। गजानन माधव मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के निर्माण में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है।

जुलाई 1938 में बड़नगर में ही एक मिडिल स्कूल में गजानन माधव मुक्तिबोध ने अध्यापन कार्य आरम्भ किया। उन्हें अभी कार्य करते चार माह ही बीते थे कि नवम्बर में डॉ. नारायण विष्णु जोशी, प्रभाकर माचवे से गजानन माधव मुक्तिबोध का परिचय प्राप्त कर उन्हें अपने कार्यों में सहयोग देने के लिए लेने आ पहुँचे। डॉ. नारायण विष्णु जोशी उन दिनों शुजालपुर में शारदा शिक्षा सदन में प्रमुख अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे थे। “गजानन माधव मुक्तिबोध का डॉ. जोशी पर कुछ ऐसा विश्वास हो गया था कि उसी रात अपनी पेटी भर कर उनके साथ शुजालपुर मंडी के लिए चल दिये। लेकिन शुजालपुर में भी स्कूल मैनेजर से ज्यादा दिन तक नहीं बनी और आप इस्तीफा देकर चल दिये।” जीवन भर यही क्रम निरंतर चलता रहा। शुजालपुर मंडी छोड़कर 1939 ई. में उज्जैन के दौलतगंज मिडिल स्कूल में नौकरी कर ली लेकिन साल भर बाद ही अक्टूबर 1941 को डॉ. नारायण विष्णु जोशी के पास चले गये।

शुजालपुर मंडी का शारदा शिक्षा सदन नेमिचंद्र जैन के आने से पहले गांधीवादी आदर्शों के अनुरूप चल रही थी। हालांकि नेमिचंद्र जैन की गांधीवाद में कोई आस्था नहीं थी। “नेमि जी पहले से कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे। अब डॉ. जोशी और मुक्तिबोध भी जुड़ गये थे। उज्जैन से लौटने के बाद इन्होंने 12 मार्च 1943 को पत्र में नेमिचंद्र जैन को लिखा था कि-”मैं फिर से पार्टी सदस्य बना लिया गया हूँ।” नेमिचंद्र जैन के प्रभावस्वरूप डॉ. नारायण विष्णु जोशी और मुक्तिबोध भी माक्र्सवाद के प्रभाव में आ गये। मुक्तिबोध का यह जुड़ाव पार्टी स्तर पर था। कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनना और फिर सदस्यता छोड़ देने का इरादा करना उनकी स्थायी अस्थिरता की मुद्रा थी। कभी वे कहते थे-”मेरा मन तब तक बौद्धिक भूल-भुलैया में कोई रुचि नहीं लेना चाहता जब तक सामने कोई क्रियात्मक लक्ष्य न हो।”

मुक्तिबोध सितम्बर 1942 से उज्जैन के माडेल हाईस्कूल में अध्यापक हो गये। डॉ. प्रभाकर माचवे वहीं माधव कॉलेज में दर्शन के प्राध्यापक थे। 1942 के काल में अगस्त क्रांति और 1943 का बंगाल का अकाल एवं द्वितीय विश्व युद्ध का प्रकोप भी जारी था। इन घटनाओं से भारतीय बौद्धिक जनमानस उद्वेलित हो रहा था। ऐसे समय में मुक्तिबोध ने उज्जैन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की, इसका प्रमुख उद्देश्य था-”छायावाद की क्षयशील भावुकता की जगह नये कवियों और लेखकों में नया यथार्थ बोध उत्पन्न करना।” इस संघ द्वारा परिषदें बुलायी जाती, व्याख्यान मालाओं का आयोजन किया जाता। प्रगतिशील लेखक संघ के अंतर्गत जो पहली परिषद बुलायी गयी इसकी अध्यक्षता ‘जैनेन्द्र कुमार’ ने की। ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी’, ‘अज्ञेय’, ‘राहुल सांकृत्यायन’ तथा ‘पं. माखन लाल चतुर्वेदी’ ने मध्य भारत के इस लेखक वर्ग को प्रोत्साहित करने के लिए अपने संदेश दिये। 1943 में मुक्तिबोध ने इंदौर में फासिस्ट विरोधी लेखक सम्मेलन का आयोजन किया जो राहुल सांकृत्यायन की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। “1944 में भारत सोवियत मंत्री संघ के अधिवेशन में भाग लेने के लिए बम्बई गये। वहाँ इन्होंने ‘लाल सलाम’ शीर्षक कविता लिखी, जो कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक पत्र ‘लोक युद्ध’ के 11 जून 1944 के अंक में प्रकाशित हुई।” उज्जैन में आकर मुक्तिबोध 1942 से 1944 तक वामपंथी विचारधारा से प्रेरित रहे। लेकिन धनाभाव के कारण यहाँ ज्यादा दिन टिक नहीं सके।

1945 में वायुसेना में भर्ती होने के लिए बंगलौर गये लेकिन स्वच्छन्द प्रकृति के होने के कारण इन्हें सैन्य अनुशासन पसन्द नहीं आया। इस प्रकार बंगलौर से पुन: उज्जैन और उज्जैन से बनारस आ गये। सितम्बर 1945 में त्रिलोचन शास्त्री के साथ ‘हंस’ के संपादन कार्य में लग गये। पारिवारिक समस्या यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी। प्रेस का काम घर-गृहस्थी और बीमारी के बाद लेखन, इस प्रकार वे स्वयं को जनता से कटा हुआ अनुभव करते थे। अक्टूबर 1946 तक जबलपुर आ गये। वहीं डी.एन. जैन हाईस्कूल में अध्यापक हो गये।

अक्टूबर 1948 में गजानन माधव मुक्तिबोध नागपुर आ गये। डॉ. प्रभाकर माचवे के प्रयत्न से नागपुर रेडियो-स्टेशन के समाचार विभाग में न्यूज रीडर के रूप में नियुक्ति हो गयी। आगे चलकर रेडियो के अधिकारियों से भी इनकी नहीं निभी और नौकरी छोड़नी पड़ी। नेमिचंद्र जैन को सन् 1956 में पत्र में लिखा कि “All India Radio की यह नौकरी मैं न छोड़ता लेकिन Monthly Contract में भोपाल जाने को मैं तैयार न था। अगर आपको Government Department अथवा University की कोई अच्छी नौकरी दिखाई दे तो मुझे जरूर सूचित कीजिएगा। जैसे मुझे Lecturer की भी तलाश है, लेकिन उसमें पैसे इतने कम मिलते हैं यानी 150+30 कि अब लगता है, इतनी कम तनख्वाह में मैं गतप्राण हो जाऊंगा।”18 असल में नौकरी इनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या थी। 1956 में ही ये ‘नया खून’ अखबार का सम्पादन करने लगे। ‘नया खून’ के लिए उन्होंने खूब काम किया, इस स्थानीय पत्र को वे अखिल भारतीय पत्र बनाना चाहते थे। ‘नया खून’ का कोई निश्चित समय नहीं था, अत: रात की ड्यूटी के अलावा दोपहर में भी अक्सर जाना पड़ता था, वेतन कुल मिलाकर 250 रुपया ही था जिसमें परिवार का पालन मुश्किल था। ‘नया खून’ के बारे में नेमिचंद्र जैन को 1956 में लिखा है-”क्या आपको यह पत्र मिलता है मैं चाहता हूँ आपकी सम्पूर्ण सेवाओं का व्रत उसमें प्रकाशित करवा सकूँ। मेरी इच्छा है कि वह प्रादेशिक क्षेत्र को पार कर एक अखिल भारतीय पत्र हो।”19 यहाँ भी कृष्णानंद सोख्ता से ज्यादा नहीं निभी।

राजनाद गाँव में कॉलेज खुलने पर श्री शरद कोठारी, अटल बिहारी दूबे तथा प्रमोद कुमार वर्मा के सहयोग से जुलाई 1958 से दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में मुक्तिबोध की नियुक्ति हो गयी। राजनाद गाँव में मुक्तिबोध को भाग-दौड़ से निजात मिली और उनके जीवन में एक स्थिरता आई। कई मित्रों के सहयोग से आर्थिक समस्या में भी संतुलन स्थापित हो गया। “राजनाद गाँव लेखन की दृष्टि से वाकई मुक्तिबोध के लिए सर्वाधिक फलप्रद साबित हुआ। एक ईमानदार और परिश्रमी अध्यापक का जीवन बिताते हुए भी उन्होंने कविता और गद्य सबसे ज्यादा यहीं लिखा। यहाँ के वातावरण में शांति और सद्भाव था उसने उन्हें लेखन के मोर्चे पर बहुत सक्रिय कर दिया था।” राजनाद गाँव में ही 1962 में उनके द्वारा लिखित एक पाठ्य पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ जिसका कुछ भाग एक छोटी-सी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ और मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सेकेण्ड्री स्कूल के छात्रों के लिए पाठ्य पुस्तक के रूप में स्वीकृति की गयी। 

कुछ प्रकाशकों द्वारा इस पर सांप्रदायिकता का आक्षेप लगाकर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया गया। इस घटना से मुक्तिबोध के भीतर असुरक्षा का भाव जो पहले से मौजूद था और बढ़ गया। “वे निरंतर दु:स्वप्नों से घिरे रहने लगे, जबलपुर में परसार्इ जी के यहाँ एक रात सोये थे तो डरावना स्वप्न देखने के कारण चीखकर चारपाई से फर्श पर गिर पड़े। इसी दौरान उन्होंने अपनी महान कविता ‘अंधेरे में’ को अंतिम रूप प्रदान किया।” मुक्तिबोध का स्वास्थ्य तो 1948 में नागपुर के समय से खराब चल रहा था, चक्कर आते थे, बुखार रहता था। उक्त पुस्तक काण्ड ने उन्हें अंदर से हिला दिया था। उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था फिर भी नियमित कॉलेज जाते थे। 7 फरवरी 1964 को एकाएक गिर पड़े और तभी उन पर पक्षाघात का पहला प्रहार हुआ।

मुक्तिबोध की स्थिति में सुधार होता न देख, उनके साहित्यिक मित्रों, हरिशंकर परसाई, ज्ञानरंजन, प्रमोद वर्मा आदि ने भोपाल ले जाने का निश्चय किया। तभी दिल्ली से साहित्यिक वर्ग का एक तार मध्यप्रदेश सरकार के नाम आया। इस सिफारिश पर भोपाल सरकार ने हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध को दाखिल किया। बाद में 26 जून 1964 को वे दिल्ली लाये गये। इस उपचार व्यवस्था के लिए दिल्ली के युवा रचनाकारों ने प्रधानमंत्री ‘लाल बहादुर शास्त्री’ से अनुरोध किया। जिसे उन्होंने स्वीकार कर मेडिकल इंस्टीट्यूट में चिकित्सा का समुचित प्रबंध किया। इसी दौरान उनकी डायरी तथा कविता संग्रह के प्रकाशन की व्यवस्था हुई। डायरी उन्हें दिखाई तो मुसकुराएँ, आँखों से आँसू बह निकले। 11 सितम्बर 1964 को इंडियन मेडिकल इंस्टीट्यूट के कमरा नं. 208 में 47 वर्ष की आयु में मुक्तिबोध समकालीन कविता के केन्द्र में प्रवेश करते हुए चले गये।

गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ

 इनके पूरे साहित्य को ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के नाम से छ: खण्डों में प्रकाशित किया। जिनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है।
  1. कविता संग्रह-’’चाँद का मुँह टेढ़ा हैं’’ तार सप्तक । 
  2. समीक्षा- एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक डायरी, भारत इतिहास और संस्कृति, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र । 
  3. कहानी संग्रह- काठ का सपना, सतह से उठता आदमी । 
  4. निबन्ध- नये निबन्ध, न कविता का आत्म संघर्ष । 
  5. उपन्यास-विपात्र ।

तारसप्तक : सं. अज्ञेय 

अज्ञेय के संपादकत्व में ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन सन् 1943 में हुआ। ‘तारसप्तक’ में संग्रहित 17 कविताओं को मुक्तिबोध के काव्य प्रयोग का प्रथम चरण माना जाता है। ‘तारसप्तक’ में गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा है-”उन दिनों भी एक मानसिक संघर्ष था। एक ओर हिन्दी का यह नवीन सौन्दर्य काव्य था, तो दूसरी ओर मेरे बाल मन पर मराठी साहित्य के अधिक मानवतामय उपन्यास लोक का भी तीव्र प्रभाव। .....समय का प्रभाव कहिए या वय की माँग, या दोनों मैंने हिन्दी के सौन्दर्य लोक को ही अपना क्षेत्र चुना, ..... मेरे बाल मन की पहली भूख सौन्दर्य और दूसरी विश्व मानव का सुख-दुख इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी।” हालांकि इनकी प्रारंभिक रचनाओं पर छायावादी काव्य परम्परा का प्रभाव दिखाई देता है, लेकिन 1940 के काल तक इनकी कविता छायावादी कल्पना लोक से उतर कर वास्तविक धरातल पर विचरण करने लगी है।

‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’

चाँद का मुँह टेढ़ा है
चाँद का मुँह टेढ़ा है

सन् 1964 में प्रकाशित मुक्तिबोध का यह प्रथम स्वतंत्र संकलन है। इसमें कुल 28 कविताएं हैं। ये कविताएं ‘तारसप्तक’ से ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के प्रकाशन समय के बीच की जटिलता और विषमता की परिचायक हैं। ‘अंधेरे’ के माध्यम से मुक्तिबोध ने समाज और युग के विभिन्न संदर्भों को रेखांकित किया है। इन कविताओं में एक विचित्र रहस्यमयता और क्लिष्टता परिलक्षित होती है। इस संग्रह की प्रमुख कविताएं हैं-’भूल गलती’, ‘एक अंतर्कथा’, ‘चकमक की चिनगारियां’, ‘एक स्वप्न कथा’, ‘चम्बल की घाटी में’, ‘अंत:करण का आयतन’, ‘इस चौड़े ऊँचे टीले पर’, ‘ओकाव्यात्मन: फणिधर’, ‘मुझे याद आते हैं’, ‘जब प्रश्न चिन्ह बौखला उठे’ और ‘अंधेरे में’। इस संग्रह की तीन सबसे प्रसिद्ध और लम्बी कविताएं हैं-’ब्रह्मराक्षस’, ‘दिमागी गुहाँधकार का ओरांग उटांग’ और ‘अंधेरे में’। यह काव्य संग्रह मुक्तिबोध के दिवंगत होने के बाद प्रकाशित हुआ। कविताओं का संकलन श्रीकांत वर्मा ने किया। इन्होंने लिखा है-”मुक्तिबोध यदि स्वस्थ होते तो पता नहीं अपनी कविताओं का संकलन किस प्रकार करते। शायद उन्होंने अपनी कविताएं अधिक विवेक और परख के साथ चुनी होती।” ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ संकलन की पहली कविता ‘भूल गलती’ है। यह कविता प्रतीकात्मक शैली में लिखी गयी है। 

‘भूरि भूरि खाक धूल’

‘मुक्तिबोध’ की कविताओं का दूसरा संकलन ‘भूरि भूरि खाक धूल’ है जिसमें उनकी सन् 1949 से लेकर 1963-64 तक की रचनाओं का संकलन है। 47 कविताओं को लेकर अपने कलेवर में समेटे हुए यह संकलन मुक्तिबोध के काव्य का सम्पूर्ण साक्षात्कार प्रस्तुत करता है। इस संकलन में, शब्दों का अर्थ जब ‘बारह बजे रात के’, ‘मीठा बेर’, ‘आज जो चमकदार प्रज्ज्वलित’, ‘इसी बैलगाड़ी को’, ‘ओ अप्रस्तुत श्रोता’, ‘भविष्य धारा’ आदि प्रमुख रचनाएँ हैं। यह संकलन मुक्तिबोध के चिंतन की व्यापकता और सर्जनता कौशल को स्पष्ट करता है। इसमें मुक्तिबोध के स्वप्न चित्रों को उजागर किया गया है। ये स्वप्न चित्र ही मुक्तिबोध की अभिव्यक्ति के प्रमुख साधन है। जनता के संवेदनात्मक सत्यों के चित्रों को मुक्तिबोध ने छील-छील रख दिया है। ‘भूरि भूरि खाक धूल’ की भूमिका में स्वयं ‘अशोक वाजपेयी’ ने लिखा है-”एक समय कविता में निराला की जो केन्द्रीयता थी वही अब मुक्तिबोध की है अपनी सारी दुरूहता एवं ऊबड़-खाबड़-पन के बावजूद मुक्तिबोध आज की कविता की उग्रता, सामाजिक चेतना, सृजनात्मक साहस और वैचारिक प्रतिश्रुति के उद्गम कवि हैं।”

नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र

इस संग्रह में मुक्तिबोध के 15 निबंध संकलित हैं ये निबंध भिन्न परिवेश और भिन्न रचना कालों में लिखे गये हैं इसलिए इन निबंधों में भाषा और कथ्य में गंभीरता की दृष्टि से बहुत अंतर है। इसमें ‘छायावाद’ और ‘नयी कविता’ शीर्षक से दो आलेख हैं। नयी कविता के रूप विधान कथ्य, शिल्प एवं प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए मुक्तिबोध ने ‘नयी कविता की प्रकृति और प्रयोगवाद’, ‘नयी कविता : निस्सहाय नकारात्मकता’ शीर्षक से लेख लिखे हैं। प्रथम निबंध रचनाकार का मानवतावाद प्रौढ़ किस्म का लघु ट्रीटाइज कहा जा सकता है। यद्यपि इन निबंधों में किसी सौंदर्यशास्त्र या शास्त्रीय दृष्टि का निर्वाह पूर्णरूपेण नहीं हुआ है। फिर भी इन निबंधों में व्यापक चिंतन लेखक के गांभीर्य और प्रौढ़ता का परिचय देता है। अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं-”आधुनिक भाव बोध ऊँचा उठाया जा सका और उसके द्वारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक कर्मानुशासन हो सकता तो खंडन कर्म खण्डित हो जायेगा मूर्ति भंजक की स्वमूर्ति का सिर काट लिया जायेगा। और छाती फोड़ दी जायेगी।”

एक साहित्यिक की डायरी

‘एक साहित्यिक की डायरी’ के साहित्य रूप पर मतभेद है, इसमें डायरी और साहित्य दोनो नाम आने से मतभेद उत्पन्न हो जाता है। इसके कर्इ निबंध जबलपुर से प्रकाशित ‘वसुधा’ मासिक पत्रिका में सन् 1957-58 और 60 में प्रकाशित हुए थे। डायरी शब्द से यह भाव उत्पन्न होता है कि मुक्तिबोध की ये डायरियाँ भी महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं। हकीकत यह है कि श्रीकान्त वर्मा ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की भूमिका में लिखा है-”’एक साहित्यिक की डायरी’ के अंतर्गत समय-समय पर मुक्तिबोध को अनेक प्रश्नों पर विचार करने की छूट न केवल संपादन की ओर से बल्कि स्वयं अपनी ओर से भी होती थी। ‘वसुधा’ के पहले नागपुर से ‘नया खून’ साप्ताहिक में वह ‘एक साहित्यिक की डायरी’ स्तम्भ के अन्तयान कभी अर्ध साहित्यिक और कभी गैर-साहित्यिक विषयों पर छोटी-छोटी टिप्पणियाँ लिखा करते थे जो एक अलग संकलन रूप में प्रकाशन के लिए प्रस्तावित है। .......मुक्तिबोध की डायरी उस सत्य की खोज है जिसके आलोक में कवि अपने अनुभव को सार्वभौमिक अर्थ दे देता है।”

वस्तुत: डायरी तेरह निबंधों का संकलन है, यह मुक्तिबोध के साहित्यिक अंतरंगता की संवेदनशीलता का परिचय देती है। ‘तीसरा क्षण’, ‘एक लंबी कविता का अंत’, ‘कलाकार की व्यक्तिगत र्इमानदारी’, ‘हाशिये पर कुछ नोट्स’ और ‘डबरे का सूरज’ आदि इनमें महत्वपूर्ण निबंध हैं। ‘तीसरा क्षण’ निबंध में मुक्तिबोध कला के तीन वर्ग स्वीकारते हैं। “कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते दुखते हुए मूल्यों से पृथक् हो जाना और एक ऐसी फैण्टेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैण्टेसी आँखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैण्टेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरम्भ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमत्ता।”78 डॉ. नामवर सिंह इसे उत्तर शती की जटिल जीवन प्रक्रिया का जीवंत दस्तावेज मानते हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ साहित्य युगीन विषमता और सामाजिक विषमताओं पर अत्यन्त अनिवार्य मान्यताओं का प्रतिपादन करती है।

‘काठ का सपना’ और ‘सतह से उठता हुआ आदमी’ 

 गजानन माधव मुक्तिबोध कृत दो कहानी संग्रह प्रकाशित हैं-’काठ का सपना’ और ‘सतह से उठता हुआ आदमी’। ‘काठ का सपना’ में कुल ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं जो मुक्तिबोध द्वारा समय-समय पर लिखी गयी हैं। इनकी प्रथम कहानी है ‘मानवीय पशुता’ जिसका प्रकाशन सर्वप्रथम ‘वीणा’ में अक्टूबर 1938 में हुआ। कुछ कहानियाँ सन् 1943-44 की तथा कुछ 1962-63 की हैं। “कविताओं की भाँति मुक्तिबोध ने अक्सर एक ही कहानी को भी बार-बार लिखा, इसलिए कर्इ कहानियों के एक से अधिक प्रारूप मिलते हैं। कहीं-कहीं पाण्डुलिपि में उपलब्ध, पत्रिका में प्रकाशित और संकलन में प्रकाशित रूपों में भी अंतर है। ‘एक दाखिल दफ्तर साँझ’ जैसी कहानी का आगे का एक और किन्तु अपूर्ण हिस्सा भी उपलब्ध है जिससे उसके मूल चरित्र की मानसिकता पर कुछ अतिरिक्त प्रकाश पड़ता है।”

इन कहानियों में मुक्तिबोध के सजग चितेरे कलाकार का रूप मुखरित हुआ है तात्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं युगीन परिवेश का चित्रण हुआ है। ‘अँधेरे में’ कहानी युगीन साहित्य को पूरी र्इमानदारी से प्रकट करती है। सही मायने में मुक्तिबोध ब्रह्मराक्षस थे। कहानी ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ इनके अंतर्मन की अभिव्यक्ति है। इस कहानी में एक कलाकार की पूर्ण पराकाष्ठा की अभिव्यक्ति हुर्इ है। ‘काठ का सपना’ और ‘पक्षी और दीमक’ इनके बदलते दौर की कहानियाँ हैं, जिनमें संवेदनशीलता आत्मा का स्वर है। जो सच कहने से कभी परहेज नहीं करती। ‘सतह से उठता हुआ आदमी’ संकलन में मुक्तिबोध की सभी कहानियाँ संकलित हैं।

विपात्र

‘विपात्र‘ मुक्तिबोध का एक लघु उपन्यास है मूलत: यह ‘काठ का सपना’ संग्रह की अंतिम कहानी है जिसे बाद में बढ़ा कर उपन्यास की सीमा में लाया गया। इस उपन्यास की कथा और पात्र दोनो राजनाद गाँव से सम्बन्धित हैं। इसके प्रथम खण्ड में नैतिक संकट की अभिव्यक्ति है तो द्वितीय खण्ड में इसके निदान पर बहस है इसमें मध्यवर्गीय जीवन के तिलिस्म का वर्णन है। यह तिलिस्म एक कालेज है, जिसके कैदी उस कालेज के अध्यापक हैं। उन्हें जिस ऐयार ने कैद कर रखा है वह उस कालेज का प्राचार्य है। जो पूँजीवादी और सामंती व्यवस्था का मिला जुला रूप है, कालेज के अध्यापक प्राचार्य के आतंक से त्रस्त हैं। राव साहब, जगत, भनावत मिश्रा और विपात्र का नायक सभी तिलिस्मी परिस्थितियों में निम्नमध्यवर्गीय चरित्र के एक-एक पहलू के उदाहरण हैं।

संवेदनाओं की अभिव्यक्ति और दिशा का रेखांकन विपात्र की प्रमुख समस्या है। आधुनिक युग के वैषम्य सामाजिक संत्रास तथा बुद्धिजीवियों की स्त्रैणता पर मुक्तिबोध ने विपात्र के माध्यम से प्रहार किया है। इन्होंने लिखा है-”व्यक्तियों की टकराहट बहुत बुरी होती है जहर पचाने से फैलता है, कीचड़ उछालने से। उछालने वाला और झेलने वाले के, दोनो के चेहरे बदसूरत हो जाते हैं। मैं हमेशा दो प्रकार के परस्पर विरोधों में भेद करते आया हूँ। एक वे जो सही हैं-जहाँ वे तेज होते रहने चाहिए; और एक ओ जो गलत हैं-जहाँ वे होने ही नहीं चाहिए।”80 विपात्र मूलत: एक नैतिक संकट की अभिव्यक्ति है- वह आज की दरबारी व्यवस्थापिका में जिम्मेदारियों के दबाव से बुद्धिजीवी वर्ग ने अपनी अस्मिता को गिरवी रखा है; इस प्रकार वह विपात्र बनने को विवश हो गया है। एक स्थान पर मिश्रा, जगत से कहता है कि हमारे बीच कोर्इ झगड़ा नहीं क्योंकि हम दोनों एवी लाडर््स हैं। एबी लार्ड-जिसने संत बने रहने के लिए अपनी जननेन्द्रिय को चाकू से काट दिया था। इसी नैतिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति विपात्र के माध्यम से हुर्इ है जहाँ आधुनिकता के रंगे सियारों को बेनकाब किया गया है।

मुक्तिबोध का कथा साहित्य, उपन्यास और कहानी मात्रा की दृष्टि से तो अल्प है किन्तु जो है उसका हिन्दी कथा साहित्य में इस्पात की भाँति ठोस और सशक्त योगदान है। इस कथा और उपन्यास के साथ गजानन माधव मुक्तिबोध की कुछ अपूर्ण कहानियाँ एवं उपन्यास भी मिलते हैं। अपूर्णता के कारण पुस्तकाकार रूप नहीं दिया जा सका है। मुक्तिबोध रचनावली भाग-तीन में, अधूरी कहानी-एक, अधूरी कहानी-दो करके ऐसे ही अधूरी कहानी : ग्यारह तथा ‘भूमिका : भटनागर’, ‘तिलिस्म’, ‘ना घर तेरा ना घर मेरा’, ‘चिड़िया रैन बसेरा’ और ‘महापुरुष’ नाम से ये कहानियाँ हैं। रचनावली की भूमिका में नेमि बाबू ने लिखा है-”गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं के शीर्षक नहीं दिये हैं। अक्सर उस पत्रिका के सम्पादक के ऊपर छोड़ देते थे, जिसमें वे अपनी रचना छपने के लिए भेजते थे। अनेक कविताओं की भाँति ज्यादातर कहानियों के शीर्षक भी सम्पादकों ने दिये हुए हैं। ......पर अपूर्ण या अप्रकाशित कहानियों में से कुछ के शीर्षक स्वयं मुक्तिबोध ने दिये हैं, कुछ संपादकों ने। सात अपूर्ण कहानियों को अधूरी कहानी 1 से 7 शीर्षक में रखा गया है।” मुक्तिबोध की इन अधूरी कहानियों के साथ एक विखण्डित अप्रकाशित उपन्यास भी मिला है जो दूधनाथ जी द्वारा संपादित पत्रिका ‘पक्षधर’ में प्रकाशित हुआ था। इसकी रचना संभवत: 1948 में हुर्इ थी।

एक पुनर्विचार

मुक्तिबोध की एकमात्र आलोचनात्क कृति ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ है इसका प्रकाशन सन् 1961 में हुआ था। इसके कुछ अंश पहले ही ‘हंस’ और ‘आलोचना’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुके थे। इस रचना में कुल तेरह अध्याय हैं जिसका प्रारम्भ प्रथमत: से और समापन अंतत: से होता है। आलोच्य ग्रंथ में गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा है-”कामायनी का जो विश्लेषण मैंने किया है वह एक ओर प्रसाद जी का युग तो दूसरी ओर उनका व्यक्तित्व; इन दोनो की परस्पर क्रिया प्रतिक्रियाओं के संघनित योग को ध्यान में रखकर ही किया गया है। कामायनी की कथा केवल एक फैण्टेसी है; जिस प्रकार फैण्टेसी में मन का निगूढ़ वृत्तियों का अनुभूत जीवन-समस्याओं का, इच्छित विश्वासों और इच्छित जीवन स्थितियों का प्रक्षेपण होता है, उसी प्रकार कामायनी में भी हुआ है।”

समीक्षा ग्रंथ के माध्यम से गजानन माधव मुक्तिबोध ने एक नवीन दृष्टि दी है, मनु के यथार्थ चरित्र को उद्घाटित किया है। यहाँ मनु मन का प्रतीक नहीं है बल्कि सामंती व्यवस्था का प्रतिनिधि शासक है। मनु के चरित्र पर गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा है-”मनु में वासनाशीलता इतनी प्रधान है कि वह किसी ध्रुव लक्ष्य के प्रति अनुशासित गति से चल नहीं सकता। वह एक भावुक छायावादी अंतर्मुखी व्यक्ति है। जिसमें अहंकार अधिकार भावना तथा मन स्थितियों के अनुसार अपनी गति की दिशा को बदलने की प्रवृत्ति है।” अपने विद्वतापूर्ण विश्लेषण एवं विवेचन द्वारा ‘कामायनी’ को एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महाकाव्य ही नहीं अपितु एक फैण्टेसी कथा प्रधान आधुनिक युग का पूँजीवादी काव्य सिद्ध किया है।

भारत : इतिहास और संस्कृति

साहित्यिक ग्रंथों के साथ-साथ गजानन माधव मुक्तिबोध ने एक इतिहास एवं संस्कृतिपरक पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ लिखा। राष्ट्रवादी एवं मानवतावादी विचारधारा के पोषक होने के कारण सांस्कृतिक जागरण सम्बन्धी इस पुस्तक का विचार गजानन माधव मुक्तिबोध के मन में आया। इस पुस्तक के विषय में रमेश मुक्तिबोध ने लिखा है-”समय-समय पर आये हुए संकटों की उलझनों से छुटकारा पाने के लिए, उनसे उबरने के लिए, यही एक तात्कालिक उपाय उन्हें सूझा होगा।”84 ये संकट और उलझन आर्थिक ही रहे होंगे जिससे निजात पाने के लिए उन्होंने यह पुस्तक लिखी होगी। यह पुस्तक माध्यमिक कक्षाओं मैट्रिक और विश्वविद्यालयी शिक्षा में छात्रों के सामाजिक अध्ययन के लिए लिखी गयी थी। सन् 1962 में पुस्तक लिखी गयी और उसी वर्ष ‘नैतिकता और भद्रता’ के विरुद्ध होने का आरोप लगाकर शासन द्वारा रोक लगा दी गयी। बात यह है कि “यह पुस्तक पाठ्य पुस्तक प्रकाशकों के संयुक्त स्वार्थों के “ाड्यन्त्र के योजनाबद्ध आक्रोश का प्रदेश के कर्इ नगरों में शिकार बनी और अन्तत: एक असाधारण राजपत्र क्रमांक 154, भोपाल, बुधवार, दिनांक 19 सितम्बर, 1962 के द्वारा भारत : इतिहास और संस्कृति जन सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत भद्रता तथा नैतिकता के विरुद्ध घोषित कर दी गयी।”85 इस घटना से मुक्तिबोध काफी क्षुब्ध हुए, वे कहा करते थे “मेरी किसी मौलिक रचना को आपत्तिजनक मानकर सरकार पाबन्दी लागती तो कोर्इ बात भी बनती। किन्तु जो सर्वथा मेरी मौलिक रचना नहीं है वह किस प्रकार आपत्तिजनक घोषित हुर्इ, यह कोर्इ मुझे समझा दे।”

यह कोरा इतिहास की पुस्तक नहीं है यह इतिहास और संस्कृति का मिश्रित रूप है। सामान्यत: इसमें राजाओं, युद्धों और राजनीतिक उलट फेरों के साथ-साथ धर्म, नीति, कला साहित्य, संगीत का भरपूर उल्लेख है क्योंकि संस्कृति समाज की मूल जीवनदायिनी शक्ति है। मानव सभ्यता के आरम्भ से भारतीय स्वाधीनता तक के सभी पहलुओं का उल्लेख किया गया है। प्राचीन भारत के इतिहास के तहत पाषाण युग, सैंधव वैदिक सभ्यता और उत्तरवैदिक युग से जैन, बौद्ध, द्वितीय नगरीकरण, सम्राट अशोक, गुप्त वंश, शुंग सातवाहन, हर्ष तक के काल की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक घटनाओं का बखूबी उल्लेख किया गया है। मध्ययुग में दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल काल, मराठा के इतिहास की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक घटनाओं का राष्ट्रवादी कलेवर में चित्रित किया गया है। इसी प्रकार आधुनिक काल में समुद्रपार के जहाज से लेकर कम्पनी शासन सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन, भारत की पराजय, राष्ट्रवादी चेतना का विकास और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तक और अंत में भारतीय स्वाधीनता का सूर्य और महानों का मन्वन्तर आदि शीर्षकों से पूरे इतिहास को लिखा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी साहित्यकार द्वारा नहीं बल्कि किसी इतिहासज्ञ द्वारा लिखा गया ऐतिहासिक ग्रन्थ है। इसकी भूमिका में गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा है-”यह ग्रंथ मौलिक नहीं है। जहाँ से जो मिला, लिया। दृष्टिकोण यही रखा कि वस्तुस्थिति की समग्रता जो हमारे जीवन को बनाती है, उसे न छोड़ा जाय। उस समग्र ही के दृष्टिकोण से इतिहास-रचना की जाय।”

गजानन माधव मुक्तिबोध का भावपक्ष

इनका काव्य चिन्तन प्रधान हैं । इन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, अपूर्ण व्यक्तित्व, अन्याय एवं शोषण का सदैव विद्रोह किया । मध्यम वर्गीय जीवन का विकास , उच्चवर्गीय समाज द्वारा किये जाने वाले शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक शोषण को जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना बताया व इसे तोड़ने के प्रयास में जीवन में दु:ख व स्वत: दु:ख से व्यथित थे। समाज में व्याप्त अत्याचार, भ्रष्टाचार, अन्याय के लिये पँूजीवादी व्यवस्था को उत्तरदायी मानते हैं ।सत्य एवं यथार्थ की दृष्टि ने उन्हें माक्र्सवादी चेतना प्रदान की । उनके साहित्य में व्यंग्य व तीखे प्रहारों का प्रमुख स्थान हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का कलापक्ष

उन्होंने मुक्तक कविताएँ लिखी हैं । बिम्ब विधान और प्रतीक योजना उनकी प्रमुख शैलियाँ हैं । एक वचन की कविताओं में समास समाहित हैं । इन्होंने परम्परागत प्रतीकों को नये संदर्भ प्रदान किये जो सर्वथा नवीन किन्तु सार्थक अर्थ प्रदान करते हैं । ब्रह्मराक्षस, बरगद, शिशु, लकड़ी का रावण, अँधेरा आदि ऐसे प्रतीक हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध कीभाषा

इनकी भाषा में तत्सम् एवं तद्भव के रूप स्पष्ट हैं । लेकिन अंग्रेजी, फारसी, उर्दू शब्दों का भी प्रयोग हुआ हैं । रहस्यवादी, वैज्ञानिक, शब्दावली का प्रयोग हुआ हैं । भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध के अलंकार

इन्होंने अलंकार की मर्यादा स्वीकार नहीं की । उनके मुक्त छंद में आंतरिक तुकों का एक विशिष्ट स्थान है।

गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य में  स्थान

स्व.मुक्तिबोध जिन मूल्यों के लिये संघर्ष करते रहे, उन मूल्यों की मानवता को सदैव आवश्यकता रहेगी और इस संदर्भ में उनका साहित्य पथ प्रदर्शक रहेगा ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का केन्द्रीय भाव

‘मुझे कदम-कदम पर’ कविता में बताया गया है कि चौराहें मिलना बहुत अच्छा हैं। ये रास्ते में संकट बनकर नही, बल्कि विकल्प बनकर हमारे सामने आते हैं। यानी हमारे समक्ष जितने रास्ते होंगे, उतने ही विकल्प होंगे और हम उनमें से जो भी विकल्प चुनेंगे वह अपने आप में अनेक अन्य विकल्प लिए हुए होगा। अत: जीवन के लिए किसी भी अनुभव को व्यर्थ नही समझना चाहिए। सभी का अपना महत्व होता है। इस कविता में कवि का दृष्टिकोण व्यवहारवादी हैं। अपनी बात अस्पष्ट रूप से कहने के लिए कवि ने प्रतीकों का प्रयोग किया हैं।

संदर्भ - 
  1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ. 431 
  2. हिन्दी साहित्य संवेदना का विकास : डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृ. 193 
  3. आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. बच्चन सिंह, पृ. 227 
  4. नया ज्ञानोदय, सितम्बर 2014, पृ. 8 
  5. मुक्तिबोध का काव्य पूनर्मूल्यांकन-डॉ. शंकर बसंत मुद्गल, पृ. 13 
  6. तारसप्तक वक्तव्य-सं. अज्ञेय, पृ. 19 
  7. नया ज्ञानोदय, सितम्बर 2010, पृ. 10 
  8. मुक्तिबोध : नंदकिशोर नवल, पृ. 17 
  9. मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-6-नेमिचंद्र जैन, पृ. 206 
  10. मुक्तिबोध : नंदकिशोर नवल, पृ. 18 
  11. मुक्तिबोध : कविता और जीवन विवेक, चंद्रकांत देवताले, पृ. 17 
  12. मुक्तिबोध-नंदकिशोर नवल, पृ. 24 
  13. मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-6-नेमिचंद्र जैन, पृ. 311 
  14. मुक्तिबोध : नंदकिशोर नवल, पृ. 41 
  15. मुक्तिबोध काव्य पुनर्मूल्यांकन : डॉ. शंकर वसंत मुदगल, पृ. 24 
  16. एक साहित्यिक की डायरी-मुक्तिबोध, पृ. 49 
  17. कवि मुक्तिबोध एक विश्लेषण : रमेश शर्मा, पृ. 3 
  18. मुक्तिबोध काव्य पुनर्मूल्यांकन : डॉ. शंकर वसंत मुदगल, पृ. 19 
  19. मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-2-नेमिचंद्र जैन, पृ. 349 
  20. मुक्तिबोध काव्य पुनर्मूल्यांकन : डॉ. शंकर वसंत मुदगल, पृ. 20 
  21. तारसप्तक-सं. अज्ञेय, पृ. 28 31- नयी कविता : निराला अश्रेय मुक्तिबोध सं. विद्या सिंह, पृ. 120 
  22. कविता के नये प्रतिमान : भूमिका-डॉ. नामवर सिंह, पृ. 3 
  23. मुक्तिबोध का रचना संसार : डॉ. वर्षा अग्रवाल, पृ. 296 
  24. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास : बच्चन सिंह, पृ. 430 
  25. तारसप्तक : मुक्तिबोध का वक्तव्य, पृ. 21 
  26. मुक्तिबोध की काव्य सृष्टि, सुरेश ऋतुपर्ण, पृ. 13
  27. मुक्तिबोध : नंदकिशोर नवल, पृ. 8 
  28. मुक्तिबोध का रचना संसार : डॉ. वर्षा अग्रवाल, पृ. 297 
  29. मुक्तिबोध का काव्य पुनर्मूल्यांकन : डॉ. शंकर वसंत मुदगल, पृ. 25 
  30. तारसप्तक : वक्तव्य मुक्तिबोध, पृ. 21 

Bandey

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