जॉन डीवी का जीवन परिचय एवं शिक्षा दर्शन

जॉन डीवी का जीवन परिचय 

जॉन डीवी का जन्म 1859 में संयुक्त राज्य अमेरिका में बर्लिंगटन में हुआ था। विद्यालयी शिक्षा बर्लिंगटन के सरकारी विद्यालयों में हुआ। इसके उपरांत जॉन डीवी वर्मोन्ट विश्वविद्यालय में अध्ययन किया । जॉन हापकिन्स विश्वविद्यालय से उन्हें PHD की उपाधि मिली। जॉन डीवी मिनीसोटा विश्वविद्यालय (1888-89), मिशीगन विश्वविद्यालय (1889-94), शिकागो विश्वविद्यालय (1894-1904) में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। 1904 में वे कोलम्बिया में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए और तीस वर्षों तक वे इस पद पर रहें।

डीवी की महानतम रचना डेमोक्रेसी एण्ड एडुकेशन (1916) है जिसमें उन्होंने अपने दर्शन के विभिन्न पक्षों को एक केन्द्र बिन्दु तक पहुँचाया तथा उन सबका एकमात्र उद्देश्य उन्होंने ‘बेहतर पीढ़ी का निर्माण करना’ रखा है। प्रत्येक प्रगतिशील अध्यापक ने उनका बौद्धिक नेतृत्व स्वीकार किया। अमेरिका का शायद ही कोई विद्यालय हो जो डीवी के विचारो से प्रभावित न हुआ हो। उनका कार्यक्षेत्र वस्तुत: सम्पूर्ण विश्व था। 

1919 में उन्होंने जापान का दौरा किया तथा अगले दो वर्ष (मई 1919 से जुलाई 1921) चीन में बिताये- जहाँ वे अध्यापकों एवं छात्रों को शिक्षा में सुधार हेतु लगातार सम्बोधित करते रहे। उन्होंने तुर्की की सरकार को राष्ट्रीय विद्यालयों के पुनर्गठन हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में प्रगतिशील शिक्षा आन्दोलन को चलाने में डीवी की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

जॉन डीवी की शिक्षा संबंधी रचनाएं

जॉन डीवी ने पुस्तकों, शोध पत्रों एवं निबन्धों की रचना की। उनके अनेक कार्य दर्शन से सम्बन्धित है -
  1. दि स्कूल एण्ड सोसाइटी 1899 
  2. दि चाइल्ड एण्ड दि क्यूरीकुलम 1902 
  3. हाउ वी थिन्क 1910
  4. इन्ट्रेस्ट एण्ड एर्फट इन एडुकेशन  1913
  5. स्कूल्स ऑफ टूमॉरो 1915
  6. डेमोक्रेसी एण्ड एडुकेशन 1916 
  7. ह्यूमन नेचर एण्ड कन्डक्ट 1922 
  8. इक्सपीरियन्स एण्ड नेचर 1925
  9. दि क्वेस्ट फॉर सर्टेन्टि: स्टडी ऑफ रिलेशन ऑफ नॉलेज एण्ड एक्शन 1929
  10. सोर्सेज ऑफ साइन्स एडुकेशन 1929

डीवी का शिक्षा दर्शन 

जॉन डिवी आधुनिक युग का एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद तथा विचारक है। जॉन डिवी की शिक्षा की अवधारणा व्यवहारवादी दर्शन पर आधारित है। डिवी का मानना था कि ज्ञान कार्य का परिणामी होता है। उनके अनुसार, परिवर्तन विश्व की वास्तविकता है। शिक्षा को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा, “शिक्षा अनुभवों की सतत् पुनर्संरचना है।” शिक्षा के प्रति उसकी मुख्य अवधारणा उसकी पुस्तक जैसे “डेमोक्रेसी एण्ड एजुकेशन” (1916), “लॉजिक” (1938) तथा “एक्सपेरियन्स एंड एजुकेशन” (1938) में लिखी गई है। उनके अनुसार, “सत्य एक उपकरण है जिसका उपयोग मनुष्य द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए किया जाता है”, जब समस्याएँ बदलती हैं, सत्य बदलता है तथा शाश्वत सत्य नहीं हो सकता है। 

डिवी के अनुसार, परिवर्तन शिक्षा का मौलिक सिद्धान्त है। सत्य व्यक्ति के अनुसार परिवर्तित होता है। अत: व्यक्ति कार्यों एवं प्रयोगों के परिणाम के आधार पर सिद्धान्त को विकसित करता हैं शिक्षा का मुख्य लक्ष्य बच्चे को अपने अनुभवों से जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए सक्षम बनाना है। शिक्षा का लक्ष्य मानव जीवन को समृद्ध एवं सुखी बनाना है। अत: जान डिवी को व्यवहारवादी विचारक कहा जाता है।

शिक्षा का उद्देश्य 

उनके कार्यों में शिक्षा के उद्देश्य स्पष्टत: दिखते हैं-
  1. बच्चे का विकास- शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है बच्चे की शक्ति एवं क्षमता का विकास। प्रत्येक बच्चे की अपनी विशेष क्षमता होती है एक ही प्रकार के विकास का सिद्धान्त लागू करना व्यर्थ है क्योंकि एक बच्चे का विकास दूसरे से अलग होता है। बच्चे की क्षमता के अनुरूप अध्यापक को विकास को दिशा देनी चाहिए। 
  2. प्रजातांत्रिक व्यक्ति एवं समाज का सृजन- प्रयोजनवादी शिक्षा का लक्ष्य है व्यक्ति में प्रजातांत्रिक मूल्य एवं आदर्श को भरना, प्रजातांत्रिक समाज की रचना करना जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्नता न हो। प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हो तथा एक दूसरे का सहयोग करने को तत्पर रहे। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा पूरी करने तथा क्षमता का विकास करने का अवसर मिले। व्यक्तियों के मध्य समानता होनी चाहिए। 
  3. भावी जीवन की तैयारी- प्रयोजनवादी शिक्षा वस्तुत: इस अर्थ में उपयोगी है कि यह व्यक्ति को भावी जीवन हेतु तैयार करता है ताकि वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर आत्मसंतोष प्राप्त कर सके। भावी जीवन की शिक्षा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन हेतु तैयारी करती है। 

पाठ्यचर्चा 

डीवी के अनुसार शिक्षा प्रक्रिया के दो पक्ष हैं- मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक।
  1. मनोवैज्ञानिक पक्ष- बच्चे की रूचि एवं क्षमता के अनुसार पाठ्यचर्या एवं शिक्षण विधि निर्धारित किए जाने चाहिए। बच्चे की रूचि को जानने के उपरांत शिक्षा दी जानी चाहिए। तथा इनका उपयोग विभिन्न स्तरों पर शिक्षा की पाठ्यचर्चा के निर्धारण में किया जाना चाहिए। 
  2. सामाजिक पक्ष- शिक्षा की शुरूआत व्यक्ति द्वारा जाति की सामूहिक चेतना में भाग लेने से होती है। अत: विद्यालय का ऐसा वातावरण होना चाहिए कि बच्चा समूह की सामाजिक चेतना में भाग ले सके। यह उसके व्यवहार में सुधार लाता है और व्यक्तित्व तथा क्षमता में विकास कर उसकी सामाजिक कुशलता बढ़ाता है। 

पाठ्यचर्चा के सिद्धान्त

डीवी ने पाठ्यचर्चा की संरचना के लिए चार सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया:
  1. पाठ्यक्रम को उपयोगिता पर आधारित होनी चाहिए- अर्थात् पाठ्यचर्चा बच्चे के विकास के विभिन्न सोपानों में उसकी रूचि एवं रूझान पर आधारित होना चाहिए। बच्चों में चार प्रमुख रूचि देखी जा सकती हैं- बात करने की इच्छा तथा विचारों का आदान-प्रदान, खोज, रचना तथा कलात्मक अभिव्यक्ति। पाठ्यचर्चा इन चार तत्वों द्वारा निर्धारित होने चाहिए तथा पढ़ना, लिखना, गिनना, मानवीय कौशल, संगीत एवं अन्य कलाओं का अध्यापन करना चाहिए। सारे विषयों को एक साथ नहीं वरन् जब मानसिक विकास के विशेष स्तर पर इसकी आवश्यकता एवं इच्छा जाहिर हो तब पढ़ाया जाना चाहिए। 
  2. पाठ्यचर्चा लचीली होनी चाहिए। ताकि बच्चे की रूचि या रूझान में परिवर्तन को समायोजित किया जा सके
  3. पाठ्यचर्चा को बच्चे के तत्कालिक अनुभवों से जुड़ा होना चाहिए। 
  4. जहाँ तक संभव हो पाठ्यचर्चा में उन्हीं विषयों को रखा जाये जो बच्चे के तत्कालीन विकास की स्थिति में उसके जीवन की प्रक्रिया से जुड़ा है। डीवी वर्तमान में ज्ञान को विभिन्न विषयों में बाँटकर पढ़ाये जाने की विधि के कटु आलोचक थे क्योंकि उनकी दृष्टि में ऐसा विभाजन अप्राकृतिक है। जहाँ तक संभव हो पाठ्यचर्चा के सभी विषय सम्बन्धित या एकीकश्त हो। 

शिक्षण विधि 

जॉन डीवी अपनी शिक्षण विधि में निम्न पक्षों पर जोर दिया।
  1. कर के सीखना- अगर बच्चा स्वयं कर के कोर्इ विषय सीखता है तो वह सीखना अधिक प्रभावशाली होता है। अध्यापक को यह नहीं चाहिए कि जीवन भर जितनी सूचनाओं को उसने संग्रहित किया है वह छात्र के मस्तिष्क में जबरन डाले। वरन् अध्यापक ऐसी परिस्थिति का निर्माण करे कि छात्र स्वयं प्राकृतिक क्षमता एवं गुणों का विकास करने में समर्थ हो। 
  2. एकीकरण- बच्चे के जीवन, उसकी क्रियाओं एवं पढ़े जाने वाले विषयों (विषय वस्तु) में ऐक्य हो। सभी विषयों को उसकी क्रियाओं के इर्द-गिर्द- जिससे कि बच्चे अभ्यस्त हैं पढ़ाया जाना चाहिए। 
  3. बाल केन्द्रित पद्धति- बच्चे की रूचि के अनुसार शिक्षा दी जानी चाहिए। 
  4. योजना पद्धति- डीवी के विचारों के आधार पर बाद में योजना पद्धति का विकास हुआ जिससे छात्रों में उत्साह, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, सहयोग तथा सामाजिक भाव का विकास का होता है।

शिक्षक का दायित्व 

विद्यालय में ऐसे वातावरण का निर्माण करें जिससे बच्चे का सामाजिक व्यक्तित्व विकसित हो सके ताकि वह एक उत्तरदायी, प्रजातांत्रिक नागरिक बन सके। शिक्षक का व्यक्तित्व एवं कार्य प्रजातांत्रिक सिद्धान्तों एवं शिक्षा मनोविज्ञान पर आधारित होना चाहिए। विद्यालय में समानता एवं स्वतंत्रता का महत्व समझाने हेतु अध्यापक को, अपने को विद्यार्थियों से श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए। उसे अपने विचारों, रूचियों एवं प्रकृतियों को विद्यार्थियों पर नहीं लादना चाहिए। उसे बच्चों की रूचियों एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को देखते हुए पाठ्यचर्चा का निर्धारण करना चाहिए। अत: अध्यापक को लगातार बच्चों की भिन्नता का ध्यान रखना चाहिए। अध्यापक बच्चों को ऐसे कार्यों मे लगाए जो उसे सोचने और निदान ढ़ूँढ़ने के लिए प्रेरित करे।

अनुशासन 

अगर बच्चें ऊपर वर्णित योजना के अनुसार कार्य करें तो विद्यालय में अनुशासन बनी रहती है। कठिनार्इ तब होती है जब बाह्य शक्तियों द्वारा बच्चों को अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को प्रकट करने से रोका जाय। बच्चों को ऐसा सामाजिक वातावरण दिया जाना चाहिए जिससे उसमें आत्मअनुशासन की भावना का विकास हो सके ताकि वास्तव में वह एक सामाजिक प्राणी बन सके। शांत वातावरण अच्छे और शीघ्र कार्य के लिए आवश्यक है, पर शांति एक साधन है, साध्य नहीं। बच्चे आपस में झगड़े नहीं पर इसके लिए बच्चों को डाँटना या दंडित करना उचित नहीं है वरन् दायित्व की भावना का विकास कर उसमें अनुशासन का विकास हो सके। इसके लिए अध्यापक को स्वयं उत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार करना होगा। 

सामाजिक कार्यों में सहभागिता शैक्षिक प्रशिक्षण का एक अनिवार्य हिस्सा है। विद्यालय स्वयं एक लघु समाज है। अगर बच्चा विद्यालय के सामाजिक कार्यों में भाग लेता है तो भविष्य में वह सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों में भाग लेने के लिए प्रशिक्षित हो जायेगा। इस तरह से एक प्रौढ़ के रूप में वह एक अनुशासित जीवन जीने का अभ्यस्त हो जायेगा। 

आलोचना

डीवी के विचारों को शिक्षा जगत में उत्साह के साथ स्वीकार किया गया परन्तु साथ ही साथ उसकी आलोचना भी की गई। आलोचना के आधार थे-
  1. सत्य को स्थायी न मानने में कठिनाई- डीवी सत्य को समय एवं स्थान के सापेक्ष परिवर्तनशील मानते हैं। डीवी के अनुसार कोई भी दर्शन सर्वदा सही या सत्य नहीं हो सकता। कुछ विशेष स्थितियों में ही इसकी उपयोगिता होती है। उपयोगिता ही सत्य की अंतिम कसौटी है। 
  2. भौतिकवादी आग्रह- आदर्शवादी दर्शन के विरोध में विकसित होने के कारण आदर्शवदियों आध्यात्मिक आग्रह के विपरीत इनमें भौतिकता के प्रति आग्रह है। 
  3. शिक्षा के किसी भी उद्देश्य की कमी- शिक्षा के द्वारा प्रजातांत्रिक आदर्श की प्राप्ति का उद्देश्य डीवी के शिक्षा सिद्धान्त में अन्तर्निहित है पर वह शिक्षा का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं बताता है। उसके लिए शिक्षा स्वयं जीवन है तथा इसके लिए कोई उद्देश्य निर्धारित करना संभव नहीं है। अधिकांश विद्वान इससे असहमत है। उनके मत में शिक्षा का विकास तभी हो सकता है जब उसका कुछ निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य हो। बच्चे को विद्यालय भेजने का कुछ निश्चित उद्देश्य होता है। यद्यपि विद्यालय कई अर्थों मे समाज के मध्य इसका एक अलग अस्तित्व है। 
  4. व्यक्तिगत भिन्नता पर अत्यधिक जोर- आधुनिक दृष्टिकोण बच्चे की भिन्नता को शिक्षा देने में अत्यधिक महत्वपूर्ण मानता है। बच्चे को उसकी रूचि एवं झुकाव के अनुसार शिक्षा देनी चाहिए। पाठ्यक्रम तथा विधियाँ इसे ध्यान में रखकर तय की जाये। सिद्धान्तत: यह बात बिल्कुल सही प्रतीत होती है पर वास्तविक स्थिति में इसे लागू करने पर कई कठिनाईयाँ सामने आती है। यह लगभग असंभव है कि हर बच्चे के लिए अलग-अगल शिक्षा योजना बनाई जाये। किसी विषय में किसी बच्चे की रूचि बिल्कुल नहीं हो सकती है, फिर भी अध्यापक को पढ़ाना पड़ता है। 

डीवी का आधुनिक शिक्षा पर प्रभाव 

डीवी के विचारों का आधुनिक शिक्षा पर व्यापक प्रभाव है। आधुनिक शिक्षा पर डीवी के प्रभाव को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है -
  1. शिक्षा के उद्देश्य पर प्रभाव- सामाजिक गुणों का विकास भी डीवी के कारण शिक्षा में महत्वपूर्ण माना जाने लगा।
  2.  शिक्षण विधि पर प्रभाव- आधुनिक शिक्षण विधि पर डीवी के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा। शिक्षा बच्चे के अनुभव पर आधारित होनी चाहिए। बच्चे की क्षमता, रूचि एवं रूझान के अनुसार शिक्षण विधि बदलनी चाहिए। इन विचारों ने आधुनिक शिक्षण विधि को प्रभावित किया। ‘एक्टीविटी स्कूल’ इसी का परिणाम है। प्रोजेक्ट विधि भी डीवी के विचारों का ही फल है। दूसरे विद्यालयों में भी बच्चे के मनोविज्ञान पर ध्यान दिया जाने लगा। साथ ही बच्चों में सामाजिक चेतना के विकास का भी प्रयास किया जाता है। 
  3. पाठ्यचर्चा पर प्रभाव- डीवी क अनुसार मानव श्रम को पाठ्यचर्चा में स्थान दिया जाना चाहिए। यह शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष बन गया। विभिन्न तरह के खेलों, वस्तुओं, विभिन्न उपकरणों के उपयोग पर आज अधिक जोर दिया जाता है। पढ़ाये जाने हेतु विषयों के चलन में भी बच्चे की रूचि एवं क्षमता पर अधिक ध्यान दिया जाता है। 
  4. अनुशासन पर प्रभाव- आज बच्चों को विद्यालय में अधिक से अधिक जिम्मेदारियाँ सौपी जाती हैं ताकि उनमें आत्म नियंत्रण और प्रजातांत्रिक नागरिकता के गुणों का विकास हो सके। 
  5. सार्वजनिक शिक्षा- डीवी के आदर्शों एवं विचारों ने सार्वजनिक एवं अनिवार्य शिक्षा की माँग को बल प्रदान किया। हर व्यक्ति को शिक्षा के द्वारा अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त को सर्वत्र मान्यता मिल गयी। 

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