मृदा अपरदन के प्रकार, मृदा अपरदन रोकने के उपाय

अनुक्रम
मृदा को अपने स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा हटाया जाना मृदा अपरदन कहलाता है। यह प्राकृतिक कारकों जैसे जल, पवन, हिमानी और जल की लहरों द्वारा एक प्रकार की मृदा की चोरी है। गुरूत्वबल के कारण पहाड़ी ढलानों पर मृदा नीचे की ओर शनै:शैनै: गतिमान होती है जिसे मृदा-सर्पण कहते हैं अथवा यह भूस्खलन द्वारा तीव्र गति से नीचे आ सकती है। भूमि का वर्तमान स्वरूप हजारों लाखों वर्षों की काट-छाँट द्वारा बना है। मृदा अपरदन आज की पर्यावरणीय समस्याओं में से एक प्रमुख समस्या है और यह कृषि के उत्पादन में गंभीर रुकावट है। मृदा अपरदन की विकरालता एवं उसके फैलाव को कई भौतिक एवं सामाजिक कारक निर्धारित करते हैं। प्रमुख भौतिक कारक हैं: वर्षा की अपरदनकारी शक्ति, मृदा की अपनी कटाव क्षमता, आवर्ती बाढ़ों की तीव्रता, ढलान की लम्बाई और तीव्रता। प्रमुख सामाजिक कारक है: वनों की कटाई, अतिचराई, भूमि उपयोग की प्रकृति और खेती करने की विधियाँ। भूमि अपरदन के गंभीर एवं अत्यन्त स्पष्ट रूप खड्ड, अवनालिकायें और भूस्खलन हैं। इसके दूसरी ओर वर्षा द्वारा किया गया परत-अपरदन और पवन द्वारा किया गया अपरदन यद्यपि स्पष्ट रूप से बहुत कम दिखाई देते हैं परन्तु ये भी इतने ही गंभीर हैं क्योंकि उनके द्वारा भारी मात्रा में मृदा की बहुमूल्य ऊपरी परत नष्ट हो जाती है। भारत में खड्डों और अवनालिकाओं द्वारा हुए मृदा के अपरदन से 36.7 लाख हैक्टेयर भूमि को नुकसान हुआ है। भारत में खड्डों और अवनालिकाओं के चार प्रमुख क्षेत्र हैं: (1) यमुना-चम्बल खड्ड क्षेत्र (2) गुजरात खड्ड क्षेत्र (3) पंजाब शिवालिक गिरिपाद क्षेत्र और (4) छोटा नागपुर क्षेत्र। इनके अतिरिक्त खड्ड अपरदन के कुछ ठोस उदाहरण महानदी की घाटी, ऊपरी सोन घाटी, ऊपरी नर्मदा और तापी की घाटियों, शिवालिक तथा पश्चिमी हिमालय के गिरिपाद वाली भाबर भूमि और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एवं उनका विकास गंगा-खादर के सीमान्त में मिलते हैं। खड्ड और अवनालिका अपरदन से सबसे कम प्रभावित क्षेत्र हैं, गोदावरी के दक्षिण में पूर्व दक्कन क्षेत्र, गंगा ब्रह्मपुत्रा के मैदान, कच्छ और पश्चिमी राजस्थान। परत अपरदन के प्रमुख क्षेत्र हैं ढालू भूमि, प्रायद्वीपीय प्रदेश की बिना सीढ़ी वाली उच्च भूमियाँ, सतलुज-गंगा का मैदान, तटीय मैदान, पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ।

भूस्खलन सामान्यतया भूकंप वाले क्षेत्रों, विशेषतया शिवालिक के भागों में होते रहते हैं। भारी वर्षा और सड़कों तथा इमारतों को बनाने के लिये ढलानों को काटने एवं खनन क्रियाओं के कारण भी भूस्खलन होते हैं। गत पचास वर्षों में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश में मरूस्थल का अतिक्रमण हुआ है। इससे 13000 हैक्टेयर भूमि प्रभावित हुई है। हिमानी द्वारा अपरदन हिमालय के उच्च भागों में और समुद्री लहरों द्वारा अपरदन तटीय भागों में सीमित है। मृदा अपरदन और पोषक तत्वों के समाप्त हो जाने के कारण मृदा का समापन दोनों ही गंभीर बाधायें है। मृदा की उत्पादकता बढ़ाने के मार्ग में ये दोनों ही गंभीर समस्या है। इसके परिणामस्वरूप जनसंख्या की वृद्धि की तुलना में यह ज्यादा तेजी से बढ़ रही है।

मृदा अपरदन के प्रकार 

पवन अपरदन 

इस प्रकार का अपरदन मरूस्थलीय प्रदशें में देखने को मिलता है मरूस्थलीय प्रदेशो में पवन मृदा के महीन कणों व बालू को पास के कृषि भूमियो में बिछाते रहते हैं जिससे इन कृषि भूमियों का ऊपजाऊपन नष्ट होता रहता है इस प्रकार के अपरदन को पवन अपरदन कहते है। यह अपरदन संसार के मरूथलीय प्रदेशो तथा उनके निकटवर्ती भागों में दिखाई देता है भारत में थार का मरूस्थल एक लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र को घेरे हुए है।

परतदार अपरदन 

इस प्रकार का अपरदन समान्यत: नदी घाटियों तथा बाढ से प्रभावित क्षेत्रों में होता है। जब जल एक परत कें रूप में बहता है तो मृदा की पतली परतों को अपने साथ बहा लें जाता है। इस प्रकार के अपरदन में लम्बें समय में मृदा की परत हट जाती है। और मृदा अनुपजाऊ हो जाती है।

नदिका अपरदन 

घरातलीय पदार्थ समान्यत: मृदा का बहते हुए जल के द्वारा निष्कासन नदिका अपरदन कहालाता है इस प्रक्रिया के अन्तगर्त बहुत सी छुद्र सरिताएँ वर्षा ऋतु में बन जाती है। तथा इनकी गहराई केवल कुछ सेंटीमीटर होती है। ये अपरदन भी करती है इसे ही नदिका अपरदन के नाम से जानतें है।

अवनालिका अपरदन 

जल ढाल की ओर जब नालियो में बहता है तो वह मृदा कणो को उखाड कर बहा ले जाता है इससे अवनालिकाएँ बन जाती है। ये धीरे - धीरे गहरी और चौड़ी होकर विस्तृत क्षेत्रों में फैल जाती है। इस प्रकार के अपरदन को अवनालिका अपरदन कहते है।

मृदा अपरदन रोकने के उपाय

  1. वन संरक्षण - वृक्षों की जड़ें मृदा पद्धार्थो को बांधे रखती है वनों की अधिक कटाई के कारण मृदा अपरदन तेजी से होता है। यही कारण है कि सरकार ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी है तथा उन्हे सुरक्षित घोषित कर दिया है। मृदा संरक्षण की यह विधि सभी प्रकारों के भूभागों के लिए उपयुक्त है वनो से वर्षा होती है इनसे मृदा निमार्ण को प्रक्रिया तेज हो जाती है।
  2. बाढ नियंत्रण -  वर्षा ऋतु में नदियों में जल की मात्रा बढ जाती है इससे मृदा के अपरदन में वृ़िद्ध होती है। बाढ़ नियंत्रण के लिए नदियों पर बॉंध बनाए गए है इससे मृदा का अपरदन रोकने के लिए मदद मिलती है नदियों के जल को नहरों द्वारा सुखाग्रस्त क्षेत्रों की ओर मोड़कर तथा जल संरक्षण की अन्य सुनियोजित विधियों द्वारा भी बाढ़ों को रोका जा सकता है।
  3. वृक्षारोपण - वृक्षारोपण द्वारा हम मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन दे सकते है मरूस्थलीय प्रदेशों के आसपास क्षेत्रो में वृक्षारोपण द्वारा मृदा संरक्षण किया जा सकता है इसी प्रकार नदी घाटी बंजर भूमियों तथा पहाड़ी ढ़ालों पर वृक्ष लगाना मृदा संरक्षण की विधि है। इससे इन स्थानों पर मृदा अपरदन कम हो जाता है ।
  4. बंध बनना - अवनालिका अपरदन से प्रभावित भूमि में बंध या अवरोध - बनाकर मृदा अपरदन को रोका जा रहा हैं। यह विधि न केवल मृदा अपरदन को रोकती हैं। वरन इससे मृदा का ऊपजाऊपन बनाए रखने में मदद मिलती हैं। साथ ही जल संसाधनो के संरक्षण तथा भूमि को समतल करने में भी सहायता मिलती हैं।
  5. नियोजित चराई - चराई से वनस्पत्ति आवरण समाप्त हो जाता है जिससे मृदा ढ़ीली हो जाती है। इन मृदाओ को जल आसानी से बहा ले जाती है। इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पत्ति आवरण को बचाया जा सकता हैं। इस विधि से उन क्षेत्रों का मृदा अपरदन कम कर मृदा संरक्षण किया जा सकता हैं।
  6. सीढ़ी़दार खेत बनाना - सीढ़ीदार खेत बनाने से मतलब चौड़ें समतल चबूतरे बनाने से हैं। पहाड़ी ढ़ालों पर यदि इस प्रकार के चबूतरे बना दियें जाए तो ढ़लान पर समतल होने के कारण मृदा संरक्षण होगा और अपरदन की क्रिया कम हो जायेगी जिससे की जल संसाधनों का समुचित उपयोग होगा और इस क्षेत्र में उत्पादन का कार्य भी किया जा सकेगा ।
  7. समोच्यरेखीय जुताई -  मृदा संरक्षण की यह विधि तरंगित भूमि वाले प्रदेशों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त हैं। भूमि को समान ऊॅंचाई पर जोतने से हल के कूंड ढ़ाल के आरपार बन जाती हैं इससे मृदा के अपरदन की गति कम हो जाती है। यह विधि मृदा में आर्द्रता व उपजाऊपन बनाये रखने में भी सहायक है।
  8. कृषि की पटटीदार विधि अपनाना - इस विधि में खेतो को पट्टियों में बॉंट दिया जाता है एक पटटी में एक साल खेंती की जाती है जबकी दूसरी पट्टी बिना जोते बोए खाली पड़ी रहती है छोडी़ गई पटटी की वनस्पति का आवरण मृदा अपरदन को रोकेते है तथा उपजाऊ पन को बनाये रखता हैं। अगले वर्ष इस क्रिया को बदल दी जाती है।
  9. शस्यार्वतन - यह विधि संसार के अधिकांश देशों में उपजाई जा रही है जहॉं पर जनसंख्या के दाबाव के कारण खेती की जमीन कम हो गई हैं। इससें खेती का उपजाऊपन बनाए रखने के लिए चुने हुए खेतो में विभिन्न फसलों को बारी बारी से बोते है। इस प्रकार शस्यार्वतन के द्वारा ऐसे खेतो की उर्वरता भी बनी रहती है। जिनमे लगातार कोई न कोई फसल खड़ी रहती हैं।
  10. भूमि उद्धार - मृदा संरक्षण की यह विधि नदी घाटी और पहाड़ी प्रदेशों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं इस विधि में भूमियों को समतल करके भी अपरदन क्रिया रोकी जा सकती हैं। हमारे देश मे चम्बल व यमुना नदियों के उत्खात भूमियो वाले विस्तृत क्षेत्रों को इस विधि द्वारा समतल किया गया हैं।

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