खनिज संसाधन क्या है?

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पुर्नजागरण के उपरान्त संसार में एक नया बदलाव आया और व्यापारिक
प्रतिस्पर्धा से यूरोपवासियों ने अथाह धन कमाया। ‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी
हैं।’ संसार में एक से एक नवीन आविष्कारों ने खनिज का दोहन प्रांरभ कर दिया।  परिभाषा- ‘‘खनिज प्राकृतिक रासायनिक यौगिक तत्व हैं। जो पम्रुखतया अजैव प्रक्रियाओं से
बना हैं। भूमि से खोदकर निकाले गये पदार्थो को खनिज कहते हैं।

भारत में अपार खनिज भंडार –

आवश्यकता की पूर्ति की दृष्टि से भारत में पाये जाने वाले खनिज-

  1. जो आवश्यकता से अधिक हैं। अभ्रक, बाक्साइड, बेरीलियम, सिलिकान,
    पत्थर, जिप्सम, बलुआ पत्थर, कोरंडम आदि। 
  2. भारत जिनके उत्पादन में आत्म निर्भर हैं- बलुआ पत्थर, बैराइट, स्लेट,
    कोयला, क्रोमाइट, चूने का पत्थर, एंडीमनी, डोलोमाइट, फिटकरी, फॉस्फेट, तांबा, संगमरमर
    आदि। 
  3. खनिज जो आवश्यकता से कम हैं-
    पेट्रोलियम, सोना, चांदी, टिन, सीसा, टंगस्टन, पारा,प्लेटिनम, पोटाश,
    गंधक एंव एस्फाल्ट। 

खनिजो के प्रकार- 

मूलत: तीन प्रकार हैं।

  1. धात्विक खनिज 
  2. अधात्विक खनिज 
  3. खनिज र्इंधन 

लौह अयस्क –

संसार में सबसे अधिक उपयोग लोहा से निर्मित वस्तुओ का हो रहा हैं। लौह
अयस्क को आधुनिक सभ्यता की जननी कहा जाता हैं। यह लौह युग हैं। जहां बड़ी-बड़ी
इमारते, पुल, भवन, मशीने, वाहन, कलपूर्जे आदि क प्रकार से बनायें जाते हैं।

लौहा के प्रकार:- 

  1. मेग्नेटाइट- यह सबसे उत्तम कोटि का अयस्क हैं। इसमें धातु अंश 70 प्रतिशत
    पायी जाती हैं। इसका रंग काला होता हैं। 
  2. हैमेटाइड- यह लाल,कत्थ, रंग का होता हैं। इसमें लोहांश 60 से 70 प्रतिशत
    पायी जाती हैं।
  3. लिमोनाइट- इसका रंग पीला या भूरा होता हैं। इसमें लोहांश की मात्रा 40 से
    60 प्रतिशत तक पाया जाताहैं। 
  4. सिडेराइट- इसका रंग राख जैसे होता हैं। इसमें लोहांश 10 से 48 प्रतिशत पाया
    जाता हैं। 

लौह अयस्क का वितरण –

  1. झारखण्ड- सिहं भूमि जिले में जो आमुंडी गुआ, पंसीरा बुरू तथा बुराबुरू
    मनोहरपुर कोहलन, हेमेटाइट प्रकार का लौहा मिलता हैं। इन लोहा खदानों से जमशेद
    पुर, दुर्गापुर, हीरापुर, कुल्टी, इस्पात संयंत्रों को पूर्ति की जाती हैं। 
  2. उड़ीसा-सुंदरगढ़, मयूरमंज, कोरापुर, एवं सम्बलपरु जिले में लौह अयस्क के
    भंडार हैं। विशेष रूप से सुलेपात, बादाम पहाड़, किसीवारू, की प्रसिद्ध खदाने हैं। यहां
    का लोहा जमशेदपुर, राउलकेला, लोहा इस्पात केंद्र को भेजा जाता हैं। 
  3. छत्तीसगढ़-यहां उत्तम कोटि का लोहा दुर्ग, बस्तर, रायपुर, रायगढ़ जिलों में
    मिलता हैं। दुर्ग जिले की दल्ली राजहरा की खदान विश्व विख्यात हैं। जहां से लोहा
    भिला स्पात संयंत्र को भेजा जाता हैं।
    बस्तर की बेलाडीला को संसार का खनिज आष्चर्य कहा जाता हैं। यहां
    का लोहा विशाखापटनम इस्पात संयंत्र को भेजा जाता है तथा जापान देश को निर्यात
    किया जाता हैं। 
  4. महाराष्ट्र- चांदा जिले के लोहारा, पीपलगांव, अकोला, देवलगांव, सूरजगढ़,गुल्टूर
    खानो से लौह अयस्क निकाला जाता हैं। 
  5. कर्नाटक- बेलारी, चिकमंगलूर, चित्तलदुर्ग, शिमोगा, तथा धारवाड़ क्षेत्र में लौह
    अयस्क निकाला जाता हैं। भद्रावती संयंत्र को यहां से कच्चे माल की पूर्ति की जाती हैं। 
  6. गोवा- यहां पिरना, अदेाल, पाले, ओनड़ा, कुदनेम, सुरला, उत्तरी गोवा में लौह के
    भंडार हैं। 
  7. व्यापार-भारत का लोहा सबसे अधिक जापान को जाता हैं। 

कोयला –

औद्योगिक क्रांति का प्रमुख सूत्र कोयला ही रहा हैं। इससे अनेक प्रकार की वस्तुयेंं
बनायी जाती हैं ओैर शक्ति के साधनों का गुरू रहा हैं।

कोयला के प्रकार- 

  1. एंथ्रसाइट- यह सवोर्त्तम किस्म का कोयला हैं। इसमें कार्बन की मात्रा 80 से 95
    प्रतिशत तक होता हैं। 
  2. बिटुमिनस-गोडंवाना काल की शैलों में मिलता हैं। इसमें कार्बन की मात्रा 60 से
    80 प्रतिशत होती हैं। 
  3. लिग्नाइट-यह मध्यम श्रेणी का कोयला हैं। इसमें कार्बन की मात्रा 45 से 55
    प्रतिशत होती हैं। 
  4. पीट कोयला- यह सबसे कम उपयोगी हैं। यह धुंआ बहुत देता हैं। इसमें कार्बन
    की मात्रा 40 प्रतिशत से कम होती हैं। 

कोयला का वितरण- 

  1. बिहार तथा झारखंड- यहां भारत का सर्वाधिक कोयला उत्पन्न होता
    हैं। दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र यहां पर स्थित हैं। 
  2. पश्चिम बंगाल- वर्तमान में रानीगंज प्रमुख कोयला उत्पादक केंद्र हैं।.
  3. मध्यप्रदेश- यहां सोननदी की घाटी, छिंदवाड़ा, बैतूल, नरसिंहपुर,
    कुरसिया,तथा होशंगाबाद में मिलता हैं 
  4. छत्तीसगढ़- तातापानी, रामकोला, चिरमिरी, विश्रामपुर, कोरबा, रायगढ़ से
    कोयला निकाला जाता हैं। 
  5. उड़ीसा- यहां सम्बलपुर तालचि, रामपुर, दोलबैरा, औरंगा में कोयला
    निकाला जाता हैं। 

उपयोग- 

भारत में कोयले की खदाने 826 हैं। जिसमें खोदकर विभिन्न हजारों उत्पाद तैयार
किये जाते हैं। गैस , कर्नाटक, फिनाल, रगं रोगन, बैजीन, कोके , कोलतार, अमोनिया
आदि प्रमुख हैं।

खनिज तेल – 

पेट्रोलियम
यह लैटिन भाशा के दो शब्दों पेट्रो और ओलियम से मिलकर बना हैं। जिसका अर्थ
चट्टानी तेल होता हैं। 

वितरण- 

भारत संपूर्ण विश्व का दस प्रतिशत पेट्रोलियम उत्पादन करता
हैं। 
  1. असम-यहा लखीमपुर जिले में डिगबो बायापांग, हस्सापागं तथा पानाटोला
    के तेल कुयेंं हैं। 
  2. गुजरात-यहां खंभात क्षेत्र में लुनेज, अंकलेश्वर में तेल निकाला जाता हैं। 
  3. आंध्रप्रदेश (गोदावरी तेल क्षेत्र )- यहा पर थाले में तेल प्राप्ति हु। 
  4. मुम्ब हा तेल क्षेत्र- वर्तमान में यह देश का सबसे बड़ा तेल उत्पादक
    क्षेत्र बन गया हैं। मुम्ब के उत्तर पश्चिम में 176किमी. दूर अरब सागर में इसका मुख्य क्षेत्र
    हैं। इसे मुम्ब हा के नाम से जाना जाता हैं।
    यहां तेल प्राप्ति हेतु एक सागर समा्रट नामक जलमंच का निर्माण किया गया हैं।
    1976 से यहां तेल तथा गैस उत्पादन किया जा रहा हैं। 

उपयोग-

पेट्रोलियम के महत्वपूर्ण उत्पादों में पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल,
साबुन, कृत्रिम रेशे, प्लास्टिक, विविध सौंदर्य प्रसाधन वस्तुयें हैं। इसमें लगभग 5000
किस्मो की उप वस्तुयें भी प्राप्त की जाती हैं। 

मैगनीज –

मैगनीज को जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स कहते हैं , क्योंकि इसके अनेक उपयोग हैं। जैसे
लोहे को कड़ा करना, उसकी गंदगी दूर करने, इस्पात बनाने, धातुओं को साफ करने एंव
धातुकर्मी व रासायनिक उद्योगों में किया जाता हैं। 

वितरण- 

भारत में 16करोड़ 70 लाख टन मैगनीज का विशाल भंडार है। विश्व उत्पादन
में भारत का तीसरा स्थान हैं। इसके भंडार आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक , राजस्थान,
मध्यप्रदेश, उड़ीसा, झारखंड में प्रमुख रूप से मिलते हैं। 

व्यापार- 

भारत मैग्नीज का निर्यातक देश हैं। भारतीय मैग्नीज के ग्राहक जापान, ब्रिटेन,
संयुक्त राष्ट्र अमेरीका तथा जर्मनी प्रमुख निर्यातक बंदरगाह विशाखापट्नम हैं।
भारत पूरे देश में शीट माइका या परतदार अभ्रक का अग्रणी उत्पादक देश हैं।
विश्व के कुल व्यापार में भारत का हिस्सा 60 प्रतिशत हैं। देश में अभ्रक का भंडार 59064
टन हैं। इनका उपयोग बिजली उपकरण में होता हैं। 

उत्पादन एंव वितरण- 

यहां तीन प्रकार के अभ्रक मिलते हैं। 
  1. मास्कोवाट, 
  2. फलोगोपाइट, 
  3. बायोटाइट । 

अभ्रक का उत्पादन पहले की तुलना में घट रहा हैं,
झारखण्ड एंव बिहार दोनो मिलकर भारत का लगभग 60 प्रतिशत अभ्रक निकालते
हैं। इसके अतिरिक्त आंध््राप्रदेश, राजस्थान में भी अभ्रक निकाला जाता हैं। अभ्रक का
आयातक देश संयुक्त राज्य अमेरीका हैं। 

बॉक्साइट –

इससे एल्युमिनियम बनाया जाता हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण हल्की धातु हैं। उच्च
विद्युत संचालकता में यह बहतु उपयोगी हैं। इससे वायुदाब, निर्माण, बिजली के घरेलू
उपयेगी सामान बनाते हैं। सफेद सीमेट के निर्माण आदि में होता हैं। 

उत्पादन एवं वितरण – 

देश में बॉक्साइड का अनुमानित भंडार 295.30 करोड टन हैं।
इसके महत्वपूर्ण निक्षेप बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक,
केरल आदि राज्यो में पाया जाता हैं। 

तांबा – 

तांबें का उपयोग भारत में प्राचीन काल से होता रहा हैं। भारत में कुल संभावित
भंडार लगभग 103 करोड़ टन हैं। मुख्य उत्पादक राज्य झारखंड, बिहार, राजस्थान, मध्
यपद्रेश, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल आदि है। भारत में तांबे का उत्पादन कम होता हैं। अत:
विदेशों से आयात करना पड़ता हैं। यहां संयुक्त राज्य अमेरीका, कनाडा, एवं जापान से
आयात किया जाता हैं। बिजली के तार बनायें जाते हैं। 

सोना –

सोना पीले रंग का चमकदार, ठोस भारी, मुलायम एंव जंग न लगने वाली धातु हैं।
इसे कड़ा करने हेतु तांबा, निकल, चांदी, पीतल आदि धातुओं का मिश्रण किया जाता हैं। 

वितरण- 

हमारे देश में तीन महत्वपूर्ण स्वर्ण क्षेत्र हैं।
कर्नाटक जिले का कोलार एंव हट्टी क्षेत्र द्वितीय रायचूर जिले का हट्टी स्वर्ण
क्षेत्र एंव तृतीय अनन्तपुरम जिले का रामगिरी क्षेत्र हैं। छत्तीसगढ़ में अभी राजनांदगांव के
दक्षिण तथ बस्तर में इसके संचय का पता चला हैं।
उत्पादन:- 67.9 टन स्वर्ण धातु के साथ स्वर्ण खनिज का अनुमानित भंडार 177.9 लाख
टन हैं। 

व्यापार- 

भारत सोने का मुख्य आयातक देश हैं। 

अन्य खनिजो का संक्षिप्त विवरण –

  1. चांदी:- चांदी बहु उपयोगी एंव कम मात्रा में मिलने वाली धातु हैं। भारत
    में मुख्यत: कर्नाटक में कोलार तथा झारखंड में सिंहभूमि क्षेत्र में मिलता हैं। 
  2. चूना पत्थर :- सीमेंट उद्योग मे ं सबसे उपयोगी खनिज हैं। मध्यप्रदेश में
    सबसे अधिक उत्पादन होता है। छत्तीसगढ़ में भी चूना पत्थर बहुतायत से मिलता हैं। 
  3. नमक:- राजस्थान की डीडवाना, पंचभ्रदा, लूनकरन तथा सांभर झील के
    जल से नमक तैयार किया जाता हैं। चट्टानी नमक हिमालय क्षेत्र में द्राग तथा गुमा से
    प्राप्त होता हैं। 
  4. हीरा:- यह मध्यप्रदेश के पन्ना जिला तथा कृश्णा के थाले में मिलता हैं।
    रायपुर जिले के मैनपुर एंव देवभोग क्षेत्र में मिलने की उम्मीद हैं। 

खनिज संसाधनों की समस्यायें –

खनिज संसाधनों से सम्पन्न होने के बावजूद भारत के खनिज सम्पदा की अनेक
समस्यायें हैं वे इस प्रकार हैं- 
  1. वितरण उपयोग क्षेत्रों से दूरी- भारत के अधिंकांश खनिज विशिष्ट
    क्षेत्रोंं में केंद्रित हो गये हैं। इनका दोहन करने के लिये संयंत्रों तक पहुँचाने में काफी खर्च
    आता हैं ले जाये जाने पर परिवहन खर्च अधिक आता हैं। जैसे ताम्बा का शोधक सयंत्र
    खेतड़ी राजस्थान में हैं। मध्यप्रदेश के मलाजखंड का ताम्बा खेतड़ी भेजा जाता हैं। 
  2. खनन मूल्य की अधिकता:- क खनिज उत्तम गुण वाले नहीं हैं। अत:
    उनका आर्थिक दोहन नुकसान पद्र होता हैं। हमारे यहां ताम्बा, सीसा, जस्ता तथा कोक
    बनाने युक्त कोयला भी गुणात्मक रूप में कम हैं, इसीलिये क बार कोक आयात करना
    पड़ता हैं। 
  3. खनन की आधुनिक तकनीक नहीं हैं:- भारत की खानों में खनन की
    आधुनिक तकनीक का अभाव हैं इसीलिये खनिजों का नुकसान तो होता ही हैं साथ ही
    खान क्षेत्र में दुर्घटनायें भी अधिक होती हैं। जैसे कोयला क्षेत्र में होती हैं, वहा क बार
    श्रमिकों की खान समाधि हु हैं। 
  4. परिवहन व्यय:- भारी सामानों के लिये सबसे सस्ता परिवहन जल माना
    जाता हैं किन्तु हमारी खनिज खर्च जल यातायात से बहुत दूर है। अत: थलमार्ग से ही
    परिवहन किया जाता है जो आर्थिक दृश्टि से नुकसान प्रद हैं। 
  5. खनिज आयात:- भारत में कोयला, पेट्रोलियम तथा अन्य खनिज निकाले
    जाते हैं, किन्तु बढ़ती हुयी आवश्यकता के फलस्वरूप बड़ी मात्रा में खनिज तेल आयात
    करना पड़ता हैं। इस आयात का प्रभाव हमारे आर्थिक तथा राजनैतिक खनन पर पड़ता
    हैं। 
  6. खनिज राष्ट्रीय नीति का अभाव- यद्यपि विभिन्न खनिजो के निर्माण के
    लिये अनेक प्रकार की सार्वजनिक संस्थाओं तथा योग्य प्रशासन कर्मचारी का तालमेल न
    होना अवशिष्ट पदार्थो के प्रति लापरवाही के फलस्वरूप हमे असफलता ही हाथ लगती हैं।
    खनिज संसाधनों का संरक्षण
    समस्यायें हर क्षेत्र में आती हैं किंतु उनका निराकरण भी आवश्यक हैं। 

उपरोक्त
समस्याओं का निराकरण निम्न आधार पर कर संरक्षण किया जा सकता हैं-

  1. मितव्ययता पूर्वक उपयोग- जो खनिज हमारे यहां कम मात्रा में हैं
    उनका उपयोग मितव्ययता पूर्वक करना चाहिये, जैसे जस्ता, पोटाश, गंधक, चांदी, पारा,
    सीसा आदि। 
  2. विकल्प शोध को प्रोत्साहन- कम मात्रा के खनिजों का विकल्प खोजना
    आवश्यक हैं, ऐसे शोध पर प्रोत्साहन मिलना चाहियें जैसे आज पेट्रोलियम का विकल्प
    खोजा जा रहा हैं ‘जेट्रोपा’ से पेट्रोलियम मिलेगा। ऐसा विश्वास हैं। 
  3. न तकनीक का उपयोग:- खनन के क्षेत्र में न तकनीकों तथा
    प्रोद्योगिकी को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। अनुमान लगाया गया हैं कि पुराने तरीेको
    से खनन द्वारा 3 प्रतिशत तक खनिज समाप्त हो जाते हैं। इस पर रोक लगायी जानी
    चाहिये। 
  4. नवीन क्षेत्रों की खोज:- खनिजो के नवीन क्षेत्रों की खोज की जावे
    ताकि संकट का सामना न करना पड़े। 
  5. निर्यात पर नियंत्रण- भारत से कुछ खनिजो का विदेशों को निर्यात किया
    जा रहा हैं। अब भारत में भी औद्योंगिक क्रांति हो रही हैं। देर सबरे उन खनिजों की हमें
    आवश्यकता होगी । अत: निर्यात पर नियंत्रण होना जरूरी हैं। 
  6. जन जागृति- खनिजों के प्रति जन जागृति भी आनी चाहिये ताकि लोग
    उनका उपयोग िवेवेकपूर्ण पद्धति से करें। खनिज संरक्षण के लिये अनेक संगठन कार्य कर
    रहें हैं।

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