अनुवाद का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र

अनुक्रम
भारत में अनुवाद की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। कहते हैं अनुवाद उतना ही प्राचीन जितनी कि भाषा। आज ‘अनुवाद’ शब्द हमारे लिए कोई नया शब्द नहीं है। विभिन्न भाषायी मंच पर, साहित्यिक पत्रिकाओं में, अखबारों में तथा रोजमर्रा के जीवन में हमें अक्सर ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग देखने-सुनने को मिलता है। साधारणत: एक भाषा-पाठ में निहित अर्थ या संदेश को दूसरे भाषा-पाठ में यथावत् व्यक्त करना अर्थात् एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में कहना अनुवाद है। परंतु यह कार्य उतना आसान नहीं, जितना कहने या सुनने में जान पड़ रहा है। दूसरा, अनुवाद सिद्धांत की चर्चा करना और व्यावहारिक अनुवाद करना-दो भिन्न प्रदेशों से गुजरने जैसा है, फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं कि अनुवाद के सिद्धांत हमें अनुवाद कर्म की जटिलताओं से परिचित कराते हैं। फिर, किसी भी भाषा के साहित्य में और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जितना महत्त्व मूल लेखन का है, उससे कम महत्त्व अनुवाद का नहीं है। लेकिन सहज और संप्रेषणीय अनुवाद मूल लेखन से भी कठिन काम है। भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए अनुवाद की समस्या और भी महत्त्वपूर्ण है। इसकी जटिलता को समझना अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है।

अनुवाद का अर्थ 

अनुवाद एक भाषिक क्रिया है। भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश में अनुवाद का महत्त्व प्राचीन काल से ही स्वीकृत है। आधुनिक युग में जैसे-जैसे स्थान और समय की दूरियाँ कम होती गर्इं वैसे-वैसे द्विभाषिकता की स्थितियों और मात्रा में वृद्धि होती गई और इसके साथ-साथ अनुवाद का महत्त्व भी बढ़ता गया। अन्यान्य भाषा-शिक्षण में अनुवाद विधि का प्रयोग न केवल पश्चिमी देशों में वरन् पूर्वी देशों में भी निरन्तर किया जाता रहा है। बीसवीं शताब्दी में देशों के बीच दूरियाँ कम होने के परिणामस्वरूप विभिन्न वैचारिक धरातलों और आर्थिक, औद्योगिक स्तरों पर पारस्परिक भाषिक विनिमय बढ़ा है और इस विनिमय के साथ-साथ अनुवाद का प्रयोग और अधिक किया जाने लगा है। बहरहाल, अनुवाद की प्रक्रिया, प्रकृति एवं पद्धति को समझने के लिए ‘अनुवाद क्या है ?’ जानना बहुत ज़रूरी है। चर्चा की शुरुआत ‘अनुवाद’ के अर्थ एवं परिभाषा’ से करते हैं।

‘अनुवाद’ का अर्थ- अंग्रेजी में एक कथन है : 'Terms are to be identified before we enter into the argument' इसलिए अनुवाद की चर्चा करने से पहले ‘अनुवाद’ शब्द में निहित अर्थ और मूल अवधारणा से परिचित होना आवश्यक है। ‘अनुवाद’ शब्द संस्कृत का यौगिक शब्द है जो ‘अनु’ उपसर्ग तथा ‘वाद’ के संयोग से बना है। संस्कृत के ‘वद्’ धातु में ‘घञ’ प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है ‘वाद’। ‘वद्’ धातु का अर्थ है ‘बोलना या कहना’ और ‘वाद’ का अर्थ हुआ ‘कहने की क्रिया’ या ‘कही हुई बात’। ‘अनु’ उपसर्ग अनुवर्तिता के अर्थ में व्यवहृत होता है। ‘वाद’ में यह ‘अनु’ उपसर्ग्ा जुड़कर बनने वाला शब्द ‘अनुवाद’ का अर्थ हुआ-’प्राप्त कथन को पुन: कहना’। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि ‘पुन: कथन’ में अर्थ की पुनरावृत्ति होती है, शब्दों की नहीं। हिन्दी में अनुवाद के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले अन्य शब्द हैं : छाया, टीका, उल्था, भाषान्तर आदि। अन्य भारतीय भाषाओं में ‘अनुवाद’ के समानान्तर प्रयोग होने वाले शब्द हैं : भाषान्तर(संस्कृत, कन्नड़, मराठी), तर्जुमा (कश्मीरी, सिंधी, उर्दू), विवर्तन, तज्र्जुमा(मलयालम), मोषिये चण्र्यु(तमिल), अनुवादम्(तेलुगु), अनुवाद (संस्कृत, हिन्दी, असमिया, बांग्ला, कन्नड़, ओड़िआ, गुजराती, पंजाबी, सिंधी)।

प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के समय से ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में भारतीय वाड़्मय में होता आ रहा है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति में गुरु द्वारा उच्चरित मंत्रों को शिष्यों द्वारा दोहराये जाने को ‘अनुवचन’ या ‘अनुवाक्’ कहा जाता था, जो ‘अनुवाद’ के ही पर्याय हैं। महान् वैयाकरण पाणिनी ने अपने ‘अष्टाध्यायी’ के एक सूत्र में अनुवाद शब्द का प्रयोग किया है : ‘अनुवादे चरणानाम्’। ‘अष्टाध्यायी’ को ‘सिद्धान्त कौमुदी’ के रूप में प्रस्तुत करने वाले भट्टोजि दीक्षित ने पाणिनी के सूत्र में प्रयुक्त ‘अनुवाद’ शब्द का अर्थ ‘अवगतार्थस्य प्रतिपादनम्’ अर्थात् ‘ज्ञात तथ्य की प्रस्तुति’ किया है। ‘वात्स्यायन भाष्य’ में ‘प्रयोजनवान् पुन:कथन’ अर्थात् पहले कही गई बात को उद्देश्यपूर्ण ढंग से पुन: कहना ही अनुवाद माना गया है। इस प्रकार भतर्ृहरि ने भी अनुवाद शब्द का प्रयोग दुहराने या पुनर्कथन के अर्थ में किया है : ‘आवृत्तिरनुवादो वा’। ‘शब्दार्थ चिन्तामणि’ में अनुवाद शब्द की दो व्युत्पत्तियाँ दी गई हैं : ‘प्राप्तस्य पुन: कथनम्’ व ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादनम्’। प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘पहले कहे गये अर्थ ग्रहण कर उसको पुन: कहना अनुवाद है’ और द्वितीय व्युत्पत्ति के अनुसार ‘किसी के द्वारा कहे गये को भलीभाँति समझ कर उसका विन्यास करना अनुवाद है। दोनों व्युत्पत्तियों को मिलाकर अगर कहा जाए ‘ज्ञातार्थस्य पुन: कथनम्’, तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो जाती है। इस परिभाषा के अनुसार किसी के कथन के अर्थ को भलीभाँति समझ लेने के उपरान्त उसे फिर से प्रस्तुत करने का नाम अनुवाद है।

संस्कृत में ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग बहुत प्राचीन होते हुए भी हिन्दी में इसका प्रयोग बहुत बाद में हुआ। हिन्दी में आज अनुवाद शब्द का अर्थ उपर्युक्त अर्थों से भिन्न होकर केवल मूल-भाषा के अवतरण में निहित अर्थ या सन्देश की रक्षा करते हुए दूसरी भाषा में प्रतिस्थापन तक सीमित हो गया है। अंग्रेजी विद्वान मोनियर विलियम्स ने सर्वप्रथम अंग्रेजी में ‘translation’ शब्द का प्रयोग किया था। ‘अनुवाद’ के पर्याय के रूप में स्वीकृत अंग्रेजी ‘translation’ शब्द, संस्कृत के ‘अनुवाद’ शब्द की भाँति, लैटिन के ‘trans’ तथा ‘lation’ के संयोग से बना है, जिसका अर्थ है ‘पार ले जाना’-यानी एक स्थान बिन्दु से दूसरे स्थान बिन्दु पर ले जाना। यहाँ एक स्थान बिन्दु ‘स्रोत-भाषा’ या 'Source Language’ है तो दूसरा स्थान बिन्दु ‘लक्ष्य-भाषा’ या ‘Target Language’ है और ले जाने वाली वस्तु ‘मूल या स्रोत-भाषा में निहित अर्थ या संदेश होती है। ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में ‘Translation’ का अर्थ दिया गया है-'a written or spoken rendering of the meaning of a word, speech, book, etc. in an another language.’ ऐसे ही ‘वैब्स्टर डिक्शनरी’ का कहना है-’Translation is a rendering from one language or representational system into another. Translation is an art that involves the recreation of work in another language, for readers with different background.’

बहरहाल, अनुवाद का मूल अर्थ होता है-पूर्व में कथित बात को दोहराना, पुनरुक्ति या अनुवचन जो बाद में पूर्वोक्त निर्देश की व्याख्या, टीका-टिप्पणी करने के लिए प्रयुक्त हुआ। परंतु आज ‘अनुवाद’ शब्द का अर्थ विस्तार होकर एक भाषा-पाठ (स्रोत-भाषा) के निहितार्थ, संदेशों, उसके सामाजिक-सांस्कृतिक तत्त्वों को यथावत् दूसरी भाषा (लक्ष्य-भाषा) में अंतरण करने का पर्याय बन चुका है। चूँकि दो भिन्न-भिन्न भाषाओं की अलग-अलग प्रकृति, संरचना, संस्कृति, समाज, रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेशभूषा होती हैं, अत: एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में यथावत् रूपांतरित करते समय समतुल्य अभिव्यक्ति खोजने में कभी-कभी बहुत कठिनाई होती है। इस दृष्टि से अनुवाद एक चुनौती भरा कार्य प्रतीत होता है जिसके लिए न केवल लक्ष्य-भाषा और स्रोत-भाषा पर अधिकार होना जरूरी है बल्कि अनुद्य सामग्री के विषय और संदर्भ का गहरा ज्ञान भी आवश्यक है। अत: अनुवाद दो भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक सेतु जैसा ही है, जिस पर चलकर दो भिन्न भाषाओं के मध्य स्थित समय तथा दूरी के अंतराल को पार कर भावात्मक एकता स्थापित की जा सकती है। अनुवाद के इस दोहरी क्रिया को निम्नलिखित आरेख से आसानी से समझा जा सकता है :

अनुवाद

अनुवाद की परिभाषा 

साधारणत: अनुवाद कर्म में हम एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में व्यक्त करते हैं। अनुवाद कर्म के मर्मज्ञ विभिन्न मनीषियों द्वारा प्रतिपादित अलग-अलग शब्दों में परिभाषित किए हैं। अनुवाद के पूर्ण स्वरूप को समझने के लिए यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का उल्लेख किया जा रहा है :-

पाश्चात्य चिन्तन 

  1. नाइडा : ‘अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश के लिए लक्ष्य-भाषा में निकटतम सहज समतुल्य सन्देश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।’ 
  2. जॉन कनिंगटन : ‘लेखक ने जो कुछ कहा है, अनुवादक को उसके अनुवाद का प्रयत्न तो करना ही है, जिस ढंग से कहा, उसके निर्वाह का भी प्रयत्न करना चाहिए।’ 
  3. कैटफोड : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापना ही अनुवाद है।’ 1.मूल-भाषा (भाषा) 2. मूल भाषा का अर्थ (संदेश) 3. मूल भाषा की संरचना (प्रकृति) 
  4. सैमुएल जॉनसन : ‘मूल भाषा की पाठ्य सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना अनुवाद है।’ 
  5. फॉरेस्टन : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री के तत्त्वों को दूसरी भाषा में स्थानान्तरित कर देना अनुवाद कहलाता है। यह ध्यातव्य है कि हम तत्त्व या कथ्य को संरचना (रूप) से हमेशा अलग नहीं कर सकते हैं।’ 
  6. हैलिडे : ‘अनुवाद एक सम्बन्ध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं।’ 
  7. न्यूमार्क : ‘अनुवाद एक शिल्प है, जिसमें एक भाषा में व्यक्त सन्देश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।’ 
इस प्रकार नाइडा ने अनुवाद में अर्थ पक्ष तथा शैली पक्ष, दोनों को महत्त्व देने के साथ-साथ दोनों की समतुल्यता पर भी बल दिया है। जहाँ नाइडा ने अनुवाद में मूल-पाठ के शिल्प की तुलना में अर्थ पक्ष के अनुवाद को अधिक महत्त्व दिया है, वहीं कैटफोड अर्थ की तुलना में शिल्प सम्बन्धी तत्त्वों को अधिक महत्त्व देते हैं। सैमुएल जॉनसन ने अनुवाद में भावों की रक्षा की बात कही है, तो न्यूमार्क ने अनुवाद कर्म को शिल्प मानते हुए निहित सन्देश को प्रतिस्थापित करने की बात कही है। कैटफोड ने अनुवाद को पाठ सामग्री के प्रतिस्थापन के रूप में परिभाषित किया है। उनके अनुसार यह प्रतिस्थापन भाषा के विभिन्न स्तरों (स्वन, स्वनिम, लेखिम), भाषा की वर्ण सम्बन्धी इकाइयों (लिपि, वर्णमाला आदि), शब्द तथा संरचना के सभी स्तरों पर होना चाहिए। नाइडा, कैटफोड, न्यूमार्क तथा सैमुएल जॉनसन की उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि अनुवाद एक भाषा पाठ में व्यक्त (निहित) सन्देश को दूसरी भाषा पाठ में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया का परिणाम है। हैलिडे अनुवाद को प्रक्रिया या उसके परिणाम के रूप में न देख कर उसे दो भाषा-पाठों के बीच ऐसे सम्बन्ध के रूप में परिभाषित करते हैं, जो दो भाषाओं के पाठों के मध्य होता है ।

भारतीय चिन्तन 

  1. देवेन्द्रनाथ शर्मा : ‘विचारों को एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपान्तरित करना अनुवाद है।’ 
  2. भोलानाथ : ‘किसी भाषा में प्राप्त सामग्री को दूसरी भाषा में भाषान्तरण करना अनुवाद है, दूसरे शब्दों में एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथा सम्भव और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास ही अनुवाद है।’ 
  3. पट्टनायक : ‘अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्थक अनुभव (अर्थपूर्ण सन्देश या सन्देश का अर्थ) को एक भाषा-समुदाय से दूसरी भाषा-समुदाय में सम्प्रेषित किया जाता है।’ 
  4. विनोद गोदरे : ‘अनुवाद, स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त विचार अथवा व्यक्त अथवा रचना अथवा सूचना साहित्य को यथासम्भव मूल भावना के समानान्तर बोध एवं संप्रेषण के धरातल पर लक्ष्य-भाषा में अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया है।’ 
  5. रीतारानी पालीवाल : ‘स्रोत-भाषा में व्यक्त प्रतीक व्यवस्था को लक्ष्य-भाषा की सहज प्रतीक व्यवस्था में रूपान्तरित करने का कार्य अनुवाद है।’ 
  6. दंगल झाल्टे : ‘स्रोत-भाषा के मूल पाठ के अर्थ को लक्ष्य-भाषा के परिनिष्ठित पाठ के रूप में रूपान्तरण करना अनुवाद है।’ 
  7. बालेन्दु शेखर : अनुवाद एक भाषा समुदाय के विचार और अनुभव सामग्री को दूसरी भाषा समुदाय की शब्दावली में लगभग यथावत् सम्प्रेषित करने की सोद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।’ 
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि अनुवाद की परिकल्पना में स्रोत-भाषा की सामग्री लक्ष्य-भाषा में उसी रूप में, सम्पूर्णता में प्रकट होती है। सामग्री के साथ प्रस्तुति के ढंग में भी समानता हो। मूल-भाषा से लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित करने में स्वाभाविकता का निर्वाह अनिवार्यत: हो। और लक्ष्य-भाषा में व्यक्त विचारों में ऐसी सहजता हो कि वह मूल-भाषा पर आधारित न होकर स्वयं मूल-भाषा होने का एहसास पैदा करे। हम यह भी लक्ष्य करते हैं कि लगभग सभी परिभाषाओं में अनुवाद-प्रक्रिया को शामिल किया गया है। इन सभी परिभाषाओं के आधार पर ‘अनुवाद’ को परिभाषित किया जा सकता है : -‘अनुवाद, मूल-भाषा या स्रोत-भाषा में निहित अर्थ (या सन्देश) व शैली को यथा सम्भव सहज समतुल्य रूप में लक्ष्य-भाषा की प्रकृति व शैली के अनुसार परिवर्तित करने की सोद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।’

अनुवाद के क्षेत्र 

आज की दुनिया में अनुवाद का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जिसमें अनुवाद की उपादेयता को सिद्ध न किया जा सके। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आधुनिक युग के जितने भी क्षेत्र हैं सबके सब अनुवाद के भी क्षेत्र हैं, चाहे न्यायालय हो या कार्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हो या शिक्षा, संचार हो या पत्रकारिता, साहित्य का हो या सांस्कृतिक सम्बन्ध। इन सभी क्षेत्रों में अनुवाद की महत्ता एवं उपादेयता को सहज ही देखा-परखा जा सकता है। चर्चा की शुरुआत न्यायालय क्षेत्र से करते हैं।
  1. न्यायालय : अदालतों की भाषा प्राय: अंग्रेजी में होती है। इनमें मुकद्दमों के लिए आवश्यक कागजात अक्सर प्रादेशिक भाषा में होते हैं, किन्तु पैरवी अंग्रेजी में ही होती है। इस वातावरण में अंग्रेजी और प्रादेशिक भाषा का बारी-बारी से परस्पर अनुवाद किया जाता है। 
  2. सरकारी कार्यालय : आज़ादी से पूर्व हमारे सरकारी कार्यालयों की भाषा अंग्रेजी थी। हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता मिलने के साथ ही सरकारी कार्यालयों के अंग्रेजी दस्तावेजों का हिन्दी अनुवाद ज़रूरी हो गया। इसी के मद्देनज़र सरकारी कार्यालयों में राजभाषा प्रकोष्ठ की स्थापना कर अंगे्रजी दस्तावेज़ों का अनुवाद तेजी से हो रहा है। 
  3. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी : देश-विदेश में हो रहे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के गहन अनुसंधान के क्षेत्र में तो सारा लेखन-कार्य उन्हीं की अपनी भाषा में किया जा रहा है। इस अनुसंधान को विश्व पटल पर रखने के लिए अनुवाद ही एक मात्र साधन है। इसके माध्यम से नई खोजों को आसानी से सबों तक पहुँचाया जा सकता है। इस दृष्टि से शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में अनुवाद बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 
  4. शिक्षा : भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश के शिक्षा-क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका को कौन नकार सकता है। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि शिक्षा का क्षेत्र अनुवाद के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। देश की प्रगति के लिए परिचयात्मक साहित्य, ज्ञानात्मक साहित्य एवं वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद बहुत ज़रूरी है। आधुनिक युग में विज्ञान, समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र, भौतिकी, गणित आदि विषय की पाठ्य-सामग्री अधिकतर अंग्रेजी में लिखी जाती है। हिन्दी प्रदेशों के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए इन सब ज्ञानात्मक अंग्रेजी पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद तो हो ही रहा है, अन्य प्रादेशिक भाषाओं में भी इस ज्ञान-सम्पदा को रूपान्तरित किया जा रहा है।
  5. जनसंचार : जनसंचार के क्षेत्र में अनुवाद का प्रयोग अनिवार्य होता है। इनमें मुख्य हैं समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन। ये अत्यन्त लोकप्रिय हैं और हर भाषा-प्रदेश में इनका प्रचार बढ़ रहा है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में समाचार प्रसारित होते हैं। इनमें प्रतिदिन 22 भाषाओं में खबरें प्रसारित होती हैं। इनकी तैयारी अनुवादकों द्वारा की जाती है। 
  6. साहित्य : साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद वरदान साबित हो चुका है। प्राचीन और आधुनिक साहित्य का परिचय दूरदराज के पाठक अनुवाद के माध्यम से पाते हैं। ‘भारतीय साहित्य’ की परिकल्पना अनुवाद के माध्यम से ही संभव हुई है। विश्व-साहित्य का परिचय भी हम अनुवाद के माध्यम से ही पाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद के कार्य ने साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन को सुगम बना दिया है। विश्व की समृद्ध भाषाओं के साहित्यों का अनुवाद आज हमारे लिए कितना ज़रूरी है कहने या समझाने की आवश्यकता नहीं। 
  7. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध : अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अनुवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों का संवाद मौखिक अनुवादक की सहायता से ही होता है। प्राय: सभी देशों में एक दूसरे देशों के राजदूत रहते हैं और उनके कार्यालय भी होते हैं। राजदूतों को कई भाषाएँ बोलने का अभ्यास कराया जाता है। फिर भी देशों के प्रमुख प्रतिनिधि अपने विचार अपनी ही भाषा में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुवाद की व्यवस्था होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री एवं शान्ति को बरकरार रखने की दृष्टि से अनुवाद की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। 
  8. संस्कृति : अनुवाद को ‘सांस्कृतिक सेतु’ कहा गया है। मानव-मानव को एक दूसरे के निकट लाने में, मानव जीवन को अधिक सुखी और सम्पन्न बनाने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ‘भाषाओं की अनेकता’ मनुष्य को एक दूसरे से अलग ही नहीं करती, उसे कमजोर, ज्ञान की दृष्टि से निर्धन और संवेदन शून्य भी बनाती है। ‘विश्वबंधुत्व की स्थापना’ एवं ‘राष्ट्रीय एकता’ को बरकरार रखने की दृष्टि से अनुवाद एक तरह से सांस्कृतिक सेतु की तरह महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।
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