मुद्रा की परिभाषा

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विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने मुद्रा को अलग-अलग दृिष्टकोण से परिभाषित किया है विभिन्न दृिष्टकोणों को वर्गीकृत किया सकता है।

सामान्य स्वीकृत के अनुसार परिभाषाएं

इस वर्ग की परिभाषाएं मुद्रा के सर्वग्राहयता के गुण पर बल देती है।
  1. प्रो माशर्ल -’’मुद्रा के अन्तर्गत ये समस्त वस्तएुं सम्मिलित की जाती है जो किसी समय अथवा किसी स्थान में बिना सदेंह या विशेष जांच पडत़ाल के वस्तुओं तथा सेवाओं के खरीदने और खर्च चुकाने के साथ के रूप में सामान्य प्रचलित रहती है।’’
  2. प्रो.कीन्स-’’मुद्रा  वह वस्तु है जिसके द्वारा ऋण संविदा एवं मूल्य संविदा का भुगतान किया जाता है एवं जिसके रूप में सामान्य किया जाता है।
  3. प्रो पीगु-’’वह वस्तु जिसको विस्तृत क्षत्रे में विनिमय माध्यम के रूप में सामान्य स्वीकृत प्राप्त हो और अधिकाशं लागे उसे वस्तुओं की सेवाओं के भुगतान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार है उसे मुद्रा कहते है।
  4. रार्बटसन-’’मुद्रा वह वस्तु है जिसे विस्तृत क्षत्रे में दायित्वों के भुगतान के रूप में स्वीकार किया जाता है।’’
  5. सेलिगमैन-’’मुद्रा वह वस्तु है जिसे सामान्य स्वीकृत प्राप्त है।’’

वर्णनात्मक या कार्यवाहक परिभाषाएँ

म्रदा के कार्यों का वर्णन करने वाली परिभाषाएँ वर्णनात्मक या कार्यवाहक परिभाषाएँ कही जा सकती है। फ्रान्सिस वाकर (Francis A. Walker), सिजविक (Sidgwick), हिटलसी (Whittlesey), हार्टले विदर्स (Hartley Withars), नोगारो (NogSaro) तथा एस. थॉमस (S.E. Thomas) द्वारा परिभाषाएँ दी ग है-
  1. वाकर के अनुसार-  ‘‘मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करे।”
  2. कॉलबोर्न के अनुसार- ‘‘मुद्रा वह है जो मुल्य का मापक और भुगतान का साधन हो।”
  3. नोगारो के शब्दों में- “मुद्रा वह वस्तु है जो विनिमय के माध्यम और मूल्य के सामान्य मापक के रूप में कार्य करती है।”

वैधानिक परिभाषाएँ-

वैधानिक विचार के अनुसार किसी भी वस्तु के मुद्रा होने के लिए वैधानिक मान्यता आवश्यक है। मुदा वही वस्तु है जिसे सरकार मुद्रा घोषित करती है आरै प्रत्यके व्यक्ति उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है। इस विचार के मुख्य समर्थक जर्मनी के प्रो. नैप (Knapp) तथा ब्रिटिश अर्थशास्त्री हाट्रे (Hawtrey) हैं। नैप के अनुसार- “को भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा  घोषित कर दी जाती है मुद्रा कहलाती है।” हाट्रे ने मुद्रा की परिभाषा करते हएु दो पहलुओं का विवेचन किया है। प्रथम, ऋणों के कानूनी शोधन के लिए मुद्रा एक साधन प्रदान करती है, दूसरे मुल्य-मापक के रूप में यह साख की अस्थिरता को सही करती है। इस प्रकार हाट्रे ने मुद्रा के वैधानिक रूप के साथ-साथ मुद्रा के कुछ कार्यों  का भी उल्लेख किया है।

विस्तार के आधार पर दी ग परिभाषाएँ-

इस प्रकार की परिभाषाओं को तीन वर्गों  में विभाजित किया जा सकता हैं-
  1. संकुचित परिभाषाएँ,
  2. व्यापक अथवा विस्ततृ परिभाषाएँ,
  3. उचित अथवा आधुनिक विचारधारा की परिभाषाएँ।

संकुचित या संकीर्ण परिभाषाएँ-

इन परिभाषाओं में प्रो. प्राइम की परिभाषा प्रमुख है- प्रो. प्राइम के अनुसार- “सिक्के केवल धात्विक सिक्के ही मुद्रा है” संकुचित अर्थ में मुद्रा की परिभाषा के अंतर्गत केवल धातु के सिक्कों को ही सम्मिलित किया जाता है। इसके अनुसार केवल सोने व चाँदी की बनी मुद्राओं को ही विस्ततृ रूप से स्वीकार किया जाता है, लेकिन यह परिभाषा अत्यनत सकींर्ण हैैं इसमें पत्र-मुद्रा को जिसमें मुद्रा के सभी गुण पाये जाते हैं सम्मिलित नही किया गया है, यह उचित नहीं है।

व्यापक अथव विस्तृत परिभाषाएँ-

कछु अर्थाशास्त्रियों ने विस्तृत दृिष्टकोण (Very broad point of views) से अर्थाशास्त्र की परिभाषाएँ दी है उदाहरणाथर्, प्रो. वाकर (Walker), ने कहा है कि “मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करे।” (Money is what money does.) इनके अनूसार, मुद्रा  में धातु के सिक्के पत्र-मुद्रा , चके , हुण्डियाँ, बिल आदि जो भी वस्तएुँ विनिमय का कार्य करती है, शामिल हैं। परन्तु इस प्रकार की परिभाषाएँ भी मान्य नही कही जा सकतीं, क्योंिक चके , बिल, हुण्डियाँ आदि प्रत्यके व्यक्ति द्वारा, प्रत्येक स्थान में बिना रोक-टोक वस्तुओं के विनिमय में स्वीकार नही की जाती है

उचित अथवा आधुनिक विचारधारा की परिभाषाएँ-

इस वर्ग में आने वाली परिभाषाओं में प्रो. मार्शल (Marshall), ऐली (Ely), रॉबटर्सन (Robertson) आदि की परिभाषाएँ महत्वपूर्ण हैं ।
  1. प्रो. मार्शल के अनुसार-  “मुद्रा में उस सभी वस्तुओं का समावेश होता है, जो किसी भी समय या स्थान के बिना किसी सन्दहे के और बिना किसी जाँच-पडत़ाल के वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने आरै भुगतान करने के साधन के रूप में स्वीकृत की जाती हैं”
  2. ऐली के अनुसार-  “मुद्रा ऐसी वस्तु है जो विनिमय के माध्यम के रूप में हस्तान्तरित होती है और ऋणों के अन्तिम भगु तान के रूप में सामान्य रूप से गह्रण की जाती है।”
  3. प्रो. रॉबटर्सन के शब्दों में- “मुद्रा वह को चीज है जो कि दायित्वों के चुकाने में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है।”
  4. प्रो. कोल के अनुसार- “मुद्रा क्रय-शक्ति है, एक ऐसी वस्तु है, जो वस्तुओं को खरीद सकती है।” उपर्यकुत परिभाषाओं से स्पष्ट है कि द्रव्य कहलाने के लिए वस्तु में तीन गुण होन चाहिए-
    1. वह विनिमय के माध्यम का कार्य करे तथा आर्थिक लेन-देनों का अन्तिम भगु तान कर सके।
    2. उसकी सहायता से का भी अपना धन ऋणदाता को देकर ऋण-मुक्त हो सके एवं
    3. वह एक हाथ से दूसरे हाथ में बिना रोक -टोक आ सके। 
ये गुण धात्विक सिक्कों और पत्र-मुद्रा में ही पाये जाते हैं। अत: इनको मुद्रा में गिना जायेगा, किन्तु हणुडी, चेक , आदि नहीं क्याेिंक इनको लोग बिना विशेष जाचँ के स्वीकार नहीं करते। इन गुणों को स्पष्ट करते हएु एक सरल परिभाषा दी जा सकती है- “मुद्रा वह सर्वमान्य और सर्व-स्वीकार्य वस्तु है जिसे वस्तु और सेवाओं के विनिमय में और ऋण के शोधन में सभी व्यक्तियों द्वारा बेरोक-टोक आरै नि:सकेांच स्वीकार किया जाता है।”

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