चयन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं महत्व

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इसके अंतर्गत विभिन्न कार्यों के लिए योग्य प्रार्थियों को चुना जाता है जिसके लिए रोजगार, परीक्षाएँ लेना, साक्षात्कार एवं चिकित्सकीय जाँच शामिल है। चयन, एक संगठन के अन्तर्गत रिक्त पदों को भरने के लिए अपेक्षित पात्रताओं तथा सामर्थ्य से युक्त व्यक्तियों (वे लोग जो आवेदन करते हैं, उनके सम्पूर्ण समूह में से) को चुनने की प्रक्रिया है। चयन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा संगठनों के लिए वांछित योग्यताओं के श्रेष्ठता अभ्यर्थियों का चयन करके उन्हें रोजगार प्रदान किया जाता है तथा शेष अभ्यर्थियों को अस्वीकार कर दिया जाता है।

चयन की परिभाषा

चयन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण परिभाषाओं का विवरण है:
  1. थॉमस एच. स्टोन के अनुसार, ‘‘चयन एक कार्य में सफलता की अत्यधिक सम्भावना से युक्त लोगों की पहचान करने ( तथा पारिश्रमिक देकर नियुक्त करने) के उद्देश्य से आवेदकों के मध्य भेद करने की प्रक्रिया है।’’। 
  2. अरून मोनप्पा एवं मिर्जा एस. सैय्यद के अनुसार, ‘‘ चयन आवेदन-पत्रों में से एक अथवा अधिक आवेदकों को रोजगार प्रदान करने की प्रक्रिया से सम्बन्धित होता है। 

चयन प्रक्रिया की विशेषताएं 

चयन प्रक्रिया की जो विशेषताएं सामने आती हैं, उनमें से कुछ प्रमुख का वर्णन है:
  1. चयन प्रक्रिया, एक निर्णायक चरण होता है। 
  2. चयन प्रक्रिया के द्वारा वे लोग जो आवेदन करते हैं, उनके सम्पूर्ण समूह में से, किसी कार्य में सफलता की अत्यधिक सम्भावना से युक्त लोगों की पहचान की जाती है। 
  3. चयन प्रक्रिया के द्वारा कुल अभ्यर्थियों में से ‘सर्वाधिक उपयुक्त’ को चुना जाता है। 
  4. चयन एक नकारात्मक दृष्टिकोण है, क्योंकि इसके द्वारा अयोग्य अभ्यार्थियों को अस्वीकार कर दिया जाता है।
  5. चयन प्रक्रिया में वे अभ्यर्थी, जो इसके विभिन्न चरणों को पार करते हुए अन्त तक पहुँच जाते हैं, वे चुन लिये जाते हैं तथा शेष अभ्यर्थी चयन की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। 

चयन का महत्व 

योग्य कर्मचारियों के चयन का महत्व निम्नलिखित कारणों से भी बढ़ जाता है:
  1. चयन प्रक्रिया के माध्यम से योग्य कर्मचारियों को चुनना सम्भव होता है। 
  2. चयन प्रक्रिया के द्वारा यदि उपयुक्त कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है। 
  3. उचित ढंग से किये गये योग्य लोगों के चयन से कर्मचारी-परिवर्तन में कमी होती है। 
  4. एक श्रेष्ठ चयन प्रक्रिया का अनुसरण करने से कर्मचारियों की संगठन के प्रति कर्तव्य-निष्ठा, अपनत्व तथा सहयोग की भावना में वृद्धि होती है।
  5. समुचित चयन प्रक्रिया के अपनाये जाने से संगठन के अन्तर्गत सेवायोजक एवं कर्मचारियों के मध्य मधुर सम्बन्धों की स्थापना होती है। 
  6. योग्य कर्मचारियों का चयन करने से संगठन की उत्पादन लागत एवं अपव्यय में कमी होती है तथा साथ ही कार्यों की निष्पादन कुशलतापूर्वक होता है। 

चयन प्रक्रिया 

चयन प्रक्रिया के अन्तर्गत निम्नलिखित चरणों का समावेश किया जा सकता हैं:

आवेदन पत्र -

आवेदन-पत्र चयन प्रक्रिया का मूल आधार होते हैं, क्योंकि इनके द्वारा अभ्यार्थियों के विषय में सामान्य जानकारी प्राप्त की जाती है। 

इस आवेदन-पत्र के द्वारा अभ्यर्थियों की आयु, शैक्षिक योग्यता, प्रशिक्षण, अनुभव, पृष्ठभूमि तथा अपेक्षित वेतन आदि की जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कुछ संगठनों द्वारा स्वयं तैयार किया गया आवेदन-पत्र का प्रारूप ही स्वीकृत किया जाता है। कि वे जिस रूप से चाहें अपना आवेदन कर सकते हैं इस हेतु प्राय: आवेदन-पत्र के रूप में एक सह-पत्र के साथ बायोडेटा अथवा रिज्यूम का उपयोग किया जाता है।

प्रारम्भिक साक्षात्कार -

आवेदन-पत्रों के द्वारा जिन अभ्यार्थियों को चुना जाता हैं, उन्हें। प्रारम्भिक साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है। प्रारम्भिक साक्षात्कार अत्यन्त संक्षिप्त होता है। इसका उद्देश्य आवेदन-पत्रों के माध्यम से अभ्यार्थियों की जो अयोग्यतायें प्रकट नहीं हो पाती हैं, उनको प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात करके अनुपयुक्त अभ्यार्थियों को चयन प्रक्रिया से हटा देना होता है।

प्रारम्भिक साक्षात्कार के अन्र्तगत अभ्यार्थियों को कार्य की प्रकृति, कार्य के घंटों, कार्य-दशाओं तथा वेतन आदि की जानकाी प्रदान की जाती है। साथ हीे, उनकी शैक्षिक योग्यताओं, प्रशिक्षणों, अनुभवों, वर्तमान कार्यों तथा रूचियों आदि की जानकारी प्राप्त की जाती है। 

चयन परीक्षण -

प्रारम्भिक साक्षात्कार के द्वारा चुने गये अभ्यर्थियों को चयन परीक्षण से गुजरना होता है। यह चयन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग होता है। सामान्यत: चयन परीक्षण मनोवैज्ञानिक प्रकृति का होता है। जिसके द्वारा अभ्यर्थियों की योग्यताओं चातुर्य, कार्य अभिरूचियों तथा व्यवहारों आदि का मूल्याकंन किया जाता है तथा साथ ही अभ्यर्थियों की कार्य क्षमताओं एवं निपुणताओं को भी परखा जाता है चयन परीक्षण के द्वारा उचित पद के लिए उचित व्यक्ति को चुनना अत्यन्त सरल हो जाता है। चयन परीक्षण के प्रमुख प्रकार है:

1. योग्यता परीक्षण - इन परीक्षणों के माध्यम से अभ्यर्थियों की छिपी हुई विशिष्टता योग्यताओं तथा रूझानों को ज्ञात करने का प्रत्यन किया जाता है। इसके द्वारा यह अनुमान लगाने का प्रयास किया जाता हैं कि यदि किसी अभ्यर्थी को चयन कर लिया जाये तो भविष्य में वह अपने कार्य में सफल हो पायेगा अथवा नहीं। इसके साथ ही, परीक्षणों से किसी विशिष्ट कार्य को सीखने के लिए अभ्यर्थी के रूझान को भी ज्ञात किया जा सकता है। योग्यता परीक्षण निम्नलिखित प्रकार के हो सकते है:
  1. बुद्धि परीक्षण: इन परीक्षणों के माध्यम से अभ्यर्थियों की ग्रहण शक्ति, गणितीय प्रवृत्ति, स्मरण-शक्ति तथा तर्क-शक्ति की जाँच की जाती है। 
  2. यान्त्रिक योग्यता परीक्षण: इन परीक्षणों के माध्यम से अभ्यर्थियों की यन्त्रों को पहचानने तथा उन्हें सुचारू रूप से प्रयोग करने की क्षमता का मापन किया जाता है।
  3. लिपिकीय योग्यता परीक्षण: इन परीक्षणों के माध्यम से कार्यालय की क्रियाओं की निष्पादन क्षमता का मापन किया जाता है। 
2. उपलब्धि अथवा निष्पादन परीक्षण - इन परीक्षणों का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि अभ्यर्थियों द्वारा विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त किये जाने का दावा किया जाता है। इनके माध्यम से यह ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है कि अभ्यर्थियों द्वारा प्राप्त प्रशिक्षणों में से कितनी बातें वे सीख पाया है। ये परीक्षण दो प्रकार से किये जा सकते है:
  1. कार्य ज्ञान : इस परीक्षण के अन्तर्गत एक कार्य विशेष के सम्बन्ध से अभ्यर्थियों के ज्ञान का पता लगाया जाता है।
  2. कार्य-नमूना परीक्षण: इस परीक्षण के अन्तर्गत अभ्यर्थियों को एक वास्तविक कार्य के भाग को सम्पन्न करने के लिए कहा जाता है तथा उनके निष्पादन के स्तर के आधार पर उनके विषय में निर्णय किया जाता है। 
3. स्थितिपरक परीक्षण - इस परीक्षण के माध्यम से अभ्यर्थियों का वास्तविक जीवन से मिलती-जुलती एक परिस्थिति में मूल्यांकन किया जाता है। इस परीक्षण में अभ्यर्थियों को या तो किसी परिस्थिति का सामना करने के लिए, या फिर कार्य के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण परिस्थितियों को समाधान करने के लिए कहा जाता है।

4. रूचि परीक्षण - इस परीक्षण के माध्यम से अभ्यर्थियों की कार्य, पद, व्यवसाय, शौक तथा मनोरंजनात्मक क्रियाओं के सम्बन्ध में उनकी पसन्द एवं नापसन्द को ज्ञात करने का प्रयत्न किया जाता हैं इस परीक्षण का उद्देश्य इस बात का पता लगाना होता है कि कोई अभ्यर्थी जिस कार्य के लिए उसने आवेदन किया है, उसमें रूचि रखता है अथवा नहीं।
5. समूह परिचर्चा- समूह परिचर्चा में अभ्यर्थियों को समूह में विभाजित करके उन्हें कोई चर्चित अथवा सामयिक विषय दे दिया जाता है, जिस पर उन्हें तर्क-वितर्क करना होता है। इस परिचर्चा में अभ्यर्थियों के ज्ञान की गहनता, विचारों की गुणवत्ता, स्तर एवं मौलिकता, कम शब्दों में अपनी बात समझाने की योग्यता तथा उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। कोई अभ्यर्थी अपने समूह में कितनी पहल करता है तथा दूसरे सदस्यों को किस हद तक प्रभावित कर पाता है, इसका विशेष महत्व होता हे। समूह में चर्चा के समय अभ्यर्थियों की सहनशीलता एवं दूसरे की बात सुनने की क्षमता को भी ध्यानपूर्वक मापा जाता है। अनेक व्यावसायिक संगठनों द्वारा आज कल समूह परिचर्चा के बाद समूह कार्य भी करवाया जाता है।

6. चिकित्सकीय परीक्षण- मुख्य सेवायोजन साक्षात्कार में योग्य पाये गये अभ्यर्थियों का चिकित्सकीय परीक्षण किया जाता है। शारीरिक योग्यताओं, जैसे- स्पष्ट दृष्टि, स्पष्ट सुनने की शक्ति, असाधारण शारीरिक शक्ति, कठोर कार्य-दशाओं के लिए सहन-शक्ति तथा स्पष्ट आवाज आदि का होना नितान्त आवश्यक होता हैं। चिकित्सकीय परीक्षण के द्वारा इस बात की जाँच की जाती है कि अभ्यर्थियों में ये शारीरिक योग्यतायें हैं। अथवा नहीं।

7. सन्दर्भों की जाँच- चिकित्सकीय परीक्षण की समाप्ति के पश्चात मानव संसाधन विभाग द्वारा सन्दर्भों की जाँच की जाती है। विभिन्न संगठनों द्वारा अभ्यर्थियों से उनके आवेदन-पत्रों में दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों के नाम व पते सन्दर्भ के रूप में दिये जाने की अपेक्षा की जाती है। ये सन्दर्भ उन व्यक्तियों के हो सकते हैं, जो कि अभ्यर्थियों को अच्छी तरह से जानते हो अथवा वे अभ्यर्थियों के पूर्ववर्ती सेवायोजक हों तथा जो अभ्यर्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों एवं उनके पूर्व के कार्य-निष्पादन के विषय में भली प्रकार से परिचित हों।

कार्य पर नियुक्ति 

चयन प्रक्रिया के माध्यम से जब किसी अभ्यर्थी का अन्तिम रूप से चयन कर लिया जाता है तथा उसे नियुक्ति आदेश दे दिया जाता है तो आगामी चरण उसकी ‘कार्य पर नियुक्ति’ का होता है जब नव-नियुक्त कर्मचारी कार्य करने के लिए उपस्थित होता है तो उसे उस कार्य पर, जिसके लिए उसका चयन किया गया है, नियुक्त करना होता हैं। नव-नियुक्त कर्मचारियों को स्थापित करना ही कार्य पर नियुक्ति कहलाती है। 

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