राष्ट्रपति की शक्तियां और कार्य

संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार भारत का एक राष्ट्रपति होगा। संघ की कार्यपालिका शक्ति इसी में निहित की गई है। अनुच्छेद 53 में उपबन्ध किया गया है कि-
  1. संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और वह इसका प्रयोग संविधान के उपबन्धों के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
  2. संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश राष्ट्रपति में निहित होगा और उसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा। 
  3. इस अनुच्छेद की कोई बात-(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी राज्य की सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी का प्रदान किए गए कृत्य राष्ट्रपति को अन्तरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या (ख) राष्ट्रपति से भिन्न अन्य प्राधिकारियों को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद को निवारित नहीं करेगी। 
इस प्रकार राष्ट्रपति मुख्य कार्यपालक है। फिर भी उन कृत्यों को जो पहले से ही अन्य प्राधिकारियों को दिए गये हैं और संसद की अन्य प्राधिकारियों को किन्हीं कृत्यों को सौंपने की क्षमता को अछूता छोड़ दिया गया है।

संघीय सरकार के समस्त कार्य राष्ट्रपति के नाम से ही सम्पादित होते है। वास्तव में वह देश के शासन का संचालन नहीं करता वरण उसे जो शक्तियां प्राप्त हैं व्यवहार में उसका प्रयोग संघीय मंत्री परिषद ही करती है। वास्तव में वह मंत्री परिषद के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।

अनुच्छेद ‘58 के अनुसार राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं इस प्रकार हैं-(1) कोई व्यक्ति राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह-
  1. वह भारत का नागरिक हो। 
  2. कम से कम 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो । 
  3. वह लोक सभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो। 
  4. वह किसी सरकारी लाभकारी पद पर कार्यरत न हो। 
  5. राष्ट्रपति के पद पर आसीन व्याप्ति संसद का सदस्य या राज्यों में विधायक नहीं हो सकता । 
परन्तु अनुच्छेद 58(2) के अनुसार कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियन्त्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, राष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा। 

इसके स्पष्टीकरण में यह कहा गया है कि इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल है अथवा संघ का या किसी राज्य का मन्त्री है।

राष्ट्रपति की शक्तियां और कार्य

राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रमुख होता है। केन्द्र सरकार की सभी शक्तियों का प्रयोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से राष्ट्रपति (प्रधानमंत्री एवं मंत्री परिषद के द्वारा) करता है । राष्ट्रपति की शक्तियां और कार्य है -
  1. कार्यपालिका संबंधी शक्तियां
  2. व्यवस्थापिका संबंधी शक्तियां
  3. वित्तीय संबंधी शक्तियां
  4. न्याय संबंधी शक्तियां
  5. संकट कालीन शक्तियां

कार्यपालिका संबंधी शक्तियां

भारत सरकार के समस्त कार्यपालिका संबंधी कार्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते है।। शक्तियां निम्न हैं :-

1. नियुक्ति एवं पदच्युति सम्बन्धी शक्तियां- राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा उसके सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति, राज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के राजदूत ,भारत का महान्यायवादी, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, योजना आयोग आदि के सदस्यों की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति उक्त पदाधिकारियों को विशेष प्रक्रिया का पालन करते हुए पद से हटा भी सकता है। 

2. शासन संचालन सम्बन्धी शक्तियां - शासन के सुचारू रूप से संचालन हेतु राष्ट्रपति, विभिन्न प्रकार के नियम बना सकता है। इसके अतिरिक्त संधीय क्षेत्रों के प्रशासन का दायित्व भी राष्ट्रपति का ही हैं। 

3. वैदेशिक मामलों से सम्बन्धित शक्तियां- राष्ट्रपति राजदूतों की नियुक्ति व विदेशी राजदूतों को मान्यता देते हैं। समस्त अन्तार्राष्ट्रीय संधियॉं व समझौते व वैदेशिक कार्य राष्ट्रपति के नाम किये जातें है। \

4. सेना सम्बन्धी शक्तियां - राष्ट्रपति तीनों सेनाओं ( जल,थल वायु ) का सर्वोच्च सेनापति होता है। तीनों सेनाओं के सेनापतियों की नियुक्ति, यद्धु पा्ररम्भ व बंद करने की घोषणा करता है। 

व्यवस्थापिका संबंधी शक्तियां

विधायी या व्यवस्थापिका सम्बन्धी शक्तियां है -

1. संसद संगठन सम्बन्धी शक्तियां- राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों के लिये सदस्यों को मनोनीत करने करने का अधिकार है। लोक सभा के लिये आंग्ल - भारतीय 2 सदस्य, राज्य सभा के लिये 12 सदस्यों को मनोनीत करता है । 

2. संसद के सत्रों से सम्बन्धित शक्तियॉ - संसद के दाने ों सदनों के सत्रों की, किसी भी समय बैठक आमंत्रित कर सकता है। किसी भी एक सदन या संयुक्त अधिवेशन में भाषण दे सकता है, संदेश भेज सकता है। सदन की बैठक स्थगित करा सकता है। एक वर्ष में संसद के दो सत्रों (अधिवेशन) का होना अनिवार्य है। 

3. विधेयकों की स्वीकृति या अस्वीकृति सम्बन्धी शक्तियाँ - संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए बिना कानून नहीं बन सकता तथा कछु विधये क ऐसे होते है जिन्हें सदन में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी पडती है जैसे - वित्त विधेयक या कोई नया राज्य बनाने सम्बन्धी विधेयक।

4. अध्यादेश जारी करने की शक्ति - जब संसद का सत्र नहीं चल नहीं चल रहा हो और कानून की आवश्यकता हो, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करके कानून की पूर्ति कर सकता हैं। 

राष्ट्रपति की वित्तीय संबंधी शक्तियां

  1. बजट प्रस्तुत करने की शक्तियां - प्रत्येक वर्ष के प्रारंभ में ससंद की स्वीकृति हेतु वाषिंर्क बजट राष्ट्रपति की ओर से पहले लोकसभा में और बाद में राज्य सभा में प्रस्तुत किया जाता है । 
  2. कोई भी वित्त विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति लिये बिना लोक सभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।
  3. आकस्मिकता निधि के नियंत्रण सम्बन्धी शाक्तियॉं- राष्ट्रपति संसद की पूर्व स्वीकृति के बिना इस निधि से धन व्यय की स्वीकृति प्रदान कर सकता है । 
  4. वित्त आयोग की नियुक्ति सम्बन्धी शक्तियां- वित्तीयं मामलों में परामर्श लेने के लिए वित्त आयोग की नियुक्ति करता है । 
  5. संसद द्वारा नियम न बनाये जाने की स्थिति में, राष्ट्रपति भारत की संचित - निधि सें धन निकालनें या जमा करने से सम्बन्धित नियम बना सकता है । 

राष्ट्रपति की न्याय संबंधी शक्तियां

किसी अपराध के लिए दण्डित किये गये व्यक्ति को राष्ट्रपति चाहे तो क्षमा दान कर सकता है। किसी दण्ड को कम कर सकता है। उसकी सजा को परिवर्तन कर सकता है-मृत्यु दण्ड को आजीवन कारावास कर सकता है। ऐसा सब विधि मंत्रालय की सलाह पर किया जा सकता है। राष्ट्रपति पर फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। 

राष्ट्रपति की संकट कालीन शक्तियां

संविधान द्वारा राष्ट्रपति को प्राप्त समस्त शक्तियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं व्यापक शक्ति संकट कालीन शक्तियॉें है । इस शक्ति के आधार पर संकटकाल (आपातकाल) की घोषणा करके देश के संविधान को लगभग एकात्मक स्वस्प प्रदान कर सकता है। निम्न लिखित तीन परिस्थितियों में संकट काल को घोषणा कर सकता है - 

1. वाह्य संकट - युद्ध बाहरी आक्रमण की स्थितियां शंका उत्पन्न होने पर राष्ट्रपति संकट काल की घोषणा कर सकता है । 

2. आंतरिक संकट -  (i) देश के आंतरिक भाग में सशस्त्र विद्रोह की स्थिति अथवा राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने पर संकट काल की घोषणा कर सकता है । (ii) राष्ट्र में वित्तीय संकट उत्पन्न हो जाने पर राष्ट्रपति संकट काल की घोषणा कर सकता है। 
44वें संविधान संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति ऐसी संकटकालीन घोषणा केवल मंत्रीमण्डल की लिखित सिफारिश पर ही कर सकता है । ऐसी संकटकालीन घोषणा की पुष्टि संसद के दोनों के द्वारा एक मास के अंदर होना अनिवार्य है, नहीं तो वह घोषणा स्वंय समाप्त हो जाती है । संकटकालीन घोषणा के समय यदि लोकसभा भंग है अथवा उसका अधिवेशन नहीं चल रहा है तो इसकी पुष्टि राज्य सभा द्वारा एक महीने के अंदर होनी होती हैं तथा बाद मे लाके सभा द्वारा अधिवेशन शुरू होने के एक मास के अंदर हो जानी चाहिए। 

संसद द्वारा एक बार पुष्टि हो जाने पर आपातकाल का प्रभाव घोषणा की तिथी से छह महीनें तक रहता है। यदि इसको छह महीने से आगे बढाना है तो संसद द्वारा दूसरा प्रस्ताव पास किया जाना आवश्यक होता है। इस प्रकार आपातकाल अनिश्चित काल तक जारी रहता है। परन्तु स्थिति में सुधार होने पर राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल समाप्त हो सकता है। संविधान के 44वें संशोधन के अनुसार लोकसभा के 10 प्रतिशत या अधिक सदस्य लोकसभा के अधिवेशन की मांग कर सकते हैं तथा उस अधिवेशन में साधारण बहुमत द्वारा आपातकाल को रद्द अथवा समाप्त किया जा सकता है । 

भारत में तीन बार राष्ट्रीय आपात काल की घोषणा की जा चूकी है। पहली 26-10-1962 को चीनी आक्रमण के समय । दसू री 03-12-1977 को भारत - पाक युद्ध के समय। तीसरी 21 मार्च 1975 को की गई । तीसरी घोषणा आंतरिक गडबडी को आधार मान कर की गई जिसको लागू करने का कोई औचित्य नहीं था । 

राष्ट्रपति की स्थिति

राष्ट्रपति का पद ख्याति और गौरव का है न कि वास्तविक शाक्तियों का पद। उसको प्राप्त शक्तियों का प्रयोग वह स्वयं नहीं करता बल्कि राष्ट्रपति के नाम से मंत्री -परिषद द्वारा किया जाता है। यदि मंत्रीपरिषद् की इच्छा के विरूद्ध कार्य करता है तो यह संवैधानिक सकंट माना जाता है। इसके लिए उस पर महाभियोग चलाया जा सकता है और उसे हटाया भी करता है। इससिए राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री की बात मानने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। आखिकार प्रंधानमंत्री कायर्पालिका का मुखिया है। राष्ट्रपति के साथ निरंतर सम्पर्क बनाए रखता है।

मंत्री -परिषद् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है केवल अविश्वास का प्रस्ताव पारित होने पर ही हटाई जा सकती है। परन्तु संविधान के अनुसार मंत्री-परिषद् राष्ट्रपति के प्रसाद काल तक कार्य करते रह सकती है। संविधान के 42 संविधान के अनुसार राष्ट्रपति मंत्री -परिषद के परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है। वह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता। 

राष्ट्रपति की शक्तियां औपचारिक हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्री-परिषद ही वास्तविक कार्यपालिका है। संविधान के चवालीसवें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित किसी विधेयक को पुन: विचार के लिए वापिस भेज सकता है। यदि विधेयक पुन: पारित कर दिया है तो राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पडत़ ी है। संविधान सभा में डॉ. बी आर अम्बेकडर ने ठीक कहा था ‘‘राष्ट्रपति की स्थिति बिल्कुल वही है। जो ब्रिटिश संविधान मे राजा की होती है।’’ परन्तु वास्तविकता में भारत का राष्ट्रपति मात्र रबर की मुहर नहीं है। 

संविधान के अनुसार भारतीय संविधान की सुरक्षा का दायित्व राष्ट्रपति का है। वह नवयुक्ति प्रधानमंत्री को निर्धारित समय के अंदर विश्वास का मत प्राप्त करने के लिए कह सकता है। देश का सारा प्रशासन राष्ट्रपति के नाम से चलाया जाता है। वह किसी भी मंत्री से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है। मंत्री- परिषद् द्वारा लिए नए सभी निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति को भेज दी जाती है । उसे प्रशासन से संबंधित सभी जानकारी भी दी जाती हैं। 

राष्ट्रपति पद की उपयोगिता का पता उसी बात से लग जाता है। कि उसे सरकार को परामर्श, प्रेरणा अथवा प्रोत्साहन तथा चेतावनी देने का अधिकार है इसे संदर्भ में राष्ट्रपति एक परामर्शदाता, मित्र तथा आलाचेक के रूप में उभर कर सामने आता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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