जनतंत्र का अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्य

अनुक्रम
आधुनिक युग जनतंत्र व्यवस्था का युग है। जनतांत्रिक शासन व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। वर्तमान जनतंत्र साम्राज्यवादी प्रशासन के पश्चात् आया जबकि सम्पूर्ण विश्व औद्योगिक एवं भूमण्डलीकरण के प्रभाव में आया तो मनुष्य के अस्तित्व व अधिकारों में सर्वोच्चता आयी और विभिन्न देशों ने जनतंत्र शासन व्यवस्था को सहृदय होकर स्वीकारा। वैसे यह भी सत्य है कि जनतंत्र सिद्धान्तों की नींव पुरातन युग में भी प्रतीत होती है, परन्तु जनतंत्र की वर्तमान इमारत नवीन अवश्य है। जनतंत्र (डेमोक्रेसी) का साधारण अर्थ है जन+तंत्र या लोक+तंत्र जनता का शासन या शासन पर नियंत्रण, जनतंत्र एक प्रकार से सामाजिक संगठन है, और इसके अर्थ को भी विविध रूपो में लिया जाता है।
  1. राजनैतिक अर्थ में जनतंत्र- राजनैतिक दृष्टि से लाके तत्रं के अर्थ को स्पष्ट करते हुये ‘‘डायसी’’ ने लिखा है ‘‘लाकेतत्रं संसार का वह रूप है, जिसमें प्रशासकीय वर्ग सम्पूर्ण राष्ट्र का बहुत बड़ा भाग होता है।’’
  2. अब्राहम लिंकन-’’प्रजातंत्र वह सरकार है जो जनता की, जनता द्वारा तथा जनता के लिये है।’’
  3. सामाजिक संगठन के अर्थ में - सामाजिक दृष्टिकोण से लाके तत्रं का अर्थ वह व्यवस्था जिसमें वर्गगत जातिगत एवं लैंगिक भेदभाव के बगैर व्यक्ति की उन्नति के समान अवसर मिले।
  4. डा0 वर्मा के अनुसार -’’लाकेतत्रं सामूि हक रूप से राजनैतिक तथा सामाजिक प्रगति की एक प्रक्रिया है।’’
  5. भाटिया के शब्दो मेंं-  ‘‘सामाजिक लाके तत्रं -वर्ग जन्म या सम्पत्ति पर आधारित समस्त भेदों का अभाव है।’’
  6. कैण्डल ने जनतंत्र की परिभाषा देते हुुये कहा - ‘‘एक आदर्श रूप में जनतंत्र जीवन की एक विधि है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं उसके उत्तरादायित्व पर आधारित है।’’

जनतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

डयूवी ने लिखा है कि ‘‘लोकतंत्र केवल सरकार का रूप न होकर, उससे भी कुछ अधिक है। यह मुख्यत: सहयोगी जीवन और सम्मिलित रूप से किये गये अनुभव की विधि है।’’ इस प्रकार से यह निश्चित है कि शिक्षा लोगों को तैयार करे। शिक्षा को लोगों में सहजीवन व सहअस्तित्व की भावना विकसित करनी चाहिये। लोकतंत्र में शिक्षा के उद्देश्यों को तीन रूपों में बांटा जा सकता है- 1. व्यक्तिक उद्देश्य 2. समाज सम्बन्धी उद्देश्य 3. राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य।

    व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य 

    1. शारीरिक विकास - जनतत्रं शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के स्वास्थ्य को उत्तम बनाना।
    2. मानसिक विकास का उद्देश्य- शिक्षा को बालक का मानसिक विकास कर उसमें स्वतंत्र विचार तर्क एवं निर्णय शक्ति उत्पन्न करनी चाहिये।
    3. चारित्रिक विकास का उद्देश्य - शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य विद्याथिर्यों में अच्छे चरित्र का निर्माण करना है। जाकिर हुसैन के अनुसार- ‘‘हमारे शिक्षा कार्य का पुर्नसंगठन और व्यक्तियों का नैतिक पुनरूत्थान एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से गुथें हुये है।’’
    4. आध्यात्मिक विकास - शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में आध्यात्मिक एवं नैतिक गुणों का विकास किया जाना चाहिये, जिससे कि समाज में शान्ति बनी रहे। श्री अरविन्द ने कहा है- ‘‘शिक्षा का उद्देश्य विकसित होने वाली आत्मा को सर्वोत्तम प्रकार से विकास करने में सहायता देना और श्रेष्ठ कार्य के लिये पूर्ण बनाना होना चाहिये।’’
    5. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास - लोकतंत्र का सम्पूर्ण कलेवर उसके नागरिकों पर ही निर्भर है, अत: जनतंत्र में शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य - मानव व्यक्तित्व का चतुर्मुखी विकास करना है। शिक्षा को मानव की मनोवैज्ञानिक सामाजिक, भावात्मक और व्यावहारिक आवश्यकताओं पर ध्यान देना है।
    6. आत्मनिर्भरता की प्राप्ति - स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट तौर पर कहा है ‘‘मैं सच्ची शिक्षा उसको कहता हॅू जो बालक को इस योग्य बना दे कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।’’ शिक्षा को विद्यार्थियों में व्यावसायिक कुशलता की उन्नति पर ध्यान देना चाहिये। डा0 राधाकृष्णन ने लिखा है- ‘‘हमें युवकों को यथासम्भव सर्वोत्तम प्रकार के सर्वकार्य-कुशल, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिये प्रशिक्षित करना चाहिये। उन्हें शिष्टाचार और सम्मान के अलिखित नियमों को अपनी इच्छा से मानना सीखना चाहिये।’’

      समाज सम्बधी उद्देश्य  - 

      1. समाजवादी समाज की धारणा - यह कार्य शिक्षा ही कर सकती है कि वह समाज के मध्य विषमताओं को मिटाकर स्वस्थ और सुखी जीवन व्यतीत करने के समान अवसर, सामाजिक सुरक्षा की भावना नागरिकों में उत्पन्न करे। जवाहर लाल नेहरू ने शिक्षा के इस उद्देश्य पर बल देते हुये कहा था कि ‘‘मैं समाजवादी राज्य में विश्वास करता हॅू मैं चाहता हॅू कि शिक्षा का इस उद्देश्य की ओर विकास किया जाये।’’ संस्कृति का संरक्षण एवं पोषण- शिक्षा का एक दायित्व यह भी है कि वह भावी पीढ़ी में संस्कृति का सुरक्षित हस्तान्तरण करे और सांस्कृतिक तत्वों एवं धरोहरों के प्रति विद्यार्थियों को सचेत बनाये। ओटावे ने शिक्षा के इस कार्य की ओर इंगित किया है-’’शिक्षा का एक कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार के प्रतिमान को अपने तरूण और कार्यशील सदस्यों को प्रदान करना है।’’
      2. सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूकता एवं क्रियाशीलता - व्यक्ति समाज की इका है, अत: यह आवश्यक है कि वह समाज में सबके साथ मिलकर समाज के जीवन को नैतिक और भौतिक दृष्टिकोण से अधिक अच्छा बनाने का उत्तरदायित्व ले और उसमें इस प्रकार की भावना का समावेश शिक्षा द्वारा ही की जा सकती है।
      3. जन शिक्षा की व्यवस्था- शिक्षा जनतत्रं का आधार है अत: प्रत्यके व्यक्ति का शिक्षित होना अति आवश्यक है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वहन ठीक प्रकार से कर सकता है। अत: यह आवश्यक है कि शिक्षा घर - घर व जन-जन में फैले और उन्हें उद्दीप्त करे। स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है -’’मेरे विचार से जनता की अवहेलना महान राष्ट्रीय पाप है। को भी राजनीति उस समय तक सफल नहीं होगी जब तक भारत की जनता एक बार अच्छी तरह से शिक्षित न हो जाये।’’
      4. नेतृत्व के गुणों का विकास- लाके तत्रं का भविष्य कुशल नेतृत्व में है और जनता की सहभागिता आवश्यक होने के कारण यह आवश्यक है शिक्षा व्यवस्था भावी पीढ़ी में नेतश्त्व के गुण उत्पन्न करे। भावी पीढ़ी की शिक्षा इस प्रकार से तैयार करे कि यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कुशल नेतृत्व कर सके।
      5. माध्यमिक शिक्षा आयोग ने इस उद्देश्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये लिखा है- ‘‘जनतंत्रीय  भारत में शिक्षा महत्वपूर्ण उद्देश्य - व्यक्तियों के गुणों का विकास करना है।’’ भावात्मक एकता का विकास- भावात्मक एकता का अभिप्राय है सम्पूर्ण देश की जनसंख्या का भावनात्मक रूप से एक होना यह लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाती है। भावात्मक एकता आंतरिक संघर्ण को कम करती है। शिक्षा भावी पीढ़ी को उन कुशलताओं अभिरूचियों एवं दृष्टिकोणों का हस्तांतरित करती है, जिससे समाज की रक्षा होती है। अन्तर सांस्कृतिक भावना की उत्पत्ति- लोकतंत्र नागरिकों के एकता पर निर्भर करता है। लोकतंत्र ने यह अति आवश्यक है, कि विविधता में एकता के दर्शन हो और यह मानसिक एंव भावात्मक सुदृढ़ता से ही सम्भव है कि व्यक्ति प्रत्येक धर्म व संस्कृति का आदर करे और भावात्मक सुदृढ़ता एवं मानसिक परिपक्ता लाने का कार्य शिक्षा को करना होगा।

      राष्ट्र सम्बधी उद्देश्य - 

      1. राष्ट्रीय एकता का विकास- शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भावी जीवन में राष्ट्रीय एकता का विकास करना है, क्योंकि लेाकतंत्र का आधार एकता है, और एकता की भावना उत्पन्न व पुष्ट करने का कार्य शिक्षा करती है। श्राष्ट्र की आर्थिक सम्पन्नता हेतु उत्पादकता की वृद्धि मेंं सहयोग- लोकतंत्र की सफलता नागरिकों के आर्थिक सम्पन्नता पर निर्भर करता है क्योंकि आर्थिक विपन्नता कर्तव्य विमुख बनाती है, और आर्थिक सम्पन्नता राष्ट्र की उत्पादन क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, अत: शिक्षा का प्रमुख कार्य उत्पादन में वृद्धि कर कुशल मानव संसाधन भी तैयार करना है।
      2. कुशल नागरिकता का प्रशिक्षण- जनतंत्र में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य लोगों को नागरिकता का प्रशिक्षण देना भी है, क्येांकि कुशल नागरिक हो जनतंत्र को एक बेहतर दिशा दे सकते है, और नागरिक कुशलता उत्पन्न करने का कार्य शिक्षा का है। अमरीकाी शिक्षा के 35वें बुलेटिन में इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि ‘‘लोकतंत्र में शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान, रूचियों आदर्शों, आदतों और शक्तियों का विकास करना चाहिये, जिससे कि वह अपना उचित स्थान प्राप्त कर सके और उस स्थान का प्रयोग स्वयं व समाज दोनों के उच्च लक्ष्यों की ओर ले जाने को तैयार हो।’’

      जनतंत्र के लिये शिक्षा की आवश्यकता

      हुमायूॅ कबीर ने कहा है कि- ‘‘प्रजातंत्र सामाजिक संयोग और सामाजि प्रगति के लिये पाशविक शक्ति को अनुयय में बदलने का प्रयास करता है, शक्ति के बजाय विवेक को समाज का पथ प्रदर्शन करने वाला सिद्धान्त बनाने का अर्थ है। शिक्षा व्यक्तियों को समाज के रचनात्मक सदस्यों के रूप में तैयार करें।’’ इस आधार पर जनतंत्र के लिये शिक्षा की आवश्यकता स्वयं निर्धारित हो जाती है।
      1. नागरिकों को जनतंत्र को सफलता पूर्वक संचालन के गुण उत्पन्न करने के लिये शिक्षा का कार्य अहम है।
      2. नागरिकों को प्रबुद्ध सर्तक एवं जागरूकता उत्पन्न करने के लिये शिक्षा की टावश्यकता होगी।
      3. जनतंत्र केा सफल आधार प्रदान करने हेतु सफल मानव संसाधान तैयार करने हेतु शिक्षा चाहिये।
      4. नागरिकों में जनतंत्र के आदर्श समानता, भाचारा, धर्म सहिष्णुता उत्पन्न करने हेतु शिक्षा की भूमिका अहम है।
      5. शिक्षा के द्वारा जनतंत्र समाज में लोंगो को अपने अधिकारों के प्रति संचेतना जागृत होती है।
      6. जनतन्त्र में व्यक्ति स्वयं साध्य है और इसलियें शिक्षा का प्रमुख कार्य उसको अपनी शक्तियों के पूर्ण विकास के लिये अधिकाधिक अवसर प्रदान करना है।
      7. शिक्षा द्वारा मानव ने उम्पादन शक्ति को उत्पन्न एवं विकसित किया जाये जिससे राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि हो सके।
      8. शिक्षा नागरिकों को दायित्व निर्वहन के प्रति सजगता उम्पन्न करे।
      9. शिक्षा के द्वारा जनतन्त्र समाज में संस्कृति का पुनरूत्थान किया जाना चाहिये।
      10. शिक्षा सर्वांगीण विकास का माध्यम है। अत: यह जनतन्त्र को कुशल व शिक्षित नागरिक प्रदान करती है।
      11. जनतन्त्र नागरिकों के कुशलता एवं दक्षता पर निर्भर है। इसलिये जवाहर लाल नेहरू ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रथम वर्णगाठ के अवसर पर कहा था कि- ‘‘प्रजातन्त्र की कुशलता एवं निर्भरता यहॉ के शिक्षित नागरिकों पर है अत: हमें एक निश्चित समय के अन्दर सभी को शिक्षित कर लेना है।’’
      शिक्षा की इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर सरकार ने सबके लिये शिक्षा, सम्पूर्ण साक्षरता, शिक्षा के सार्वजनीकरण, स्कूल चलो अभियान और सर्वशिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम चलाये जिससे की भारत की सम्पूर्ण जनसंख्या शिक्षित हो जाये।

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