चिंतन क्या है?

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अपनी दैनिक बातचीत में हम चिंतन शब्द का प्रयोग कई मनोवैज्ञानिक क्रियाओं के लिए करते है। उदाहरण स्वरूप अपना अनौपचारिक परिचय देते हुए जब मैं यह कहता हू कि मैं उन दिनों के बारे में सोच रहा हू जब मैं कालेज में विद्यार्थी था। तो यहॉ में सोच (चिंतन) शब्द का प्रयोग मनोवैज्ञानिक क्रिया याद के लिए कर रहा हू। इसी प्रकार जब बच्चा कहता है कि मैं उस बंगले के बारे में सोच रहा हू जो मैं अपने लिए बनाऊँगा तो वस्तुत: वह कल्पना कर रहा है। इसी प्रकार दूर से आती हुई किसी अस्पष्ट चीज को देखकर यदि कोई व्यक्ति कहता है मैं यह सोचता हू कि वह टैक्सी है तो वह केवल अपने प्रयक्षीकरण की ही व्याख्या कर रहा है।
  1. रॉस- चिंतन मानसिक क्रिया का भावनात्मक पक्ष या मनोवैज्ञानिक वस्तुओं से संबंधित मानसिक क्रिया है।
  2. गैरेट- चिंतन एक प्रकार का अव्यक्त एवं अदृश्य व्यवहार होता है जिसमें सामान्य रूप से प्रतीकों (बिम्बों, विचारों, प्रत्यय) का प्रयोग होता है।
  3. मोहसिन- चिंतन समस्या समाधान संबंधी अव्यक्त व्यवहार है।
चिंतन की उपरोक्त सभी परिभाषाओं को मुख्य रूप से दो वर्गो में विभाजित करके समझा जा सकता है। प्रथम वर्ग में वे परिभाषाए आती है जिनके अनुसार चिंतन को एक ऐसी प्रक्रिया माना जाता है जिसमें बाहृय घटनाओं (भूत, वर्तमान तथा भविष्य की) का आन्तरिक या मानसिक चित्रण किया जाता है। हम उस वस्तु या घटना के बारे में भी सोच सकते है जिसे हमारे द्वारा कभी देखा तथा अनुभव न किया गया हो। दूसरे वर्ग में ये परिभाषाए पहले वर्ग की परिभाषाओं से अधिक व्यवहारात्मक मानी जाती है क्योंकि ये चिंतन को एक ठोस क्रियात्मक आधार प्रदान करती हैं, उसे महज मानसिक क्रियाओं तथा अनुभूतियों का खिलौना न मानकर एक ऐसा साधन मानती है जिसके सहारे विभिन्न प्रकार के समस्या समाधान व्यवहार को दिशा और गति प्रदान करने का कार्य किया जा सकता है। चिंतन के इस स्वरूप का अध्ययन और मापन भी संभव हैं क्योंकि किसी का चिंतन कितना सार्थक है यह उसके समस्या समाधान व्यवहार के संदर्भ में अच्छी तरह जाना जा सकता है।

परन्तु अगर गहराई से और अधिक विश्लेषण किया जाए तो चिंतन की इन दोनों प्रकार की परिभाषाओं में कोई सैद्धान्तिक अन्तर नजर नहीं आता। दोनों का लक्ष्य एक ही है। मानसिक चित्रण और अनुभूति समस्या समाधान व्यवहार में सहायक होती है और समस्या समाधान व्यवहार मानसिक चित्रण या अनुभूतियों को जन्म देने वाला सिद्ध होता है। जब भी हम कोई समस्या हल करते हैं तो उसका विश्लेषण उसे ठीक से समझना तथा उसके हल के बारे में परिकल्पनाए बनाकर समाधान का रास्ता ढूॅढना- ये सभी बातें हमारे मन और मस्तिष्क में आंतरिक रूप से चलती रहती है। हम विचारों के द्वारा वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं, प्रक्रियाओं आदि को अपने मन और मस्तिष्क में बिठाकर इधन-उधर इस तरह शतरंज की गोटियों की तरह आदान-प्रदान करते रहते हैं, ताकि हमारी समस्या के समाधान का कोई रास्ता निकल आए। इस तरह मानसिक चित्रण या मानसिक खिलवाड़ की प्रक्रिया और उसके द्वारा समस्या समाधान या और किसी प्रकार का प्रतिफल ये दोनों बातें अन्त: संबंधित है। इसलिए चिंतन की प्रक्रिया और उसके प्रतिफल को एक दूसरे का अभिन्न अंग ही समझा जाना चाहिए तथा उनका मूल्यांकन चिंतन के परिणामस्वरूप होने वाले सम्पूर्ण लाभी के रूप में ही किया जाना चाहिए। होता भी ऐसा ही है। कोई क्या सोच रहा है या कया सोच रहा था इसका पता उसके द्वारा बाहृय रूप से किए जाने पर उसकी व्यवहार क्रियाओं द्वारा ही लगाया जा सकता हैं इस तरह समस्या समाधान या व्यवहार क्रियाओं के रूप में किसी के द्वारा क्या किया गया और इसके लिए उसके मन और मस्तिष्क में पहले क्या कुछ घटित हुआ इन दोनों बातों का समन्वय ही चिंतन के मनोवैज्ञानिक अर्थ एवं प्रकृति को समझने में किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से चिंतन की एक व्यावहारिक परिभाषा के बारे में सोचा जाय तो उसमें चिंतन संबंधी मानसिक और आन्तरिक व्यवहार तथा इस व्यवहार का प्रतिफल इन दोनों ही बातों का समन्वय होना चाहिए।

इस प्रकार की परिस्थिति में निष्कर्ष रूप से चिंतन को निम्न ढंग से परिभाषित करना हमारी दृष्टि से उपयुक्त सिद्ध हो सकता है: चिंतन से तात्पर्य हमारी उन व्यवहार क्रियाओं के प्रारूप से है जिसमें हम वस्तुओं, व्यक्तियों तथा घटनाओं का समस्या विशेष के समाधान हेतु अपने-अपने ढंग से मानसिक चित्रण या क्रियान्वयन (चिन्ह, प्रतीक आदि के रूप में) करते रहते हैं।

चिंतन की प्रकृति

चिंतन के अर्थ और उसकी परिभाषाओं के उचित विश्लेषण के माध्यम से हमें चिंतन की प्रकृति और उसके स्वरूप के बारे में निम्न निष्कर्ष निकालने में सहायता मिल सकती है।
  1. चिंतन सभी प्रकार से एक संज्ञानात्मक व्यवहार क्रिया है।
  2. चिंतन किसी उद्देश्य या लक्ष्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर रहता है। इसका अर्थ यह है कि दिवास्वप्न या कल्पना आदि उद्देश्यहीन संज्ञानात्मक क्रियाए चिंतन की परिधि में नहीं आती। 
  3. चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार हैं, आरम्भ से लेकर अन्त तक इसमें कोई न कोई समस्या विद्यमान रहती है। समस्या तब खड़ी होती है जब कोई निश्चित व्यवहार मनुष्य की अनुकूल आवश्यकताओं को संतुष्ठ नहीं कर सकता। ये समस्याए चिंतन को उत्पन्न करती है और चिंतन उसके समाधान में सहायता प्रदान करता है।
  4. परन्तु समस्या समाधान संबंधी प्रत्येक व्यवहार चिंतन में नहीं आता जैसा कि मोहसिन ने अपनी परिभाषा में कहा है। चिंतन केवल आन्तरिक ज्ञानात्मक व्यवहार से संबंधित है। जब हम किसी स्थिति में कोई काम करके समस्या के समाधान का प्रयास करते है, उस समय हम चिंतन नहीं कर रहे होते हैं। चिंतन के समय बाहरी गत्यात्मक क्रियाए बन्द हो जाती है। यह एक अव्यक्त क्रिया है जो व्यक्ति के भीतर होती है।
  5. चिंतन में मानसिक खोज होती है, गत्यात्मक खोज नहीं। मान लो मुझे ताला खोलने के लिए चाबी की जरूरत पड़ गई। मैं अपनी जेब देखूॅगा जहॉ प्राय: चाबी रखी रहती है। परन्तु मुझे वहॉ चाबी नहीं मिलती। अब मैं यदि इधर-उधर दौड़ता हू तो यह गत्यात्मक खोज होगी। परन्तु यदि मैं मौन भाव से बैठकर सोचता हू कि मैंने उसे कहॉ रख दिया होगा तो यह मानसिक खोज होगी। समस्या समाधान में चिंतन का यही काम है। इससे समय और श्रम में बचत होती है।
  6. चिंतन जैसा कि गैरट ने अपनी परिभाषा में कहा है कि एक प्रतीकात्मक क्रिया है। चिंतन में समस्या का मानसिक समाधान सोचा जाता है। चिंतन में ठोस चीजों की बजाय प्रतीकों का प्रयोग होता है। उदाहरणस्वरूप किसी बिल्डिंग के निर्माण की योजना में इन्जीनियर प्रत्यन एवं भूल का बाहृय साधन नहीं अपनाता। वास्तव में वह अपनी चिंतन-क्रिया में विभिन्न मानसिक बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग करता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुॅच सकते है कि चिंतन एक आन्तरिक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है। उसका कोई निश्चित उद्देश्य होता है। इसमें किसी समस्या का समाधान निहित होता है। समस्या समाधान के लिए इसमें गत्यात्मक खोज नहीं होती, बल्कि विषयों, क्रियाओं तथा अनुभूतियों को मानसिक स्तर पर प्रयुक्त किया जाता है।

चिंतन के साधन

चिंतन की प्रक्रिया से जुड़े हुए तत्वों तथा काम में आने वाले साधनों को इन रूप में समझा जा सकता है-
  1. बिम्ब- प्राय: बिम्ब चिंतन साधन के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। मानसिक चित्रों के रूप में बिम्बों में व्यक्ति के उन वस्तुओं, दृश्यों तथा व्यक्तियों से संबंधित वयक्तिगत अनुभव सम्मिलित होते हैं जिन्हें वास्तविक रूप में देखा हो या जिनके बारे में सुना या अनुभव किया हो। कई स्मृति बिम्ब होते हैं जो इन ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभवों पर आधारित होते हैं। कई कल्पना बिम्ब होते हैं जो कल्पनाओं पर आधारित होते है। अत: बिम्ब वास्तविक वस्तुओं, अनभूतियों तथा क्रियाओं के प्रतीक होते हैं।
  2. संप्रत्यय- संप्रत्यय भी चिंतन का एक महत्वपूर्ण साधान है। संप्रत्यय एक सामान्य विचार है जो किसी सामान्य वर्ग के लिए प्रयेफकत होता है और जो उसी सामान्य वर्ग की सभी वस्तुओं या क्रियाओं की किसी सामान्य विशेषता का प्रतिनिधित्व करता है। संप्रत्यय निर्माण या सामान्यीकरण से हमारे चिंतन प्रयासों में मितव्ययिता आती हैं। उदाहरणस्वरूप जब हम बन्दर शब्द सुनते हैं तो तत्काल हमारे मन में बन्दरों की सामान्य विशेषताएॅ ही नहीं घूम जाती बल्कि बन्दरों के संबंध में अपने व्यक्तिगत अनुीाव भी हमारी चेतन पटल पर आ जाते हैं और हमारे चिंतन को आगे बढ़ाते हैं।
  3. प्रतीक एवं चिन्ह- प्रतीक एवं चिन्ह वास्तविक विषयों, अनुभूतियों तथा क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते है। टे्रफिक की बत्तियॉ, रेल्वे सिग्नल, स्कूल की घंटियॉ, गीत, झण्डा, नारे-सभी प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियॉ है। चिंतन में संप्रत्यय भी प्रतीकों एवं चिन्हों द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। इन प्रतीकों एवं चिन्हों से चिंतन को बढ़ावा मिलता है। इनकी सहायता से तत्काल ज्ञान हो जाता है कि क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए- जैसे हरी झण्डी का हिलाना हमें बता देता है कि गाड़ी चलने वाली है और हमें गाड़ी में बैठ जाना चाहिए। इस प्रकार गणित में (+) का निशान बता देता है कि हमें क्या करना है। बोरिग लांगफील्ड तथा वैल्ड ने इस संबंध में महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला है, प्रतीक एवं चिन्ह मोहरे एवं गोटियॉ है जिसमें द्वारा चिंतन का महान खेल खेला जाता है। इसके बिना यह खेल इतना अभूतपूर्व और सफल नहीं हो सकता।
  4. भाषा- भाषा केवल पारस्परिक सम्पर्क बनाने का ही साधन नहीं बल्कि चिंतन का भी साधन है। इनमें शब्द होते हैं जो प्रतीकात्मक होते हैं। कई बारे हम शब्दों के स्थान पर इशारों का प्रयोग करते हैं। अंगूठा दिखाना, मुस्कुराना, भौहें चढ़ाना, कन्धे झठकना- आदि महत्वपूर्ण अर्थ रखते हैं। चिंतन प्रक्रिया के लिए भाषा एक सशक्त एवं अत्यन्त विकसित साधन है।

चिंतन के प्रकार

प्रत्यक्ष बोधात्मक या मूर्त चिंतन- 

यह चिंतन का अत्यन्त सरल रूप है। प्रत्यक्ष बोध या अप्रत्यक्षीकरण ही इस प्रकार के चिंतन का आधार है। प्रत्यक्षीकरण व्यक्ति की संवेदनात्मक अनुभूमि की व्याख्या है। यदि एक बच्चे को सेब दिया जाए तो वह एक क्षण के लिए सोचता है और उसे लेने से इन्कार कर देता है। इस समय इसका चिंतन प्रत्यक्ष बोध पर आधारित है वह अपनी पूर्व अनुभूति के आधार पर संवेदना की व्याख्या कर रहा है। उसे हरे सेब के स्वाद की याद आ रही है जो उसे कुछ दिन पहले दिया गया था।

संप्रत्यात्मक या अमूर्त चिंतन- 

प्रत्यक्ष बोधात्मक चिंतन की भॉति इसमें वास्तविक विषयों या क्रियाओं के बोध की आवश्यकता नहीं होती। इसमें संप्रत्ययों एवं सामान्यीकृत विचारों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के चिंतन के विकास में भाषा का बहुत बड़ा हाथ होता है। यह चिंतन प्रत्यक्ष बोधात्मक चिंतन से बढ़िया माना जाता है, क्योंकि इससे समझने में सुविधा होती है तथा खोज एवं आविष्कारों में सहायता मिलती है।

विचारात्मक या तार्किक चिंतन- 

यह ऊँचे स्तर का चिंतन है जिसका कोई निश्चित लक्ष्य होता है। सरल, चिंतन तथा इसमें पहला अन्तर तो यह है कि इसका उद्देश्य सरल समस्याओं की अपेक्षा जटिल समस्याओं को हल करना होता है। दूसरे, इसमें अनुभूतियों को सरलतापूर्वक एक दूसरे के लाभ जोड़ने की अपेक्षा समस्त संबंधित अनुभूतियों का पुनर्गठन करके उनमें से स्थिति का सामना करने के लिए या बाधाओं को दूर करने के लिए नए रास्ते निकाले जाते है। तीसरे विचारात्मक चिंतन में मानसिक क्रिया प्रयत्न एवं भूल का यान्त्रिक प्रयास नहीं करती। चौथे विचारात्मक चिंतन में तर्क को सामने रखा जाता है। सभी संबंधित तथ्यों को तर्कपूर्ण क्रम में कठित करके उनसे प्रस्तुत समस्या का समाधान निकाला जाता है।

सृजनात्मक चिंतन- 

इस चिंतन का मुख्य उद्देश्य किसी नई चीज का निर्माण करना है। यह वस्तुओं, घटनाओं तथा स्थितियों की प्रकृति की व्याख्या करने के लिए नएं सम्बन्धों की खोज करता है। यह पूर्व स्थापित नियमों से बाध्य नहीं होता। इसमें व्यक्ति स्वयं ही समस्या पैदा करता है और फिर स्वतन्त्रतापूर्वक उसके समाधान के साधन ढूॅढता है। वैज्ञानिकों तथा अनुसन्धानकर्ताओं का चिंतन इसी प्रकार का होता है।

अभिसारी चिंतन-

अभिसारी चिंतन की सर्वप्रथम व्याख्या पॉल गिलफर्ड ने की। अभिसारी चिंतन में किसी मानक प्रश्न का उत्तर देने में किसी सृजनात्मक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। विद्यालयों में होने वाले अधिकांश कार्यो, बुद्धि आदि के परीक्षण में बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर देने में अभिसारी चिंतन का प्रयोग होता है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति एक पदानुक्रमिक ढंग से अनुसरण करते हुए चिंतन करता है। वस्तुत: यह चिंतन परंपरागत प्रकार की क्रमबद्ध विचार प्रक्रिया का परिणाम होता है, इसके द्वारा व्यक्ति अपनी सरल समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करता है।

अपसारी चिंतन-

किसी समस्या के विभिन्न समाधानों या कार्य को करने के विभिन्न प्रयत्नों में से किसी एक उत्तम समाधान या प्रयत्न को चुना जाना अपसारी चिंतन है, अपसारी चिंतन अभिसारी चिंतन के विपरीत होता है क्योंकि अभिसारी चिंतन में किसी समस्या के समाधान के लिए कुछ निश्चित संख्या में समाधान उपस्थित होते हैं जबकि इस प्रकार के चिंतन में विभिन्न प्रकार के अनेकों समाधान होते हैं। अपसारी चिंतन में सृजनात्मकता तथा खुले प्रकार के प्रश्न तथा सृजनात्मकता सम्मिलित होती है।

क्रांतिक चिंतन-

क्रांतिक चिंतन, चिंतन का एक प्रकार होता है जिसमें किसी विषय-वस्तु, विषय या समस्या के समाधान में कौशलयुक्त संश्लेषण मूल्यांकन तथा पुर्नसंरचना सम्मिलित होते हैं। क्रांतिक चिंतन स्वनिर्देशित, स्व-अनुशासित, सुनियोजित प्रकार का चिंतन होता है।

चिंतन शक्ति का विकास

चिंतन सीखने-सिखानें की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण तत्व है। हमारी सीखने की योग्यता हमारे ठीक चिंतन की योग्यता पर आधारित है। केवल वह व्यक्ति समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जो स्पष्ट, सावधानीपूर्ण एवं क्रमिक चिंतन कर सकता है। परन्तु व्यक्ति जन्म से चिंतक नहीं होता, व्यक्ति को चिंतन करना सीखना पड़ता है। चिंतन करना सीखना कोई आसान काम नहीं। इसके लिए उचित चिंतन की शैलियों तथा अभ्यास का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। यद्यपि प्रभावशाली तथा ठीक चिंतन करना सिखाने से संबंधित समस्त साधनों का उल्लेख करना कठिन है परन्तु फिर भी निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देकर चिंतन प्रक्रिया को विकसित किया जा सकता है।

ज्ञान एवं अनुभूतियों की पर्याप्तता- 

चिंतन बिना कोई पूर्वाधार के नहीं होता। चिंतन चिंतक के पूर्व ज्ञान तथा पूर्व अनुभवनों पर आधारित होता है। जितना अधिक ज्ञान होगा, उतना ही अधिक चिंतन होगा। गलत ज्ञान गलत चिंतन का कारण बन सकता है। अत: हमें पर्याप्त एवं उचित ज्ञान तथा अनुभूतियॉ ग्रहण करनी चाहिए। यह इन साधनों द्वारा किया जा सकता है:
  1. ज्ञान एवं अनुभव, संवेदनाओं तथा प्रत्यक्षीकरण से प्राप्त होते हैं। अत: यह महत्वपूर्ण है कि हम ठीक संवेदना ग्रहण कर उनकी ठीक तरह से व्याख्या कर सकें। अत: हमें ठीक निरीक्षण तथा ठीक व्याख्या करने का अभ्यास करना चाहिए।
  2. पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करने के अवसर प्राप्त करने चाहिए। हमें स्वाध्याय, विचार-विमर्श तथा स्वस्थ एवं अभिप्रेरणात्मक क्रियाओं में भाग लेने हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए। 

अभिप्रेरणा तथा लक्ष्य की निश्चितता- 

चिंतन उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। जब तक सुनिश्चित लक्ष्य सामने न हो तब तक चिंतन ठीक रास्ते पर नहीं चल सकता। यह समस्या संबंध व्यवहार है जिसका लक्ष्य अनुभूत आवश्यकताओं को संतुष्ट करना होता है। प्रत्येक चिंतन के पीछे कोई न कोई लक्ष्य होता है। इससे चिंतन शक्ति संगठित करने में सहायता मिलती है। इससे चिंतन में रूचि उत्पन्न होती है और चिंतन में कुशलता आती है। अत: सुनिश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही चिंतन करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। हमें जिन समस्याओं का समाधान ढूॅढना हो, वे समस्याए हमारी आवश्यकताओं के साथ संबंधित होनी चाहिए। निरूद्देश्य चिंतन पर नियंत्रण होना चाहिए और अपनी शक्ति निर्माणात्मक चिंतन पर ही केन्द्रित करने का प्रयत्न सदैव हमारे द्वारा होना चाहिए।

पर्याप्त लचीलापन- 

अनावश्यक बाधाए खड़ी होने तथा चिंतन के क्षेत्र के संकीर्ण हो जाने से चिंतन प्रक्रिया में बाधा पड़ती है। परन्तु इसका अर्थ यह कभी नहीं कि हम अपने आपको पूरी स्वतंत्रता प्रदान करके कल्पना के संसार में अनावश्यक रूप से विचरने दें। यदि समस्या समाधान में पूर्व अनुभवनों से सहायता न मिलती हो तो हमें नए संबंधें तथा नई संभावनाओं के प्रयोग की ओर ध्यान देना चाहिए।

इनक्यूबेशन- 

चिंतन प्रक्रिया में प्रगति के लिए इनक्यूबेशन की क्रिया अत्यन्त सहायक सिद्ध हो सकती है। जब हम बहुत कोशिश करने पर भी किसी समस्या के समाधान में सफल नहीं होते तो उसे कुछ समय के लिए एक तरफ रख कर आराम करना चाहिए या किसी अन्य क्रिया में लग जाना चाहिए। इस दौरान हमारा अवचेतन उस समस्या पर विचार करता रहता है। जिस प्रकार इनक्यूबेशन से अंडे सेने का काम होता है, उसी प्रकार हमारे अवचेतन मन के प्रयासों द्वारा हमारी समस्याओं का समाधान निकल आता है। इस इनक्यूबेशन द्वारा हम अपने चिंतन में नया जीवन पैदा कर सकते हैं और थकान को दूर कर सकते हैं।

बुद्धि एवं विवेक- 

उचित चिंतन की योग्यता बुद्धि में निहित है। उचित चिंतन के लिए बुद्धि का उचित विकास अत्यन्त आवश्यक है। विवके चिंतन प्रक्रिया को जारी करने का प्रभावशाली साधन है। यह समस्या समाधान के लिए अन्तदर्ृष्टि प्रदान करता है। अत: उचित चिंतन का विकास करने हेतु हमें सदैव बुद्धि विवके को इस कार्य हेतु एक आवश्यक साधन के रूप में अपनाना चाहिए।

संप्रत्ययों तथा भाषा का उचित विकास-

यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि संप्रत्यय, प्रतीक, चिन्ह, भाषा आदि चिंतन के महत्वपूर्ण साधन हैं। उनके उचित विकास के बिना चिंतन प्रभावशाली नहीं हो सकता। इन साधनों के विकास से चिंतन-प्रक्रिया को प्रेरणा मिलती है। गलत-संप्रत्ययों के अनुचित विकास से न केवल चिंतन की प्रगति में बाधा पड़ती है बल्कि अशुद्ध चिंतन एवं अपूर्ण धारणाओं का जन्म होता है। अत: हमें भाषा विकास में उचित संप्रत्ययों तथा भाषात्मक योग्यताओं के निर्माण की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा इन्हें चिंतन हेतु समुचित उपयोग में लाने का अभ्यास करना चाहिए।

तर्क प्रक्रिया का ठीक होना- 

तर्क प्रकिन पर प्रभाव पड़ता है। तर्कहीनता अशुद्ध चिंतन को जन्म देती है। तक शुद्ध चिंतन का विज्ञान है। अत: हमें सदैव तर्कपूर्ण चिंतन करने की आदत डालनी चाहिए।

उपर्युक्त बातों की ओर ध्यान देने के अतिरिक्त हमें अपने आपको ऐसे तत्वों से बचाने का भी प्रयास करना चाहिए जो चिंतन की प्रगति में बाधा डालते हैं। उनमें से एक तत्व हैं-भावात्मक उत्तजेना के प्रभाव में व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। संकीर्ण भावनाएॅ, भ्रम तथा अन्धविश्वासों के कारण चिंतन में बाधा पड़ती है। ठीक चिंतन के लिए इन तमाम बाधक तत्वों पर नियंत्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है तभी हम उचित चिंतन की ओर प्रगति कर सकते हैं।

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