प्रशिक्षण क्या है? प्रशिक्षण की विशेषताएं, उद्देश्य, आवश्यकता, क्षेत्र

अनुक्रम
साधारण शब्दों में, प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने के लिए एक कर्मचारी के ज्ञान एवं निपुणताओं में वृद्धि करने का कार्य है। प्रशिक्षण एक अल्पकालीन शैक्षणिक प्रक्रिया है तथा जिसमें एक व्यवस्थित एवं संगठित कार्य-प्रणाली उपयोग में लायी जाती हैं, जिसके द्वारा एक कर्मचारी किसी निश्चित उद्देश्य के लिए तकनीकी ज्ञान एवं निपुणताओं को सीखता है। दूसरे शब्दों में प्रशिक्षण कार्य एवं संगठन की आवश्यकताओं के लिए एक कर्मचारी के ज्ञान निपुणताओं, व्यवहार, अभिरूचियों तथा मनोवृत्तियों में सुधार करता है, परिर्वतन उत्पन्न करता है तथा ढालता है। इस प्रकार प्रशिक्षण एक सीखने का अनुभव है। जिसके अन्तर्गत यह एक कर्मचारी में तुलनात्मक रूप से स्थायी परिवर्तन लाने का प्रयास करता है, जो कि उसके कार्य का निष्पादन क्षमता में सुधार लाता है। प्रशिक्षण की कुछ प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित प्रकार से है:
  1. एडविन बी. फिलिप्पा के अनुसार ‘‘प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को करने के लिए एक कर्मचारी के ज्ञान एवं निपुणताओं में वृद्धि करने का कार्य है’’ 
  2. डेल एस. बीच के अनुसार’’ प्रशिक्षण एक संगठित प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लोग किसी निश्चित उद्देश्य के लिए ज्ञान तथा/अथवा निपुणताओं को सीखने है।’’ 
  3. अरून मोनप्पा एवं मिर्जा एस. सैय्यदैन के अनुसार, ‘‘प्रशिक्षण सिखाने/सीखने के क्रियाकलापों से सम्बन्धित होता है, जो कि एक संगठन के सदस्यों को उस संगठन द्वारा अपेक्षित ज्ञान निपुणताओं, योग्यताओं तथा मनोवृत्तियों को अर्जित करने एवं प्रयोग करने के लिए सहायता करने में प्राथमिक उद्देश्य हेतु जारी रखी जाती है।’’ 

प्रशिक्षण की विशेषताएं

  1. प्रशिक्षण, मानव संसाधन विकास की एक महत्वपूर्ण उप-प्रणाली तथा मानव संसाधन प्रबन्धन के लिए आधारभूत संचालनात्मक कार्यों में से एक है 
  2. प्रशिक्षण कर्मचारियो के विकास की एक व्यवस्थित एवं पूर्व नियोजित प्रक्रिया होती है। 
  3. प्रशिक्षण एक सतत् जारी रहने वाली प्रक्रिया है। 
  4. प्रशिक्षण सीखने का अनुभव प्राप्त करने की प्रक्रिया है। 
  5. प्रशिक्षण किसी कार्य की व्यावहारिक शिक्षा का स्वरूप होता है। 
  6. प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारियों के ज्ञान एवं निपुणताओं में वृद्धि की जाती हैं। तथा उनके विचारों, अभिरूचियो एवं व्यवहारों में परिर्वतन लाया जाता है। 
  7. प्रशिक्षण से कर्मचारियो की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। 
  8. प्रशिक्षण मानवीय संसाधनों में उद्देश्यपूर्ण विनियोग है, क्योंकि यह संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक होता है। 
  9. प्रशिक्षण प्रबन्धतन्त्र का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व होता है। 
अत: निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रशिक्षण, कार्यों को सही एवं प्रभावपूर्ण ढंग से सम्पन्न करने के लिए कर्मचारियों को जानकारी प्रदान करने की प्रक्रिया है, जिससे कि उनकी कार्य के प्रति समझ, कार्यक्षमता तथा उत्पादकता में वृद्धि हो सके।

प्रशिक्षण के उद्देश्य 

किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके उद्देश्यों का निर्धारण कितनी कुशलता से किया गया है। सामान्य: संगठनों द्वारा अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए जो उद्देश्य होते है, वे निम्नलिखित प्रकार से है:-
  1. कार्य एवं संगठन की वर्तमान तथा साथ ही परिवर्तित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नये तथा पुराने दोनों कर्मचारियों को तैयार करना 
  2. किसी निश्चित कार्य के कुशलतापूर्ण निष्पादन के लिए नव-नियुक्त कर्मचारियों को आवश्यक आधारभूत ज्ञान एवं निपुणताओं को प्रदान करना। 
  3. संगठन के सभी स्तरों पर योग्य एवं कुशल कर्मचारियों की व्यवस्था को बनाये रखना।
  4. कर्मचारियों को कार्य-दशाओं एवं संगठनात्मक संस्कृति के अनुकूल बनाना। 
  5. न्यूनतम लागत, अपव्यय एवं बर्बादी तथा न्यूनतम पर्यवेक्षण पर कर्मचारियों से श्रेष्ठ ढंग से कार्य सम्पादन को प्राप्त करना। 
  6. कर्मचारियों को दुर्घटनाओं से बचाव की विधियों से परिचित कराना। 
  7. नवीन प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी परिवर्तनों से कर्मचारियों को परिचित करवाने तथा बदलते हुए वातावरण के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए कर्मचारियों को विकसित करना।
  8. स्थानान्तरण एवं पदोन्नति के सम्बन्ध में नवीन कार्य-दशाओं में समायोजित करने के लिए कर्मचारियों को तैयार करना 
  9. कर्मचारियों को नवीनतम अवधारणाओं, सूचनाओं एवं तकनीकों के विषय में जानकारी प्रदान करने तथा उन निपुणताओं, जिनकी उन्हें अपने-अपने विशेष क्षेत्रों मे आवश्यकता है अथवा होगी, उनको विकसित करने के द्वारा उन्हें उनके वर्तमान पदों पर अधिक प्रभावपूर्ण रूप से कार्य सम्पé करने के लिए सहायता प्रदान करना। 
  10. संगठन के अन्तर्गत समस्त विभागों की कार्य-प्रणाली को सरल एवं प्रभावी बनाना। 
  11. कर्मचारियों की कार्य सम्पादन सम्बन्धी आदतों में सुधार करना। 
  12. कर्मचारियों की आत्म-विश्लेषण करने की योग्यता तथा कार्य सम्बन्धी निर्णय क्षमता का विकास करनां 
  13. वैयक्तिक एवं सामूहिक मनोबल, उत्तदायित्व की अनुभूति, सहकारिता की मनोवृत्तियों तथा मधुर सम्बन्धों को बढ़ावा देना। 
  14. संगठन द्वारा आपेक्षित स्तर के आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति को सुनिश्चित करना। 
  15. मानव संसाधन विकास के लक्ष्यों की पूर्ति करना।

प्रशिक्षण की आवश्यकता 

प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने हेतु कर्मचारियों को महत्वपूर्ण विशिष्ट निपुणताओं के प्रदान किये जाने से सम्बन्धित होता है। प्रशिक्षण, मुख्य रूप से कार्य-उन्मुख होता है तथा इसका लक्ष्य वर्तमान कार्य-निष्पादन को बनाये रखना एवं उसमें सुधार करना होता है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक होता है:-
  1. शैक्षणिक संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों की शिक्षा सैद्धान्तिक ज्ञान की ठोस नींव तो डाल सकती है, किन्तु विभिन्न कार्यों के सफल निष्पादन हेतु व्यावहारिक ज्ञान एवं विशिष्ट निपुणताओं की आवश्यकता होती है, जो कि प्रशिक्षण द्वारा ही पूरा की जा सकती है। 
  2. नव-नियुक्त कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक होता है, ताकि वे अपने कार्यों को प्रभावपूर्ण रूप से सम्पन्न कर सके। 
  3. वर्तमान कर्मचारियों को उच्चतर स्तर के कार्यों के लिए तैयार करने हेतु प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। 
  4. वर्तमान कर्मचारियों के लिए पुर्नअभ्यास प्रशिक्षण आवश्यक होता है, ताकि वे कार्य-संचालनों में होने वाले नवीनतम विकासों के साथ-साथ चल सकें। इसके अतिरिक्त तीव्र गाति से होने वाले प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के लिए भी यह अत्यन्त आवश्यक होता है। 
  5. कर्मचारियों को गतिशील एवं परिवर्तनशील बनाने के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। इससे उन्हें संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न कार्यों पर नियुक्त किया जाता सकता हैं। 
  6. कर्मचारी के पास क्या है? तथा कार्य की आवश्यकता क्या है, इन दोनों के बीच के अन्तर को दूर करने हेतु प्रशिक्षण अत्यन्त आवश्यक होता हैं। इसके अतिरिक्त, कर्मचारियों को अधिक उत्पादक एवं दीर्घकालिक उपयोगी बनाने के लिए भी प्रशिक्षण प्रदान किया जाना आवश्यक होता है। 
  7. अधिसमय, कार्य-लागत, अनुपस्थितता तथा कर्मचारी-परिवर्तन में कमी लाने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है। 
  8. दुर्घटनाओं की दरों में कमी लाने तथा उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए समय-समय पर कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक होता है।

प्रशिक्षण के क्षेत्र 

प्राय: विभिन्न संगठन अपने कर्मचारियों को निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करते है:-
  1. ज्ञान: इसके अन्तर्गत प्रशिक्षाथ्र्ाी कार्यो, कर्मचारी-व्यवस्था तथा संगठन द्वारा उत्पादित वस्तुओं अथवा प्रदत्त सेवाओं के विषय में निर्धारित नियमों एवं विनियमों को सीखते है। इसका उद्देश्य नव-नियुक्त कर्मचारियों को इस सम्बन्ध में पूर्ण रूप से अवगत कराना होता है कि संगठन के भीतर तथा बाहर क्या-क्या घटित होता है। 
  2. तकनीकी निपुणतायें: इसमें कर्मचारियों को एक विशिष्ट निपुणता (जैसे-किसी यन्त्र का संचालन करना अथवा कम्प्यूटर का संचालन करना) को सिखाया जाता है, ताकि वे उस निपुणता को अर्जित कर सकें तथा संगठन के प्रति अर्थपूर्ण रूप से अपना योगदान दे सकें। 
  3. सामाजिक निपुणतायें: इसके अन्तर्गत कर्मचारियों को कार्य-सम्पादन के लिए एक उचित मानसिक स्थिति का विकास करने तथा वरिष्ठों, सहकर्मियों एवं अधीनस्थों के प्रति आचरण के ढंगों को सिखाया जाता हैं। इसमें प्रमुख ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि एक कर्मचारी को कार्य-समूह के सदस्य के रूप में किस प्रकार से समायोजित किया जाये। 
  4. तकनीकें: इसमें कर्मचारियों को कार्य सम्पादन की विभिन्न स्थितियों में उनके द्वारा अर्जित ज्ञान एवं निपुणताओं के प्रयोग के विषय में जानकारी प्रदान की जाती है। कर्मचारियों के ज्ञान एवं निपुणताओं के सुधार करने के अतिरिक्त, प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारियों की मनोवृत्तियों को संगठनात्मक संस्कृ ति के अनुरूप ढालना भी होता है। जब एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रशासन समुचित ढंग से किया जाता है तो इससे संगठन के क्रियाकलापों के लिए कर्मचारियों की निष्ठा, लगाव एवं वचनबद्धता को स्थायी रूप से प्राप्त किया जा सकता है।

प्रशिक्षण के सिद्धान्त 

संगठनात्मक कार्यों की सफलता के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना अनिवार्य होता है। परन्तु कार्य-सम्बन्धी ज्ञान एवं निपुणताओं के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जाना एक जटिल प्रक्रिया है। विद्धानों ने विभिन्न शोधों एवं प्रयोगों पर आधारित कुछ सिद्धान्तों को विकसित किया है। इन मार्गदर्शक सिद्धान्तों का अनुपालन प्रशिक्षण प्रक्रिया को सुलभ बना देता है तथा इससे प्रशिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त करना भी सम्भव होता है। इनसें से कुछ प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है।
  1. अभिप्रेरण : प्रशिक्षण कार्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिये, जो कि प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित कर सके। प्रशिक्षार्थियों को अभिपे्िर रत करने के लिए प्रशिक्षण की उपयोगिता एवं प्रशिक्षार्थियों की आवश्यकताओं के बीच एकात्मकता स्थापित करना आवश्यक है। प्रशिक्षार्थियों की आवश्यकतायें, सामाजिक आर्थिक एवं मनोवज्ञै ानिक हो सकती हैं। जब प्रशिक्षाथ्र्ाी यह अनुभव करते हैं। कि प्रशिक्षण उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति की सहायक हो सकता है, तो इसके प्रति उनमें रूचि एवं उत्साह का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। 
  2. प्रगति प्रतिवेदन : प्रशिक्षण को प्रभावपूर्ण बनाने तथा प्रशिक्षार्थियों के मनोबल को बनाये रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक हैं कि प्रशिक्षार्थियों को उनकी प्रगति के विषय में समय-समय पर जानकारी प्रदान की जाये। प्रशिक्षण काल के दौरान प्रशिक्षक द्वारा निरन्तर यह अनुमान लगाया जाना चाहिये कि प्रशिक्षार्थियों ने किन-किन क्षेत्रों में कितनी प्रगति कर ली हैं प्रगति प्रतिवेदन से प्रशिक्षण में नियमितता, तत्परता एवं प्रभावशीलता बनी रहती है। 
  3. प्रबलन : प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रभावपूर्णता के लिए पुरस्कार एवं दण्ड के माध्यम से प्रशिक्षार्थियों का प्रबलन भी किया जाना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि प्रगति का मूल्यांकन करने पर अच्छे परिणामों के लिए पुरस्कार तथा खराब परिणामों के लिए दण्डित करने की भी व्यवस्था होना आवश्यक है। पदोन्नति, वेतन-वृद्धि, प्रशंसा एवं मान्यता आदि के द्वारा अच्छे परिणामों के लिए प्रशिक्षार्थियों को पुरस्कृत किया जा सकता हैं। परन्तु दण्ड के सम्बन्ध में प्रबन्धतन्त्र को अत्यन्त ही सावधानी बरतनी चाहिये। 
  4. प्रतिपुष्टि : प्रगति प्रतिवेदन एवं प्रतिपुष्टि दोनों एक-दूसरे के सहायक सिद्धान्त है। प्रतिपुष्टि को प्रगति प्रतिवेदन का पूरक कहा जा सकता है। इसका आशय यह है कि प्रशिक्षार्थियों को उनकी त्रुटियों एवं कमियों का ज्ञान प्रशिक्षण की अवधि में समय-समय पर प्राप्त होते रहना आवश्यक है, ताकि समय रहते वे त्रुटियों को सुधार सकें। प्रशिक्षक को भी चाहिए कि वह त्रुटियों के कारणों का पता लगाकर उन्हें सुधारने हेतु प्रयास करें 
  5. वैयक्तिक भिéताये : प्राय: प्रशिक्षार्थियों को सामूहिक रूप से प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, क्योंकि इससे समय एवं धन दोनों की बचत होती है। परन्तु प्रशिक्षार्थियों की बौद्धिक क्षमता एवं सीखने की तत्परता एक-दूसरे से भिन्न होती है। अत; प्रशिक्षार्थियों की इन भिन्नताओं को ध्यान में रखकर प्रशिक्षण कार्यक्रम को तैयार किया जाना चाहिए। 
  6. अभ्यास : किसी कार्य को भली-भाँति सीखने के लिए उसका वास्तविक अभ्यास अत्यन्त आवश्यक है। केवल व्याख्यान सुनने एवं चलचित्र आदि देखने से किसी कार्य को सम्पन्न करने की विधि सीखना कठिन होता है। अत:, प्रशिक्षण एवं सार्थक बनाने के लिए यह भी आवश्यक हैं कि प्रशिक्षाथ्र्ाी को कार्य के अभ्यास का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जाये

प्रशिक्षण के प्रकार 

विभिन्न संगठनों द्वारा अपने उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं के आधार पर भिन्न -भिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उपयोग अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने हेतु किया जाता है। उनमें से कुछ प्रमुख का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है:-

  1. कार्य-परिचय अथवा अभिमुखीकरण प्रशिक्षण  - इस प्रकार के प्रशिक्षण के उद्देश्य नव-नियुक्त कर्मचारियों को उनके कार्य एवं संगठन से परिचित कराना होता है। इसके द्वारा नव-नियुक्त कर्मचारियों को संगठन की नीतियों, उद्देश्यों, संगठन की सरंचना, उत्पादन-प्रणालियों तथा कार्य-दशाओं आदि की जानकारी प्रदान की जाती है। यह प्रशिक्षण नव-नियुक्त कर्मचारियों में संगठन के प्रति निष्ठा, रूचि एवं विश्वास उत्पन्न करने तथा संगठन के साथ एकात्मकता स्थापित करने के लिए आवश्यक होता है।
  2. कार्य प्रशिक्षण - कार्य प्रशिक्षण, कर्मचारियों को उनके कार्यों में दक्ष एवं निपुण बनाने तथा कार्यों की बारीकियाँ समझाने के लिए प्रदान किया जाता है, ताकि वे अपने कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर सकें। इसमें कर्मचारियों को कार्य के विभिन्न पहलुओं, उसमें प्रयुक्त यन्त्रों एवं उपकरणों तथा कार्यविधियों की जानकारी प्रदान की जाती है। इस प्रकार के प्रशिक्षण से कर्मचारियों की कार्यकुशलता एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है। यह प्रशिक्षण नये तथा पुराने दोनों प्रकार के कर्मचारियों को दिया जाता सकता है।
  3. पदोन्नति प्रशिक्षण - संगठन में जब कर्मचारियों को पदोन्नत किया जाता है तो उन्हें उच्च पद के कार्य का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक होता है, ताकि वे अपने नवीन कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह कर सकें। सामान्यत: संगठन द्वारा उच्च पदों की भावी रिक्तियों का अनुमान लगाकर सम्भावित प्रत्याशियों को पहले से ही प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की जाती है। कई बार कर्मचारियों को पदोéति के तुरन्त बाद भी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है इसमें कर्मचारियों को नये पदों के कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों, अधिकारों तथा अन्य कार्यों से सम्बन्धों आदि का ज्ञान करवाया जाता है।
  4. पुनअभ्यास प्रशिक्षण - वर्तमान परिवर्तनशील वातावरण एवं तीव्र प्रौद्योगिकीय विकास के परिणामस्वरूप इस प्रकार के प्रशिक्षण का महत्व बढ़ गया है। अत: कर्मचारियों को केवल एक बार प्रशिक्षित कर देना ही पर्याप्त नहीं होता है। उत्पादन में नवीन तकनीकों एवं यन्त्रों का प्रयोग किये जाने तथा नवीतम कार्य-प्रणालियों को अपनाये जाने की दशा में पुराने कर्मचारियों को पुन: प्रशिक्षित किये जाने की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है पुराने कर्मचारियों के ज्ञान को तरा-ताजा करने उनकी मिथ्या धारणाओं को दूर करने, उन्हें नवीन कार्य-पद्धतियों एवं नये सुधारों से परिचित करवाने तथा उन्हें नवीन परिवर्तन से अवगत कराने की दृष्टि से यह प्रशिक्षण आवश्यक है। इस प्रकार ज्ञान का नवीनीकरण एंव विकास सूचनाओं का प्रसार, कार्य-शैलियों में परिवर्तन तथा वैयक्तिक विकास आदि इस प्रशिक्षण के प्रमुख उद्देश्य हैं।

प्रशिक्षण की विधियाँ 

विभिé संगठनों द्वारा प्रशिक्षण के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक संगठन अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप इनमें से उपयुक्त विधि का चयन करता है। सामान्यत:, ये प्रशिक्षण विधियाँ प्रचालनात्मक तथा पर्यवेक्षकीय कर्मचारियों के लिए प्रयोग की जाती है। प्रशिक्षण की इन विधियों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित करके समझाा जा सकता है।
  1. कार्य पर प्रशिक्षण विधियाँ 
  2. कार्य से पृथ्क प्रशिक्षण विधियाँ 

कार्य पर प्रशिक्षण विधियाँ 

सामान्यत: कार्य पर प्रशिक्षण विधियाँ अत्यधिक प्रयोग में लायी जाती है। इन विधियों में प्रशिक्षार्थियों को संगठन के नियमित कार्यों पर नियुक्त करके उन्हें उन कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अनिवार्य निपुणताओं को सिखाया जाता है। प्रशिक्षाथ्र्ाी योग्य कर्मचारियों अथवा प्रशिक्षकों के पर्यवेक्षण एवं निर्देशन में कार्य सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करते है। कार्य पर प्रशिक्षण, वास्तविक कार्य-दशाओं में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त करते है। कार्य पर प्रशिक्षण, वास्तविक कार्य-दशाओं में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान एवं अनुभवों को प्रदान करने में अत्यन्त उपयोगी होते हैं। प्रशिक्षाथ्र्ाी, कार्य के विषय में सीखने के दौरान, नियमित रूप से संगठन के कर्मचारी भी होते हैं, जो कि अपनी सेवायें संगठन को देते हैं तथा जिसके लिए उन्हें संगठन द्वारा परिश्रमिक का भुगतान भी किया जाता है। इससे प्रशिक्षार्थियों के स्थानान्तरण की समस्या भी समाप्त हो जाती है, क्योंकि वे अपने कार्य पर ही प्रशिक्षण प्राप्त कर लेते है। इन विधियों के अन्तर्गत कार्यों को किस प्रकार से सम्पादित किया जाये इसे सिखाने की अपेक्षा प्रशिक्षार्थियों की सेवाओं को अत्यधिक प्रभावपूर्ण रूप से प्राप्त करने पर अधिक बल दिया जाता है। कार्य पर प्रशिक्षण विधियों में सम्मिलित है:-
  1. कार्य परिवर्तन : इस विधि के अन्तर्गत प्रशिक्षाथ्र्ाी का एक कार्य से दूसरे कार्य पर प्रतिस्थापन सम्मिलित होता है। प्रशिक्षाथ्र्ाी, विभिé निर्दिष्ट कार्यों में से प्रत्येक में अपने पर्यवेक्षक अथवा प्रशिक्षक से कार्य का ज्ञान प्राप्त करता है। तथा अनुभवों को अर्जित करना है। यद्यपि, यह विधि प्राय: प्रबन्धकीय पदों के लिए प्रशिक्षण में सामान्य होती हैं। परन्तु कर्मचारी- प्रशिक्षार्थियों को भी कार्यशाला कार्यों में एक कार्य से दूसरे कार्य पर परिवर्तित किया जा सकता है। यह विधि प्रशिक्षाथ्र्ाी को दूसरे कार्यों पर नियुक्त कर्मचारियों की समस्याओं को समझने तथा उनका सम्मान करने का अवसर प्रदान करती है।
  2. कोचिगं : इस विधि में प्रशिक्षाथ्र्ाी को एक विशेष पर्यवेक्षक के अधीन नियुक्त कर दिया जाता है, जो कि उसके प्रशिक्षण में शिक्षक की भाँति कार्य करता है। पर्यवेक्षक प्रशिक्षाथ्र्ाी को उसके कार्य-निष्पादन पर त्रुटियों एवं कमियों के विषय में बताता है तथा उसे उनके सुधार के लिए कुछ सुझावों को भी प्रस्तुत करता है। प्राय: इस विधि में प्रशिक्षाथ्र्ाी, पर्यवेक्षक के कुछ कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में भागीदार बनता है तथा उसे उसके कार्य-भार से कुछ मुक्ति प्रदान करता है। प्रशिक्षण की इस विधि में जो दोष होता है वह यह कि प्रशिक्षाथ्र्ाी को कार्य सम्पन्न करने में किसी प्रकार की न तो स्वंतंत्रता होती है तथा न ही उसे अपने विचारों को व्यक्त करने का अवसर प्राप्त होता है। 
  3. समूह निर्दिष्ट कार्य : समूह निर्दिष्ट कार्य प्रशिक्षण विधि के अन्तर्गत, प्रशिक्षार्थियों के एक समूह को कोई वास्तविक संगठनात्मक समस्या दी जाती है। तथा उनसे उसका समाधान करने को कहा जाता है। प्रशिक्षाथ्र्ाी संयुक्त रूप से समस्या का समाधान करते हैं। इस विधि से उनमें दलीय-भावना का विकास होता है। 

कार्य से पृथ्क प्रशिक्षण विधियाँ 

कार्य से पृथक प्रशिक्षण विधियों के अन्तर्गत प्रशिक्षार्थियों को उनके कार्य की परिस्थितियों से अलग करके केवल उनके भावी कार्य निष्पादन से सम्बन्धित सीखने की विषय-वस्तु एवं सामग्री पर ही उनका ध्यान केन्द्रित करवाया जाता है। चूँकि इनमें प्रशिक्षार्थियों के कार्य से पृथक रहने से उनके कार्य की आवश्यकताओं द्वारा उनकी एकाग्रता भंग नहीं होती है, इसलिए वे अपना सारा ध्यान कार्य सम्पé करने में समय बिताने की अपेक्षा कार्य सीखने में लगा सकते है।
  1. वेस्टिब्यूल टे्रनिंग : इस विधि में प्रशिक्षण, कार्य स्थल से पृथक एक विशेष प्रशिक्षणशाला में प्रदान किया जाता है, जिसमें यन्त्र, उपकरण,कम्प्यूटर तथा अन्य साज-सामान आदि जो कि सामान्यत: वास्तविक कार्य निष्पादन में प्रयुक्त होते हैं, वे भी उपलब्ध होते हैं तथा जहाँ लगभग कार्य स्थल जैसा वातावरण स्थापित किया जाता है। सामान्यत: इस प्रकार का प्रशिक्षण लिपिकीय तथा अद्धकुशल कार्यों के कर्मचारियों के लिए प्रयोग किया जाता है। यह प्रशिक्षण कुशल पर्यवेक्षकों अथवा फोरमैन द्वारा प्रदान किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत सिद्धान्तों को अभ्यास के साथ सम्बद्ध करते हुए प्रशिक्षण दिया जा सकता है। जब प्रशिक्षाथ्र्ाी अपना प्रशिक्षण पूर्ण कर लेते है तो उन्हें कार्य पर नियुक्त कर दिया जाता है। 
  2. रोल प्लेइंग : इस विधि को मानवीय अन्त:क्रिया की एक पद्धति के रूप में पारिभाषिति किया जा सकता है, जिसमें अधिकल्पित परिस्थितियों में वास्तवित व्यवहार सम्मिलित होता है। प्रशिक्षण की इस विधि में कार्य, क्रियाशीलता तथा अभ्यास सम्मिलित होते है। इसमे प्रशिक्षार्थियों को विभिन्न पद काल्पनिक रूप से सांपै े जाते हैं। तथा उन्हैं। उन पदों की भूमिकाओं का निर्वाह करने को कहा जाता है। उदाहरणार्थ, प्रशिक्षार्थियों में से किसी को विक्रय अधिकारी, किसी को क्रय पर्यवेक्षक तथा किसी को विक्रेता की भूमिका सांपै कर किसी संगठनात्मक समस्या को हल करने के लिए कहा जाता है। प्रशिक्षार्थियों द्वारा भूमिका निर्वाह के समय प्रशिक्षक उनका गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करता है तथा बाद में उन्हें उनकी त्रुटियों एवं कमियों के विषय में जानकारी देता है, ताकि वे वास्तविक कार्य निष्पादन के समय उन्हें दूर कर सकें। इस विधि का अधिकतर प्रयोग अन्तवैंयक्तिक अन्त: क्रियाओं एवं सम्बन्धों के विकास के लिए किया जाता है। 
  3. व्याख्यान विधि : यह एक परम्परागत विधि है, जिसके अन्तर्गत एक अथवा अधिक प्रशिक्षक, प्रशिक्षार्थियों के समूह को व्याख्यान देकर किसी विषय-वस्तु के सम्बन्ध में ज्ञान प्रदान करते हैं। प्रशिक्षक को व्याख्यान कला एवं विषय-वस्त ु का अच्छा ज्ञान होता है। व्यख्यान को प्रभावशाली बनाने के लिए, प्रशिक्षर्थियों को अभिप्रेरित करना तथा उनमें रूचि उत्पन्न करना अनिवार्य होता है। व्याख्यान विधि का एक लाभ यह हैं कि यह एक प्रत्यक्ष विधि है, जिसे कि प्रशिक्षार्थियों के एक बड़े समूह के लिए प्रयोग किया जा सकता है। अत: इससे समय एवं धन, दोनों की बचत होती है। इस विधि का प्रमुख दोष यह है कि इसके द्वारा केवल सैद्धान्तिक ज्ञान की प्रदान किया जा सकता है, व्यवाहारिक ज्ञान नहीं । 
  4. सम्मेलन अथवा विचार-विमर्श विधि: इस विधि के अन्तर्गत, सामूहिक विचार-विमर्श द्वारा सूचनाओं एवं विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। इसके उद्देश्य एक समूह के ज्ञान एवं अनुभव से सभी को लाभान्वित करना होता है। इस विधि के अन्तर्गत भाग लेने वाले प्िरशक्षाथ्र्ाी विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को प्रस्ततु करते हैं, तथ्यों, विचारों एवं आँकडों का आदान-प्रदान एवं परीक्षण करते हैं, मान्यताओं की जाँच करते हैं, निष्कर्षों को निकालते है तथा परिणामस्वरूप कार्यों के निष्पादन में सुधार हेतु योगदान देते है। 
  5. प्रोग्राम्ड इन्स्ट्रक्शन : हाल ही के वर्षों में यह विधि काफी लोकप्रिय हुई है। इस विधि में जो भी विषय-वस्तु सिखायी जानी होती है, उसे सावधानीपूर्वक नियोजित कर क्रमिक इकाइयों के एक अनुक्रम में प्रस्तुत किया जाता है। ये इकाइयाँ अनुदेशक के सरल से जटिल स्तर की ओर व्यवस्थित की गयी होती हैं। इन इकाइयों को प्रशिक्षाथ्र्ाी प्रश्नों के उत्तर देकर अथवा रिक्त स्थानों को भरकर पर करते है। तथा आगे बढ़ जाते हैं। इस विधि का प्रमुख लाभ यह हैं। कि प्रशिक्षाथ्र्ाी अपने सीखने का समायोजन अपनी सुविधानुसार किसी भी स्थान पर कर सकते है। आज सांख्यिकी विज्ञान एवं कम्प्यूटर के क्षेत्र में अनेक प्रोग्राम्ड बुक उपलब्ध हैं। यह विधि समय एवं धन के हिसाब से खर्चीली होता है।

प्रशिक्षण की प्रक्रिया 

प्रशिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया हैं। जिसके द्वारा संगठनों के कर्मचारियों के ज्ञान, निपुणताओं तथा रूचियों में वृद्धि की जाती है। विभिन्न संगठनों की परिवर्तित आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह अत्यन्त आवश्यक है कि कर्मचारियों के लिए उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जायें। एक आदर्श प्रशिक्षण प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण इस प्रकार से है -

  1. प्रशिक्षण आवश्यकताओं की निर्धारण - प्रशिक्षण प्रक्रिया चरण में प्रशिक्षण की आवश्यकताओं का निर्धारण किया जाता है। प्रशिक्षण आवश्यकताओं की निर्धारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण होता है, क्योंकि इसी के आधार पर हीे प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रशिक्षण की विधियों तथा प्रशिक्षण की विषय-वस्तु को निर्धारित किया जाता है। प्रशिक्षण आवश्यकताओं का निर्धारण निम्नलिखित प्रकार के विश्लेषणों के माध्यम से किया जा सकता है।
    1. संगठनात्मक विश्लेषण: इसमें संगठन के उद्देश्य, विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक वातावरण का गहन अवलोकन जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक क्षमताओं एवं कमजोरियों, जैसे- दुर्घटनाओ, बार-बार यन्त्रों की टूट-फूट, अत्याधिक कर्मचारी-परिवर्तन बाजार अंश एवं बाजार सम्बन्धी अन्य क्षेत्रों, उत्पादन की गुणवत्ता एवं मात्रा उत्पादन-सारणी, कच्चा माल तथा वित्त आदि का विश्लेषण सम्मिलित है। 
    2. विभागीय विश्लेषण: इसमें विभिन्न विभागों की विशेष समस्याओं अथवा उन विभागों के कर्मचारियों के एक समूह की सामान्य समस्या, जैसे-ज्ञान एवं निपुणताओं को प्राप्त करने की समस्या सहित, विभिन्न विभागीय क्षमताओं एवं कमजोरियों आदि का विश्लेषण सम्मिलित है। 
    3. कार्य एवं भूमिका विश्लेषण: इसमे विभिन्न कार्यों एवं उनकी भूमिकाओं, परिवर्तनों के परिणामस्वरूप किये गये कार्य अभिकल्पों, कार्य-विस्तार तथा कार्य समृद्धिकरण आदि का विश्लेषण सम्मिलित है। 
    4. मानवीय संसाधन विश्लेषण : इसमें कार्यों के ज्ञान एवं निपुणताओं के क्षेत्रों में संगठन के कर्मचारियों की क्षमताओं एवं कमजोरियों का विश्लेषण सम्मिलित है। 
  2. प्रशिक्षण के उद्देश्यों का निर्धारण - प्रशिक्षण की प्रक्रिया का अगला चरण इसके उद्देश्य का निर्धारण करना होता है एक बार प्रशिक्षण की आवश्यकता का निर्धारण कर लेने से इसके उद्देश्यों को इंगित करना सरल हो जाता है। प्रशिक्षण के उद्देश्यों का निर्धारण अत्यन्त ही सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए क्योंकि सम्पूर्ण प्रशिक्षण की सफलता इसके उद्देश्यों द्वारा ही निर्देशित होती है
  3. प्रशिक्षण कार्यक्रम का संगठन - प्रशिक्षण आवश्यकताओं एवं उद्देश्यों का निर्धारण हो जाने के पश्चात् अगला चरण प्रशिक्षण कार्यक्रम का संगठन अथवा नियोजन करना होता है। यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण चरण होता है। क्योंकि इसके द्वारा सम्पूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसके अन्तर्गत संगठन का प्रबन्धतन्त्र विचार-विमर्श के द्वारा इन बातों के विषय में निर्णय करता है कि:
    1. किन-किन कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाना है। 
    2. प्रशिक्षण की विषय-वस्तु क्या होगी ।
    3. किन-किन विधियों द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा। 
    4. प्रशिक्षण का समय, अवधि एवं स्थान क्या होगा।
    5. कौन-कौन से व्यक्ति प्रशिक्षक होंगे, आदि।
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