राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?

देश की राजनीतिक व्यवस्था से संबंधित किसी निश्चित सामान्य सिद्धांत तथा उद्देश्य में विश्वास रखने वाले कुछ व्यक्तियों द्वारा बनाए गए संगठन को राजनीतिक दल कहते है। राजनीतिक दलो का मुख्य उद्देश्य होता है राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना। जो राजनीतिक दल सरकार चलाता है उसे सत्ता पक्ष कहते है तथा जो दल विपक्ष में बैठते है सत्ता पक्ष की आलोचना करते है तथा सरकार में हिस्सा नहीं लेते उन्हें विपक्षी दल कहते है।

राजनीतिक दल की परिभाषा

1. एडमंड बर्क के अनुसार - ‘‘राजनीतिक दल कुछ लोगों का एक ऐसा समूह है जो कुछ सिद्धांतों पर एकमत होकर अपने संयुक्त प्रयासों द्वारा जनहितों को आगे बढाने का प्रयास करता है।’’ ‘‘राजनीतिक दल से हमारा तात्पर्य नागरिकों के उस न्यूनाधिक संगठित समुदाय से होता है जो एक ही साथ एक राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करते है।’’ 

2. जे. ए. शुपीटर के अनुसार - ‘‘राजनीतिक दल एक ऐसा गुट या समूह है जिसमें सदस्य सत्ता प्राप्त करने के लिए संघर्ष व होड में लगे हुए है।’’

3. गिलव्रफाइस्ट के अनुसार, ‘‘राजनीतिक दल की परिभाषा उन नागरिकों के संगठित समूह के रूप में की जा नोट सकती है जो राजनीतिक रूप से एक विचार के हों और जो राजनीतिक इकाई के रूप में सरकार पर नियंत्रण करना चाहते हों।’’ 

4. प्रोफसर लीकाॅक के शब्दों में, ‘‘राजनीतिक दल से हमारा तात्पर्य नागरिकों के उस संगठित समूह से होता है जो एक राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करते हैं।’’ इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राजनीतिक दल मतैक्यता एवं सिद्धांतों के आधार पर संगठित राजनीतिक समूह होते हैं जिनका उद्देश्य सत्ता संघर्ष में भाग लेना होता है। 

राजनीतिक दल के कार्य

राजनीतिक दल क्या करते है? मूलतः राजनीतिक दल राजनीतिक पदों को भरते हैं और राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल करते हैं। दल इस काम को कई तरह से करते हैं- 

1. दल चुनाव लड़ते हैं। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खड़ा किए गए उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव कई तरीकों से करते हैं। अमरीका जैसे कुछ देशों में उम्मीदवार का चुनाव दल के सदस्य और समर्थक करते हैं। अब इस तरह से उम्मीदवार चुनने वाले देशों की संख्या व कुछ बुनियादी राय तक समेट लाती हैं जिनका वे समर्थन करती हैं। सरकार प्रायः शासक दल की राय के अनुरूप अपनी नीतियाँ तय करती है। 

2. पार्टियाँ देश कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। कानूनों पर औपचारिक बहस होती है और उन्हें विधायिका में पास करवाना पड़ता है लेकिन विधायिका के अधिकतर सदस्य किसी ने किसी दल के सदस्य होते हैं। इस कारण वे अपने दल के नेता के निर्देश पर फैसला करते हैं। 

3. दल ही सरकार बनाते और चलाते हैं। अगर दल न हों तो सारे उम्मीदवार स्वतंत्र या निर्दलीय होंगे। तब इनमें से कोई भी बड़े नीतिगत बदलाव के बारे में लोगों से चुनावी वायदे करने की स्थिति में नहीं होगा। सरकार बन जाएगी पर उसकी उपयोगिता संदिग्ध होगी। निर्वाचित प्रतिनिधि सिर्फ अपने निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए कामों के लिए जवाबदहे होंगे। लेकिन देश चलाने के लिए कोई उत्तरदायी नहीं होगा। हम गैर-दलीय आधार पर होने वाले पंचायत चुनावों का उदाहरण सामने रखकर भी इस बात की परख कर सकते हैं।

हालांकि इन चुनावों में दल औपचारिक रूप से अपने उम्मीदवार नहीं खड़े करते लेकिन हम पाते है कि चुनाव के अवसर पर पूरा गाँव कई खेमों में बँट जाता है और हर खेमा सभी पदों के  के लिए अपने उम्मीदवारों का ’’पैनल उतारता है। राजनीतिक दल भी ठीक यही काम करते हैं। यही कारण है कि हमें दुनिया के लगभग सभी देशों में राजनीतिक दल नजर आते हैं चाहे वह देश बड़ा हो या छोटा नया हो या पुराना विकसित हो या विकासशील । राजनीतिक दलों का उदय प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के उभार के साथ जुड़ा है। 

भारतीय दलीय व्यवस्था का विकास

भारतीय दलीय व्यवस्था के विकास का प्रारंभ 1885 में एक राजनीतिक मंच के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से होता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना औपनिवेशिक शासन के प्रत्युत्तर के रूप में तथा ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए की गई थी। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक संविधान अपनाने के साथ 1952 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित प्रथम आम चुनावों के दृष्टिगत एक नइर् दलीय व्यवस्था उभरी हुई। पहली स्थिति को एक दल के प्रभुत्व का दौर कहा जाता है क्योंकि केन्द्र और राज्यों में केवल (1956-59 में केरल का अपवाद छोडकर) कांग्रेस दल का शासन रहा है। 

दूसरी स्थिति (1967-75) में भारत ने बहुदलीय व्यवस्था के उद्भव को देखा। 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस आठ राज्यों में पराजित हुई। इन राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी दलो ने संयुक्त सरकार बनाई। 1969 में कांग्रेस (आ) तथा कांग्रेसी (एन) के रूप में विघटन हुआ। परंतु 1971 के मध्यावधि चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस एक बाद फिर एक प्रमुख ताकत बन गई। तब आपातकाल (1975-77) का युग आया। जिसे भारतीय लोकतंत्र का सर्वसत्तावादी युग कहा जाता है।

आपातकाल हटने के साथ ही कांग्रेस का प्रभुत्व भी समाप्त हो गया है। 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस को जनता पार्टी ने पराजित किया। कई राजनीतिक दलो के विलय के फलस्वरूप जनता पार्टी अस्तित्व में आई थी। लेकिन 1980 के आम चुनावों के बाद कागंस्रे पुन: सत्ता में लौट आई और 1989 तक सत्ता में बनी रही। 1989 के चुनावों में नेशनल फ्रटं ने भाजपा और वाम दल के सहयोग से सरकार बनाई। परंतु ये दोनों दल अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये और दसवीं लाकेसभा के लिए मई जून 1991 में चुनाव करवाए गए। कांग्रेस ने फिर से केन्द्र में सरकार बनाई। 1996 के आम चुनावों में भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप में रूप उभरकर सामने आई और उसे केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। चूकि यह निर्धारित समय में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर सकी। 

कांग्रेस आरै भारतीय कम्युिनष्ट पार्टी (माक्सर्वादी) के बाहरी समर्थन के आधार पर बनी 13 दलो की संयुक्त मोर्चा सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। यद्यपि 1998 के चुनावों के बाद भाजपा के नेतृत्व में बनी संयुक्त सरकार को 1999 चुनावों ने दोबारा सरकार बनाने का अवसर प्रदान किया जिसने बहदुलीय गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक (एन. डी.ए.) मे रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया।

2004 के 14 वें आम चुनावों में कांग्रेस सबसे बडे दल के रूप में उभर कर आई और केदं्र में वाम मोर्चे के समर्थन से गठबंधन की सरकार बनाई। 1989 में पा्रभ् हुए भारतीय दलीय व्यवस्था का दौर अभी भी चल रहा है और इसे मिली जुली अथवा गठबंधन की राजनीति दारै कहा जाता है। कोइर् भी दल इस दौर में अपने दम पर केंद्र में सरकार बनाने में सफल नहीं हुआ है।

भारत में प्रमुख राष्ट्रीय दल

मूलत: कांग्रेस की स्थापना 1885 में डब्लू. सी. बेनर्जी की अध्यक्षता में मुंबई में हुई थी। बाद में इंदिरा गांधी ने 1978 में इसका नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय काग्रेंस (आई) कर दिया जो बाद में कांग्रेस (आई) के नाम से जानी जाने लगी। इसके बाद 1984 तक इंदिरा गांधी इसकी अध्यक्ष रही। उनकी हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी अध्यक्ष हुए तथा राजीव गांधी की हत्या के बाद पी. वी. नरसिम्हा राव कांग्रेस के अध्यक्ष कांग्रेस हुए। नरसिम्हन राव के हटने बाद 1996 की सीताराम केसरी और अब सोनिया कांग्रेस के अध्यक्ष है। कांग्रेस (आई) के मुख्य उदेश्य है -
  1. देश की एकता तथा अखंडता को बनाए रखना। 
  2. अन्न की पैदावार बढाना 
  3. गरीबी हटाना तथा कृषि एवं उद्योग धंधो को बढावा देना । 
  4. बच्चो को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना तथा ग्रामीण क्षेत्रों मे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो की स्थापना करना।
  5. अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोगो को सामाजिक शैक्षणिक तथा धार्मिक सुविधाएं उपलब्ध कराना। 

1. भारतीय जनता पाटी (भाजपा) 

भारतीय जनता की पार्टी की स्थापना 1980 में गांधीवाद समाजवाद की सिपनाओ के विरोध में हुई थी। गाधीवादी समाजवाद महात्मा गाधी जयप्रकाश नारायण तथा दीनदयाल उपाध्याय की विचार धाराओं पर आधारित है। इसका उददेश्य है लघु तथा बडे उद्योग धंधो को बढावा देना। यह व्यक्ति की मूल आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए प्रतिबद्ध है। किंतु भाजपा ने 1985 के अपने पूना अधिवेशन में गांधीवादी समाजवाद के स्थान पर अपनी पार्टी का उददेश्य हिंदुत्व को बनाया तथा यह घोषणा की कि हिदुंत्व के द्वारा ही एक धर्म निरपेक्ष भारत का निर्माण संभव है। इसके पीछे यह भी तर्क दिया गया कि अब तक सरकारे अपनी तुष्टिकरण की निति के चलते हिंदुओ के हितो को नजर अंदाज करती रही है। भाजपा ने आयोध्या में राम मंदिर की स्थापना के लिए आंदोलन चलाया था।

इस आंदोलन के चलते भाजपा को बहुत लाभ मिला और यही कारण है कि जिस भाजपा को 1984 में हएु आम लोकसभा चुनावों मे केवल दो सीटे मिली थी उसे 1889 में 88 सीटे प्राप्त हुई। 1991 में इसे 119 तथा 1996 में 161 सीटे प्राप्त हुई।जब 1996 के लोकसभा चुनावों में भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरकर आयी थी तक राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उसके नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार गठित करने के लिए आमंत्रित किया था किंतु ससं द में अपना बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण उन्होने 13 दिनो में ही अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था और भाजपा की सरकार गिर गई थी। 1998 के लोकसभा चुनाव में पुन: भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरी। वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा तथा उसके अनेक अनेक सहयोगी दलों ने मिलकर कंदे ्र सरकार का गठन किया।

भारतीय जनता पार्टी के उद्देश्य -

  1. पार्टी राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए धार्मिक तथा साम्प्रदायिक भावनाओं से काम नहीं लेगी। 
  2. पार्टी धर्मनिरपेक्षता मे विश्वास करती है। 
  3. पार्टी का उददेश्य गांधीवादी अर्थव्यवस्था को लागू करना है। 
  4. पार्टी वैदेशिक मामलो में गुटनिरपेक्षता में विश्वास करती है। 
  5. अखण्ड भारत की स्थापना करना पार्टी का उददेश्य है। 
  6. निजी उद्योगो का भारतीयकरण करना पार्टी का उददेश्य है। 

2. साम्यवादी दल

भारतीय दल (सी.पी.आई.) और भारतीय साम्यवादी दल (माक्र्सवादी) दो साम्यवादी दल है। कांग्रेस के बाद साम्यवादी दल ही सबसे पुराना राजनीतिक दल है। साम्यवादी आंदोलन 1920के दशक के प्रारंभ में शुरू हुआ और 1925 में साम्यवादी दल की स्थापना हो गई। साम्यवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया यद्यपि आमतौर पर उनके कांग्रेस के साथ गंभीर मतभेद थे। साम्यवादियों का मानना था कि लोग आर्थिक रूप से समान होने चाहिए और समाज को गरीब और अमीर में वर्गीकृत नही किया जाना चाहिए। मजदूरो, किसानों तथा अन्य मेहनतकश लोगो को जो समाज में उत्पादक कार्य करते है उचित मान्यता और शक्ति मिलनी चाहिए।

पूरे नेहरू युग में साम्यवादी दल ही मुख्य विपक्षी दल था। प्रथम लोकसभा में उनके 26 सदस्य थे। दूसरी और तीसरी लोकसभा में उनके क्रमश: 27 और 29 सदस्य थे। 1957 में सी.पी.आई. (भारतीय साम्यवादी दल) को केरल में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है और उसने भारत के किसी एक राज्य में पहली साम्यवादी सरकार बनाई। 60 के दशक के प्रारंभ में विशेष रूप से 1962 में भारत पर चीनी आक्रमण के बाद भारतीय साम्यवादी दल के सदस्यों में गंभीर मतभेद पैदा हुए। परिणाम स्वरूप पार्टी दो भागो में बंट गई। सी.पी.आई. से अलग होने वालो ने 1964 में सी.पी.आई. (एम) का गठन किया। सी.पी.आई. (एम) का मुख्य समर्थन आधार पश्चिमी बंगाल ,केरल,और त्रिपुरा में केन्दित्र है यद्यपि इसने आंध्रप्रदेश, आसाम, पजाब इत्यादि में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। 

सी.पी.आइर्. के प्रभाव क्षेत्र आंध्र प्रदेश, आसाम, बिहार, मणिपुर, उडीसा पांडीचेरी और पंजाब इत्यादी में है। इसके अतिरिक्त सीपी. आई. केरल और पश्चिमी बंगाल में वाम मोर्चा गठबंधन का सदस्य रही है। 

2004 के लोकसभा चुनावों के बाद सी.पी.आई. और सी.पी.आई (एम) दोनो ही कांग्रेस गठबंधन की सरकार के समर्थक रहे है। वे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे है।

3. बहुजन समाज पार्टी 

बहुजन समाजवादी पार्टी (ब.स.पा.) को 1996 में राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त हुआ। बसपा पिछडी जातियों, वंचित समूहो और अल्प संख्यकों के हितो की बात करती है। बसपा का विश्वास है कि इस बहुसंख्यक समाज को उची जातियों के शोषण से मुक्त करवाना चाहिए और उनको अपनी सरकार बनानी चाहिए। बसपा का प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब आदि में देखा जा सकता है। 1995 और 1997 में बसपा उत्तर प्रदेश में गठबधंन सरकारो में भागीदार थी। लेकिन 2007 में पहली बार इस दल ने बहुमत प्राप्त कर उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई है।

एडमंड के अनुसार, ‘‘राजनीतिक दल ऐसे दलों का एक समूह होता है जो किन्हीं पूर्व स्वीकृत सिद्धांतों के आधार पर अपने सामूहिक प्रयत्नों द्वारा जनता के हित में काम करने के लिए एकता में बंधे हैं।’’ 

गैटिल के अनुसार, ‘‘एक राजनीतिक दल न्यूनाधिक संगठित उन नागरिकों का समूह होता है जो राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करते हैं और जिनका उद्देश्य अपने मतदानरूपी बल के प्रयोग द्वारा सरकार को नियंत्रित करना और अपनी सामान्य नीतियों का संचालन करना होता है।’’ 

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Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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