कविवर बिहारी लाल का जीवन परिचय

अनुक्रम [छुपाएँ]


कविवर बिहारी रीतिकाल के सप्रसिद्ध व चर्चित कवि है। इनका जन्म संवत् 1653 में ग्वालियर के निकट वसुआ गोविन्दपुरा गांव में हुआ था। आमेर के मिर्जा राजा जय सिंह के आश्रम में रहकर उन्होंंने सतस की रचना की । संवत् 1721 में वे परमधाम चले गये।।

रचनाएँ-

बिहारी सतस (700 दोहो का संग्रह उसकी सतस में हुआ है)।

भावपक्ष-

बिहारी मुख्यत: श्रृंगार रस के कवि है। उनकी कृति में प्रेम, सौंदर्य व भक्ति का सुन्दर समन्वय है। श्रृंगार रस के अतिरिक्त उन्होंने भक्ति परक, नीति परक एवं प्रकृति चित्रण आदि पर भी दोहे लिखे हैं।

कलापक्ष-

बिहारी लाल ने ब्रज भाषा को लालित्य एवं अभिव्यंजना शक्ति से सम्पन्न कर उसे सुन्दरतम स्वरूप प्रदान किया है। अलंकारों की योजना में भी बिहारी ने अपनी अपूर्व क्षमता का प्रदर्शन किया है। बिहारी की भाषा बोलचाल की होने पर भी साहित्यिक है। बिहारी की कलात्मकता के बारे में जितना कहा जाए उतना थोड़ा है। मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए वह बिहारी के दोहों में जाकर चरम उत्कर्ष को पहुंचा है। छोटे से दोहे में बिहारी ने गागर में सागर भरने वाली उक्ति चरितार्थ की है।

साहित्य मेंं स्थान-

रीतिकालीन कवि में बिहारी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आपको बिहारी- सतस रचना ने हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान किया है।

केन्द्रीय भाव-

बिहारी जी ने श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग एवं वियोग का चित्रण करते समय नायक-नायिका की दैनिक गति-विधियों को चुना है। बिहारी के भक्ति परक दोहे भक्तिकालीन काव्य से अलग हटकर है। उन्होंने सख्यभाव से अत्यंत अंतरंगता के साथ कृष्ण का स्मरण किया है। कृष्ण उसके काव्य में श्रृंगार के नायक के रूप में उपस्थित है। उन्होने प्रकृति के कोमल और रूचिकर रूपों के साथ साथ उनके प्रचंड रूपों का भी वर्णन किया है।

Comments