मारिया मांटेसरी का जीवन परिचय एवं शिक्षा के सिद्धान्त

अनुक्रम
मारिया मान्टेसरी का जन्म 1870 ई0 में इटली के एक सम्पन्न तथा सुशिक्षित परिवार में हुआ था। मारिया मान्टेसरी ने व्यवस्थित ढंग से शिक्षा प्राप्त की और 1894 में, चौबीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने रोम विश्वविद्यालय से चिकित्सा में एम0डी0 की उपाधि प्राप्त की। इसके उपरान्त इसी विश्वविद्यालय में उन्हें मन्द बुद्धि बालकों की शिक्षा का दायित्व दिया गया। इस कार्य के सम्पादन के दौरान उनकी रूचि शिक्षण पद्धति में जगी। मान्टेसरी ने पाया कि मन्द बुद्धि बालकों के पिछड़ेपन का कारण उनकी ज्ञानेन्द्रियों का कमजोर होना है। मान्टेसरी ने अनुभव किया कि तत्कालिन शिक्षा पद्धति की एक प्रमुख कमी है सभी विद्यार्थियों को एक ही विधि से समान शिक्षा का दिया जाना। ऐसी स्थिति में मन्द बुद्धि बालक का पिछड़ना स्वभाविक है। परम्परागत विधि में इन पिछड़े विद्याथिर्यों की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। मान्टेसरी ने इनकी शिक्षा के लिए अनेक प्रयोग किये। उनके द्वारा विकसित की गई शिक्षा एवं प्रशिक्षण की विधि ‘मान्टेसरी विधि’ कहलाती है।

मान्टेसरी विधि के उपयोग से पिछड़े बालकों ने आश्चर्यजनक ढ़ंग से प्रगति की। इटली की सरकार ने मान्टेसरी की सफलताओं को देखते हुए उन्हें बाल-गृह (हाउस ऑफ चाइल्डहुड) का अध्यक्ष बनाया। बाल गृह की अधीक्षक के रूप में उन्होंने कई प्रयोग किए, प्रयोगात्मक मनोंविज्ञान का अध्ययन किया, लोम्ब्रोसे और सर्गी जैसे विचारकों द्वारा प्रयुक्त शिक्षण विधि की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने शिक्षण-प्रशिक्षण को वैज्ञानिक बनाने हेतु लगातार निरीक्षण एवं प्रयोग किये। मंद-बुद्धि बालकों के संदर्भ में सफलता मिलने पर मान्टेसरी ने इसी विधि का उपयोग सामान्य बच्चों की शिक्षा के लिए भी किया। मान्टेसरी के अनुसार जो पद्धति छह वर्ष के मंद-बुद्धि बालक के लिए उपयुक्त है वही पद्धति तीन वर्ष के सामान्य बुद्धि के बालक के लिए उपयोगी है। अत: उन्होंने अपनी विधि का उपयोग दोनों ही तरह के विद्यार्थियों को शिक्षित करने के लिए किया।

मान्टेसरी ने अपनी विधि के संदर्भ में एक पुस्तक ‘मान्टेसरी मेथड’ की रचना की। पूरे यूरोप में मान्टेसरी की विधि लोकप्रिय होती गई। 1939 में थियोसोफिकल सोसाइटी के निमन्त्रण पर मारिया मान्टेसरी भारत आई और मान्टेसरी विधि के संदर्भ में अनेक व्याख्यान दिये। मद्रास में मान्टेसरी संघ की शाखा स्थापित की और अहमदाबाद में बड़ी संख्या में अध्यापकों को मान्टेसरी पद्धति का प्रशिक्षण दिया। वे इण्डियन ट्रेनिंग कोचर्स इंस्टीट्यूट, अडियार की निर्देशिका भी रहीं। इस तरह से उन्होंने न केवल यूरोप वरन् भारत में भी मान्टेसरी पद्धति को लोकप्रिय बनाया। वस्तुत: सम्पूर्ण विश्व में शिशु शिक्षा के क्षेत्र में मान्टेसरी के प्रयोगों ने क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। वे लगातार शिशु शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत रहीं। अन्तत: 1952 ई0 में इस महान अध्यापिका का देहावसान हो गया।

 मान्टेसरी पद्धति का विकास 

आवास स्थिति के संदर्भ में सामाजिक प्रयोग के द्वारा शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए विकसित की गई शिक्षा विधि का सामान्य बच्चों के संदर्भ में उपयोग मान्टेसरी पद्वति के जन्म का कारण है।

रोम के निर्धनतम परिवारों के आवास से सम्बन्धित सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने हेतु ‘असोसिएशन ऑफ गुड बिल्डिंग’ बनाया गया- इसने आवासीय क्वार्टरों को तो पुनर्निमित किया पर स्कूल नहीं जाने योग्य छोटे बच्चों की समस्या बनी रही। ये दिन में भवन को गंदा करते रहते थे। इस समस्या के समाधान हेतु रोम के ‘असोसिएशन ऑफ गुड बिल्डिंग’ के डाइरेक्टर जनरल के मन में विचार आया कि एक बड़े हॉल में तीन से सात वर्ष के चाल में रहने वाले सभी बच्चों को इकट्ठा किया जाये और उनके लिए खेल तथा कार्य की व्यवस्था किसी अध्यापिका की देखरेख में की जाये जो उसी आवासीय परिसर में अपने अपार्टमेंट में रहें। इस तरह से ‘हाउस ऑफ चाइल्डहुड’ के नाम से आवासीय परिसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई।

हाउस ऑफ चाइल्डहुड का उद्देश्य ऐसे बच्चों की व्यक्तिगत देखरेख करना था जिनके अभिभावक अपने दैनिक कार्य/व्यवसाय के कारण बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ हैं। आवासीय परिसर में रहने वाले तीन से सात वर्ष के बच्चों को अर्ह माना गया। कोई शुल्क नहीं लगना था पर तय समय पर बच्चों को साफ-सुथरे वस्त्र में पहुँचाना था, डाइरेक्टरेस के प्रति सम्मान तथा बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना था।

इस प्रकार सामाजिक आवश्यकता ने शिक्षा के एक नए अभिकरण को जन्म दिया। यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर गरीब बच्चों के लिए शुरू की गई व्यवस्था अमीर बच्चों के लिए ही सीमित हो जाए।

1906 में डाइरेक्टर जनरल ऑफ रोमन असोसिएशन ऑफ गुड बिल्डिंग ने शिशु विद्यालय के संचालन का दायित्व मारिया मान्टेसरी को सौंपा जिन्होंने अपने पूर्व के अनुभव एवं प्रशिक्षण के आधार पर अपनी विधि का विकास किया। चिकित्साशास्त्र में स्नातक होने के नाते उन पर मानसिक रूप से विकलांग या दोषपूर्ण बच्चों के प्रशिक्षण का दायित्व था। इस कार्य में मारिया मान्टेसरी को अभूतपूर्व सफलता मिली- इस तरह के काफी बच्चों को उन्होंने लिखना-पढ़ना सिखाया। वे अपने आयुवर्ग के सामान्य बच्चों के साथ परीक्षा में बैठकर सफल हुए। इस प्रभावशाली सफलता का कारण मान्टेसरी के अनुसार बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण विधि है जिनके द्वारा इन बच्चों को पढ़ाया गया था। मारिया मान्टेसरी ने निष्कर्ष निकाला अगर इस श्रेष्ठ विधि का प्रयोग सामान्य बालकों की शिक्षा हेतु किया जाये तो परिणाम और आश्चर्यजनक होंगे।

मान्टेसरी पद्धति की शिक्षा के सिद्वान्त 

मान्टेसरी ने पहले मानसिक रूप से कमजोर या विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए जो सिद्वान्त प्रतिपादित किए उन्हें बाद में सामान्य शिशुओं की शिक्षा पर लागू किया। ये सिद्वान्त हैं :-

स्वतंत्रता का सिद्धान्त- 

पहला सिद्धान्त दैनिक जीवन की सामान्य क्रियाकलापों में बच्चों को स्वतंत्र बनाना। मस्तिष्क का अल्प विकास होता है अत: बुद्धि की जगह इन्द्रिय प्रशिक्षण पर जोर दिया जाना चाहिए। शारीरिक विकलांगता वाले बच्चों में खराब अंग या इन्द्रिय की कमी को पूरा करने हेतु दूसरे इन्द्रियों के प्रयोग का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए- जैसे नेत्रविहीन के लिए स्पर्श की शक्ति का विकास किया जाना चाहिए। स्पर्श को मारिया मान्टेसरी अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं मूल मानती है- इसका विकास प्रारम्भिक वषोर्ं में बहुत अधिक किया जा सकता है।

मनोविज्ञान का सिद्धान्त- 

एडवर्ड सेगुइन, जिनका प्रभाव मान्टेसरी पर पड़ा, ने कमजोर दिमाग वाले बच्चों के प्रशिक्षण को शारीरिक विधि कहा। पर मान्टेसरी द्वारा की गई प्रगति को देखते हुए इसे मनोवैज्ञानिक विधि कहा जा सकता है। शिक्षा में मनोवैज्ञानिक विधि से तात्पर्य है शैक्षिक प्रक्रिया बच्चे मानसिक विकास के स्तर तथा उसकी रूचि पर निर्भर करती है न कि पाठ्यक्रम की आवश्यकताओं पर और न ही अध्यापक की कार्य योजना पर। मान्टेसरी ने कहा ‘‘शिक्षा से तात्पर्य है बच्चे के जीवन के सामान्य विस्तार हेतु दी गयी क्रियाशील सहायता।’’ शैक्षिक प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक पल तब आता है जब बच्चे के मस्तिष्क में आवश्यकता की जागरूकता आती है। अत: यह आवश्यक है बच्चे द्वारा विकास की आवश्यकता को महसूस किये जाने पर कार्य/प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अगर कोई बच्चा कोई कार्य नहीं कर पाता या कोई चीज नहीं समझ पाता तो अध्यापक को उसे दुहराने की बजाय यह मानना चाहिए कि कार्य समय से पूर्व दे दिया गया- जब बच्चा उसकी आवश्यकता दिखाये तो पुन: वह पाठ/कार्य दिया जाना चाहिए। किसी कार्य के लिए समय सारिणी को ध्यान में रखने की जगह बच्चे की रूचि और सीखने की इच्छा को ध्यान में रखना चाहिए। मान्टेसरी पद्धति में एक ही कार्य पर बच्चे कई दिन लगा सकते है।

स्वशिक्षा का सिद्धान्त- 

मान्टेसरी पद्धति में कोई पुरस्कार नहीं होता। छात्र का कार्य/ज्ञान में कुशल हो जाने का भाव सबसे बड़ा पुरस्कार है। ‘‘उसका अपना स्वयं का विकास सही तथा एकमात्र प्रसन्नता या उपलब्धि है।’’ मान्टेसरी के अनुसार सुधार वस्तुओं से आता है न कि अध्यापकों से। ‘‘शिशु सदन में अनुशासन एवं स्थिरता बनाए रखने वाली एवं लगातार व्याख्यान देने वाली पुरानी अध्यापिकाओं की जगह शैक्षिक वस्तुओं ने ले ली है, जिसमें गलतियों को नियन्त्रित करने की अन्तर्निहित क्षमता होती है- और स्वतंत्रता एवं स्वशिक्षा संभव होती है।’’

आत्म अनुशासन का सिद्धान्त- 

मनोवैज्ञानिक पद्धति में बच्चे को पूर्ण स्वतंत्रता होती है, स्वतंत्रता, जिसमें वह अपनी प्रकृति के विकास के सिद्धान्त के प्रति पूर्णत: आज्ञाकारी होता है। बच्चों को कार्य करने की स्वतंत्रता होती है। जिसने भी मान्टेसरी विद्यालय देखा वह वहाँ के अनुशासन से अत्यधिक प्रभावित हुआ। चालीस छोटे बच्चे (3 से 7 वर्ष के)- प्रत्येक अपने-अपने कार्य में लगा हुआ। कोई इन्द्रियों से सम्बन्धित अभ्यास में लगा है, तो काई अंकगणित की समस्या में, कोई अक्षरों को संभाल रहा है तो कोई चित्र बना रहा है, कोई लकड़ी के टुकड़े में कपड़े को बाँध और खोल रहा है, कोई सफाई कर रहा है, कुछ लोग टेबुल पर बैठे हैं, कुछ लोग दरी पर नीचे। कुछ लोगों के लिए यह लाइसेन्स लग सकता है पर यह स्वतंत्रता की समय-समय पर पुनर्खोज करने का शिक्षाशास्त्रियों का तरीका है।

वैयक्तिक विकास का सिद्धान्त- 

फ्रोबेल की ही तरह मान्टेसरी का मानना है कि शिक्षा वस्तुत: व्यक्ति के अन्दर निहित शक्तियों के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है। भविष्य की क्षमताओं के बीज बच्चे में जन्म के समय से उपस्थित रहते हैं। अध्यापिका या डाइरेक्ट्रेस का कार्य है जन्म के समय उपस्थित शक्तियों के विकास हेतु उपयुक्त वातावरण प्रदान करना।

ज्ञानेन्द्रिय प्रशिक्षण द्वारा शिक्षा- 

मान्टेसरी ने शिक्षा में ज्ञानेन्द्रियों पर अत्यधिक जोर दिया है। उनका कहना है कि मानव ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है। अगर इन्द्रियों का विकास अवरूद्ध हुआ तो ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं होगा। अत: ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार तीन से सात वर्ष तक की अवस्था में बच्चों की इन्द्रियाँ विशेष रूप से क्रियाशील रहती हैं अत: इनके विकास पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।
  1. कर्मेन्द्रियों की शिक्षा- मारिया मान्टेसरी कर्मेन्द्रियों की शिक्षा को मानव शिशु के लिए आवश्यक मानती हैं। शरीर के सभी अंगो को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि बच्चों को अंगो के सही संचालन की शिक्षा दी जाय। अंग-संचालन हेतु मांसपेशियों पर नियन्त्रण से खेलना-कूदना, लिखना-पढ़ना आदि क्रियायें सफल हो सकती हैं।
  2. खेल के माध्यम से शिक्षा- मान्टेसरी ने शिक्षा को बालक या बालिका की रूचि एवं क्षमता के अनुरूप देने पर जोर दिया। बालक की खेल में रूचि अत्यन्त स्वभाविक है। अत: प्रारम्भ में खेल के माध्यम से ही शिक्षा दी जानी चाहिए। शिशु को विभिन्न तरह के शैक्षिक यन्त्र दिए जाने चाहिए। इनसे खेलते-खेलते वह वर्णमाला, गणित, भाषा आदि विषय सीख जाता है।

मान्टेसरी विधि का क्रियान्वयन 

मान्टेसरी ने तीन तरह से बच्चों को प्रशिक्षित करने का सुझाव दिया-
  1. व्यावहारिक जीवन के अभ्यास या कार्य,
  2. इन्द्रिय या संवेदी प्रशिक्षण के कार्य, 
  3. शिक्षा से सम्बन्धित कार्य। 

व्यावहारिक जीवन के कार्यों का अभ्यास 

कमजोर दिमाग के बच्चों को अपने को संभालने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह स्वतंत्रता में प्रशिक्षण है- स्वतंत्रता के लिए सामान्य कार्य करे- दूसरे के कहने की आवश्यकता न हो। ‘हाउस ऑफ चाइल्डहुड’ में बच्चे अपना हाथ धोना सीखते हैं, नाखूनों को साफ करना, दाँत को ब्रश करना, वस्त्र पहनना और बदलना सीखता है। चाइल्डहुड हाउस के सारे फर्नीचर ऐसे होते हैं जिसे बच्चे स्वयं एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकें। इससे मोटर ट्रेनिंग भी हो जाती है।

कुछ जिमनास्टिक अभ्यास भी मान्टेसरी ने विकसित किए- ताकि समन्वित गति आ सके। लेकिन उन्होंने बच्चों के लिए व्यस्कों के व्यायाम का विरोध किया। व्यायाम आयु के अनुरूप ही होना चाहिए। जैसे कि एक उदाहरण उपकरण का है- लिटिल राउन्ड स्टेयर इससे बच्चा सही ढ़ंग से सीढ़ी चढ़ना और उतरना सीखता है जबकि सामान्य घरों में सीढ़ियाँ बड़ों को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं।

इन्द्रिय या संवेदी प्रशिक्षण कार्य 

इन्द्रिय या संवेदी प्रशिक्षण के लिए मान्टेसरी प्रयोगात्मक मनोवैज्ञानिकों के परीक्षणों और उपकरणों पर निर्भर करती है। लेकिन दोनों में अन्तर है। प्रयोगात्मक मनोविज्ञान तथा इन्द्रिय प्रशिक्षण में आधारभूत भिन्नता है- प्रयोगात्मक मनोविज्ञान प्रयोगों के द्वारा इन्द्रिय या संवेदी शक्ति का मापन करना चाहता है जबकि मान्टेसरी शक्ति का मापन करने की बजाय संवेदी शक्ति के विकास को चाहती है।

सामान्य बच्चे उन अभ्यासों को दोहराने में आनन्द की अनुभूति करते हैं जिन्हें उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। कमजोर मस्तिष्क के बच्चे जिस कार्य को एक बार पूरा कर लेते है उसे दुबारा करने की इच्छा नहीं दिखाते हैं। अल्प बुद्धि वाले बच्चों की गलती को सुधरवाना पड़ता है जबकि सामान्य बच्चे अपनी गलतियों को स्वयं सुधारना चाहते हैं। वे शैक्षिक वस्तु जो अल्पबुद्धि बच्चे के संदर्भ में शिक्षा को संभव बनाता है- सामान्य बच्चों के संदर्भ में स्व-शिक्षा को बढ़ावा देता है।

इन्द्रिय या संवेदी प्रशिक्षण में मान्टेसरी रूसो की ही तरह इन्द्रियों को अलग-अलग करने पर बल देती है। यह शारीरिक विकलांग बच्चों की शिक्षा पर आधारित है- दृष्टिहीन व्यक्तियों की स्पर्श शक्ति काफी संवेदनशील हो जाती है। स्पर्श की शक्ति के विकास के लिए बच्चों को मान्टेसरी विद्यालयों में आँख बाँधकर प्रशिक्षण दिया जाता है। श्रवण शक्ति का अभ्यास न केवल शांत वातावरण वरन् अंधेरे में भी किया जाता है।

इन्द्रिय या संवेदी प्रशिक्षण में आकार के अनुभव/ज्ञान के लिए बेलनाकार लकड़ी के टुकड़े- केवल ऊचाँई में अंतर, चौड़ाई में अंतर- या दोनों अंतर के साथ रखे जाते हैं। इसी तरह से ब्लॉक या कुन्दा जिसके आकार में लगातार अंतर हो तथा छड़ या रॉड अलग-अलग लम्बाई के; रेखागणित या आकार की समझ के लिए लोहे या लकड़ी के बने हुए और बाद में कागज पर बनाए गए रेखागणितीय आकृति दिए जा सकते है। वजन की समझ के लिए लकड़ी के समान आकार पर भिन्न वजन की पÍी दी जा सकती है। स्पर्श की समझ के लिए एक अत्यन्त ही चिकना धरातल और दूसरा खुरदरा धरातल, ताप की समझ के लिए छोटे-छोटे धातु के कटोरे- ढ़क्कन सहित दिए जा सकते हैं, श्रवण शक्ति के लिए भिन्न-भिन्न बेलनाकार ध्वनि बॉक्स भिन्न-भिन्न वस्तुओं वाले हो सकते है, रंग के ज्ञान के लिए विभिन्न रंगों में रंगे ऊन दिए जाने चाहिए।

शिक्षण विधि को रंगों की भिन्नता के संदर्भ में समझा जा सकता है जो मान्टेसरी ने सेग्विन से ग्रहण किया था। इसके तीन पद हैं-
  1. रंग के नाम के साथ संवेदी समझ को जोड़ना। जैसे अध्यापिका दो रंग को दिखाती है लाल एवं नीला। लाल को दिखाते समय कहेगी ‘‘यह लाल रंग है’’ नीला दिखाते समय कहेगी ‘‘यह नीला रंग है’’। 
  2. द्वितीय सोपान में बच्चा रंग पहचानने लगेगा। मुझे ‘लाल’ रंग दो, मुझे ‘नीला’ रंग दो। 
  3. वस्तु से जुड़े रंग को याद रखना। अध्यापिका कहेगी ‘यह क्या है?’ बच्चा कहेगा ‘लाल’ या ‘नीला’। 
इसी तरह का प्रशिक्षण स्पर्श, श्रवण, वजन तथा तापक्रम में अन्तर करने की क्षमता के विकास के लिए दिया जा सकता है। इनमें बच्चों का आँख बन्द किया जाता है या उन्हें बन्द रखने को कहा जाता है। उन्हें यह समझाया जाता है कि इससे वे अंतर को बेहतर समझ पायेंगे।

ठोस आकृति जिसमें बच्चे का पूर्ण नियंत्रण था, के उपरांत अब दृष्टि पर आधारित आकार की समझ पर आता है। वह अब लकड़ी की आकृति को नीले कागज पर बने आउटलाइन में सजाता है। बाद में चित्र भी नीले कागज का आउटलाइन होता है। अंतत: वह लकड़ी के टुकड़ों को केवल रेखा द्वारा खीचे चित्रों पर डालता है।

इस प्रकार वह वास्तविक से सूक्ष्म, ठोस वस्तु से चित्रों, जो केवल रेखाओं द्वारा बना होता है और जिसे केवल देखकर समझा जाता है तक पहुँचता है। इस तरह से कई चित्रों जैसे वृत्त, त्रिभुज, चतुभ्र्ाुज आदि का ज्ञान होता है। और जब बच्चों द्वारा आवश्यकता महसूस की जाती है, इनका नाम बताया जाता है। आकार का कोई स्पष्टीकरण नहीं किया जाता है अत: कहा जा सकता है कि रेखागणित की पढ़ाई नहीं की जा रही है।

मान्टेसरी द्वारा प्रयोग किये जाने वाले मुख्य उपकरण निम्नलिखित हैं-
  1. छिद्रों वाला तख्ता : एक बक्से के भीतर के तल में अलग-अलग आकार के छिद्र बने होते हैं। बक्से में ही विभिन्न आकार के गुटके भी होते हैं। बालक गुटकों को छिद्रों में बैठाने की कोशिश करता है।
  2. सिलेण्डर (बेलनाकार वस्तु) : कई छोटे-बड़े सिलेण्डर होते हैं। शिशु इन्हें क्रम से सजाता है। 
  3. घन : विभिन्न आकारों के अनेक घन होते हैं। बच्चे खेल-खेल में इन्हें सजाते हैं और कई आकार बनाते हैं। 
  4. भिन्न-भिन्न रंगों की टिकियाँ : शिशु इनसे रंगों की पहचान करता है। 

शिक्षा से सम्बन्धित कार्य 

मान्टेसरी विधि में लिखना पहले और पढ़ना बाद में सिखाया जाता है। उनके अनुसार पढ़ना मानसिक विकास से सम्बन्धित है जबकि लिखने में केवल अनुकरण की जरूरत होती है जो बच्चों के लिए आसान है। लिखना सीखने में तीन क्रियायें कराई जाती हैं-
  1. लेखनी पकड़ने का अभ्यास।
  2. अक्षर का स्वरूप समझना। 
  3. अक्षरों में भेद कर सकने में सक्षम होना। 
लिखना सीखने के बाद पढ़ना सिखाया जाता है। इसमें लिखी हुई परिचित वस्तुओं का वाचन कराया जाता है। जब बालक शब्द की ध्वनि का सही उच्चारण करने लगता है तब उसे पूरे शब्द की कई बार आवश्त्ति करायी जाती है। मान्टेसरी के अनुसार मांसपेशीय समझ शैशवावस्था में बड़ी आसानी से विकसित होती है और यह बच्चों में लेखन की क्षमता के विकास को अत्यधिक आसान कर देता है। पढ़ने में और अधिक भिन्न-भिन्न बौद्धिक विकास चाहिए, क्योंकि इसमें संकेतों की व्याख्या होती है। भिन्न-भिन्न स्वरों एवं वर्णों के उच्चारण में आवाज में परिवर्तन- ताकि शब्द समझा जा सके। पढ़ना अधिक उच्चस्तरीय मानसिक कार्य है- लिखने में बच्चे आवाज को कुछ चिन्हों में बदलता है तथा कुछ गति करता है- यह कार्य आसान होता है तथा बच्चे को आनन्द भी आता है। लिखने की विधि का विकास मान्टेसरी ने एक कमजोर बालिका द्वारा सीना सीखाने के अनुभव से किया। इसकी तैयारी के लिए शुरूआती गतिविधि या तैयारी आवश्यक है। वास्तविक कार्य बाद में होता है।

मान्टेसरी के अनुसार प्रारम्भिक तैयारी के अभ्यास और प्रथम लिखित शब्द के मध्य 4 वर्ष के बच्चे के लिए एक से डेढ़ महीने तथा 5 वर्ष के बच्चे के लिए और कम- एक महीना लगता है। तीन महीनों में बच्चे कुशल हो जाते हैं। लिखने की प्रक्रिया की शुरूआत में पन्द्रह दिन लगते हैं। मान्टेसरी विधि के अनुसार सामान्य बच्चा चार वर्ष की उम्र में लिखना और पाँच वर्ष में पढ़ना शुरू कर देता है।

डाइरेक्ट्रस (अध्यापिका) की योग्यता 

मान्टेसरी विधि में शिक्षण कार्य करने के लिए बाल मनोविज्ञान का विस्तृत ज्ञान होना चाहिए तथा जिसे प्रयोगशाला पद्धति, वैज्ञानिक संस्कृति तथा प्रयोगवादी मनोविज्ञान का ज्ञान हो वही सफल अध्यापिका हो सकती है। अध्यापक प्रशिक्षण का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह जाने कि कब बच्चे की गतिविधि में हस्तक्षेप करें तथा अधिक महत्वपूर्ण कि कब हस्तक्षेप करने से रूकें। मान्टेसरी ने टीचर की जगह डाइरेक्ट्रस उपाधि का प्रयोग किया।

 रस्क के अनुसार मान्टेसरी की प्रसिद्धि शिक्षा के क्षेत्र में संवेदी (इन्द्रिय) प्रशिक्षण के कारण है। संभवत: उन्होंने इसको कुछ अधिक ही महत्व दिया। संवेदी प्रशिक्षण में स्थायी महत्व का वस्तु है व्यावहारिक व्यायाम। तथा शैक्षिक प्रक्रिया से सम्बन्धित सहयोगी ‘हाउस ऑफ चाइल्डहुड’ जैसी सामाजिक संस्था का विकास हुआ। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था इंडिविड्यूलिज्म (बच्चा विशेष पर व्यक्तिगत ध्यान देना) जो कि मनोवैज्ञानिक विधि के प्रयोग के कारण हुआ। बच्चा विशेष पर व्यक्तिगत ध्यान देने की मान्टेसरी की यह पद्धति आधुनिक शिक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करती है- यह भविष्य के विद्यालय का एक महत्वपूर्ण पक्ष होगा।

मान्टेसरी पद्धति की विशेषतायें 

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर हम मान्टेसरी पद्धति में  विशेषतायें पाते हैं-
  1. मान्टेसरी की शिक्षण विधि वैज्ञानिक विधि पर आधारित है। मान्टेसरी ने निरीक्षण, अनुभव तथा प्रयोग के आधार पर पद्धति का विकास किया।
  2. रूसो, पेस्टोलॉजी एवं फ्रोबेल की ही भाँति मान्टेसरी भी विद्यार्थियों की पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन करती है। इनके अनुसार स्वतंत्र वातावरण में ही स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास हो सकता है। मान्टेसरी की पद्धति वैयक्तिक है।
  3. मान्टेसरी द्वारा प्रस्तावित ज्ञानेन्द्रियों का शिक्षण मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुकूल है। 
  4. मान्टेसरी के द्वारा प्रारम्भ की गई लिखना एवं पढ़ना सिखाने की विधियाँ सर्वथा नवीन हैं। प्रथम बार किसी शिक्षाशास्त्री ने लिखना सिखाने की क्रिया में मांसपेशियों के सन्तुलन पर जोर दिया है। 
  5. बालकों को पूर्ण स्वतंत्रता होती है और अध्यापिका उनके कार्यों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती, इसलिए अनुशासन की कोई समस्या नहीं रह जाती है। 
  6. इस प्रणाली में मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास का भी ध्यान रखा जाता है। 

मान्टेसरी पद्धति की सीमायें 

  1. मान्टेसरी का बच्चों का स्वयं सीखने का सिद्धान्त उत्तम है। पर इसे सभी विषयों पर लागू नहीं किया जा सकता है। साथ ही यह बहुत अधिक समय ले सकता है। 
  2. उनका इन्द्रियों के प्रशिक्षण का सिद्धान्त पुरानी पद्धति पर आधारित है। एक बार में एक ज्ञानेन्द्रिय का प्रशिक्षण आधुनिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुकूल नहीं है। 
  3. भिन्न-भिन्न विषयों को समन्वित करके पढ़ने का आयोजन तथा बालगृहों पर बहुत अधिक व्यय होता है। इसे अविकसित और विकासशील देशों में सभी बच्चों के लिए लागू कर पाना संभव नहीं दिखता है। 
  4. इस प्रणाली में कल्पनात्मक खेलों की उपेक्षा की जाती है। खेल खेल के लिए हो तभी वह खेल होगा अन्यथा कार्य हो जायेगा। 
  5. प्रयोजनवादी शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक ने इस पद्धति का मूल्यांकन करते हुए कहा कि इसमें बालक के व्यक्तित्व के विकास पर जोर दिया गया है पर उसके सामाजिक पक्ष के विकास की उपेक्षा की गई है। ऐसा विकास एकांगी विकास होगा। 
रॉस के अनुसार मान्टेसरी पर सामाजिक उत्तरदायित्व एवं विनम्र व्यवहार के प्रति लापरवाह होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। वे अपने डाइरेक्ट्रेस को सुझाव देती हैं कि वे उस हद तक हस्तक्षेप करें कि विद्यालय असामाजिक व्यवहार को हतोत्साहित करे और दोषियों को सामुदायिक कार्य में अस्थायी तौर पर भाग लेने से रोक दे। इस तरह से यहाँ अध्यापिका के उत्तरदायित्व को स्वीकार किया गया है। लेकिन यह कार्य उन्हें अपने को पृष्ठभूमि में रखते हुए, विद्यालय के वातावरण द्वारा पूरा करना चाहिए। जैसा कि हम सब जानते हैं विद्यालय के वातावरण के निर्माण में अध्यापिका की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। अध्यापिका चाहे जितना भी पृष्ठभूमि में रहे उसके प्रभाव एवं निर्देशन में ही विद्यालय की व्यवस्था चलती है। वस्तुत: मान्टेसरी सावधानी से नियोजित वातावरण के द्वारा विद्यार्थियों को प्रभावित करना चाहती हैं।

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