ज्वालामुखी किसे कहते हैं, कितने प्रकार के होते हैं?

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


ज्वालामुखी किसे कहते हैं?

पृथ्वी के गर्भ में स्थित गर्म लावा, वाष्प एवं गैसें जब धरातल को तोड़कर बाहर आती हैं तो उसे ज्वालामुखी उद्गार कहते हैं। गर्म लावा धरातल की चट्टानों को भी तोड़कर आसमान में उछाल देता है, जिसे ज्वालामुखी बन कहा जाता है।  ज्वालामुखी भूपर्पटी में वह छिद्र या द्वार होता है जिनके द्वारा शैल पदार्थ,शैल के टुकड़े, राख, जलवाष्प तथा अन्य गर्म गैसे धीरे-धीरे अथवा तेजी से उद्गार के समय निकलते है। ये पदार्थ के आंतरिक गर्म भागों मे पाये जाते हैं, जहॉं शैल संस्तर अपेक्षाकृत कमजोर होते है। 

ज्वालामुखी इस तथ्य के प्रमाण हैं कि पृथ्वी के आंतरिक भागों में अत्यधिक गर्मी व दबाव विद्यमान है। पृथ्वी की बाह्य ठोस परत के नीचे पिघले शैल पदार्थ जिन्हें मैग्मा कहते है। अत्याधिक दबाव में होते है। जब यह मैग्मा छिद्र या दरार द्वारा मैग्मा चेम्बर से बाहर धरातल पर जमा हो जाता है, तब इसे लावा कहते है। मैग्मा तथा गैंसे जो भूपर्पटी के नीच जमा हैं, वे बाहर आने का प्रयास करती है जब ये अपने दाब से भूपर्पटी में को कमजोर रेखा या छिद्र बनाने में सफल हो जाती है। तो ये गैंसें, पिघले शैल पदार्थ, शैल के ठोस टुकड़े व राख आदि के साथ तेजी से धरातल पर फैल जाते हैं। जब ठोस व पिघले शैल तथा गैसे पृथ्वी के आंतरिक भागों से निकलकर धरातल पर आती है। तो यह प्रक्रिया ज्वालामुखी प्रक्रिया कहलाती है।

ज्वालामुखी के प्रकार

विश्व में पाये जाने वाले ज्वालामुखी तीन प्रकार के हैं- 
  1. सक्रिय ज्वालामुखी - वे ज्वालामुखी जिनमें समय-समय पर उद्गार होते रहते है। अथवा वर्तमान में उदगार हो रहे है उन्हें सक्रिय ज्वालामुखी कहते है। इस प्रकार के प्रमुख ज्वालामुखी-भूमध्य सागर में स्ट्रॉमबोली, इंडोनेशिया में क्राकाटोआ, फिलीपाइन्स में मेयोन, हवा द्वीप समूह में मोना लोआ तथा भारत में बैरन द्वीप हैं।
  2. प्रसुप्त  ज्वालामुखी - वे है जिनमें वर्तमान काल में उद्गार नहीं हुए है। वास्तव में उन्हें सोये हुए ज्वालामुखी कहा जा सकता है। इटली का विसुवियस तथा दक्षिण अमेरिका का कोटोपेक्सी प्रमुख प्रसुप्त ज्वालामुखी हैं।
  3. विलुप्त ज्वालामुखी - कुछ ऐसे ज्वालामुखी हैं जिनमें ऐतिहासिक काल में उद्गार नहीं हुए। इन्हें विलुप्त ज्वालामुखी कहते है। म्यांमार (बर्मा) का माऊंट पोपा तथा तंजानिया का किलीमंजारों प्रमुख विलुप्त ज्वालामुखी है। 

ज्वालामुखी का वितरण

संसार में लगभग 500 ज्वालामुखी हैं। इनमें से अंधिकांश तीन निश्चित पेटियों में पाये जाते हैं ये तीन पेटियॉं हैं-प्रशांत महासागरीय पेटी, मध्यवर्ती पेटी तथा अफ्रीकी दरारघाटी पेटी। इस प्रकार, ज्वालामुखी उन क्षेत्रों में मुख्य रूप में पाये जाते है। जहॉं अत्यधिक वलन व भ्रंशन पाये जाते है। वे तटीय पर्वतीय श्रेणियों के साथ, द्वीपों तथा महासागरों के आंतरिक भागों में पाये जाते है। महाद्वीपों के आंतरिक भाग इनकी क्रिया से सामान्यतया अछूते रहे है। अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में पाये जाते है। 

संसार की मध्यवर्ती पेटी का ज्वालामुखी की संख्या के अनुसार दूसरा स्थान है यह यूरोप में आल्प्स पर्वत से प्रारंभ होकर टर्की तथा हिमाचल पर्वत प्रदेश से होती हु प्रशांत महासागरीय पेटी से मिल जाती है आफ्रिका दरार घाटी प्रदेश का तीसरा स्थान है इस पेटी के अधिकांश ज्वालामुखी विलुप्त प्रकार के है। केवल माउन्ट केमरून ज्वालामुखी जो पश्चिमी मध्य अफ्रिका में है सक्रिय ज्वालामुखी है। 

विश्व में ज्वालामुखी वितरण के प्रमुख क्षेत्र

विश्व में ज्वालामुखी वितरण के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं - (क) परिप्रशान्त पेटी, (ख) मध्य महाद्वीपीय पेटी और (ग) मध्य महासागरीय कटक मेखला। परिप्रशान्त पेटी में विश्व के सर्वाधिक ज्वालामुखी हैं, जिनसे निकलने वाला पदार्थ रोशनी बिखेरता है, फलत: इस पेटी को ज्वाला मेखल कहा जाता है। यहाँ विश्व के 88 प्रतिशत सक्रिय ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इस पेटी के प्रधान क्षेत्रों में फिलीपाइन (98), आलस्का (35), जापान (33), मध्य एण्डीज (22), दक्षिणी एण्डीज (22), द0-पू0 न्यूगिनी (15), ग्वाटेमाला (14), क्यूराइल (3), कमचटका (9), मैक्सिको (9), उत्तरी एण्डीज (9), लेसर उण्टीलीस (9), निकारगुआ (7), न्यूहेब्राइड (7), टांगा (6), कोस्टारिका (5) और न्यूजीलैण्ड (4) विशेष उल्लेखनीय हैं। मध्य महाद्वीपीय पेटी में भूमध्य सागर का अफ्रीकी तट, यूरोपीय और एशियाई क्षेत्र के ज्वालामुखी अधिक सक्रिय है। इस क्षेत्र में सिसली, इटली, काकेशस, तुर्की, अरमीनिया, ईरान आदि के ज्वालामुखी अधिक विनाशक हैं।

ज्वालामुखी का प्रभाव और बचाव

ज्वालामुखी से निकला गर्म लावा, जहरीली गैस, जलवाष्प राख, चट्टान चूर्ण आदि पर्यावरण को प्रदूषित कर जीवन को दूभर बनाते हैं। इनसे निकला द्रवित लावा मानव निर्माण और कृषि भूमि को श्मशान बना देता हैं। वाष्प से बाढ़ का खतरा उत्पन्न होता है और गैस घुटन पैदा करती है जिससे एक साथ दो दैवीय आपदाएं धन और जन की अपार क्षति करती है। 1783 में आइसलैण्ड के ज्वालामुखी से 10 हजार व्यक्ति, 2 लाख भेड़ें, 28 हजार घोड़े ओर 11 हजार अन्य पशु काल-कवलित हो गये थे। इसी प्रकार 1902 में पश्चिमी द्वीप समूह के माउण्ट पीली ज्वालामुखी से 28 हजार मौतें हुई। 1919 में जापान में केलतू ज्चालामुखी 5.5 हजार लोगों को मौत के द्वार पर पहुँचा दिया। अभी हाल (1985) में कोलम्बिया का भयानक उद्गार 25 हजार मौतों के लिये जिम्मेदार हैं।

अध्ययनों से पता चला है कि विगत 500 वर्ष की अवधि में तीन लाख से अधिक मौतें ज्वालामुखी से हुई हैं। गर्म लावा और राख लाखों हेक्टेयर भूमि को अयोग्य बना चुके हैं और विशाल पैमाने पर जीव-जन्तुओं का नाश हो चुका है। कहीं-कहीं इसकी विनाशलीला पूरी पारिस्थितिक तन्त्र को पंगु बना देती है। जनवायु और मौसम का बदलाव भी उद्गार का परिणाम बताया गया है। विशाल मात्रा में निकली धूल तापमान को घटरा देती है। इसी प्रकार गंधक मुक्त धूल और गैस से अम्ल वर्षा की सम्भावना बढ़ जाती है।

ज्वालामुखी जैसी आपदा से बचने के लिए अनेक उपाय किये जाते रहे हैं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से दूर मानव आवास, ज्वालामुखी उद्गार के समय शीघ्र हटने की सुविधा, ज्वालामुखी उद्भेदन का पूर्वानुमान और ऐसी वनस्पतियों का रोपण जिनकी सहन क्षमता पर्याप्त हो। फिर भी आकस्मिक घटना के समय सम्हल पाना कठिन होता है। हाल के वर्ष में फिलीपीन्स में ज्वालामुखी उद्गार भयानक प्रमाणित हुआ।

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