शेरशाह सूरी का जीवन परिचय एवं शासन प्रबन्ध

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प्रारंभिक जीवन- 

शेरशाह सूरी भारत के महान शासकों में एक था । बचपन का नाम फरीद खां था । उसके पिता हसन खां था । वे बिहार प्रान्त में सहसराम के जागीरदार थे । फरीद खां का बचपन सौतेली मां के दबाव में बिता ।

बिहार का शासक- 

सौतेली मां के षड्यंत्रों ने शेरशाह को जागीर छोड़ने को मजबूर कर दिया वह बिहार चला गया । वह सुबेदार का विश्वास पात्र बन गया । 1529 ई. में सुबेदार की मृत्यु हो जाने पर शेरखां उसके पुत्र का सरंक्षक बन कर काम करने लगा । शेरखां संरक्षक के पद पर रहते हुए अपनी शक्ति बढ़ा ली । जलाल खां भी संरक्षण से निकलना चाहता था । परिणाम स्वरूप दोनों में संघर्ष हुआ जलाल खां हार गया तथा शेर खां स्वतंत्र शासक बन गया।

भारत सम्राट- 

शेर खां बिहार का स्वतंत्र शासक बनने के बाद भारत का सम्राट बनने का स्वप्न देखने लगा । बंगाल प्रान्त अपने अधिकार में ले लिया । हुमायूं नाराज होकर उसे सजा देने आगे बढ़े चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में हुमायूं शेर खां से पराजित हुआ शेर खां शेरशाह सूरी के नाम से भारत का सम्राट बन गया ।

सफल, प्रतिभावान, आदर्श, प्रजा हितैषी, न्यायप्रिय सम्राट- 

उसके राजस्व काल आदर्श उच्च कोटि का था । उनकी धारणा थी कि शासक को भोग विलास से दुर रहना चाहिए, राजपद को अमोद प्रमोद का साधन मानना चाहिए । जनकल्याण व प्रजा की सुख समृद्धि के लिए शासक को अथक परिश्रम करना चाहिए । उन्हें अपने कर्तव्यों के पालन के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। ईश्वर के प्रति वह उत्तरदायी माना । शेरशाह सफल प्रतिभावन शासक था । पांच वर्ष की अल्प अवधि में प्रजा में अत्यधिक प्रशंसनीय हुए ।

शेरशाह की विजय यात्रा

सम्राट बनने के बाद शेरशाह ने 1541 ई. में हुमायूं के भाई कामरान को हराया तथा उससे पंजाब छीन लिया । 1542 ई. में मालवा तथा 1543 ई. में रायसेन का किला ले लिया । उसी वर्ष मुलतान तथा सिंध भी उसके अधिकार क्षेत्र में आ गए । चारों ओर से निश्ंिचत होकर उसने राजपूतों को अपना लक्ष्य बनाया । 1544 ई. में उसने मारवाड़ पर चढ़ाई की । राजपूतों ने वीरता के साथ उसका सामना किया ।

इस युद्ध में बड़ी कठिनाई से उसे विजय मिली । इससे चित्तौड़ तथा अजमेर उसके अधिकार में आ गये । अन्त में 1545 ई. में उसने कालिंजर के किले पर आक्रमण किया । किला शेरशाह के अधिकार में आ गया, पर बारूद में आग लगने से शेरशाह बुरी तरह जख्मी हो गया तथा 21 मई 1545 ई. को उसकी मृत्यु हो गई । वह एक विस्तृत साम्राज्य का स्वामी था । हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक तथा बंगाल से लेकर सिंध तक उसका विस्तृत साम्राज्य था ।

शेरशाह का शासन प्रबन्ध

शेरशाह सूरी मध्यकालीन भारत का महान शासक था । उसका राज्यकाल शासन- प्रबन्ध की दृष्टि से भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । यद्यपि उसने कोई मौलिक सुधार तो नहीं किये, परन्तु अपने प्रशासन में पुरानी संस्थाओं को जो नया स्वरूप प्रदान किया तथा उसे लोक कल्याण का साधन बनाया, वह उसकी महान देन है ।

प्रसिद्ध इतिहासकार क्रुक के अनुसार- ‘‘वह पहला मुसलमान शासक था जिसने अपने प्रजा के हित में विचार किया । उसमें यह समझने की क्षमता थी कि सरकार को सर्वप्रिय बनाया जाय, राजा को प्रजा के कल्याण के लिए शासन करना चाहिये । न्याय तथा सहिष्णुता की नीति द्वारा हिन्दुओं को प्रसन्न करना चाहिये, भू-राजस्व न्याय के आधार पर निर्धारित होना चाहिये और देश की भौतिक उन्नति को प्रोत्साहन देना चाहिए ।’’ शेरशाह के शासन प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

केन्द्रीय शासन- 

शरेशाह निरंकुश स्वेच्छाधारी, स्वतंत्र शासक था, उसकी शक्ति एवं सत्ता सर्वोच्च थी । निरंकुश होते हुए भी वह शासन के सभी कार्य जन-कल्याण की भावना से करता था । शासन की सुविधा के लिये उसने सल्तनतकालीन व्यवस्था के आधार पर ही अनेक विभागों की स्थापना की तथा मंत्रियों को इन विभागों का उत्तरदायित्व सौंपा । फिर भी शासन की नीति का निर्धारण एव उसमें किसी पक्रार के परिवर्तन का अधिकार उसके पास सुरक्षित था। शेरशाह ने शासन की सुविधा के लिए केन्द्रीय शासन को पांच भागों में विभाजित कर दिया था-
  1. दीवान-ए-वजारत- इस विभाग का प्रमुख वजीर होता था, जो साम्राज्य के वित्त संबंधी कार्यो की देखभाल करता था । (
  2. दीवान-ए-आरिज- यह सैन्य विभाग का प्रमुख होता था । इसका कार्य सैनिकों की भर्ती, संगठन नियंत्रण एवं उनका वेतन वितरण करना था । 
  3. दीवान-ए-रसातल- यह विदेश मंत्री होता था, जो विदेशों से संबंधित कार्यो को सम्पादित करता था । 
  4. दीवान-ए-इशा- यह शाही घोषणाएं करता था तथा शाही पत्रों का हिसाब रखता था । 
  5. दीवान-ए-कजा- इस विभाग का मंत्री प्रधान काजी होता था, जो न्याय व्यवस्था के दायित्व का निर्वहन करता था । दिवाने-वरीद डाक व गुप्तचर व्यवस्था करता था । इन व्यवस्थाओं के बाद भी शेरशाह स्वयं भी प्रशासनिक व्यवस्था का निरन्तर निरीक्षण करते रहता था । यही उसकी सफलता का रहस्य था ।

प्रान्तीय शासन-

  1. प्रान्त- शेरशाह ने सामा्रज्य को प्रान्तों में विभाजित किया था। प्रान्त को इक्ता कहा जाता था । इसके अधिकारी को हाकिम या फौजदार कहते थे । इक्ता का अधिकारी नागरिक तथा सैनिक दोनों प्रकार के अधिकारों का प्रयोग करता था । 
  2. सरकार या जिला- डॉं. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार, ‘‘शेरशाह ने अपने साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था । प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थे ।’’ दोनों अधिकारी मुख्य शिकदार तथा मुख्य मुन्सिफ कहलाते थे, जो सरकार में शान्ति तथा कानून व्यवस्था बनाये रखते थे । वे सरकार की देख-रेख के साथ चलते-फिरते न्याय करते थे। इसका उद्देश्य त्वरित न्याय प्रदान करना था 
  3. परगना- शेरशाह ने सरकार को शासन व्यवस्था की दृष्टि से परगनों में विभाजित किया प्रत्येग परगने में एक शिकदार तथा एक मुन्सिफ और दो अधिकारी होते थे । इनके अतिरिक्त एक खजांची, दो कारकून तथा एक लेखाकार होता था । खजांची, खजाने का अधिकारी होता था। लेखाकार भूमि तथा भूमिकर के आंकड़े रखता था ।
  4. गांव- प्रत्येक परगने में अनेक गांव होते थे । प्रत्येक गांव में एक ग्राम पचायत होती थी । पंचायत गांव की सुरक्षा, शिक्षा तथा सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी । पंचायत के सहयोग के लिए चौकीदार तथा पटवारी तोते थे ।

आर्थिक व्यवस्था- 

इस काल में भू-राजस्व राज्य की आय का पम्रुख स्त्रोत था । इसलिए शेरशाह ने भूमि सुधार पर विशेष ध्यान दिया । उत्पादन के आधार पर भूमि कर लिया जाता था, पर हमेशा उत्पादन समान नहीं होता था । अतएव कर-व्यवस्था ठीक नहीं थी, शेरशाह ने इस व्यवस्था में सुधार किया । शेरशाह ने कृषि योग्य भूमि को बीघों में नपवाया, इसे ‘टोडरमल’ या ‘जाब्ता’ प्रणाली भी कहते थे । उसने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर किसान तथा सरकार के बीच सीधा संबंध स्थापित किया था । उपज के आधार पर भूमि को तीन भागों में विभक्त किया गया । भूमि का उत्पादन का 1/3 से लेकर 1/4 तक निश्चित किया गया । कर, अनाज या नकद के रूप में लिया जाता था । किसान स्वयं खजाने में लगान जमा करते थे, वसूली सख्ती से की जाती थी । युद्ध के समय किसानों तथा उनके खेतों का ध्यान रखा जाता था । अकाल के समय किसान राजकोष से सहायता पाते थे । भू-कर छोड़कर खम्स, चुगी, जजिया, उपहार तथा सरकारी टकसाल भी आय के स्त्रोत थे । वह गरीबों की अपेक्षा अमीरों से अधिक कर लेने का पक्षपाती था ।

सैन्य व्यवस्था- 

सम्राट बनने के पवूर् शेरशाह के पास काइेर् स्थायी सेना नही थी । जागीरदारों के पास सेनाएं होती थीं । वेस्वाभाविरूक रूप से राजा के प्रति विश्वासपात्र न होकर जागीरदारों के प्रति होते थे । कभी-कभी जागीरदार भी सम्राट के विरोध में उठ खड़े होते थे । उक्त बुराइयों के नाम पर शेरशाह ने अपनी एक स्थायी सेना तैयार की, जिसमें 1,50,000 घुड़सवार, 25,000 पैदल तथा 300 जंगी हाथी तथा तोपखाना होता था । शेरशाह स्वयं अच्छे सैनिकों की भर्ती करता था । ग्वालियर, रायसेन, बयाना, रोहिताष जैसे सामरिक महत्व के स्थलों में शेरशाह ने प्रशिक्षित सैनिकों की टुकड़ी रख छोड़ी थी । सैनिकों को वेतन और पदोन्नति दी जाती थी । घोड़े तथा सैनिकों का परिचय पत्र बनाया गया था । घोड़े को दागने की प्रथा थी, सैनिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था थी । वैसे शेरशाह सबकी सुविधाओं का ध्यान रखता था, पर अनुशासनहीनता पर कठोर दण्ड देता था । सैन्य शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए उसने अनेक छावनियां तथा किले बनवाये थे । उसकी सैन्य व्यवस्था उन्नत, सुधरी हुई तथा उस काल के अनुकूल थी ।

न्याय व्यवस्था- 

शेरशाह एक न्यायप्रिय शासक था । शेरशाह हर बुधवार केा मुकदमें सुनता था। प्रत्येक जिला या सरकार की अदालत को ‘दारूल्ल अदालत’ कहते थे । वह सबके साथ समान व्यवहार करता था । दण्ड की कठोर व्यवस्था थी । छोटे अपराधों के लिए भी वह मृत्युदण्ड देने में हिचकता न था । अपराधमुक्त समाज उसे दण्ड विधान का सिद्धान्त था । सरकारों में छोटे न्यायालय थे । वे अपनी सीमा में न्याय करते थे । ग्राम पंचायत भी ग्राम सीमा में न्याय करती थी । अब्बास खाँ के अनुसार, ‘‘शेरशाह के समय में एक बुढ़ी स्त्री आभूषणों को अपने सिर पर रखकर यात्रा कर सकती थी । कोई चोर या डाकू उसके पास जाने का साहस नहीं कर सकता था । शेरशाह के दण्ड का इतना डर था ।’’ शेरशाह स्वयं अपीलें सुनता था । न्याय विभाग का दूसरा बड़ा अधिकारी काजी था । मुन्सिफ तथा अमीन सरकार तथा परगना के न्याय कार्य की देख-रेख करते थे । फौजदारी मुकदमें मुख्य शिकदार तथा दीवानी मुकदमें मुख्य मुन्सिफ सुना करते थे। पुलिस व्यवस्था- शेरशाह ने पुलिस व्यवस्था में अनके नये सुधार किए । पुलिस विभाग पर शान्ति स्थापना तथा कानून-व्यवस्था का भार था । शिकदार मुख्य पुलिस अधिकारी था ।

धार्मिक नीति- 

शेरशाह कट्टर सुन्नी मुसलमान हाते हुए भी हिन्दूओं एव गैर मुस्लिमों के प्रति उदारता की नीति अपनाए । शासन में धर्मान्धता और कट्टरता की नीति नहीं अपनाई, फिर जी जजिया कर वसूल किया जाता था । हिन्दुओं को योग्यता के आधार पर ऊँचे पदों पर नियुक्त करता था । राजा टोरमल और विक्रमादित्य गौंड उसके बड़े कृपा पात्र थे, गोवध पर प्रतिबन्ध नहीं था । किसी को बलात मुसलमान नहीं बनाया उसके सरकारी कागजातों में फारसी के साथ हिन्दी (देवनागरी) लिपि का उपयोग किया । सिक्कों पर देवनागरी लिपि अंकित करवाय ।

गुप्तचर विभाग- 

शेरशाह के गुप्तचर देश के चारों आरे फैले थे । गुप्तचर राज्य की व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे । सरकारी कर्मचारियों के कार्यो पर निगरानी रखते थे । भ्रष्ट कर्मचारियों पर नियंत्रण रखते थे व सूचनाएं सम्राट तक पहुंचाया । इससे षडयंत्र की संभावना कम रहती थी ।

जनहित के कार्य-

व्यापार- 

शरेशाह ने व्यापार को विकसित करने के लिए सड़कें बनवाई तथा लेन-देन की सुविधा के लिए सिक्कों का प्रचलन किया था । व्यापारी सिर्फ दो प्रकार के कर देते थे -
  1. माल का राज्य की सीमा में आने पर कर तथा 
  2. बिक्री कर व्यापारियों को अनेक सुविधाएं प्राप्त थीं । 
अधिकारियों को भी उनके साथ ठीक व्यवहार करने के निर्देश थे । मानक भार तथा मापों का प्रचलन था ताकि लेन-देन में बेईमानी के कम अवसर रहें ।

सड़क़ें- 

व्यापार की उन्नति तथा आवागमन की सुविधा के लिए शेरशाह ने निम्न प्रमुख सड़कों का निर्माण कराया था -
  1. ग्रांड ट्रंक रोड- यह सड़क दिल्ली, आगरा से बंगाल के सुनार गावं तक जाती थी । 
  2. आगरा-बुरहानपुुर- यह सड़क आगरा से बुरहानपरु तक जाती थी । 
  3. आगरा-चित्तौड-जोधपुुर- यह सड़क आगरा से जोधपुर तक जाती थी । 
  4. लाहौर-मुलतान- यह सडक़ लाहारै से मुलतान तक जाती थी । 
  5. वाराणसी से मुंगेर तक- सड़क परिवहन के लिए शेरशाह ने ही बनवाया था । 
सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगाए गए थे । दो-दो कोस की दूरी पर सरायें बनी हुई थीं । सरायों में हिन्दू व मुसलमान के लिए भोजन की व्यवस्था थी । इन सड़कों के बन जाने से व्यापार की बड़ी उन्नति हुई । सैनिक सुविधा भी मिली । सेना सड़कों के माध्यम से बहुत कम समय मे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकती थी । प्रशासन को नियंित्रत करने में भी सड़कों की उपयोगिता अपना महत्व रखती थी ।

मुद्रा व्यवस्था मे सुधार- 

शेरशाह का मुद्रा सुधार उसकी शासन व्यवस्था की उत्तमता का प्रमाण थी । इसमें उसने अनेक सुधार कर समस्त देश के लिए एक-सी मुद्रा प्रणाली प्रचलित की । उसने स्वर्ण मुदा्र ‘अशफीर्’ तथा चादी का सिक्का ‘दाम’ चलाया, इससे अतिरिक्त ताबे के छोटे सिक्के भी चलाये । मुद्राओं पर उसने अपना नाम, पद, टकसाल का नाम अंकित करायें। उसके इन सुधारों से व्यापार की खूब उन्नति हुई तथा सभी वर्गो को लाभ मिला । इस मुद्रा प्रणाली के आगे के शासकों ने भी चलाया । इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है कि ‘‘शेरशाह की मुद्रा प्रणाली ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली की आधारशिला थी ।’’

डाक- 

शेरशाह  ने डाक भजे ने की उत्तम व्यवस्था की थी । सरायें डाक चौकी का काम करती थीं । डाक चौकी में दो घुडसवार होते थे जो डाक को एक चौकी से दूसरी चौकी तक पहुंचाया करते थे । डाक व्यवस्था चुस्त थी तथा उसके द्वारा केन्द्र का दूर प्रदेशों पर नियंत्रण रहता था ।

दान- 

शरे शाह सदैव प्रजाहित में लगा रहता था । उसने विद्यार्थियों के लिए मकतब तथा मदरसे खोल रखे थे । विद्याथ्री तथा अध्यापकों को वृत्तियां दी जाती थीं । अनाथ तथा गरीबों के लिए मुफ्त भोजन हेतु लंगर खोले गए थे । इस कार्य के लिए राजकोष में 80,000 अशर्फियां दी जाती थी ।

6. भवन निर्माण- 

शेरशाह को भवन निर्माण का बड़ा शौक था । उसका सहसराम का मकबरा अत्यन्त प्रसिद्ध है । यमुना के किनारे उसका किला भी महत्वपूर्ण है, जो पुराना किला के नाम से प्रसिद्ध है ।

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