अनुवाद की प्रकृति और प्रकार

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अनुवाद की प्रकृति (अर्थात् अनुवाद-क्रिया कला के अन्तर्गत आता है या विज्ञान के या शिल्प के) के साथ-साथ अनुवाद के विविध प्रकार एवं प्रभेद की भी चर्चा की जा रही है।

अनुवाद की प्रकृति 

‘अनुवाद’ एक कर्म के रूप में बेहद जटिल क्रिया है और एक विधा के रूप में बहुत संश्लिष्ट। यही कारण है कोई इसे ‘अनुवाद कला’ कहता है, कोई ‘अनुवाद शिल्प’, तो कोई ‘अनुवाद विज्ञान’। अनुवाद कर्म के मर्म को समझने के लिए अनुवाद की प्रकृति और अनुवाद के प्रभेद को जानना-समझना बहुत ज़रूरी है। चर्चा की शुरुआत अनुवाद की प्रकृति से करते हैं।

अनुवाद सिद्धान्त एवं व्यवहार पर उपलब्ध पुस्तकों के शीर्षकों को देखने से मन में यह प्रश्न स्वत: उठता है कि आख़िर अनुवाद की प्रकृति क्या है ? विद्वानों का एक वर्ग इसे ‘कला’ मानता आया है तो दूसरा वर्ग इसके विपरीत इसे ‘विज्ञान’ की श्रेणी में रखना पसन्द करता है। एक वर्ग ऐसा भी है जो अनुवाद को कला या विज्ञान की श्रेणी से अलग ‘शिल्प’ की कोटि में रखता है। ऐसे में अनुवाद की प्रकृति पर विचार करना ज़रूरी हो जाता है। पहले हम इसके विज्ञान पक्ष पर विचार करते हैं।

अनुवाद का वैज्ञानिक पक्ष 

विज्ञान का साधारण अर्थ होता है ‘विशिष्ट ज्ञान’। मगर आज ‘विज्ञान’ शब्द केवल ‘विशिष्ट ज्ञान’ तक सीमित न रह कर समूचे वैज्ञानिक व तकनीक चिन्तन, अनुशासनों, यथा- भौतिकी, रसायन, गणित, जीवविज्ञान, कम्प्यूटर आदि को अपने में समाहित कर चुका है जिसमें पूर्ण सार्वभौमिक सत्यता(universal truth) विद्यमान होती है। इसे सार्वभौमिक सत्यता इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सामान्यत: स्थान, समय व परिवेश से प्रभावित नहीं होती। इसमें हमेशा 2+2=4 या H2+0=H20 होता है। परन्तु अनुवाद में ऐसी सार्वभौमिक सत्यता नहीं होती। हर अनुवादक से उसे एक नया रूप मिलता है। फिर अनुवाद में अनिवार्यत: अनुवादक के युग, समाज, भौगोलिक परिवेश आदि का प्रभाव भी मौज़ूद रहता है। अनुवाद को उस अर्थ में विज्ञान नहीं कहा जा सकता जिस अर्थ में भौतिकी, रसायन, गणित, जीवविज्ञान आदि को विज्ञान कहा जाता है। अनुवाद को विज्ञान मानने के पीछे कारण यह है कि अनुवाद की प्रकिया में विज्ञान की भाँति ही विश्लेषण, तुलना, निरीक्षण, अनुशीलन आदि सोपान होते हैं।

डार्टेस्ट ने अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (Applied Linguistics) की एक शाखा के रूप में परिभाषित करते हुए लिखा है कि अनुवाद, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की वह शाखा है जिसमें विशेषत: एक प्रतिमानित प्रतीक समूह से दूसरे प्रतिमानित प्रतीक समूह में अर्थ को अन्तरित करने की समस्या या तत्सम्बन्धी तथ्यों पर विचार-विमर्श किया जाता है -

अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अन्तर्गत शामिल करने का कारण यह है कि अनुवाद कर्म में स्रोत-भाषा से लक्ष्य-भाषा तक पहुँचने में हम जिन प्रक्रियाओं से होकर गुजरते हैं उसका वैज्ञानिक विश्लेषण (scientific analysis) किया जा सकता है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि अनुवाद क्रिया में पहले स्रोत-भाषा का विकोडीकरण (decoding of Source Language) होता है जिसका बाद में लक्ष्य-भाषा में पुन:कोडीकरण (encoding of Target Language) किया जाता है। अत: अनुवाद कर्म में विज्ञान का कुछ गुण अवश्य है परन्तु इतने भर से इसको पूर्णत: वैज्ञानिक विधा नहीं माना जा सकता।

अनुवाद का कला पक्ष 

कला एक प्रकार की सर्जना(creation) है। शायद यही कारण है कि सृजनात्मक साहित्य को कला की श्रेणी में रखा जाता है। जब सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद किया जाता है तो वह मात्र शाब्दिक प्रतिस्थापन नहीं होता बल्कि अनुवादक को मूल लेखक के उस महान् जीवन क्षण को फिर से जीना होता है जिससे अभिभूत होकर कवि या रचनाकार ने उस रचना को अंजाम दिया। इसलिए आग्निस गेर्गली ने कहा है : Translation must find and reproduce the impulse of the original work. हमेशा सहज समतुल्यता की खोज में अनुवादक को अक्सर पुन:सृजन(त्मबतमंजपवद) करना पड़ता है, जिसमें अनुवादक के सौन्दर्यबोध एवं सृजनशील प्रतिभा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शैली के शब्दों में कहें तो सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद एक प्रकार से कलात्मक प्रक्रिया है। साहित्यिक अनुवाद का पुनर्सृजित रूप निम्नलिखित दो अनुवादों से स्पष्ट हो जाएगा :
उदाहरण-1 मूल : लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम है लूटि ।
पीछैं ही पछिताहुगे, यह तन जैहै छूटि ।।
                                                            -कबीर 
अनुवाद : Rejoice O Kabir
In this great feast
of Love !
Once death
knocks at your door,
This golden moment
will be gone
For ever !
                -Translated by Sahdev Kumar
उदाहरण-2 मूल : One Moment in Annihilation's Waste,
One Moment, of the Well of Life to taste
The Stars are setting and the Caravan,
Starts for the dawn of Nothing& oh, make haste!
                                                        -Rubaiyat (Fitzgerald) 

अनुवाद -अरे, यह विस्मृति का मरु देश
एक विस्तृत है, जिसके बीच
खिंची लघु जीवन-जल की रेख,
मुसाफ़िर ले होठों को सींच ।
            एक क्षण, जल्दी कर, ले देख
            बुझे नभ-दीप, किधर पर भोर
कारवाँ मानव का कर कूच
बढ़ चला शून्य उषा की ओर !
                                            -खै़याम की मधुशाला                                             हिन्दी अनुवाद : हरिवंशराय बच्चन 

उपर्युक्त दोनों अनुवाद मूल के आधार पर नई रचनाएँ बन गई हैं। ये अनुवाद नहीं बल्कि मूल का ‘अनुसृजन’ है। इसमें मूल लेखक की भाँति अनुवादक की सृजनशील प्रतिभा की स्पष्ट झलक देखने को मिल रही है। राजशेखर दास ने ठीक ही कहा है : ‘कविता का अनुवाद कितना ही सुन्दर क्यों न हो वह केवल मूल विचारों पर आधृत एक नई कविता ही हो सकती है।’ यही कारण है कि साहित्यिक अनुवाद को एक कलात्मक प्रक्रिया माना गया है।

अनुवाद का शिल्प पक्ष 

कई भाषाविज्ञानियों का मानना है कि अनुवाद-कार्य एक शिल्प-कर्म है। उनका तर्क है कि स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश को लक्ष्य-भाषा में प्रस्तुत करने में अनुवादक के कौशल, उसके भाषा-चातुर्य की अहम् भूमिका होती है। यह शिल्प शब्द अंग्रेजी के  skill व craft के निकट पड़ता है। न्यूमार्क ने अनुवाद कर्म को ‘शिल्प’ स्वीकारा है : ‘अनुवाद एक शिल्प है, जिसमें एक भाषा में लिखित सन्देश को दूसरी भाषा में उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है।’ फिर अनुवाद में जितना अधिक अभ्यास किया जाएगा या प्रशिक्षण लिया जाएगा, अनुवाद उतना ही सुन्दर होता जाएगा। इसके अलावा कला और शिल्प का अभिन्न सम्बन्ध भी रहा है। जहाँ कला होगी वहाँ निश्चय ही शिल्प होगा और इसके विपरीत जहाँ शिल्प होगा वहाँ अनिवार्यत: कला होगी। अत: अनुवाद में अंशत: शिल्प का तत्त्व भी समाहित है।

अनुवाद में कला-विज्ञान-शिल्प के तीनों तत्त्व 

नाइडा द्वारा प्रस्तावित अनुवाद प्रक्रिया में तीन सोपानों का उल्लेख है :
  1. विश्लेषण 
  2. अन्तरण 
  3. पुनर्गठन 
दरअसल ये तीनों चरण क्रमानुसार विज्ञान, शिल्प और कला के ही तीनों सोपान हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अनुवाद-प्रक्रिया का पहला चरण है मूल-पाठ का ‘वैज्ञानिक विश्लेषण’, दूसरा सोपान है मूल-पाठ के सन्देश व शिल्प का ‘अन्तरण कौशल’ तथा तीसरा सोपान है लक्ष्य-भाषा में उसका ‘कलात्मक पुनर्ग्ाठन’। मगर अनुवाद में ये तीनों (कला, विज्ञान और कौशल) का अनुपात सदैव समान नहीं रहता। इन तीनों का अनुपात अनुद्य सामग्री की प्रकृति पर निर्भर रहता है। सृजनात्मक सामग्री में कला तत्त्व का प्राधान्य होने के कारण इसके अनुवादक में भी सृजनात्मक प्रतिभा का होना अपरिहार्य माना गया है। यही कारण है कि साहित्यिक अनुवादक अनुवाद को कलात्मक क्रिया मानते आए हैं। इसके विपरीत तकनीकी या वैज्ञानिक सामग्री के अनुवादक को अनुद्य विषय का सम्यक ज्ञान होना ज़रूरी है। अनुवादक का विषय ज्ञान जितना अधिक होगा अनुवाद उतना सटीक होगा। अन्यथा 'woody portion' का अनुवाद ‘काष्ठमय अंश’ हो जाने में देर नहीं लगती। इसके अलावा तकनीकी-वैज्ञानिक सामग्री के अनुवाद में हमें कुछ नियमों का अनुसरण भी करना पड़ता है। इसीलिए तकनीकी विषय के अनुवाद में अनुवादक का कौशल बखूबी काम करता है। इस सन्दर्भ में नाइडा का कथन है : ‘Translation is far more than a Science, it is also a Skill and in the ultimate analysis fully satisfactory translation is always an Art.’ अर्थात् अनुवाद विज्ञान से बढ़कर है, वह कौशल भी है और अन्तिम विश्लेषण में पूर्णत: सन्तोषजनक अनुवाद हमेशा एक कला रहा है। परन्तु डॉ. नगेन्द्र अनुवाद को एक स्वतंत्र विधा मानते हैं। उनका कहना है : ‘अनुवाद पारिभाषिक अर्थ में न विज्ञान है और न कला। इसके अतिरिक्त उसे निश्चित रूप से शिल्प भी कहना तर्कसंगत नहीं होगा। वास्तविक स्थिति यह है कि आधार विषय के अनुसार अनुवाद में इन तीनों के ही तत्त्वों का यथानुपात समावेश रहता है। साहित्यिक अनुवाद विशेष रूप से काव्यानुवाद का अन्तर्भाव जहाँ कला की परिधि में ही हो जाता है, वहाँ वैज्ञानिक तथा शास्त्रीय अनुवाद में विज्ञान के आधार तत्त्वों का प्राधान्य रहता है जबकि शिल्प का प्रयोग प्राय: सर्वत्र ही मिलता है। इस प्रकार अनुवाद एक स्वतंत्र विधा है।’ निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि अनुवाद में कला, विज्ञान और शिल्प तीनों विधाओं के तत्त्व अंशत: विद्यमान हैं। दूसरे शब्दों में, अनुवाद के विश्लेषण में वैज्ञानिकता है, उसकी सिद्धि में कलात्मकता जिसके लिए आवश्यकता होती है शिल्पगत कौशल की।

अनुवाद के प्रकार 

गद्य-पद्य पर आधारित प्रभेद 

  1. गद्यानुवाद : गद्यानुवाद सामान्यत: गद्य में किए जानेवाले अनुवाद को कहते हैं। किसी भी गद्य रचना का गद्य में ही किया जाने वाला अनुवाद गद्यानुवाद कहलाता है। किन्तु कुछ विशेष कृतियों का पद्य से गद्य में भी अनुवाद किया जाता है। जैसे ‘मेघदूतम्’ का हिन्दी कवि नागार्जुन द्वारा किया गद्यानुवाद।
  2. पद्यानुवाद : पद्य का पद्य में ही किया गया अनुवाद पद्यानुवाद की श्रेणी में आता है। दुनिया भर में विभिन्न भाषाओं में लिखे गए काव्यों एवं महाकाव्यों के अनुवादों की संख्या अत्यन्त विशाल है। इलियट के ‘वेस्टलैण्ड’, कालिदास के ‘मेघदूतम्’ एवं ‘कुमारसंभवम्’ तथा टैगोर की ‘गीतांजलि’ का विभिन्न भाषाओं में पद्यानुवाद किया गया है। साधारणत: पद्यानुवाद करते समय स्रोत-भाषा में व्यवहृत छन्दों का ही लक्ष्य-भाषा में व्यवहार किया जाता है।
  3. छन्दमुक्तानुवाद : इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक को स्रोत-भाषा में व्यवहार किए गए छन्दों को अपनाने की बाध्यता नहीं होती। अनुवादक विषय के अनुरूप लक्ष्य-भाषा का कोई भी छन्द चुन सकता है। साहित्य में ऐसे अनुवाद विपुल संख्या में उपलब्ध हैं।

साहित्य विधा पर आधारित प्रभेद 

  1. काव्यानुवाद : स्रोत-भाषा में लिखे गए काव्य का लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरण काव्यानुवाद कहलाता है। यह आवश्यकतानुसार गद्य, पद्य एवं मुक्त छन्द में किया जा सकता है। होमर के महाकाव्य ‘इलियड’ एवं कालिदास के ‘मेघदूतम्’ एवं ‘ऋतुसंहार’ इसके उदाहरण हैं।
  2. नाट्यानुवाद : किसी भी नाट्य कृति का नाटक के रूप में ही अनुवाद करना नाट्यानुवाद कहलाता है। नाटक रंगमंचीय आवश्यकताओं एवं दर्शकों को ध्यान में रखकर लिखा जाता है। अत: इसके अनुवाद के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। संस्कृत के नाटकों के हिन्दी अनुवाद तथा शेक्सपियर के नाटकों के अन्य भाषाओं में किए गए अनुवाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  3. कथा अनुवाद : कथा अनुवाद के अन्तर्गत कहानियों एवं उपन्यासों का कहानियों एवं उपन्यासों के रूप में ही अनुवाद किया जाता है। विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों एवं कहानियों के अनुवाद काफ़ी प्रचलित एवं लोकप्रिय हैं। मोपासाँ एवं प्रेमचन्द की कहानियों का दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। रूसी उपन्यास ‘माँ’, अंग्रेजी उपन्यास ‘लैडी चैटर्ली का प्रेमी’ तथा हिन्दी के ‘गोदान’, ‘त्यागपत्र‘ तथा ‘नदी के द्वीप’ के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।
  4. अन्य साहित्यिक विधाओं के अनुवाद : अन्य साहित्यिक विधाओं के अन्तर्गत रेखाचित्र, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी एवं आत्मकथा आदि के अनुवाद आते हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू की कृति ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ तथा महात्मा गांधी एवं हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथाओं के विभिन्न भाषाओं में किए गए अनुवाद इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

विषय आधारित प्रभेद 

  1. ललित साहित्यानुवाद : ललित साहित्यानुवाद के अन्तर्गत साहित्यिक विधाओं को रखा जाता है। कविता, ललित निबन्ध, कहानी, डायरी, आत्मकथा, उपन्यास आदि। इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।
  2. धार्मिक-पौराणिक साहित्यानुवाद : जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है धार्मिक-पौराणिक साहित्यानुवाद में विभिन्न धमोर्ं के मानक धर्मग्रंथों, गीता, भागवत, कुरआन, बाइबिल आदि का अनुवाद किया जाता है। वेद, उपनिषद आदि भी इसके साथ शामिल हैं।
  3. वैज्ञानिक एवं तकनीकी सामग्री के अनुवाद : वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद में विषय मुख्य है और शैली गौण। साहित्यिक अनुवाद में प्राय: ‘क्यों’ से ज़्यादा ‘कैसे’ का महत्त्व होता है जबकि वैज्ञानिक अनुवाद में ‘कैसे’ से ज़्यादा ‘क्या’ का महत्त्व होता है। इसमें भावानुवाद त्याज्य है और प्राय: शब्दानुवाद अपेक्षित है। इसमें पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग अपेक्षित है, ध्वन्यात्मक या व्यंग्यात्मक शब्दावली का नहीं। कुल मिलाकर इस प्रकार के अनुवाद में सूचना, संकल्पना तथा तथ्य महत्त्वपूर्ण होते हैं। सबसे ज़रूरी बात यह कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद में अनुवादक विषय का सम्यक् जानकार हो और साथ ही प्रशिक्षित भी। तभी वह अनुवाद के साथ न्याय कर पाएगा।
  4. विधि का अनुवाद : इसमें एक भाषा की विधि सम्बन्धी अर्थात् कानून की सामग्री को दूसरी भाषा में अनुवाद किया जाता है। कानून की किताबें, अदालत के मुकद्दमे, तत्सम्बन्धी विभिन्न आवेदन-पत्र, कानूनी संहिताएँ, नियम-अधिनियम, संशोधित अधिनियम आदि कानूनी अनुवाद के प्रमुख हिस्से हैं। इस प्रकार के अनुवाद में प्रत्येक शब्द का अपना विशेष महत्त्व होता है। इसमें भावार्थ नहीं शब्दार्थ महत्त्वपूर्ण होता है। इसके प्रत्येक शब्द का अर्थ स्पष्ट होता है। एक शब्द का एक ही अर्थ अपेक्षित होता है। इस प्रकार के अनुवाद की भाषा पूरी तरह तकनीकी प्रकृति की होती है।
  5. प्रशासनिक अनुवाद : प्रशासनिक अनुवाद से तात्पर्य है वह अनुवाद जिसमें एक भाषा की प्रशासन सम्बन्धी सामग्री को दूसरी भाषा में परिवर्तित किया जाता है। प्रशासनिक अनुवाद का सम्बन्ध सरकारी कार्यालयों से होने के कारण इसे कार्यालयी अनुवाद भी कहा जाता है। इस अनुवाद के अन्तर्गत प्रशासन के सभी कागजात, सरकारी पत्र, परिपत्र, सूचनाएँ-अधिसूचनाएँ, नियम-अधिनियम, प्रेस विज्ञप्तियाँ आदि आते हैं। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, संसद, विभिन्न मंत्रालय आदि में द्विभाषी तथा बहुभाषी स्थिति के कारण प्रशासनिक अनुवाद के बिना काम नहीं चलता। यहाँ भी पारिभाषिक शब्दावली का सहारा लिया जाता है। प्रशासनिक अनुवाद में ‘कथ्य’ अर्थात् ‘कही गई बात’ महत्त्वपूर्ण होती है।
  6. मानविकी एवं समाजशास्त्र का अनुवाद : मानविकी एवं समाजशास्त्र से सम्बन्धित सामग्रियों के अनुवाद के लिए अनुवादक का विषय ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। इस तरह का अनुवाद अनुसंधान, सर्वेक्षण, परियोजना एवं शैक्षिक आवश्यकता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है। इस तरह के अनुवाद में सरलता एवं स्पष्टता अपेक्षित होती है।
  7. संचार माध्यमों की सामग्री का अनुवाद : वर्तमान युग के संचार माध्यमों ने मानव-विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। संचार माध्यमों के जरिए ही वह देश-विदेश और समग्र दुनिया की जानकारी हासिल करता है। किन्तु विविध देशों में विविध भाषाएँ होने के कारण संचार माध्यम की सामग्री का अनुवाद महत्त्वपूर्ण बना हुआ है। इस अनुवाद के अन्तर्गत मुख्यत: दैनिक समाचार, सभी प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन तथा आकाशवाणी आदि क्षेत्रों की सामग्री के अनुवाद आते हैं। इन सम्पर्क माध्यमों में दुनिया के सारे ज्ञान-विज्ञान की सामग्री समाहित होती है। इसमें राजनीति, व्यापार, खेल, विज्ञान, साहित्य आदि की अर्थात् जीवन से सम्बन्धित सभी विषय-क्षेत्रों की सामग्री होती है।
उपर्युक्त प्रकारों के अलावा विषयाधारित अनुवाद में संगीत, ज्योतिष, पर्यावरण, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अभिलेखों, गजेटियरों आदि की सामग्री, वाणिज्यानुवाद, काव्यशास्त्र, भाषाविज्ञान सम्बन्धी अनेकानेक विषयों को शामिल किया जा सकता है।

अनुवाद की अन्य प्रकृति पर आधारित प्रभेद 

  1. मूलनिष्ठ : मूलनिष्ठ अनुवाद कथ्य और शैली दोनों की दृष्टि से मूल का अनुगमन करता है। इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक का प्रयास रहता है कि अनूदित विचार या कृति स्रोत-भाषा के विचारों एवं अभिव्यक्ति के निकट रहे।
  2. मूलमुक्त : मूलमुक्त अनुवाद को भोलानाथ तिवारी ने मूलाधारित अथवा मूलाधृत अनुवाद भी कहा है। वैसे तो मूलमुक्त का अर्थ ही होता है मूल से हटकर, किन्तु किसी भी अनुवाद में विचारों के स्तर पर परिवर्तन की गुँजाइश नहीं होती। अत: यहाँ मूल से भिन्न का अर्थ है शैलीगत भिन्नता तथा कहावतों एवं उपमानों का देशीकरण करने की अनुवादक की स्वतंत्रता।

अनुवाद के कुछ अन्य प्रभेद 

  1. शब्दानुवाद : स्रोत-भाषा के शब्द एवं शब्द क्रम को उसी प्रकार लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित करना शब्दानुवाद कहलाता है। यहाँ अनुवादक का लक्ष्य मूल-भाषा के विचारों को रूपान्तरित करने से अधिक शब्दों का यथावत् अनुवाद करने से होता है। शब्द एवं शब्द क्रम की प्रकृति हर भाषा में भिन्न होती है। अत: यांत्रिक ढंग से उनका यथावत अनुवाद करते जाना काफ़ी कृत्रिम, दुर्बोध्य एवं निष्प्राण हो सकता है। शब्दानुवाद उच्च कोटि के अनुवाद की श्रेणी में नहीं आता।
  2. भावानुवाद : साहित्यिक कृतियों के सन्दर्भ में भावानुवाद का विशेष महत्त्व होता है। इस प्रकार के अनुवाद में मूल-भाषा के भावों, विचारों एवं सन्देशों को लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। इस सन्दर्भ में भोलानाथ तिवारी का कहना है : ‘मूल सामग्री यदि सूक्ष्म भावों वाली है तो उसका भावानुवाद करते हैं।’ भावानुवाद में सम्प्रेषणीयता सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। इसमें अनुवादक का लक्ष्य स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त भावों, विचारों एवं अर्थों का लक्ष्य-भाषा में अन्तरण करना होता है। संस्कृत साहित्य में लिखे गए कुछ ललित निबन्धों के हिन्दी अनुवाद बहुत ही सफल सिद्ध हुए हैं।
  3. छायानुवाद : अनुवाद सिद्धान्त में छाया शब्द का प्रयोग अति प्राचीन है। इसमें मूल-पाठ की अर्थ छाया को ग्रहण कर अनुवाद किया जाता है। छायानुवाद में शब्दों, भावों तथा संकल्पनाओं के संकलित प्रभाव को लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। संस्कृत में लिखे गए भास के नाटक ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ एवं कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के हिन्दी अनुवाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  4. सारानुवाद : सारानुवाद का अर्थ होता है किसी भी विस्तृत विचार अथवा सामग्री का संक्षेप में अनुवाद प्रस्तुत करना। लम्बी रचनाओं, राजनैतिक भाषणों, प्रतिवेदनों आदि व्यावहारिक कार्य के अनुवाद के लिए सारानुवाद काफ़ी उपयोगी सिद्ध होता है। इस प्रकार के अनुवाद में मूल-भाषा के कथ्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य-भाषा में उसका रूपान्तरण कर दिया जाता है। सारानुवाद का प्रयोग मुख्यत: दुभाषिये, समाचार पत्रों एवं दूरदर्शन के संवाददाता तथा संसद एवं विधान मण्डलों के रिकार्डकर्त्ता करते हैं।
  5. व्याख्यानुवाद : व्याख्यानुवाद को भाष्यानुवाद भी कहते हैं। इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक मूल सामग्री के साथ-साथ उसकी व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। व्याख्यानुवाद में अनुवादक का व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण होता है। और कई जगहों में तो अनुवादक का व्यक्तित्व एवं विचार मूल रचना पर हावी हो जाता है। बाल गंगाधर तिलक द्वारा किया गया ‘गीता’ का अनुवाद इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
  6. आशु अनुवाद : आशु अनुवाद को वार्तानुवाद भी कहते हैं। दो भिन्न भाषाओं, भावों एवं विचारों का तात्कालिक अनुवाद आशु अनुवाद कहलाता है। आज जैसे विभिन्न देश एक दूसरे के परस्पर समीप आ रहे हैं इस प्रकार के तात्कालिक अनुवाद का महत्त्व बढ़ रहा है। विभिन्न भाषा-भाषी प्रदेशों एवं देशों के बीच राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के क्षेत्रों में आशु अनुवाद का सहारा लिया जाता है।
  7. आदर्श अनुवाद : आदर्श अनुवाद को सटीक अनुवाद भी कहा जाता है। इसमें अनुवादक आचार्य की भूमिका निभाता है तथा स्रोत-भाषा की मूल सामग्री का अनुवाद अर्थ एवं अभिव्यक्ति सहित लक्ष्य-भाषा में निकटतम एवं स्वाभाविक समानार्थों द्वारा करता है। आदर्श अनुवाद में अनुवादक तटस्थ रहता है तथा उसके भावों एवं विचारों की छाया अनूदित सामग्री पर नहीं पड़ती। रामचरितमानस, भगवद्गीता, कुरआन आदि धार्मिक ग्रन्थों के सटीक अनुवाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  8. रूपान्तरण : आधुनिक युग में रूपान्तरण का महत्त्व बढ़ रहा है। रूपान्तरण में स्रोत-भाषा की किसी रचना का अन्य विधा(साहित्य रूप) में रूपान्तरण कर दिया जाता है। संचार माध्यमों के बढ़ते हुए प्रभाव एवं उसकी लोकप्रियता को देखते हुए कविता, कहानी आदि साहित्य रूपों का नाट्यानुवाद विशेष रूप से प्रचलित हो रहा है। ऐसे अनुवादों में अनुवादक की अपनी रुचि एवं कृति की लोकप्रियता महत्त्वपूर्ण होती है। जैनेन्द्र, कमलेश्वर, अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी आदि की कहानियों के रेडियो रूपान्तर प्रस्तुत किए जा चुके हैं। ‘कामायनी’ महाकाव्य का नाट्य रूपान्तर काफ़ी चर्चित हुआ है। 

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