मुद्रा का अर्थ, परिभाषा, कार्य एवं महत्व

मुद्रा वस्तुतः एक ऐसी वस्तु है जिसके माध्यम से अन्य वस्तुओं का क्रय किया जा सकता है। वस्तुओं के क्रय के साथ-साथ ऋणों का भुगतान भी बिना किसी बाधा के संभव हो जाता है।

मुद्रा का अर्थ

मुद्रा के बारे में हम उसके द्वारा किये जाने वाले कार्यों के आधार पर बात कर सकते हैं। सामान्यत: हम मुद्रा के कार्यो में विनिमय का माध्यम, मूल्य का मापक तथा धन के संचय तथा स्थगित भुगतानों के मान आदि को शामिल करते है। विभिन्न अर्थषास्त्रियों ने मुद्रा की परिभाषा उसके द्वारा किये जाने वाले कार्यों के आधार पर दी है। मुद्रा में सामान्य स्वीकृति के गुण का होना बहुत जरूरी है यदि किसी वस्तु में सामान्य स्वीकार होने की विशेषता नहीं है तो उस ‘वस्तु’ को मुद्रा नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार, मुद्रा से अभिप्राय कोई  भी वह वस्तु है जो सामान्य रुप से विनियम के माध्यम, मूल्य के माप, धन के संचय तथा ऋणों के भुगतान के रुप में स्वीकार की जा सकती है।

मुद्रा की परिभाषा

मुद्रा की कोई भी ऐसी परिभाषा नहीं है जो सर्वमान्य हो। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने मुद्रा की अलग-अलग परिभाषाएँ दी है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने मुद्रा को अलग-अलग दृष्टिकोण से परिभाषित किया है विभिन्न दृष्टिकोणों को वर्गीकृत किया सकता है।

प्रो माशर्ल -’’मुद्रा के अन्तर्गत ये समस्त वस्तएुं सम्मिलित की जाती है जो किसी समय अथवा किसी स्थान में बिना सदेंह या विशेष जांच पडत़ाल के वस्तुओं तथा सेवाओं के खरीदने और खर्च चुकाने के साथ के रूप में सामान्य प्रचलित रहती है।’’

प्रो.कीन्स-’’मुद्रा वह वस्तु है जिसके द्वारा ऋण संविदा एवं मूल्य संविदा का भुगतान किया जाता है एवं जिसके रूप में सामान्य किया जाता है।

प्रो पीगु-’’वह वस्तु जिसको विस्तृत क्षत्रे में विनिमय माध्यम के रूप में सामान्य स्वीकृत प्राप्त हो और अधिकांश लागे उसे वस्तुओं की सेवाओं के भुगतान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार है उसे मुद्रा कहते है।

रार्बटसन-’’मुद्रा वह वस्तु है जिसे विस्तृत क्षत्रे में दायित्वों के भुगतान के रूप में स्वीकार किया जाता है।’’

सेलिगमैन-’’मुद्रा वह वस्तु है जिसे सामान्य स्वीकृत प्राप्त है।’’

म्रदा के कार्यों का वर्णन करने वाली परिभाषाएँ वर्णनात्मक या कार्यवाहक परिभाषाएँ कही जा सकती है। फ्रान्सिस वाकर (Francis A. Walker), सिजविक (Sidgwick), हिटलसी (Whittlesey), हार्टले विदर्स (Hartley Withars), नोगारो (NogSaro) तथा एस. थॉमस (S.E. Thomas) द्वारा परिभाषाएँ दी ग है-

वाकर के अनुसार- ‘‘मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करे।”

कॉलबोर्न के अनुसार- ‘‘मुद्रा वह है जो मुल्य का मापक और भुगतान का साधन हो।”

नोगारो के शब्दों में- “मुद्रा वह वस्तु है जो विनिमय के माध्यम और मूल्य के सामान्य मापक के रूप में कार्य करती है।”

वैधानिक विचार के अनुसार किसी भी वस्तु के मुद्रा होने के लिए वैधानिक मान्यता आवश्यक है। मुदा वही वस्तु है जिसे सरकार मुद्रा घोषित करती है आरै प्रत्येक व्यक्ति उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है। इस विचार के मुख्य समर्थक जर्मनी के प्रो. नैप (Knapp) तथा ब्रिटिश अर्थशास्त्री हाट्रे (Hawtrey) हैं। 

नैप के अनुसार- “को भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा  घोषित कर दी जाती है मुद्रा कहलाती है।” 

हाट्रे ने मुद्रा की परिभाषा करते हएु दो पहलुओं का विवेचन किया है। प्रथम, ऋणों के कानूनी शोधन के लिए मुद्रा एक साधन प्रदान करती है, दूसरे मुल्य-मापक के रूप में यह साख की अस्थिरता को सही करती है। इस प्रकार हाट्रे ने मुद्रा के वैधानिक रूप के साथ-साथ मुद्रा के कुछ कार्यों  का भी उल्लेख किया है।

प्रो. प्राइम के अनुसार- “सिक्के केवल धात्विक सिक्के ही मुद्रा है” संकुचित अर्थ में मुद्रा की परिभाषा के अंतर्गत केवल धातु के सिक्कों को ही सम्मिलित किया जाता है। इसके अनुसार केवल सोने व चाँदी की बनी मुद्राओं को ही विस्तृत रूप से स्वीकार किया जाता है, लेकिन यह परिभाषा अत्यन्त संकीर्ण हैं इसमें पत्र-मुद्रा को जिसमें मुद्रा के सभी गुण पाये जाते हैं सम्मिलित नहीं किया गया है, यह उचित नहीं है।

कछु अर्थशास्त्रियों ने विस्तृत दृष्टिकोण (Very broad point of views) से अर्थशास्त्र की परिभाषाएँ दी है उदाहरणार्थ, प्रो. वाकर (Walker), ने कहा है कि “मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करें।” (Money is what money does.) इनके अनुसार, मुद्रा  में धातु के सिक्के पत्र-मुद्रा , चके , हुण्डियाँ, बिल आदि जो भी वस्तएुँ विनिमय का कार्य करती है, शामिल हैं। परन्तु इस प्रकार की परिभाषाएँ भी मान्य नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि चके , बिल, हुण्डियाँ आदि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा, प्रत्येक स्थान में बिना रोक-टोक वस्तुओं के विनिमय में स्वीकार नहीं की जाती है

प्रो. मार्शल के अनुसार- “मुद्रा में उस सभी वस्तुओं का समावेश होता है, जो किसी भी समय या स्थान के बिना किसी सन्दहे के और बिना किसी जाँच-पडत़ाल के वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने आरै भुगतान करने के साधन के रूप में स्वीकृत की जाती हैं”

ऐली के अनुसार- “मुद्रा ऐसी वस्तु है जो विनिमय के माध्यम के रूप में हस्तान्तरित होती है और ऋणों के अन्तिम भगु तान के रूप में सामान्य रूप से गह्रण की जाती है।”

प्रो. रॉबटर्सन के शब्दों में- “मुद्रा वह को चीज है जो कि दायित्वों के चुकाने में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है।”

प्रो. कोल के अनुसार- “मुद्रा क्रय-शक्ति है, एक ऐसी वस्तु है, जो वस्तुओं को खरीद सकती है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि द्रव्य कहलाने के लिए वस्तु में तीन गुण होने चाहिए-  
  1. वह विनिमय के माध्यम का कार्य करे तथा आर्थिक लेन-देनों का अन्तिम भुगतान कर सके। 
  2.  उसकी सहायता से का भी अपना धन ऋणदाता को देकर ऋण-मुक्त हो सके एवं 
  3. वह एक हाथ से दूसरे हाथ में बिना रोक -टोक आ सके। 
ये गुण धात्विक सिक्कों और पत्र-मुद्रा में ही पाये जाते हैं। अत: इनको मुद्रा में गिना जायेगा, किन्तु हणुडी, चेक , आदि नहीं क्याेिंक इनको लोग बिना विशेष जाँच के स्वीकार नहीं करते। 

मुद्रा के कार्य

आज के समय में बिना मुद्रा के हम अपना एक दिन भी नहीं गुजार सकते है क्योंकि मुद्रा के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के द्वारा हम अपने जीवन को सुव्यवस्थित व्यतीत करते है। मानव सभ्यता के विकास में मुद्रा के कार्यों का बहुत अधिक महत्व है। प्रो. किनले ने मुद्रा के कार्यों को तीन भागों में बांटा है।

1. मुद्रा के प्राथमिक कार्य

प्राथमिक कार्यों में मुद्रा के उन सब कार्यों को शामिल करते है जो प्रत्येक देष में प्रत्येक समय मुद्रा द्वारा किये जाते हैं इसमें केवल दो कार्यों को शामिल किया जाता है।

1. विनिमय का माध्यम - विनिमय के माध्यम का अर्थ होता है कि मुद्रा द्वारा कोई भी व्यक्ति अपनी वस्तुओं को बेचता है तथा उसके स्थान में दूसरी वस्तुओं को खरीदता है। मुद्रा क्रय तथा विक्रय दोनों को बहुत आसान बना देती है। जबसे व्यक्ति ने विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा का प्रयोग किया है तभी से मनुष्य की समय तथा शक्ति की बहुत अधिक बचत हुई  है। मुद्रा में सामान्य स्वीकृति का गुण भी है इसलिए मुद्रा का विनिमय का कार्य आसान बन जाता है।

2. मूल्य का मापक - मुद्रा के द्वारा हम वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों को माप सकते हैं बहुत समय पहले जब वस्तु विनिमय प्रणाली होती थी उसमें वस्तुओं के मूल्यों को मापने में बहुत कठिनाई होती थी। अब वर्तमान में हम मुद्रा का प्रयोग करते है तो वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों को मापने ये कोई कठिनाई नहीं आती है क्योंकि मुद्रा का मूल्य के मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया गया है। व्यापारिक फर्मे अपने लाभ, लागत, हानि, कुल आय आदि का अनुमान आसानी से लगा सकती है। मुद्रा के द्वारा किसी भी देष की राष्ट्रीय आय प्रति व्यक्ति आय की गणना की जा सकती है तथा भविष्य के लिए योजनायें भी बनाई  जा सकती हैं।

2. गौण कार्य

गौण कार्य वे कार्य होते हैं जो प्राथमिक कार्यों की सहायता करते है। धीरे -धीरे जब अर्थव्यवस्था विकसित होती है तो सहायक कार्यों की भूमिका बढ़ जाती है सहायक कायोर्ं में हम निम्नलिखित कार्यों को शामिल करते हैं।

1. स्थगित भुगतानों का मान - मुद्रा के इस कार्य में हम उन भुगतानों को शामिल करते है जिनका भुगतान वर्तमान में न करके भविष्य के लिए स्थगित कर दिया जाता है। स्थगित भुगतानों में ऋणों के भुगतानों को भी शामिल किया जाता है, वस्तु विनिमय प्रणाली में जब हम ऋण लेते थे उसमें मूलधन तथा ऋण का निर्धारण करना बहुत मुश्किल होता था परन्तु मुद्रा के प्रचलन के बाद हमें इस तरह की किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है और मुद्रा में सामान्य स्वीकृति का भी गुण पाया जाता है। इससे किसी भी देष के व्यापार तथा वाणिज्य का विकास संभव हो जाता है और जब मुद्रा स्थगित भुगतानों के रूप में कार्य करती है तो पूंजी निर्माण तथा साख निर्माण भी बहुत अधिक होता है।

2. मूल्य का संचय - जब वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी उस समय केवल वस्तुओं को आपस में विनिमय कर सकते थे वस्तुओं को संचयित नहीं कर सकते है, परन्तु अगर आपको मुद्रा का खर्च करने का विचार न हो तो आप मुद्रा को संचय भी कर सकते है। जब हम मुद्रा के रूप में बचत करते है तो हमें बहुत कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है और मुद्रा को सब लोग सामान्य रूप से स्वीकार भी करते है, और मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन भी नहीं होता है। परम्परागत अर्थशास्त्री मुद्रा को केवल विनिमय का माध्यम ही मानते थे जबकि कैम्ब्रिज अर्थशास्त्री मुद्रा के संचय कार्य पर अधिक बल देते थे।

3. मूल्य का हस्तांतरण - मुद्रा के द्वारा मूल्य का हस्तांतरण आसानी से हो जाता है मुद्रा में सामान्य स्वीकृति तथा तरलता का गुण होने के कारण हम इसको आसानी से हस्तांतरित कर पाते है। वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं का हस्तांतरण करना बहुत मुश्किल कार्य होता था जब लोगों के पास ज्यादा धन होता है तो वे इसको उधार देकर ऋण के रूप में आय प्राप्त कर सकते है और जिन लोगों को मुद्रा की आवश्यकता है वे मुद्रा के द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सकते है।

3. आकस्मिक कार्य

आकस्मिक कार्यो की भूमिका देष के आर्थिक विकास के साथ बढ़ती जाती है। आकस्मिक कार्य निम्नलिखित है।

1. अधिकतम सन्तुष्टि - मुद्रा को खर्च करके एक व्यक्ति अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करता है क्योंकि मुद्रा से वह वस्तुएं तथा सेवायें खरीदता है तथा उससे उपयोगिता प्राप्त करता है। इसी प्रकार उत्पादक भी अधिकतम लाभ प्राप्त करता है तथा समाज मुद्रा से अपने कल्याण को भी बढ़ा सकता है। मुद्रा के द्वारा हम वस्तुओं को उनकी सीमान्त उपयोगिता तथा साधनों को उनकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर कीमत देकर अधिकतम सन्तुष्टि तथा लाभ प्राप्त कर सकते है।

2. राष्ट्रीय आय का वितरण - मुद्रा के द्वारा राष्ट्रीय आय का वितरण करना भी बहुत आसान हो गया है प्रत्येक साधन को उसकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर कीमत देकर राष्ट्रीय आय का विवरण कर सकते है परन्तु जब वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी उस समय राष्ट्रीय आय का वितरण तथा माप करना बहुत कार्य था। मुद्रा के द्वारा हम मूल्य को माप भी सकते है और राष्ट्रीय आय का अनुमान आसानी से लगा सकते है। राष्ट्रीय आय को मुद्रा द्वारा मजदूरी लगान, ब्याज तथा लाभ के रूप में वितरित भी कर सकते हैं।

3. पूंजी की तरलता में वृद्धि - वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं में तरलता का गुण नहीं होता था परन्तु मुद्रा में सामान्य स्वीकृति होने के कारण मुद्रा हमारी पूंजी को तरल बनाये रखती है। हम वस्तुओं के रूप में पूँजी को लेने से मना कर सकते है परन्तु मुद्रा में सामान्य स्वीकृति होने से उसे आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। केन्ज ने बताया कि हम मुद्रा का तीन उदेष्यों के लिए मुद्रा की मांग करते है - 1. सौदा उद्देश्य 2. सावधानी उद्देश्य 3. सट्टा उद्देश्य

4. साख का आधार - वस्तु विनिमय प्रणाली में साख का निर्माण संभव नहीं था परन्तु जबसे मुद्रा का प्रचलन हुआ है। मुद्रा द्वारा हम साख का निर्माण भी कर सकते है। वर्तमान समय में विश्व के लगभग सभी देशों में चेक ड्राफ्ट, विनिमय पत्र इत्यादि साख पत्रों का प्रयोग किया जाता है। लोग अपनी अतिरिक्त आय को बैंकों में जमा करवाते है और इन्हीं जमाओं के आधार पर बैंक साख का निर्माण करते हैं।

5. शोधन क्षमता की गारन्टी - मुद्रा का एक कार्य यह भी है कि यह किसी फर्म संस्था या व्यक्ति की शोधन क्षमता की गारन्टी भी देती है। प्रत्येक व्यक्ति, फर्म संस्था आदि को अपनी शोधन क्षमता की गारन्टी बनाये रखने के लिए अपने पास कुछ न कुछ मुद्रा जरूर रखनी पड़ती है। अगर उस व्यक्ति संस्था अथवा फर्म के पास मुद्रा नहीं है तो उसे दिवालिया घोषित कर दिया जाता है।

मुद्रा का महत्व

वर्तमान समय में मुद्रा इतनी आवश्यक तथा महत्वपूर्ण हो गई है कि मुद्रा के गुण व दोषों का अध्ययन ही अर्थशास्त्र के अध्ययन का प्रमुख भाग बन गया है। मुद्रा के महत्व को हम निम्नलिखित तीन भागों में बांट सकते हैं।
  1. आर्थिक क्षेत्र में मुद्रा का प्रत्यक्ष महत्व
  2. आर्थिक क्षेत्र में मुद्रा का अप्रत्यक्ष महत्व
  3. अनार्थिक क्षेत्रों में मुद्रा का महत्व

1. आर्थिक क्षेत्र में मुद्रा का प्रत्यक्ष महत्व

वर्तमान समय में मुद्रा का अर्थशास्त्र के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत महत्व है बिना मुद्रा के हम वर्तमान समय में एक दिन भी नहीं गुजार सकते। आर्थिक क्षेत्रों में मुद्रा का प्रत्यक्ष महत्व निम्नलिखित है:

1. उपभोग क्षेत्र में महत्व - अर्थशास्त्र में अगर किसी व्यक्ति के पास मुद्रा नहीं है तो वह अपनी इच्छानुसार वस्तुएं नहीं खरीद सकता है। व्यक्ति को जो आय काम करने से प्राप्त होती है वह मुद्रा के रूप में होती है और इसी आय को वह अपनी इच्छानुसार खर्च करके अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करता है एक उपभोक्ता विभिन्न वस्तुओं अपनी आय को इस प्रकार खर्च करता है कि वस्तुओं में मिलने वाली उपयोगिता उनकी कीमत के बराबर हो।

2. उत्पादन के क्षेत्र में महत्व - उत्पादन के क्षेत्र में यदि उत्पादक के पास मुद्रा है तो वह बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकता है। उत्पादन के क्षेत्र में मुद्रा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उत्पादक उसी वस्तु का उत्पादन करता है जिसकी बाजार में मांग हो तभी वह अपने लाभ को अधिकतम कर सकता है। अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधन की सीमान्त उत्पादकता तथा साधनों को मुद्रा के रूप में दी जाने वाली साधन कीमत का अनुपात भी बराबर होना चाहिए।

3. विनिमय के क्षेत्र में महत्व - वस्तु विनिमय प्रणाली में हम प्रत्येक वस्तु की कीमत तथा लागत का अनुमान नहीं लगा पाते थे परन्तु जब से मुद्रा का प्रचलन हुआ है तब से मुद्रा ने वस्तु विनिमय प्रणाली के दोषों को दूर कर दिया है। मुद्रा के द्वारा हम प्रत्येक वस्तु की कीमत, लागत तथा उत्पादक की आय को अनुमान लगा सकते है वर्तमान समय में मुद्रा का विनिमय के क्षेत्र में बहुत अधिक महत्व है।

4. व्यापार के क्षेत्र में महत्व -  मुद्रा के विकास के कारण अन्तर्क्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में बहुत अधिक वृद्धि हुई  है। वस्तु विनिमय प्रणाली में व्यापार करते समय हमें बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था और हमारे व्यापार का क्षेत्र बहुत सीमित होता था। मुद्रा के विकास के कारण उत्पादन का पैमाना भी बढ़ गया है। उत्पादन अधिक होने से बाजारों का विकास हुआ और अन्तर्क्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का आकार बड़ा है।

5. वितरण के क्षेत्र में महत्व - मुद्रा के आविष्कार के कारण राष्ट्रीय आय के वितरण में उत्पादन के साधनों को उनका भाग देना बहुत आसान हो गया है। मुद्रा के रूप में पूंजी को ब्याज, श्रम को मजदूरी, भूमि को लगान तथा उद्यमी को लाभ देना सरल होता है। वस्तु विनिमय प्रणाली में उत्पादन के साधनों को उनका भाग देना इतना सरल काम नहीं था।

6. पूंजी निर्माण -  वस्तु विनिमय प्रणाली में बचत और निवेश करना संभव नहीं था। मुद्रा के आविष्कार के कारण हम आसानी से बचत तथा निवेश कर सकते है। व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद जो आय बच जाती है उसे बचत कहते है। इसी बचत से निवेश हो पाता है और निवेश के द्वारा ही पूंजी निर्माण संभव हो पाता है।

2. आर्थिक क्षेत्र में मुद्रा का अप्रत्यक्ष महत्व

अप्रत्यक्ष रूप से मुद्रा हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करती है। आर्थिक क्षेत्र में मुद्रा का अप्रत्यक्ष महत्व निम्नलिखित है।

1- वस्तु विनिमय की असुविधाओं से छुटकारा - वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत मूल्य का मापन तथा संचय करना संभव नहीं था। परन्तु मुद्रा के विकास के कारण अब हम मूल्य को माप भी सकते है तथा मुद्रा को संचय भी कर सकते है और मुद्रा के प्रचलन के बाद हमारे समय तथा धन की बचत संभव हुई  है और इसी धन को हम आगे निवेश करते है।

2- साख निर्माण - मुद्रा के प्रचलन के बाद ही साख का निर्माण संभव हो पाया है। व्यक्ति अपनी अतिरिक्त आय को बैकों में जमा करता है और इसी प्राथमिक जमाओं के आधार पर व्यापारिक बैंक साख का निर्माण करते है। मुद्रा के द्वारा ही साख का निर्माण हो सकता है।

3- आर्थिक विकास का सूचकांक - मुद्रा के द्वारा ही हम प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का अनुमान लगा सकते है और यह भी देख सकते है कि क्या राष्ट्रीय आय के वितरण में समानता है और अगर राष्ट्रीय आय के वितरण में समानता है तो हम कह सकते है कि आर्थिक विकास हो रहा है मुद्रा के द्वारा ही हम विभिन्न देशों के आर्थिक विकास की तुलना कर सकते हैं।

4- पूंजी की गतिशीलता में वृद्धि - वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में बहुत कठिनाई  होती थी मुद्रा के द्वारा हम पूंजी को एक स्थान से दूसरे स्थान, एक उद्योग से दूसरे उद्योग में आसानी से ले जा सकते है। पूंजी के गतिशील होने के कारण पूंजी की उत्पादकता बढ़ती है और देष का उत्पादन बढ़ता है।

5- सामाजिक कल्याण का मापक
वर्तमान समय में विश्व के सभी देशों को सरकारों का लक्ष्य अधिकतम सामाजिक कल्याण तथा देष में उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक विदोहन करना है और सरकार मुद्रा द्वारा ही तय कर पाती है कि राष्ट्रीय आय में से कितना भाग सामाजिक कल्याण पर खर्च करना है। सामाजिक कल्याण में शिक्षा, बिजली पानी मनोरंजन, आवास, सामाजिक सुरक्षा आदि पर व्यय शामिल करते है।

3.  अनार्थिक क्षेत्र में मुद्रा का महत्व

मुद्रा ने न केवल आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित किया बल्कि सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में भी अपनी अमित छाप छोड़ी है। मुद्रा का अनार्थिक क्षेत्र में महत्व निम्नलिखित है:

1. सामाजिक क्षेत्र में महत्व - मुद्रा के विकास के कारण लोगों को सामाजिक तथा आर्थिक दासता से छुटकारा मिल गया है। सामान्तवादी युग में जब मुद्रा का विकास नहीं हुआ था लोग बड़े जमीदारों के पास सेवकों के रूप में काम करते थे ओर वे अपने व्यवसाय को बदल नहीं सकते थे लेकिन मुद्रा के विकास के बाद लोग अपना व्यवसाय अपनी इच्छा से चुन सकते है और उनमें आत्मसम्मान की भावना का भी विकास हुआ।

2. राजनैतिक क्षेत्र में मुद्रा का महत्व - लोग मुद्रा के रूप में सरकारों को कर देते है और सरकार को जो करों से प्राप्त आय होती है उसे सार्वजनिक व्यय के रूप में जनता के ऊपर खर्च किया जाता है। कर देने के कारण ही लोगों में राजनैतिक चेतना का विकास हुआ मुद्रा द्वारा ही सरकार देष के विकास के लिए कल्याणकारी योजनाएं शुरू कर सकती है।

3. कला के क्षेत्र में मुद्रा का महत्व - मुद्रा द्वारा ही कला का मूल्यांकन करना संभव हो पाया है। प्रत्येक कल्याणकारी देष की सरकार मुद्रा के रूप में उस देष के कला प्रेमियों को प्रोत्साहन देती है ताकि वे अपनी कला को विकसित कर सके इस प्रकार कहा जा सकता है कि मुद्रा के द्वारा ही कला का विकास संभव हो पाया है।

संदर्भ -
  1. Dr. J.C. Pant and J.P. Mishra - Economics, Sahitya Bhavan Publication, Agra.
  2. Dr. TT Sethi - Monetary Economics, Laxminarayan Agrawal, Agra.
  3. Dr. TT Sethi - Macroeconomics
  4. Dr. M. L. Jhingan - Monetary Economics

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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