अनुवाद के प्रकार तथा वर्गीकरण

जब अनुवाद में दो भाषाओं का प्रस्ताव होता है, तो किसी एक ही पद्धति में उसका अनुवाद नहीं हो पाता।
रचना, विषय, अनुवाद सिद्धातों आदि के विभिन्न रूपों के कारण विभिन्न प्रकारों में अनुवाद करना पड़ता है।
अनुवाद प्रकारों के निर्धारण का उद्देश्य अनुवाद प्रणालियों के विविध प्रकारों में एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना
भी है ताकि अनुवाद विषयक चर्चा कर भाषा की व्यापकता को ठीक से समझा जा सके।

अनुवाद के प्रकार

अनुवाद एक प्रायोगिक विधा है। इसकी प्रक्रिया में प्रयोग, प्रयोजन, प्रयोक्ता आदि कई तत्व समाविष्ट होते हैं।
इसी आधार पर अनुवाद को अनेक भेदों-प्रभेदों में विभाजित किया जा सकता है। 

1. प्रक्रिया के आधार पर अनुवाद

प्रक्रिया के आधार पर वर्गीकरण में मूलपाठ की संरचना, बुनावट और उसमें निहित प्रभाव तथा कथ्य को आधार
पर बनाया जाता है। इसके अतंर्गत पाठधर्मी और प्रभावधर्मी अनुवाद आते हैं जो अनुवाद के एक अलग परिप्रेक्ष्य
की निर्मिति करते हैं।

1. पाठधर्मी अनुवाद: इस अनुवाद प्रकार में अनुवादक पाठ को स्वायत्त एवं स्वनिष्ठ मानता है और अनुवाद को पाठ से बाहर जाने की छूट नहीं देता। पाठ की भाषा के विभिन्न स्तरों पर वह पहले अध्ययन-विश्लेषण करता है और तत्पश्चात् उसमें निहित अर्थ को अनूदित पाठ में व्यंजित करने के लिए मूलकृति की संरचना और बुनावट को अपना माॅडल बनाता है। पाठ का यह आयाम मूलतः वाक्य-विन्यास और अर्थविज्ञान पर आधारित है। अनुवाद का यह रूप वैज्ञानिक साहित्यों एवं कानूनी दस्तावजों के साथ-साथ विधि एवं संसदीय साहित्य के अनुवाद में ज्यादा प्रभावशाली है।

2. प्रभावधर्मी अनुवाद: इसमें अनुवादक पाठ को लेखक और पाठक के बीच संबंध स्थापन का एक उपकरण
मानता है। लेखक इस स्थापित संबंध से उत्पन्न प्रभाव का पाठक पर पड़े प्रभाव के आधार पर मूल्यांकन
करता है। यह आयाम वाक्य-विन्यास और अर्थविज्ञान के साथ-साथ भाषा व्यवहार शास्त्रा (प्रैग्मेटिक्स) पर
अपना ध्यान केंद्रित करता है। इससे यह अपेक्षा रखी जाती है कि मूलपाठ पढ़ते समय मूल पाठक के ऊपर
जिस प्रकार का प्रभाव पड़ता है, ठीक उसी प्रकार का प्रभाव लक्ष्यभाषा के पाठकों पर भी पड़ना चाहिए।
सृजनात्मक साहित्य के अनुवाद में इसी प्रकार के अनुवाद की अपेक्षा रहती है।

2. पाठ के आधार पर अनुवाद

अनूदित पाठ कथ्य और अभिव्यक्त कार्य का समन्वित रूप होता है तथापि कहीं कथ्य प्रधान हो जाता है तो कहीं अभिव्यक्ति प्रधान। 

1. पूर्ण अनुवाद: इस अनुवाद प्रकार में स्रोतपाठ का ‘पाठ’ सभी दृष्टियों से लक्ष्यभाषा में पूर्ण रूप से अनूदित किया जाता है अर्थात् प्रत्येक अंश का, यानि शब्द, पदबंध, उपवाक्य, वाक्य, अनुच्छेद आदि को पूर्ण रूप से अनूदित किया जाना पूर्ण अनुवाद कहलाता है।

2. आंशिक अनुवाद: इस प्रकार के अनुवाद में स्रोतभाषा के पाठ के किसी अंश या कुछ अंशों के बिना अनुवाद में स्रोतभाषा के कुछ शब्दों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का अनुवाद नहीं हो पाता। इसी प्रकार आँचलिक शब्दों का भी अनुवाद नहीं हो पाता। इस प्रकार अननुवादनीय होने के कारण उनको छोड़ दिया जाता है। उदाहरण स्वरूप-भारतीय संस्कृति के ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास, ब्राह्मण, ठाकुर आदि का अनुवाद नहीं हो सकता। ग्लास्नोस्त, स्पूतनिक और आर्यभट्ट आदि भी इसी प्रकार के शब्द हैं जिनको यथावत छोड़ दिया जाता है। यहाँ यह ध्यान दिलाना संगत होगा कि प्रभावधर्मी अनुवाद आमतौर पर पूर्ण अनुवाद सापेक्ष होता है जबकि पाठधर्मी अनुवाद आंशिक अनुवाद की ओर अधिक झुका प्रतीत होता है।

1. समग्र अनुवाद: समग्र अनुवाद से अभिप्राय यह है कि स्रोतभाषा पाठ के सभी भाषिक स्तरों को लक्ष्यभाषा के पाठ में प्रतिस्थापित किया जाए। यद्यपि इसमें प्रतिस्थापन का प्रयत्न समग्र रूप में होता है, किंतु यह प्रतिस्थापन समतुल्यता के आधार पर सभी स्तरों पर नहीं हो पाता। इस प्रकार के अनुवाद में समतुल्यता की अनिवार्यता को बनाए रखना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें स्रोतपाठ को सभी स्तरों पर अनूदित करने का प्रयास रहता है।

2. परिसीमित अनुवाद: स्रोतभाषा की पाठ्य सामग्री का समतुल्यता के आधार पर लक्ष्यभाषा की पाठ्य सामग्री में भाषा व्यवस्था के किसी एक स्तर पर प्रतिस्थापन करना परिसीमित अनुवाद है। यह अनुवाद केवल ध्वन्यात्मक या लेखिमिक स्तर पर अथवा व्याकरणिक और शब्दगत स्तरों में से किसी एक स्तर पर होगा। परिसीमित अनुवाद में व्याकरणिक और कोशगत स्तरों का एक साथ अनुवाद करने से ही सार्थक अनुवाद संभव है। परिसीमित अनुवाद के चार भेद होते हैं। जैसे - (i) स्वनिमिक, (ii) लेखिमीय, (iii) व्याकरणिक, और (iv) शब्दकोशीय आदि।

(i) स्वनिमिक अनुवाद - इसका संबंध केवल उच्चारण से है जिसमें मूल भाषा की स्वनिम व्यवस्था के स्थान पर लक्ष्यभाषा की स्वनिम व्यवस्था आ जाती है। परंतु सामान्यतया व्याकरण तथा शब्दकोश अप्रभावित रहते हैं। इसका आधार है- मूलभाषा तथा लक्ष्यभाषा के समान स्वनिक अभिलक्षणों- घोषत्व, प्राणत्व आदि स्वनिमिक इकाइयाँ हैं। मूलभाषा की उन स्वनिमिक इकाइयों के स्थान पर लक्ष्यभाषा की वे स्वनिमिक इकाइयाँ आ जाती हैं जिनमें स्वनिक अभिलक्षणों की अधिकतम समानता मिलती है; जैसे अंग्रेजी ‘फ़’ के स्थान पर मराठी ‘फ़’ (जैसे अंग्रेजी: फ़ार्मेसी- मराठीः फार्मेसी) उर्दू के ज़ के स्थान पर हिंदी में ज का प्रयोग भी ऐसा ही है। स्वनिमिक अनुवाद का स्वेच्छा से व्यवहार करने वालों में उल्लेखनीय हैं अभिनेता और विदूषक लोग। जब वे कला प्रदर्शन के दौरान विदेशी भाषा या बोली की ध्वनियों का सायास अनुकरण (उच्चारण) करते हैं तो वे लक्ष्यभाषा की उच्चारण व्यवस्था को स्वभाषा में ले आते हैं- स्वभाषा में उसका अनुवाद (ट्रांसफर-संक्रमण) कर देते हैं। यही स्थिति विदेशी भाषा सीखने वाले छात्रों के अशुद्ध उच्चारणों में होती है जो वे अनायास तथा असतर्कतापूर्वक करते हैं। दूसरी स्थिति को भाषा-अधिगम के प्रसंग में स्वनिमिक व्याघात कहा जाता है- मातृभाषा की व्यवस्था को अन्य भाषा (लक्ष्यभाषा) की स्वनिम व्यवस्था पर आरोपित किया जाता है। परंतु अनुवाद की शब्दावली में इसे हम अन्य भाषा (लक्ष्यभाषा) से मातृभाषा में स्वनिमिक अनुवाद कहेंगे।

स्वनिमिक अनुवाद के अनेक प्रसंगों में व्याकरण तथा शब्दकोश अप्रभावित रहते हैं। परंतु कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जिनमें लक्ष्यभाषा के ऐसे शब्दों का चयन किया जाता है जिनकी स्वनिक संरचना में मूलभाषा के शब्दों की स्वनिक संरचना से अधिकतम निकटता होती है। ऐसी परिस्थितियाँ है फिल्म डबिंग तथा कविता का अनुवाद। इन स्वनिमिक विशेषताओं को स्वनिमिक अनुवाद के नाम से भी अभिव्यक्ति किया जा सकता है।

(ii) लेखिमीय अनुवाद : इसका संबंध किसी लिपि के चिह्नों (लेखिमों/वर्णों) की केवल आकृति से है, उच्चारण से बिल्कुल नहीं। किसी एक लिपि के किन्हीं चिह्नों को किसी अन्य लिपि के समान या लगभग समान चिह्नों से प्रतिस्थापित करना लेखिमीय अनुवाद कहलाता है। 

(ii) व्याकरणिक अनुवाद : इसमें मूलभाषा पाठ की व्याकरणिक इकाइयों के स्थान पर लक्ष्यभाषा पाठ की समानार्थक व्याकरणिक इकाइयों का प्रयोग किया जाता है। परंतु शब्दकोश मूलभाषा-पाठ का ही रहता है। 

मूल अंग्रेजी: ही विल ट्रैवल बाइ एक्सपे्रस ट्रेन। (Heewill travel by express train)
लक्ष्य हिंदी: वह एक्सपे्रस ट्रेन से ट्रैवल करेगा।

द्विभाषिकता की स्थिति में इसी को ‘कोडमिश्रण’ कहते हैं जो एक सामान्य और वास्तविक स्थिति है।

(iv) शब्दकोशीय अनुवाद : मूलभाषा पाठ के शब्दकोश के स्थान पर लक्ष्यभाषा पाठ का शब्द कोश आ जाता है, परंतु व्याकरण मूल का ही रहता है।

मूल अंग्रेजी: ही विल ट्रैवल बाइ एक्सपे्रस ट्रेन।
लक्ष्य हिंदी: ही विल जा बाई तेज रफ्तार रेलगाड़ी।

यह भी द्विभाषिकता से संबंधित कोडमिश्रण का एक रूप है परंतु इसका व्यवहार अत्यंत सीमित है। महानगरवासी काॅलेज छात्रों की स्लैंग में इसके उदाहरण प्रायः मिल जाते हैं। यथा-वह स्पेशल ट्रेन से जाएगा अथवा वह उस खास गाड़ी से जाएगा वह मैथ का कोर्स ले लेगा। इसमें शब्द प्रति शब्द, शाब्दिक और मुक्त अनुवाद के रूप भी दिखाई देते हैं।

1. शब्द प्रति शब्द अनुवाद : यह अनुवाद शब्द के स्तर पर होता है। इसमें रूपिमिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखा जाता है। इस प्रकार के अनुवाद में शब्द पर ही ध्यान दिया जाता है न कि वाक्य योजना पर। जैसे -

मूलः He is going.
अनुः वह है जा रहा ।
मूलः I am going home.
अनु: मैं हूँ जा रही घर।
मूलः I am going home.
अनुः यदि कस्टम अधिकारी है नहीं सावधान।


चूँकि यह एक प्रकार का अनुवाद ‘शब्द संग्रह’ प्रतीत होता है। अतः यह अनुवाद प्रकार सामान्यतः श्रेष्ठ नहीं माना जाता, क्योंकि भाषा की लघुतम इकाई वाक्य होने से ‘शब्द’ अनेकाधिक अवसरों पर अनूदित होने के पश्चात अपने ‘एकल’ अर्थ से गौण हो जाते हैं। इसे मक्षिका स्थाने मक्षिका निपात भी कहा जाता है।

2. शाब्दिक अनुवाद: मूलपाठ के शब्दक्रम की अपेक्षा इसमें वाक्य संरचना को ध्यान में रखकर अनुवाद किया जाता है। वाक्य-विन्यास के अनुसार मूल पाठ का यथासंभव अनुवाद किया जाता है। इसमें एक भाषा के भावों का दूसरी भाषा में रूपातंरण करते हुए प्रत्येक शब्द, पदबंध, वाक्य, उपवाक्य, आदि का अनुवाद किया जाता है। इसे स्थानापन्न अथवा कभी-कभी कोशगत अनुवाद भी कहा जाता है क्योंकि मूल रचना के प्रत्येक शब्द के लिए शब्द रखना होता है। ज्ञान, विधि, प्रौद्योगिकी तथा गणित से संबंधित सूचनापरक साहित्य में यह पद्धति अपनाई जाती है। इसमें प्रत्येक शब्द और वाक्य का अपना आशय होता है। 

प्राचीन धर्म ग्रंथों के अनुवाद में भी इस विधि का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसमें मूल रचना के शब्दों का विशेष महत्व होता है तथापि साहित्यिक पाठ के लिए यह विधि अधिक उपयोगी नहीं है।

मूल: Burn the lamp
अनु: बत्ती जलाओ
मूल: It is an Intereting point.
अनु: यह एक रोचक बिंदु है।
मूल: There is a custom among’st the Red Indians
अनु: लाल भारतीयों (रेड इंडियन्स) में एक रिवाज है।

3. भावानुवाद: इसमें मूल कृति के शब्द चयन, वाक्य-रचना आदि पर ध्यान न देकर उसके भावार्थ को पकड़ने का प्रयास रहता है। शाब्दिक अनुवाद में अनुवादक का ध्यान मूल सामग्री की भाषा पर होता है लेकिन भावानुवाद में अनुवादक का ध्यान लक्ष्यभाषा की शब्द-रचना, वाक्य विन्यास, मुहावरे-सौष्ठव आदि की योजना पर अधिक होता है। 

कोशगत अनुवाद के विपरीत भावानुवाद में स्रोतभाषा की भाषिक अभिव्यक्तियों की गंध लक्ष्यभाषा में नही आ पाती किन्तु भाव-संवेदना की उसमें अभिव्यिक्ति अवश्य होती है। अति लघुतम एवं संश्लिष्ट अर्थ-छवियों की यहाँ भी प्रधानता रहती है। कभी-कभी इसे sense for sense translation अथवा Free Translation भी कहा जाता है। जोड़ने-छोड़ने की प्रवृत्ति लगातार बनी रहती है। 

अतः अनुवादक को सावधानी बरतनी चाहिए। यदाकदा मूलपाठ का रसास्वादन लक्ष्यपाठ में पाठक नहीं कर पाता है। शेक्सपीयर और प्रेमचंद के नाटकों के संवाद में इस प्रकार के अनुवाद प्रायः देखे गए हैं।

मूल: तरूण तपस्वी-सा वह बैठा।
अनु: He sat envisaging the death of god.
मूल: आपने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी है।
अनु: You are far more experienced than me.
मूल: खून का घूट पीना।
अनु: To suppress one’s furry.


4. छायानुवाद: स्रोतपाठ पढ़ने के बाद अनुवादक जो समझता या अनुभव करता है तथा उसके मन पर उसका जो प्रभाव पड़ता है, उसके संदर्भ में वह मूलपाठ का लक्ष्यभाषा में जिस प्रकार ‘कथ्य’ का रूपांतरण करता है उसे छायानुवाद कहते हैं। इसमें अनुवादक को पूरी छूट होती है कि वह मुख्य भाव को लेकर लक्ष्यपाठ की रचना करंे। इस प्रकार छायानुवाद में मूल की छाया मात्रा होती है। 

अर्थात् उसके कथ्य का अनुकूलन लक्ष्यभाषा की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों के अनुसार किया जाता है। यह एक प्रकार का रूपांतरण है जो देशीयता के पुट से कथ्य को सशक्ता प्रदान करता है।

3. गद्य-पद्य के आधार पर अनुवाद

1. गद्यानुवाद : गद्यानुवाद सामान्यत: गद्य में किए जानेवाले अनुवाद को कहते हैं। किसी भी गद्य रचना का गद्य में ही किया जाने वाला अनुवाद गद्यानुवाद कहलाता है। किन्तु कुछ विशेष कृतियों का पद्य से गद्य में भी अनुवाद किया जाता है। जैसे ‘मेघदूतम्’ का हिन्दी कवि नागार्जुन द्वारा किया गद्यानुवाद।

2. पद्यानुवाद : पद्य का पद्य में ही किया गया अनुवाद पद्यानुवाद की श्रेणी में आता है। दुनिया भर में विभिन्न भाषाओं में लिखे गए काव्यों एवं महाकाव्यों के अनुवादों की संख्या अत्यन्त विशाल है। इलियट के ‘वेस्टलैण्ड’, कालिदास के ‘मेघदूतम्’ एवं ‘कुमारसंभवम्’ तथा टैगोर की ‘गीतांजलि’ का विभिन्न भाषाओं में पद्यानुवाद किया गया है। साधारणत: पद्यानुवाद करते समय स्रोत-भाषा में व्यवहृत छन्दों का ही लक्ष्य-भाषा में व्यवहार किया जाता है।

3. छन्दमुक्तानुवाद : इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक को स्रोत-भाषा में व्यवहार किए गए छन्दों को अपनाने की बाध्यता नहीं होती। अनुवादक विषय के अनुरूप लक्ष्य-भाषा का कोई भी छन्द चुन सकता है। साहित्य में ऐसे अनुवाद विपुल संख्या में उपलब्ध हैं।

4. साहित्य विधा के आधार पर अनुवाद

1. काव्यानुवाद : स्रोत-भाषा में लिखे गए काव्य का लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरण काव्यानुवाद कहलाता है। यह आवश्यकतानुसार गद्य, पद्य एवं मुक्त छन्द में किया जा सकता है। होमर के महाकाव्य ‘इलियड’ एवं कालिदास के ‘मेघदूतम्’ एवं ‘ऋतुसंहार’ इसके उदाहरण हैं।

2. नाट्यानुवाद : किसी भी नाट्य कृति का नाटक के रूप में ही अनुवाद करना नाट्यानुवाद कहलाता है। नाटक रंगमंचीय आवश्यकताओं एवं दर्शकों को ध्यान में रखकर लिखा जाता है। अत: इसके अनुवाद के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। संस्कृत के नाटकों के हिन्दी अनुवाद तथा शेक्सपियर के नाटकों के अन्य भाषाओं में किए गए अनुवाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

3. कथा अनुवाद : कथा अनुवाद के अन्तर्गत कहानियों एवं उपन्यासों का कहानियों एवं उपन्यासों के रूप में ही अनुवाद किया जाता है। विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों एवं कहानियों के अनुवाद काफ़ी प्रचलित एवं लोकप्रिय हैं। मोपासाँ एवं प्रेमचन्द की कहानियों का दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। रूसी उपन्यास ‘माँ’, अंग्रेजी उपन्यास ‘लैडी चैटर्ली का प्रेमी’ तथा हिन्दी के ‘गोदान’, ‘त्यागपत्र‘ तथा ‘नदी के द्वीप’ के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।

4. अन्य साहित्यिक विधाओं के अनुवाद : अन्य साहित्यिक विधाओं के अन्तर्गत रेखाचित्र, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी एवं आत्मकथा आदि के अनुवाद आते हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू की कृति ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ तथा महात्मा गांधी एवं हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथाओं के विभिन्न भाषाओं में किए गए अनुवाद इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

5. विषय की प्रकृति के आधार पर अनुवाद

विषय या प्रयुक्ति के आधार पर अनुवाद के अनेक भेद किए जा सकते हैं। जैसे सरकारी रिकार्डों का अनुवाद,
गजेटियरों का अनुवाद, पत्रकारिता से संबद्ध अनुवाद, विधि-साहित्य का अनुवाद, ऐतिहासिक साहित्य, धार्मिक
साहित्य तथा ललित साहित्य का अनुवाद।

6. अनुवाद की प्रकृति के आधार पर

1. मूलनिष्ठ : मूलनिष्ठ अनुवाद कथ्य और शैली दोनों की दृष्टि से मूल का अनुगमन करता है। इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक का प्रयास रहता है कि अनूदित विचार या कृति स्रोत-भाषा के विचारों एवं अभिव्यक्ति के निकट रहे।

2. मूलमुक्त : मूलमुक्त अनुवाद को भोलानाथ तिवारी ने मूलाधारित अथवा मूलाधृत अनुवाद भी कहा है। वैसे तो मूलमुक्त का अर्थ ही होता है मूल से हटकर, किन्तु किसी भी अनुवाद में विचारों के स्तर पर परिवर्तन की गुँजाइश नहीं होती। अत: यहाँ मूल से भिन्न का अर्थ है शैलीगत भिन्नता तथा कहावतों एवं उपमानों का देशीकरण करने की अनुवादक की स्वतंत्रता।

7. अनुवाद के अन्य प्रकार

    अनुवाद की प्रकृति के आधार पर अनुवाद के कुछ अन्य प्रकार भी देखे जा सकते हैं; जैसे शब्दानुवाद, भावानुवाद, सारानुवाद, रूपांरतण, व्याख्यानुवाद, आदर्शानुवाद और छायानुवाद। इनमें से कुछ पर पहले ही चर्चा की जा चुकी है। कुछ अन्य प्रकार निम्नवत हैं:

    1. सारानुवाद: सारानुवाद मूल की मुख्य बातों का मूल-मुक्त अनुवाद होता है, परंतु इसमें महत्वपूर्ण यह है कि मूलपाठ का एकाधिक पठन करने के उपरांत ही मूल-अर्थ को ग्रहण किया जाता है। इसमें केंद्रीय विचार को बनाए रखने की आवश्यकता होती है। पहले मूल का सार पाठ बनाया जता है, तदुपरांत उसका अनुवाद किया जाता है। यह संक्षिप्त, अति संक्षिप्त, अत्यंत संक्षिप्त आदि कई प्रकार का होता है। अपनी संक्षिप्तता, सरलता-स्पष्टता तथा मूल और लक्ष्यभाषा के स्वाभाविक-सहज प्रवाह के कारण व्यावहारिक कार्यों के सामान्य अनुवाद की तुलना में सारानुवाद ही अधिक उपयोगी है। न्यायालयों द्वारा दिए गए लंबे निर्णयों तथा महत्वपूर्ण व्यक्तियों के वक्तव्यों और प्रशासनिक एवं संसदीय मामलों के सार इसी रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। इसमें मूलपाठ का सावधानीपूर्वक पठन तथा केंद्रीय भाव को बनाए रखने की चुनौती होती है। इस पर अधिक चर्चा इसी पाठ्यक्रम की ‘‘सारानुवाद’’ इकाई में की जाएगी।

    2. व्याख्यानुवाद: इसमें मूलपाठ का व्याख्यात्मकता के साथ अनुवाद होता है। स्पष्ट है कि इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक अथवा व्याख्याता अपने व्यक्तित्व, ज्ञान और विषय संबंधी अनुभव के आधार पर कथ्य में स्पष्टीकरण के लिए कुछ अतिरिक्त उदाहरण, प्रमाण इत्यादि जोड़ सकता है। संस्कृत श्लोकों या सूत्रों पर भाष्य, टीका आदि इसके उदाहरण हैं। तार्किक संयोजनों में अनेक प्रसंग जोड़े जाते हैं ताकि मूल के निहितार्थ को स्पष्ट किया जा सके। हालाँकि इसमें मूल लेखक के वक्तव्य का ह्रास होने की संभावना भी बन जाती है। अतः अनुवादक को सीमा रेखा तय कर लेनी चाहिए। संस्कृत के दर्शन ग्रंथों तथा लोकमान्य तिलक के ‘गीतानुवाद’ के कुछ अन्य निदर्शन इसी प्रकार के अनुवाद के उदाहरण हैं। वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद में वर्णनात्मक शैली भी इसी का उदाहरण है।

    3. रूपांतरण: रूपांतरण का अर्थ है स्रोतभाषा के पाठ के रूप को बदलना। इसमें रूपांतरणकार मूलपाठ को अपनी रूचि, सुविधा तथा आवश्यकता के अनुसार रचनात्मक तरीके से लक्ष्य पाठक अथवा दर्शक की रुचि और आवश्यकता के अनुसार परिवर्तित करके लक्ष्यभाषा में रखता है। इसमें मूल सामग्री, संक्षिप्त या विस्तृत, सरल या कठिन तथा विधा-रूप में परिवर्तित होकर आती है; जैसे उपन्यास या कहानी का नाट्य-रूपांतरण जिसमें मूलपाठ की विधा, परिवेश, पात्रा, स्थान आदि परिवर्तित हो जाते हैं। भारतीय सिनेमा तथा रंगमंच पर रूपांतरण के सफल एवं उत्तम प्रयोग द्रष्टव्य हैं। इस पाठ्यक्रम की ‘रूपांतरण’ इकाई में इस पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।

    अनुवाद के प्रकारों की उपरोक्त स्थितियों के अतिरिक्त भाषा का आधार मानते हुए भी विद्वानों ने बहुपक्षीयता के आधार पर वर्गीकरण किया है। इसमें भाषा-बाह्य, भाषा-केंद्रित तथा मिश्रित अर्थात गौण अनुवाद प्रकारों की चर्चा आगे की जाएगी।

    4. परोक्ष अनुवाद: मूल भाषा से अनुवाद न कर जब मध्यवर्ती पाठ fiter से अनुवाद किया जए तो यह परोक्ष अनुवाद कहलाता है। इसमें पहले किसी भाषा में किए गए अनुवाद से अनुवाद किया जाता है। 

    5. पुनरानुवाद : मूल भाषा पाठ के अनुवाद की पुनः भाषा में पुनरावृत्ति करना पुनरानुवाद है। इसमें अनुवाद कार्य दो बार होता है- पहली बार में जो लक्ष्यभाषा पाठ निष्पन्न होता है वही दूसरी बार में मूल भाषा पाठ बन जाता है, और जो भाषा पहली बार में मूल भाषा होती है वह दूसरी बार में लक्ष्यभाषा बन जाती है; जैसे- एक अंगे्रजी पाठ का हिंदी में अनुवाद और फिर उस हिंदी पाठ का अंग्रेजी में अनुवाद। कभी-कभी भारतीय भाषाओं में भी यह प्रवृत्ति देखी गई है। यह आवश्यक है कि अनुवादक तथा पुनरानुवादक अलग-अलग व्यक्ति हों तथा पुनरानुवादक मूलपाठ से परिचित न हो। इसका उद्देश्य है प्रथम अनुवाद की विशुद्धता की जाँच करना। पुनरानुवाद में निष्पन्न पाठ से मूलपाठ की ‘सर्वतोमुखी निकटता’ की मात्रा के अनुपात में प्रथम अनुवाद की विशुद्धता की मात्रा निर्धारित होगी। अनुवाद मूल्यांकन के लिए इस पद्धति का प्रायः प्रयोग किया जाता है।

    6. सूचनानुवाद : मूलपाठ की विधा संबंधी विशेषता की उपेक्षा कर केवल विषयवस्तु अर्थात कथ्य या संदेश का अनुवाद करना सूचनानुवाद है। यह सारांश और संक्षेप से लेकर अविकल अनुवाद तक हो सकता हे। यह प्रायः व्याख्यात्मक हो जाता है और रूप, बिंब, लक्षण; शैली आदि पूर्णतः उपेक्षित रहती हैं। प्राचीन शास्त्राीय ग्रंथों का समसामायिक भाषाओं में सूचनानुवाद करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। प्राचीन भाषाओं के माध्यम से प्रस्तुत ज्ञान के प्रति समसामयिक पाठकों को परिचित कराना इसका उद्देश्य है।

    7. शैक्षिक अनुवाद : भारत तथा अनेक दूसरे देशों में जहाँ बहुभाषिकता जैसी स्थितियाँ है वहाँ ज्ञान साहित्य अमानक तथा अर्थ-साहित्यिक विधाओं में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अतः मूल रचनाओं का (लोक-साहित्य को इसमें लिया जा सकता है) मानक साहित्यिक शैली में अनुवाद करने की आवश्यकता बनी रहती है, जिससे शिक्षित वर्ग मूल रचनाओं का कुछ आस्वाद कर सके और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित व संवर्धित भी किया जा सके। यह ज्ञानात्मक साहित्य में होने वाले अनुवाद से इतर अनुवाद है।

    8. रूप-प्रधान अनुवाद : रूप प्रधान अनुवाद में मूल के अर्थ पक्ष की उपेक्षा कर उसके ध्वनि-योजना पक्ष (रूप पक्ष) को संरक्षित रखते हुए लक्ष्यभाषा में अंतरित किया जाता हे। प्रायः बाल कविताओं के अनुवाद के लिए इस प्रणाली का प्रयोग किया जाता है ताकि मूलपाठ की ध्वनि योजना बनी रहे परंतु पात्र अथवा ज्ञान संकेत स्थानीय हों। यहाँ ध्वनिगत पैटर्न की समानता रखी जाती है और उनके अवसरों पर अर्थगत समानता प्रासंगिक नहीं रहती है।

    8. ललित साहित्यानुवाद : ललित साहित्यानुवाद के अन्तर्गत साहित्यिक विधाओं को रखा जाता है। कविता, ललित निबन्ध, कहानी, डायरी, आत्मकथा, उपन्यास आदि। इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

    9. धार्मिक-पौराणिक साहित्यानुवाद : जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है धार्मिक-पौराणिक साहित्यानुवाद में विभिन्न धमोर्ं के मानक धर्मग्रंथों, गीता, भागवत, कुरआन, बाइबिल आदि का अनुवाद किया जाता है। वेद, उपनिषद आदि भी इसके साथ शामिल हैं।

    10. वैज्ञानिक एवं तकनीकी सामग्री के अनुवाद : वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद में विषय मुख्य है और शैली गौण। साहित्यिक अनुवाद में प्राय: ‘क्यों’ से ज़्यादा ‘कैसे’ का महत्त्व होता है जबकि वैज्ञानिक अनुवाद में ‘कैसे’ से ज़्यादा ‘क्या’ का महत्त्व होता है। इसमें भावानुवाद त्याज्य है और प्राय: शब्दानुवाद अपेक्षित है। इसमें पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग अपेक्षित है, ध्वन्यात्मक या व्यंग्यात्मक शब्दावली का नहीं। कुल मिलाकर इस प्रकार के अनुवाद में सूचना, संकल्पना तथा तथ्य महत्त्वपूर्ण होते हैं। सबसे ज़रूरी बात यह कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद में अनुवादक विषय का सम्यक् जानकार हो और साथ ही प्रशिक्षित भी। तभी वह अनुवाद के साथ न्याय कर पाएगा।

    11. विधि का अनुवाद : इसमें एक भाषा की विधि सम्बन्धी अर्थात् कानून की सामग्री को दूसरी भाषा में अनुवाद किया जाता है। कानून की किताबें, अदालत के मुकद्दमे, तत्सम्बन्धी विभिन्न आवेदन-पत्र, कानूनी संहिताएँ, नियम-अधिनियम, संशोधित अधिनियम आदि कानूनी अनुवाद के प्रमुख हिस्से हैं। इस प्रकार के अनुवाद में प्रत्येक शब्द का अपना विशेष महत्त्व होता है। इसमें भावार्थ नहीं शब्दार्थ महत्त्वपूर्ण होता है। इसके प्रत्येक शब्द का अर्थ स्पष्ट होता है। एक शब्द का एक ही अर्थ अपेक्षित होता है। इस प्रकार के अनुवाद की भाषा पूरी तरह तकनीकी प्रकृति की होती है।

    12. प्रशासनिक अनुवाद : प्रशासनिक अनुवाद से तात्पर्य है वह अनुवाद जिसमें एक भाषा की प्रशासन सम्बन्धी सामग्री को दूसरी भाषा में परिवर्तित किया जाता है। प्रशासनिक अनुवाद का सम्बन्ध सरकारी कार्यालयों से होने के कारण इसे कार्यालयी अनुवाद भी कहा जाता है। इस अनुवाद के अन्तर्गत प्रशासन के सभी कागजात, सरकारी पत्र, परिपत्र, सूचनाएँ-अधिसूचनाएँ, नियम-अधिनियम, प्रेस विज्ञप्तियाँ आदि आते हैं। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, संसद, विभिन्न मंत्रालय आदि में द्विभाषी तथा बहुभाषी स्थिति के कारण प्रशासनिक अनुवाद के बिना काम नहीं चलता। यहाँ भी पारिभाषिक शब्दावली का सहारा लिया जाता है। प्रशासनिक अनुवाद में ‘कथ्य’ अर्थात् ‘कही गई बात’ महत्त्वपूर्ण होती है।

    13. मानविकी एवं समाजशास्त्र का अनुवाद : मानविकी एवं समाजशास्त्र से सम्बन्धित सामग्रियों के अनुवाद के लिए अनुवादक का विषय ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। इस तरह का अनुवाद अनुसंधान, सर्वेक्षण, परियोजना एवं शैक्षिक आवश्यकता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है। इस तरह के अनुवाद में सरलता एवं स्पष्टता अपेक्षित होती है।

    14. संचार माध्यमों की सामग्री का अनुवाद : वर्तमान युग के संचार माध्यमों ने मानव-विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। संचार माध्यमों के जरिए ही वह देश-विदेश और समग्र दुनिया की जानकारी हासिल करता है। किन्तु विविध देशों में विविध भाषाएँ होने के कारण संचार माध्यम की सामग्री का अनुवाद महत्त्वपूर्ण बना हुआ है। इस अनुवाद के अन्तर्गत मुख्यत: दैनिक समाचार, सभी प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन तथा आकाशवाणी आदि क्षेत्रों की सामग्री के अनुवाद आते हैं। इन सम्पर्क माध्यमों में दुनिया के सारे ज्ञान-विज्ञान की सामग्री समाहित होती है। इसमें राजनीति, व्यापार, खेल, विज्ञान, साहित्य आदि की अर्थात् जीवन से सम्बन्धित सभी विषय-क्षेत्रों की सामग्री होती है।
      उपर्युक्त प्रकारों के अलावा विषयाधारित अनुवाद में संगीत, ज्योतिष, पर्यावरण, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अभिलेखों, गजेटियरों आदि की सामग्री, वाणिज्यानुवाद, काव्यशास्त्र, भाषाविज्ञान सम्बन्धी अनेकानेक विषयों को शामिल किया जा सकता है।

      Bandey

      मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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