हरबर्ट स्पेन्सर के प्रमुख कार्य एवं सिद्धान्त

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हरबर्ट स्पेन्सर का जन्म इंग्लैंड के डर्बी नामक स्थान में, 1820 ई0 में हुआ था। माता एवं पिता दोनों ही तरफ से वह विद्रोही एवं सुधारवादी धर्मावलम्बियों एवं प्रगतिशील राजनीतिक परिवारों से जुड़ा था। हरबर्ट स्पेन्सर के पिता, विलियम जार्ज स्पेन्सर में यह विरोध का भाव अधिक था। उन्हें दर्शन, साहित्य, विज्ञान आदि का ज्ञान था। कार्य-कारण सिद्धान्त के प्रति स्पेन्सर के रूझान का कारण पिता का ही प्रभाव था। साथ ही इन सबका संयुक्त परिणाम यह था कि हरबर्ट स्पेन्सर व्यक्तिवाद का कÍर सर्मथक बन गया।

स्पेन्सर के पिता, चाचा, दादा सभी निजी विद्यालयों के अध्यापक थे लेकिन पुत्र, जो कि अपनी शताब्दी का इंग्लैंड का सर्वाधिक प्रसिद्ध दार्शनिक था, चालीस वर्ष की उम्र तक अशिक्षित था। तेरह वर्ष की अवस्था में हिन्टन में तीन वर्षों तक शिक्षा प्राप्त की। केवल यही तीन वर्ष उसके व्यवस्थित स्कूली जीवन के थे। वह बाद में नहीं कह पाता कि उसने विद्यालय में क्या पढ़ा- कोई इतिहास नहीं, कोई प्राकृतिक विज्ञान नहीं, कोई साहित्य नहीं। वह गर्व के साथ कहते थे ‘‘न तो बचपन में, न युवावस्था में मैंने अंग्रेजी में कोई पाठ पढ़ा, अभी तक वाक्य विन्यास का कोई ज्ञान नहीं है।’’ उन्होंने अपने प्रिय विषयों जैसे रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, दर्शनशास्त्र आदि में भी कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई थी, न ही इनका व्यवस्थित अध्ययन किया था।

जीविकोपार्जन की दृष्टि से उन्होंने सर्वेयर, सुपरवाइजर, रेलवे लाइन तथा ब्रिजों के डिजाइनर के रूप में कार्य किया। इंजीनियर के रूप में उन्होंने कई अविष्कार के प्रयास किए पर असफल रहे। कार्य की व्यावहारिक प्रकृति के कारण स्पेन्सर के विचार भी व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रभावित हुए। आजीवन अविवाहित रहने के कारण उनमें मानवीय दृष्टिकोण तथा संवेदना का विकास कम हो सका। वे अपने तर्कों और प्रमाणों पर अड़े रहते थे। पर उनका मस्तिष्क अत्यन्त ही तर्कशील था- वे अपने तथ्यों को आगमन या निगमन पद्धति के माध्यम से शतरंज के खिलाड़ी की कुशलता से रखते थे।

सुपरवाइजर, इंजीनियर आदि के रूप में कार्य करने के उपरांत कुछ समय तक उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र को आजमाया। वे ‘दि इकोनोमिस्ट’ नामक पत्रिका के सम्पादक भी बने। इसके उपरांत, चालीस वर्ष की अवस्था में वे लेखन के क्षेत्र में उतरे और अगले तैंतीस वर्ष तक जीवन, ज्ञान एवं शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर लिखते रहे। उनकी लेखनी से ज्ञान के अनेक क्षेत्र- तत्त्व मीमांसा, जीव विज्ञान, समाज शास्त्र, नीतिशास्त्र आदि लाभान्वित हुए। इंग्लैंड के जॉन स्टुअर्ट मिल एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के एडवर्ड एल0 यूमैंस ने स्पेन्सर के कार्य को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्हें लिखते रहने हेतु प्रोत्साहित किया।

हरबर्ट स्पेन्सर के प्रमुख कार्य एवं सिद्धान्त 

स्पेन्सर ने अपने तथ्यों को सीधे निरीक्षण से प्राप्त किया था न कि अध्ययन से। उसने अपनी पहली किताब ‘सोशल स्टेटिक्स’ को केवल जोनाथन डायमंड की किताब पढ़कर लिखा। मनोविज्ञान (दि प्रिन्सिपुल्स ऑफ साइकोलॉजी) केवल ह्यूम, मेन्सेल तथा रीड को पढ़कर लिखा। जीवविज्ञान (बायोलॉजी) केवल कारपेन्टर के कोम्परेटिव फिजियोलॉजी पढ़कर लिखा। सोसियोलॉजी बिना काम्टे या टेलर को पढ़े लिखा, एथिक्स बिना काँट और मिल को पढ़े लिखा। निरीक्षण पर आधारित होने के कारण स्पेन्सर के कार्य अधिक मौलिक है।

स्पेन्सर ने 1852 में ‘परिकल्पना का विकास’ या ‘दि डेवलपमेन्ट ऑफ हाइपोथिसिस’ की रचना की। परिकल्पना ही वैज्ञानिक अध्ययन का आधार है। 1852 में ही उन्होंने ‘दि थ्योरी ऑफ पॉपुलेशन’ की रचना की जिसमें उन्होंने इस सिद्धान्त को स्वीकार किया कि अस्तित्व के संघर्ष में सर्वाधिक उपयुक्त ही सुरक्षित रहता है। 1855 में मनोविज्ञान का सिद्धान्त (दि प्रिन्सिपुल्स ऑफ साइकोलॉजी) प्रकाशित हुआ, इसमें उन्होंने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि ‘जितना ही अधिक समूह या जीव विकसित होगा उतना ही कम उसका जन्म दर होगा। 1857 में स्पेन्सर ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध ‘प्रोग्रेस, इट्स लॉज एण्ड कॉज’ में कहा कि ‘‘हर जीवित चीज की शुरूआत समरूप से होती है और उनका विभिन्न रूपों में विकास होता है।’’ ‘फस्र्ट प्रिन्सीपुल’ 1862 में प्रकाशित हुई जो ग्रहों, जीवन एवं मानव के उत्थान एवं पतन, विकास तथा विघटन की शास्त्रीय गाथा है। इसके द्वितीय एवं तृतीय खंड का प्रकाशन 1872 में हुआ। इसके पूर्व, 1860 में ‘एडुकेशन, इंटलेक्चुअल, मोरल एण्ड फिजीकल’ प्रकाशित हुई। इसमें वैज्ञानिक रूझान की मूल प्रवृति प्रारम्भ से ही दिखती है। अध्ययन हेतु विषयों के उपयुक्त चयन पर स्पेन्सर ने इस कार्य में अत्यधिक जोर दिया।

1858 में जब स्पेन्सर अपने निबन्धों के संकलित रूप में प्रकाशन हेतु सुधार कर रहे थे- तो उनके मन में अचानक यह अन्तदर्ृष्टि आई कि ‘विकास के सिद्धान्त का जीव विज्ञान के साथ सभी विज्ञानों में उपयोग किया जा सकता है। यह केवल विभिन्न जीवों का ही नहीं वरन् ग्रहों, सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास, नैतिक एवं सौन्दर्यबोधक प्रत्ययों की भी व्याख्या कर सकता है।’’

दि प्रिन्सिपल्स ऑफ साइकोलॉजी (1873) दो खंडों में प्रकाशित हुआ- इनमें सिद्धान्तों की प्रचुरता है पर प्रमाणों की दृष्टि से ये कमजोर है। दि प्रिन्सिपल्स ऑफ सोसियोलॉजी का पहला भाग दि स्टडी ऑफ सोसियोलॉजी 1873 में प्रकाशित हुई। स्पेन्सर इस नए विषय के प्रति उत्साही थे। सामाजिक घटनाओं, विषयों में भी कारण-परिणाम का सिद्धान्त को वे प्रभावी मानते थे। उनका कहना था कि प्रागैतिहासिक मानव के जीवन में धर्म केन्द्रीय स्थान रखता है। औद्योगिक समाज में प्रजातंत्र और शांति की संभावना अधिक होती है। औद्योगिक समाज ही युद्धों से समाज को मुक्त कर सकता है। कुछ राष्ट्र कार्य से जीते हैं (औद्योगिक समाज) और कुछ युद्ध से (परम्परागत समाज) ।

स्पेन्सर ने इतिहास की सर्वथा नवीन व्याख्या की। उनके अनुसार इतिहास मानवों को कार्य करते देखता है न कि युद्धरत राजाओं को, यह व्यक्तित्वों का रिकार्ड नहीं रह जाता है वरन् महान आविष्कारों तथा नए विचारों का इतिहास बन जाता है।

स्पेन्सर साम्यवादी विचारधारा का कÍर विरोधी था वह इस कल्पना मात्र से घृणा करता था कि विश्व पर श्रमिकों का राज्य होगा।

दि प्रिन्सिपल्स ऑफ एथिक्स 1893 में प्रकाशित हुई। स्पेन्सर के अनुसार नई नैतिकता जीव विज्ञान पर आधारित होनी चाहिए। स्पेन्सर के अनुसार ‘‘कोई भी नैतिक संहिता जो प्राकृतिक चयन तथा ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ की परीक्षा पर खरा नहीं उतरता, वह प्रारम्भ से ही निरर्थक और बेकार है।’’

स्पेन्सर के महत्वपूर्ण विचारों को उनके ही वाक्यों के माध्यम से बेहतर ढ़ंग से समझा जा सकता है। कुछ प्रमुख वाक्य हैं : ‘‘उच्चतम व्यवहार वह है जो जीवन का अधिकतम विस्तार तथा पूर्णता को प्राप्त करता है।’’

‘‘नैतिकता कला की ही तरह, अनेकता में एकता प्राप्त करना है; उच्चतम प्रकार का मानव वह है जो अपने में अधिकतम प्रकार की जटिलता तथा जीवन की पूर्णता को जोड़ लेता है।’’

‘‘सामान्यत: आनन्द जीव विज्ञानी दृष्टि से उपयोगी होने का द्योतक है एवं कष्ट, जीव विज्ञानी दृष्टि से खतरनाक कार्यों का संकेत करता है।’’

न्याय का सूत्र है ‘‘प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है अपनी इच्छा के अनुरूप कार्य करने के लिए, शर्त है कि वह दूसरे की बराबर की स्वतंत्रता को बाधित न करे।’’

जैसे-जैसे युद्ध कम होता जाता है व्यक्ति का राज्य के द्वारा नियंत्रण के बहाने कम होते जाते हैं। तथा स्थायी शांति की दशा में राज्य का कार्य केवल समान स्वतंत्रता को आघात पहुँचने से रोकने का कार्य रह जाता है। व्यक्ति की ही तरह राष्ट्रों के मध्य व्यापार स्वतंत्र होना चाहिए। ‘‘व्यक्ति का अधिकार’’ से तात्पर्य है- समान आधार पर जीवन, स्वतंत्रता और खुशी पाने का अधिकार।’’

स्पेन्सर व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे पर आश्चर्यजनक ढ़ंग से वे महिलाओं को राजनीतिक अधिकार नहीं देने के पक्ष में थे। स्पेन्सर के सिद्धान्तों की अनेक बिन्दुओं पर आलोचना हुई। मशीन के युग में होने के कारण, मशीनीकरण या यंत्रीकरण को उन्होंने अनिवार्य मान लिया।

स्पेन्सर ने एक वैज्ञानिक की भाँति निरीक्षण से प्रारम्भ किया, वैज्ञानिक की ही तरह परिकल्पना का निर्माण करता था लेकिन एक अवैज्ञानिक की तरह प्रयोग नहीं करता था, न ही निष्पक्ष निरीक्षण करता था, पर अपने पक्ष में आकड़ों को इकट्ठा करता था।

स्पेन्सर ने ऐसे समय में लिखा जब इंग्लैंड के तुलनात्मक अलगाव ने उसे शांति का समर्थक बना दिया और वाणिज्य तथा उद्योग में सर्वोच्चता ने उन्हें स्वतंत्र व्यापार का प्रबल समर्थक बना दिया।

उसने राज्य द्वारा वित्तीय सहायता से शिक्षण संस्थाओं के संचालन का विरोध किया।

वह व्यक्ति के नितान्त निजीपन का प्रबल समर्थक था- राज्य द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम उसको अपनी स्वतंत्रता पर आक्रमण लगता था। फस्र्ट प्रिन्सिपल के प्रकाशन के साथ ही स्पेन्सर अपने समय का सर्वाधिक प्रसिद्ध दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। उस काल की वह युगचेतना का द्योतक बन गया। न केवल समस्त यूरोप के विचारों को स्पेन्सर ने प्रभावित किया- वरन् कला एवं साहित्य के यथार्थवादी आन्दोलन को भी प्रभावित किया। 1869 में स्पेन्सर का फस्र्ट प्रिन्सिपुल- आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पाठ्य पुस्तक के रूप में स्वीकृत हुआ।

1903 में अपनी मृत्यु के समय स्पेन्सर का विचार था कि उसका कार्य व्यर्थ गया। लेकिन यह सत्य नहीं है। उसकी लोकप्रियता में सामयिक गिरावट प्रत्यक्षवाद के विरूद्ध अंग्रेज- हीगलवादी प्रतिक्रिया के कारण आई थी। उदारवाद के विकास ने उन्हें फिर अपनी शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिकों में सर्वप्रमुख बना दिया। विल डुरांट के अनुसार अपने युग का प्रतिनिधित्व दाँते के समय से किसी भी दार्शनिक ने उस पूर्णता से नहीं किया जिस समग्रता से स्पेन्सर ने किया। उनका कार्य आश्चर्यजनक ढ़ंग से ज्ञान के अत्यन्त ही विशाल क्षेत्र को समाहित करता है।

स्पेन्सर का शिक्षा सिद्धान्त 

हरबर्ट स्पेन्सर न तो अधिक अध्ययन करता था और न ही एक वैज्ञानिक की तरह प्रयोग करता था। पर उसके विचार मौलिक थे। उसने यूरोप की शास्त्रीय भाषाओं; लैटिन तथा ग्रीक का विरोध किया। उदार शिक्षा की जगह वह वास्तविक भौतिक वस्तुओं एवं विज्ञान से सम्बन्धित ज्ञान की शिक्षा देना चाहता था। स्पेन्सर का विचार क्षेत्र अत्यन्त ही व्यापक था जिसमें वह लघु नक्षत्र की उत्पत्ति से लकर मानव मस्तिष्क की संरचना एवं क्रिया का अध्ययन करना चाहता था। स्पेन्सर ने शिक्षा को जीव विज्ञान से जोड़ते हुए कहा ‘‘शिक्षा शरीर के अवयवों को उन्नत करती है तथा उन्हें जीवन के योग्य बनाती है।’’

स्पेन्सर का शिक्षा सिद्धान्त रूसो के शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त से प्रभावित है। स्पेन्सर रूसो की ही तरह ‘प्राकृतिक परिणामों द्वारा शिक्षा’ पर बल देता है। साथ ही वह स्त्री को राजनीतिक अधिकार देने का विरोधी है और स्वस्थ गृहिणी के अतिरिक्त उसे अन्य किसी भूमिका में देखने को तैयार नहीं है।

स्पेन्सर ने विभिन्न विषयों के तुलनात्मक महत्व पर गंभीरता से विचार किया और ‘कौन सा ज्ञान उपयोगी है?’ के व्यापक प्रश्न को उठाते हुए उसका समाधान ढ़ूढ़ने का प्रयास किया है। स्पेन्सर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य है पूर्ण जीवन की तैयारी तथा व्यक्ति का कल्याण। 

‘‘पूर्ण जीवन के लिए तैयार करना शिक्षा की जिम्मेदारी है तथा किसी शैक्षिक पाठ्यक्रम के मूल्यांकन की एकमात्र विवेक युक्त विधि है कि यह इस कार्य के सम्पादन में किस हद तक सक्षम है।’’

पूर्ण जीवन की तैयारी है (1) ऐसे ज्ञान को प्राप्त करना जो व्यक्ति और सामाजिक जीवन के विकास के अनुकूल हो तथा (2) इस ज्ञान के उपयोग की शक्ति का विकास करना। कौन सा ज्ञान सर्वाधिक योग्य/उपयुक्त है- यह रूसो तथा बेकन दोनों के लिए अहम प्रश्न है। स्पेन्सर इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देते हैं-
  1. ऐसा ज्ञान जो प्रत्यक्ष रूप से आत्मसंरक्षण हेतु आवश्यक है जैसे- शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 
  2. ऐसा ज्ञान जो अप्रत्यक्ष रूप से आत्मसंरक्षण को बढ़ाता है जैसे भोजन प्राप्ति, वस्त्र एवं आवास से सम्बन्धित कला एवं विज्ञान। 
  3. संतान की देखभाल- आश्चर्य की बात है कि पशु के संतानोत्पत्ति पर ध्यान दिया जाता है, पुल या बाँध या जूते बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन यह मान लिया जाता है कि बिना किसी विशेष ज्ञान या प्रशिक्षण के माता-पिता एवं अध्यापक बच्चे के पालन पोषण में सक्षम हैं। महत्व में चौथा स्थान है- 
  4. राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन का ज्ञान, ताकि बच्चा भविष्य में कुशल नागरिक एवं पड़ोसी बन सके। सबसे अंत में आता है साहित्य, कला, सौन्दर्यशास्त्र, विदेशी भाषायें, जो जीवन के अवकाश के क्षण के लिए हैं- शिक्षा के अवकाश को भी इनको भरना चाहिए। इस तरह से प्रथम तीन आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक विज्ञान आवश्यक है अत: सामाजिक विज्ञान, जो कि चतुर्थ आवश्यकता को पूरा करता है से अधिक महत्वपूर्ण है। इस तरह से ‘उदार’ शिक्षा या सांस्कृतिक विषयों, जो कि उस समय विद्यालय का संपूर्ण पाठ्यक्रम था को कम महत्वपूर्ण माना गया। इस तरह से पुनर्जागरण द्वारा भाषा एवं साहित्य पर दिए गए जोर की स्पेन्सर ने उपेक्षा की। 

स्पेन्सर के शिक्षण सिद्धान्त 

स्पेन्सर अपने शिक्षण सूत्रों का आधार पेस्टोलॉजी के शिक्षण सिद्धान्त को बनाते है। स्पेन्सर के प्रमुख शिक्षण सूत्र है:
  1. सरल से जटिल की ओर : स्पेन्सर के अनुसार विषय के चयन एवं अध्यापन कार्य सरल से जटिल की ओर बढ़ना चाहिए। इससे सीखना सरल, रूचिकर एवं उत्साहवर्द्धक होता है। 
  2. ज्ञात से अज्ञात की ओर : शिक्षण कार्य को बोधगम्य बनाने हेतु यह आवश्यक है कि शिक्षण कार्य में अध्यापक ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़े। शिक्षण में प्रस्तावना कौशल इसी सूत्र पर आधारित है। 
  3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर : स्पेन्सर ने बच्चों को गिनती सिखाने हेतु वास्तविक वस्तुओं को गिनने का अभ्यास कराने को कहा। साथ ही कागजों को काँट-छाँट कर विभिन्न आकारों की वास्तविक जानकारी देने के उपरांत ही बच्चों को ज्यामिति पढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए। 
इसके अतिरिक्त स्पेन्सर ने अन्य सिद्धान्त भी प्रतिपादित किए, जैसे मानवता के विकास के क्रम की शिक्षा देनी चाहिए। साथ ही स्पेन्सर ने शिक्षण में प्रयोगात्मक तरीकों को अपनाने पर बल दिया। प्रयोग के द्वारा विद्याथ्र्ाी वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते हैं। उसका मानना था कि बच्चों को सीखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इससे बच्चों की सीखने की रूचि समाप्त हो जाती है। स्पेन्सर ने शिक्षा को रूचिकर तथा मनोरंजक बनाने पर बल दिया। इसका उच्चतम रूप बौद्धिक अभ्यास है।

पाठ्यक्रम 

स्पेन्सर पहला विचारक था जिसे विभिन्न विषयों को उपयोगिता के आधार पर क्रमबद्ध किया। उसने शिक्षा का उद्देश्य मानव को सम्पूर्ण जीवन के लिए तैयार करना बताया। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए स्पेन्सर ने विज्ञान की शिक्षा को आवश्यक बताया। शिक्षा के द्वारा ही मानव की आवश्यकतायें- बौद्धिक, नैतिक, शारीरिक की पूर्ति की जा सकती है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्पेन्सर ने निम्नलिखित विषयों के अध्ययन को महत्वपूर्ण माना:-
  1. आत्मसंरक्षण या रक्षा हेतु ज्ञान : शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, स्वच्छता, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र आदि। 
  2. अप्रत्यक्ष रूप से आत्मसंरक्षण से जुड़े विषय : भोजन प्राप्ति, वस्तु एवं आवास से सम्बन्धित विज्ञान एवं कला। इनमें गणित, रसायन शास्त्र, कृषि, मशीन आदि का अध्ययन।
  3. शिशु-पालन हेतु : बाल मनोविज्ञान तथा गृहशास्त्र। 
  4. राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन हेतु ज्ञान : इतिहास, समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र।
  5. अवकाश के समय कार्य : स्पेन्सर ने साहित्य, कला, काव्य आदि को महत्व प्रदान नहीं किया है पर अवकाश के क्षणों के सदुपयोग को ध्यान में रखते हुए इन विषयों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया है। 
स्पेन्सर ने नैतिकता की शिक्षा प्राकृतिक परिणाम के आधार पर ही देने का सुझाव दिया। इससे बच्चे में व्यावहारिक एवं स्थायी नैतिकता का विकास हो सकता है। स्पेन्सर ने शारीरिक शिक्षा को आवश्यक बताया। भोजन में पोषक तत्व जैसे- प्रोटीन, विटामिन किस मात्रा में उपलब्ध हो यह भी स्पेन्सर ने निश्चित किया। पौष्टिक भोजन, बेहतर स्वास्थ्य, व्यायाम, स्वच्छता आदि को स्पेन्सर ने शिक्षा एवं व्यक्ति के जीवन के लिए आवश्यक माना।

स्पेन्सर के सिद्धान्त की सीमायें 

स्पेन्सर के उपयोगितावादी सिद्धान्त की आलोचना की गई है। इसने शिक्षा के परम्परागत महत्व को समाप्त कर दिया। इस सिद्धान्त का पूर्णत: खंडन हुआ कि ‘जो विषय व्यावहारिक महत्व प्राप्त कर लेता है उसका शैक्षिक महत्व समाप्त हो जाता है।’ लेकिन जो व्यवहार को प्रभावित करता है, जीवन स्तर को सुधारता है, मानव को व्यक्तिगत ढ़ंग से या सामूहिक रूप में लाभान्वित करता है वही ‘उपयोगितावाद’ है।

यह कहा जाता है कि स्पेन्सर ने जीवन के श्रेष्ठ-तत्व ‘संस्कृति’ का बलिदान किया- निम्न चीजों के लिए- व्यावहारिक लाभ हेतु। इसके विपरीत उन्होंने सांस्कृतिक तत्वों को एक नए ढ़ंग से महत्व प्रदान किया। उन्होंने कहा ज्ञान के इन सभी पक्षों/स्तरों पर जोर दिया जाना चाहिए और सबों को इन्हें क्रम से प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए।

स्पेन्सर की एक आलोचना यह भी की जाती है कि शिक्षा जीवन के लिए तैयारी नहीं है वरन् यह जीवन है। स्पेन्सर ने ज्ञान का महत्व जीवन की तैयारी के लिए माना।

स्पेन्सर के लेख ‘इंटलेक्चुअल एडुकेशन’ में विधि के बारे में विस्तृत चर्चा करते हैं। इसमें वे पेस्टोलॉजी के सिद्धान्तों का विस्तार करते हैं- शिक्षा का विकास/विस्तार- सरल से जटिल, स्थूल से सूक्ष्म, अनुभव/प्रयोग से बुद्धिसंगत या युक्तिमूल इनमें स्पेन्सर कुछ भी जोड़ता नहीं है। रूसो के सिद्धान्त सभी नैतिक प्रशिक्षण का मूल बच्चे अपने कार्यों के प्राकृतिक परिणाम के अनुभव से नैतिक शिक्षा प्राप्त करे- को स्पेन्सर ने स्वीकार किया।

स्पेन्सर के कार्यों का शिक्षा पर प्रभाव 

स्पेन्सर के कार्यों का यूरोप और अमेरिका के विभिन्न देशों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। विज्ञान की शिक्षा को इन देशों के पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। फ्रांस में पाठ्यक्रम एवं पाठ्य विषयों में स्पेन्सर के सिद्धान्तों के अनुरूप परिवर्तन किया गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका में स्पेन्सर के विचारों को और अधिक उत्साह से अपनाया गया। रूढ़िवादिता का विरोध, व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर, स्वालम्बन आदि ने अमेरिका के बुद्धिजीवियों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। विषयों का चयन उपयोगिता के आधार पर होने की बात का अमेरिका में व्यापक स्वागत किया गया। इनमें से कई सिद्धान्त प्रसिद्ध अमेरिकी शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी ने आनाये। जॉन डीवी का कार्य स्पेन्सर के कार्यों से भी अधिक आगे चला गया अत: स्पेन्सर का अमेरिका पर उतना अधिक प्रभाव नहीं दिखता है जितना वास्तव में पड़ा था।

स्पेन्सर के विचारों के अनुरूप इंग्लैंड के विद्यालयों में विज्ञान की शिक्षा पर जोर दिया जाने लगा। 1875 में रॉयल कमीशन ने सुझाव दिया कि विद्यालयों में कम से कम आधा घण्टा तक विज्ञान का शिक्षण होना चाहिए। औद्योगिक समाज ने स्पेन्सर के विचारों को गर्मजोशी से स्वीकार किया।

विज्ञान की शिक्षा पर बल, पाठ्यक्रम को जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना तथा शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान करना- ये ऐसी उपलब्धियां हैं जिसने शिक्षा के क्षेत्र में हरबर्ट स्पेन्सर को एक महत्वपूर्ण विचारक के रूप में स्थापित कर दिया है।

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