आर्थिक वृद्धि और विकास

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आर्थिक वृद्धि

किसी अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पादित वस्तुओं सेवाओं की कुल मात्रा में वृद्धि करना आर्थिक वृद्धि कहलाता है । यह वृद्धि निरतंर व दीर्घकाल तक जारी रहनी चाहिये । यदि आकस्मिक रूप से वस्तुओं और सेंवाओं की मात्रा में हु वृद्धि आर्थिक वृद्धि नहीें कहलायेगी । जैसे एक साल सभी परिस्थितियों के अनुकूल रहने पर कृषि उत्पादन बढ़ता है, लेकिन यह बाद में नही बढ़ता इसे आर्थिक वृद्धि नहीं कहेंगे । आर्थिक वृद्धि के लिये यह आवश्यक नही कि अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा में एक समान स्तर पर वृद्धि हो । यहॅा वृद्धि से आशय भौतिक उत्पादन में कुल वृद्धि से है । आर्थिक वृद्धि में यह संभव है कि कुछ वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा में अधिक वृद्धि हो, कुछ वस्तुओं में कम वृद्धि हो। परन्तु अर्थव्यवस्था में कुल उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा में दीर्घकाल तक निरतंर वृद्धि होनी चाहिए। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा को मुद्रा में व्यक्त किया जाता है। इसमें होने वाली केवल भौतिक मात्रा की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिये। इस प्रकार करने के लिये कुल उत्पादन के मूल्य में से वह वृद्धि हटानी पडे़गी, जो मूल्यों के कारण हु है। आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य दीर्घावधि में कुल उत्पादन में होने वाली वास्तविक वृद्धि से है।

आर्थिक विकास

आर्थिक विकास की अवधारणा विस्तृत अवधारणा है । आर्थिक विकास से आशय अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि के अतिरिक्त कुछ अन्य क्षेत्रों में सकरात्मक परिवर्तन से है । दूसरे शब्दों में आर्थिक विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि तथा साथ ही साथ राष्ट्रीय आय के वितरण में वांछित परिवर्तन से तथा अन्य तकनीकि व संस्थागत परिवर्तन होता है । आर्थिक वृद्धि आर्थिक विकास नही है, इसमें यह देखना होता है कि एक देश में उत्पादित वस्तुओं व सेवाओं की यात्रा में वृद्धि के फलस्वरूप उस देश के नागरिकों के रहन-सहन के स्तर वृद्धि हु या नहीं। आर्थिक वृद्धि के समय गरीबी, प्रति व्यक्ति वास्तविक आय, बेरोजगारी आदि में क्या-क्या परिवर्तन हुये । जैसे:-किसी देश द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा में वृद्धि दर के समान या उससे अधिक दर से उसकी जनसंख्या भी बढ़ जाय, तब प्रति व्यक्ति आय उतनी रहेगी या घट जायेगी । इस स्थिति में कुल उत्पादन तो बढ़ा लेकिन लोगो के औसत रहन-सहन के स्तर में को परिवर्तन नही आया । इसी प्रकार यदि प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि के साथ-साथ आय की असमानताएं भी बढ़ी हो तो इसका मतलब आर्थिक वृद्धि के लाभ समान रूप से नही बॅटे गरीब और गरीब हो गये । अमीर और अमीर हो गये । आर्थिक विकास का संबंध अर्थव्यवस्था मे कुछ अन्य परिवर्तन से भी होती है जैसे उत्पादन के साधनों की कार्यकुशलता में सुधार, उत्पादन की तकनीक में परिवर्तन, गैर कृषि क्षेत्र के महत्व आदि । आर्थिक विकास से अभिप्राय आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ परिवर्तन से है । परिवर्तन से अभिप्राय अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार से है । ये परिवर्तन रहन-सहन के स्तर में वृद्धि, असमानता में कमी, उन्नत तकनीक आदि में सकरात्मक परिवर्तन से है।

आर्थिक विकास की विशेषताएं

एक देश के अर्थव्यवस्था में कुछ परिवर्तन होते रहते है इन्ही परिवर्तनों को आर्थिक विकास के विशेषताओं में रूप में जाना जाता है जिसमें कछु नियम है-
  1. सतत् प्रक्रिया :- आर्थिक विकास एक सतत् प्रक्रिया है, जिसमें विकास के विभिन्न अंग एक दूसरे से जुडे़ रहते है । जैसे - कृषि के बाद उद्योग व सेवाओं का विकास होता है। विकास की यह प्रक्रिया नवीन उत्पादन तकनीक, बड़े पैमाने का उत्पादन तथा साधनों में परिवर्तन द्वारा दीर्घकाल में राष्ट्रीय आय की वृद्धि में सहायक।
  2. राष्ट्रीय आय व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि :- एक देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि उसके विकास का सूचक होती है । यहॅा वास्तविक राष्ट्रीय आय से आशय उस आय से है जो मय सूंचकांको के आधार पर संशोधित कर दी ग है । स्थिर मूल्यों पर राश्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि होनी चाहिये । राष्ट्रीय आय की तुलना में जनसंख्या में वृद्धि की दर अधिक तीव्र है, तो प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय बढ़ने के स्थान पर कम हो जायेगी ।
  3. दीर्घकालीन वृद्धि :- आर्थिक विकास उसी दशा में माना जाता है जबकि प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि समय विशेष से संबंधित न होकर दीर्घकाल तक निरतंर होती है।
  4.  जीवन स्तर में वृद्धि :- यदि राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा धनी वर्ग को मिलता है तो आर्थिक विकास अधिक सार्थक नही माना जाता है ।

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