मौलिक अधिकार किसे कहते हैं कितने प्रकार के होते हैं?

मौलिक अधिकार वे अधिकार होते है जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक एवं आवश्यक होने के कारण संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते है।

मौलिक अधिकार की परिभाषा

1. डॉ. अम्बेडकर - ‘‘यदि मुझसे कोई प्रश्न पूछे कि संविधान का वह कौन सा अनुच्छेद है जिसके बिना संविधान शुन्यप्राय हो जायेगा तो इस अनुच्छेद 32 को छोड़कर मैं किसी और अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता यह संविधान की हृदय एवं आत्मा है।’’

2. श्री ए.एन.पालकीपाल ने कहा है- ‘‘मौलिक अधिकार राज्य के निरंकुश स्वरूप से साधारण नागरिकों की रक्षा करने वाला कवच है।’’

3. न्यायाधीश के. सुब्बाराव के अनुसार - ‘‘परम्परागत प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम मौलिक अधिकार है।’’

4. मक्कन - अधिकार सामाजिक कल्याण की कुछ लाभदायक परिस्थितियाँ हैं।

5. हैराल्ड जे. लास्की - अधिकारों को सामाजिक जीवन की उन परिस्थितियों की संज्ञा दी है जिसके आभाव में व्यक्ति का पूर्ण विकास सम्भव नहीं।

6. हाॅब हाउस - अधिकार व कर्तव्य सामाजिक जीवन की दषाएँ हैं।

मौलिक अधिकार के प्रकार

भारत संविधान में 7 मौलिक अधिकार 7 थे। यद्यपि वर्ष 1976 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों की सूची में से संपत्ति का अधिकार हटा दिया गया था। तब से यह एक कानूनी अधिकार बन गया है। अब कुल छ: मौलिक अधिकार है। भारत संविधान में अब कुल छ: मौलिक अधिकार है। भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं निम्नलिखित है -
  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
  5. सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मौलिक अधिकार के प्रकार

1. समानता का अधिकार

भारतीय समाज के व्याप्त असमानताओं एवं विषमताओं को दूर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता के अधिकार का उल्लेख किया गया है।
  1. विधि के समक्ष समानता - अनुच्छेद 14 के अनुसार ‘‘भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता से वंचित नहीं किया जावेगा। आशय कानून की दृष्टि से सब नागरिक समान है।
  2. सामाजिक समानता - अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नगरिक के विरूध धर्म वंश जाति लिंग जन्म स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में पक्षपात नहीं किया जावेगा।
  3. अवसर की समानता - अनुच्छेद 16 की व्यवस्था के अनुसार राज्य की नौकरियों के लिए सभी को समान अवसर प्राप्त होंगे।
  4. अस्पृश्यता का अंत - अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। किसी भी दृष्टि में अस्पृश्यता का आचरण करना कानून दृष्टि में अपराध एवं दण्डनीय होगा।
  5. उपाधियों का अंत - अनुच्छेद 18 के अनुसार ‘‘सेना अथवा शिक्षा संबंधी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य को उपाधियाँ प्रदान नहीं कर सकता।

समानता के अधिकार के अपवाद

  1. सामाजिक समानता में सबको समान मानते हुए भी राज्य स्त्रियों तथा बच्चों को विशेष सुविधाएं प्रदान कर सकता है और इसी प्रकार राज्य सामाजिक तथा शिक्षा की दृष्टि से पिछडे़ वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष नियम बना सकता है।
  2. सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए कुछ स्थान सुरक्षित कर दिये गये हैं तथा राज्य द्वारा जन्म-स्थान एवं निवास-स्थान तथा आयु संबंधी योग्यता का निर्धारण किया जा सकता है।
  3. संविधान में उपाधियों की व्यवस्था न होते हुए भी देश में सन् 1950 से भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म श्री आदि उपधियां भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं। सन् 1977 में जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने पर इन उपाधियों का अंत कर दिया गया है और साथ ही उपाधि प्राप्त व्यक्तियों द्वारा उपाधियों का प्रयोग को प्रतिबन्धित भी कर दिया गया था, परंतु 24 जनवरी 1980 से इंद्रिरा काँग्रेस द्वारा भारत रत्न तथा अन्य उपाधियों एवं अलंकरणों को पुन: प्रारंभ कर दिया गया था।

2. स्वतंत्रता का अधिकार

स्वतंत्रता एक सच्चे लोकतंत्र की आधारभूत स्तंभ होती है। संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक इन अधिकारों का उल्लेख है।
  1. विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - अनुच्छेद 19 के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को भाषण लेखन एवं अन्य प्रकार से अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है।
  2. शांतिपूर्व एवं नि:शस्त्र सभा करने की स्वतंत्रता - अनुच्छेद 19 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के सभा या सम्मेलन आयोजित करने का अधिकार है।
  3. समुदाय और संघ बनाने की स्वतंत्रता - भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को समुदाय और संघ बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। द भ्रमण की स्वतंत्रता - प्रत्येक भारतीय को को संपूर्ण भारत में बिना किसी रोकटोक के भ्रमण करने तथा निवास की स्वतंत्रता है।
  4. अपराध के दोष सिद्ध के विषय में संरक्षण की स्वतंत्रता- संविधान के अनुच्छेद 20 अनुसार को भी व्यक्ति अपराध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि वह किसी ऐसे कानून का उल्लंधन न करे जो अपराध के समय लागू था और वह उससे अधिक दण्ड का पात्र न होगा।
  5. जीवन और शरीर रक्षण की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को अपने प्राण या शारीरिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी से वंचित नहीं किया जा सकता।
  6. बंदीकरण से संरक्षण की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छेद 22 के द्वारा बंदी बनाये जाने वाले व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार प्रदान किये गये है।
इसके अनुसार को भी व्यक्ति को बंदी बनाये जाने के कारण बतायें बिना गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता है। उसे यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद के वकील की राय ले सकता है, मुकदमा लड़ सकता है। अभियुक्त को 24 घण्टें के अंदर निकटत्म दण्डाधिकारी के सामने प्रस्तुत किया जाना होता है।

स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद

  1. स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक हित की दृष्टि से संसद को भी नियम बनाकर स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित कर सकती है।
  2. सिक्खों को उनके धर्म के अनुसर कटार धारण करने सभा या सम्मेलन आयोजित करने का अधिकार दिया गया है।
  3. को भी नागरिक ऐसे समुदाय या संघ का संगठन नहीं कर सकता, जिसका उद्देश्य राज्य के कार्य में बाधा उत्पन्न करना हो
  4. अनुच्छेद 22 के द्वारा प्रदान किये गये अधिकार शत्रु-देश के निवासियों पर लागू नहीं होते।

3. शोषण के विरूद्ध अधिकार

संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 के अनुसार को व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का शोषण नहीं कर सकेगा। इस संबंध में निम्न व्यवस्थाएं की गयी है-
  1. मनुष्यों का क्रय-विक्रय निषेध - संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के अनुसार मनुष्यों, स्त्रियों और बच्चों के क्रय-विक्रय को घोर अपराध और दण्डनीय माना गया है।
  2. बेगार का निषेध - संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु वाले बालकों को कारखानों अथवा खानों में कठोर श्रम के कार्यों के लिए नौकरी में नहीं रखा जा सकेगा।
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार का अपवाद - इस अधिकार की व्यवस्था में सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की को योजना लागू करने का राज्य को अधिकार है। वस्तुत: शोषण के विरूद्ध अधिकार का उद्देश्य एक वास्तविक सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना है।

शोषण के विरूद्ध अधिकार

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

धार्मिक स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि किसी धर्म में आस्था रखने या न रखने के बारे में राज्य को हस्ताक्षेप नहीं करेगा। संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक भारत के सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की व्यवस्था की गयी है। इस अधिकार के अंतर्गत निम्नलिखित स्वतंत्रताएं प्रदान की गयी हैं-
  1. धार्मिक आचरण एवं प्रचार की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसारप्रत्येक व्यक्ति को अपने अत:करण की मान्यता के अनुसार किसी भी धमर् को अबाध रूप में मानने, उपासना करने आरै उसका प्रचार करने की पूर्ण स्वतंतत्रता है
  2. धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों को धार्मिक और दानदात्री संस्थाओं की स्थापना औ उनके संचालन धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करने राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबंध करने की स्वतंत्रता प्रदान की ग है।
  3. धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों को धामिर्क और दानदात्री सस्ं थाओं की स्थापना और उनके संचालन, धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करके राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबध करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।
  4. व्यक्तिगत शिक्षण-संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने की स्वतंत्रता - संविधान के अनुच्छेद 28 की व्यवस्था के अनुसार किसी राजकीय (राज्य निधि से पूर्णत: पोषित) शिक्षण संस्था में किसी धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती है।
  5. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद - धार्मिक कट्टरता एवं धार्मिक उन्माद को रोकने के लिये राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से सार्वजनिक हित में सरकार द्वारा इस अधिकार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार -

संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 के द्वारा नागरिकों को संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी दो अधिकार दिये गये है।
  1. अल्पसंख्याकों के हितों का संरक्षण - अनुच्छेद 29 के अनुसार अल्पसंख्याकों को अपनी भाषा लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार है।
  2. अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार - अनुच्छेद 30 के अनुसार धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार है। यह अधिकार अल्पसंख्याकों को उनकी संस्कृति तथा भाष के संरक्षण हेतु राज्य से मिल रहे सहयोग को सुनिश्चित करता है।

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार -

भारतीय संविधान में संवैधानिक उपचारों का प्रावधान इंग्लैंड की कानूनी व्यवस्था का अनुकरण है। इंग्लैण्ड में यह कॉमन लॉ की अभिव्यक्ति है। इंग्लैण्ड में संविधान उपचार की रीट इस कारण जारी की जाती थी कि सामान्य विधिक उपचारों उपयप्ति हैं। आगे चलकर ये रीट उच्च न्यायालय प्रदान करने लगा, क्योंकि उसके माध्यम से ही सम्राट न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करता था।

भारतीय संविधान ने नागरिकों को केवल मौलिक अधिकार ही प्रदान नहीं किये हैं, वरन् उनके संरक्षण की भी पूर्ण व्यवस्था की गयी है। अनुच्छेद 32 से 35 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है। 

संवैधानिक उपचारों के अधिकार के महत्व के विषय में डॉभीमराव अम्बेडकर ने कहा था; ‘‘यदि मुझसे को यह पूछे कि संविधान का वह कौन-सा अनुच्छेद है, जिसके बिना संविधान शून्यप्राय हो जायेगा तो मैं अनुच्छेद 32 की ओर संकेत करूंगा। यह अनुच्छेद तो संविधान की हृदय और आत्मा है।’’ 

यह अनुच्छेद उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों को नागरिकों के मूल अधिकारों का सजग प्रहरी बना देता है। न्यायालयों द्वारा इन अधिकारों की रक्षा के लिए पांच उपचार प्रयोग किये जा सकते हैं-

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख - व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। लैटिन भाषा के हैबियस कार्पस का अर्थ है- ‘सशरीर उपस्थिति’। इस लेख के द्वारा न्यायालय बन्दी बनाये गये व्यक्ति की प्रार्थना पर अपने समक्ष उपस्थिति करने तथा उसे बन्दी बनाने का कारण बताये जाने का आदेश दे सकता है। यदि न्यायालय के विचार में संबंधित व्यक्ति को बन्दी बनाये जाने के पर्याप्त कारण नहीं है या उसे कानून के विरूद्ध बन्दी बनाया गया है तो न्यायालय उस व्यक्ति को तुरंत रिहा (मुक्त) करने का आदेश दे सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

2. परमादेश लेख - इस लेख अर्थ है- ‘हम आज्ञा देते हैं’। जब को सरकारी विभाग या अधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन होता है। तो न्यायालय इस लेख के द्वारा उस विभाग या अधिकारी को कर्तव्य पालन हेतु आदेश दे सकता है।

3. प्रतिषेध लेख - इस लेख का अर्थ - ‘रोकना या मना करना।’ यहा आज्ञा पत्र उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे की कार्यवाही को स्थगित करने के लिए निर्गत किया जाता है। इसके द्वारा उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि वे उन मुकदमों की सुनवा न कीजिए जो उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर हों।प्रतिषेध ओदश केवल न्यायिक पा्र धिकारियों के विरूद्ध ही जारी किये जा सकते हैं, प्रशासनिक कर्मचारियों के विरूद्ध नहीं।

4. उत्प्रेषण लेख - इस लेख का अर्थ है पूर्णतया सूचित करना। इस आज्ञा पत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय को और उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे को सभी सूचनाओं के साथ उच्च न्यायालय में भेजने की सूचना देते हैं। प्राय: इसका प्रयोग उस समय किया जाता है, जब को मुकदामा उस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर होता है और न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों का दुरूपयोग होने की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों से किसी मुकदमे के विषय में सूचनाएं भी लेख के आधार पर मांग सकता है।

5. अधिकार-पृच्छा लेख - इस लेख का अर्थ है- ‘किस अधिकार से?’ जब कोइ व्यक्ति सार्वजनिक पद को अवैधानिक तरीके से जब जबरदस्ती प्राप्त कर लेता है तो न्यायलय इस लेख द्वारा उसके विरूद्ध पद को खाली कर देने का आदेश निर्गत कर सकता है। इस आदेश द्वारा न्यायालय, संबंधित व्यक्ति से यह पूछता है कि वह किस अधिकार से इस पद पर कार्य कर रहा है? जब तक इस प्रश्न का सम्यक् एवं संतोषजनक उत्तर संबंधित व्यक्ति द्वारा नहीं दिया जाता, तब तक वह उस पद का कार्य नहीं कर सकता।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

मौलिक अधिकार की विशेषताएं

सभी नागरिक कानून के अंतर्गत समान है। उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता है, संगठन बनाने का अधिकार है तथा आंदोलन करने का समान अधिकार है। किसी भी व्यक्ति को उनके जीवन, स्वतंत्रता या संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता यदि ये कानून के मुताबिक हो अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा, संस्कृति एवं लिपि को संरक्षित एवं सुरक्षित रखने की अनुमति है। मौलिक अधिकार वास्तव में व्यक्तियों को सुरक्षित रखते हैं तथा अल्पसंख्यक समुदाय को भेदभाव, राज्य कार्यवाही एवं पक्षपात से सुरक्षित रखा जाता है। संविधान में तीन अनुच्छेद व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करने के लिए बनाये गये हैं। संविधान के अनुच्छेद 17 के अंतर्गत अस्पृश्यता यानी छूआछूत को समाप्त कर दिया गया है, अनुच्छेद 15 (2) के अंतर्गत किसी भी नागरिक को उनकी जाति, धर्म, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर सार्वजनिक स्थानों, दुकानों रेस्टोरेंट, कुँए, सड़क इत्यादि के प्रयोग करने पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए, तथा अनुच्छेद 23 के संविधान सभा और संविधान अंतर्गत, बाल शोषण और बंधुआ मजदूरी पर रोक है।

दो प्रकार के उपाय किये गये हैं जिनके द्वारा मौलिक अधिकारों को लागू करवाया जा सकता है। पहला न्यायिक समीक्षा (न्यायिक पुनरावलोकन) तथा दूसरा याचिकाओं द्वारा। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो याचिकाऐं दाखिल की जा सकती है। ये दोनों उपचार अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दिये गये हैं। भारतीय संविधान में दिए गये मौलिक अधिकार की विशेषताएं इस प्रकार हैं-

1. विस्तृत अधिकार-पत्र - अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को स्वतन्त्रता का अधिकार दिया गया है तथा इसके 6 भाग ऐसे हैं जिनमें नागरिकों की 6 विभिन्न स्वतन्त्रताओं और उनके अपवादों आदि का विस्तृत वर्णन है। ऐसा ही विस्तृत वर्णन अन्य अनुच्छेदों में किया गया है।

2. संविधान द्वारा दिये गये अधिकारों के अतिरिक्त नागरिकों का कोई अधिकार नहीं - भारतीय संविधान में ऐसे सिद्वान्त का स्पष्ट रूप में खण्डन किया गया है। यह स्पष्ट कहा गया है कि नागरिकों को केवल वे ही अधिकार प्राप्त हैं जोकि संविधान में लिखे हैं। उनके अतिरिक्त किसी भी अधिकार को मान्यता नहीं दी गई है।

3. सभी नागरिकों को समान अधिकार - मौलिक अधिकार जाति, धर्म, नस्ल, रंग, लिंग आदि के भेदभाव के बिना सभी नागरिकों को प्राप्त हैं। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों में कोई भेद नहीं। यह सभी पर समान रूप से लागू होते हैं और कानूनी दृष्टि से सभी नागरिकों के लिए हैं।

3. अधिकार पूर्ण और असीमित नहीं हैं - हमारे संविधान में सरकार को राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, सार्वजनिक नैतिकता तथा लोक-कल्याण की दृष्टि से मौलिक अधिकारों पर समय की आवश्यकता अनुसार उचित प्रतिबन्ध लगाने का अधिकार दिया गया है।

4. अधिकार नकारात्मक अधिकार - इन अधिकारों द्वारा राज्य पर प्रतिबन्ध तथा सीमाएँ लगाई गई हैं। उदाहरणत: राज्य पर यह सीमा लगाई गई है कि राज्य जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करेगा तथा न ही सरकारी पद पर नियुक्ति करते समय ऐसा कोई भेद-भाव करेगा।

5. अधिकार संघ, राज्यों तथा अन्य सरकारी संस्थाओं पर समान रूप से लागू हैं - मौलिक अधिकारों के भाग में ही संविधान द्वारा राज्य शब्द की व्याख्या की गई है तथा यह कहा गया है कि राज्य शब्द के अर्थ हैं-संघ, प्रान्त एवं स्थानीय संस्थाएँ। इस तरह अधिकार-पत्र द्वारा लगाई गई सीमाएँ संघ, राज्यों एवं स्थानीय संस्थाओं-नगरपालिकाएं तथा पंचायतों-पर भी लागू हैं। इन सभी संस्थाओं को मौलिक अधिकारों द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्दर कार्य करना होता है।

6. भारतीय नागरिकों और विदेशियों में अन्तर - भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में भारतीय नागरिकों तथा विदेशियों में भेद किया गया है। कुछ मौलिक अधिकार ऐसे हैं, जो भारतीय नागरिकों को तो प्राप्त हैं परन्तु विदेशियों को नहीं, जैसे- भाषण देने और विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता, घूमने-पिफरने और देश के किसी भी भाग में रहने की स्वतन्त्रता।

7. अधिकार निलम्बित किये जा सकते हैं - हमारे संविधान में अधिकारों को संकटकाल में निलम्बित किये जाने की व्यवस्था की गई है। नोट्स बाहरी आक्रमण अथवा बाहरी आक्रमण की सम्भावना से उत्पन्न होने वाले संकट का सामना करने के लिये राष्ट्रपति सम्पूर्ण भाग अथवा भारत के किसी भाग में संकटकालीन घोषणा कर सकता है तथा ऐसी व्यवस्था में नागरिक के अधिकारों विशेषत: स्वतन्त्रता के अधिकार (Art. 19) तथा संवैधानिक उपचारों के अधिकार को निलम्बित कर सकता है। संविधान की इस व्यवस्था की कई आलोचकों द्वारा कड़ी निन्दा की गई है परन्तु हमारे विचार में आलोचना बुद्वि संगत नहीं है। देश का हित सर्वोपरि है। अत: देश के हित में अधिकारों को निलम्बित किया जाना उचित ही है।

8. मौलिक अधिकार न्यायसंगत हैं - मौलिक अधिकार न्यायालयों द्वारा लागू किए जाते हैं। मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए संविधान में विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं। संवैधानिक उपचारों का अधिकार मौलिक अधिकारों में विशेष रूप से शामिल है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी नागरिक जिसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो, हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अपील कर सकता है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रकार के लेख जारी करते हैं। यदि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन सिद्व हो जाए तो वे किसी व्यक्ति, संस्था अथवा सरकार द्वारा की गई गलत कार्यवाही को अवैध घोषित कर सकते हैं।

9. संसद अधिकारों को कम कर सकती है - संविधान के द्वारा संसद मौलिक अधिकार वाले अध्याय सहित समूचे संविधान में संशोधन कर सकती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संसद साधारण कानूनों द्वारा मौलिक अधिकारों में किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकती। यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है तो वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया जाएगा।

10. अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार - भारतीय अधिकार-पत्र में अल्पसंख्यकों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया है। विशेषकर दो अधिकार-धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) तथा सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (Cultural and Educational Rights) तो अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिये ही लिखे गये हैं। एक आदर्श लोकतन्त्र में बहुमत अल्पमत पर शासन कर उन्हें कुचलता नहीं अपितु अल्पमत को पनपने का अवसर दिया जाता है। भारतीय अधिकार-पत्र द्वारा ऐसी व्यवस्था को अल्पसंख्यकों के अधिकारों के रूप में लिखा गया है।

11. सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों का अभाव -भारतीय अधिकार-पत्र में सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों, उदाहरणतया काम करने का अधिकार (Right to Work), आराम का अधिकार (Right of Rest and Leisure), सामाजिक सुरक्षा का अधिकार (Right to Social Security), आदि शामिल नहीं किये गये हैं। हाँ, इन अधिकारों को निर्देशक सिद्वान्तों के अधीन लिखा गया है।

12. शस्त्रधारी सेनाओं के अधिकार सीमित किए जा सकते हैं - संविधान की धारा 33 के अनुसार संसद सेनाओं में अनुशासन को बनाए रखने के लिए मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है। संसद पुलिस, सीमा सुरक्षा आदि के विषय में उचित व्यवस्था कर सकती है।

13. मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था - भारतीय संविधान की धारा 226 के अन्तर्गत हमारे छीने गए अधिकार को लागू करवाने के लिए उचित विधि द्वारा प्रान्त में उच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं तथा धारा 32 के अन्तर्गत उचित विधि द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं। इस सम्बन्ध में हम उचित याचिका (Writ) कर सकते हैं।

संदर्भ -
  1. Ashirvadam, Modern Political Theory.
  2. Laski H.J.- A Grammar of Politics, London, Allan University.
  3. D Held- Political Theory, Cambridge Polity Press.
  4. Verma S.P., Modern Political Theory, New Delhi, Vikas.
  5. Prof. A.D. Panth- Basis of Political Sciences, Allahabad Publisher.
  6. Dr. Om Nagpal- Foundamentals of Political Science, Kamal Publisher,Indore.

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

2 Comments

  1. kya sarkar duara jamindar ko mili jamin sirdar ke rup me sahi h ans & rul btay

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