उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की विशेषताएं

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उपभोक्ता संरक्षण अर्थात् ‘‘उपभोक्ता के हितो का संरक्षण आधुनिक युग में स्पर्धा के कारण भिन्न-भिन्न वस्तुये भिन्न-भिन्न प्रकृति, गुणवत्ता व मूल्य पर बेची जाने के कारण उपभोक्ता को कई समस्याओं का सामना करना पडता है। उपभोक्ता को उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करना पड़ता है। जो उत्पादन कर्ता द्वारा बेची जाती है। इस प्रकार उपभोक्ता का शोषण होता है अपने अधिकारों से वंचित हो जाता है।

‘‘अत: उपभोक्ता को उसके उपभोक्ता संबंधी अधिकारों एवं कर्तव्यों को अवगत करा कर शोषण एवं धोखाधड़ी से बचाना ही उपभोक्ता संरक्षण कहलाता है।’’

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 

उपभोक्ता के हितो के संरक्षण के लिये सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। 15 अप्रैल सन् 1987 मे इसे जम्मू-कश्मीर राज्य को छोडकर सभी राज्यों में क्रियान्वित किया गया। अत: उपभोक्ताओं कें हितो के संरक्षण के लिये बनाया गया अधिनियम ही उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम कहलाता है।

इस अधिनियम के अन्र्तगत कुल 31 धारायें है प्रत्येक धारा में उपभोक्ता संरक्षण संबंधी अलग-अलग नियम है। यह अधिनियम उपभोक्ता को यह एहसास कराता है कि जिस प्रकार उत्पादक अपनी वस्तुएँ एंव सेवाएँ प्रदान करने में स्वतत्रं है। वह अपनी इच्छानुसार वस्तु का मूल्य निर्धारित कर सकता है तो उपभोक्ता भी उन वस्तुओं को उन मूल्यों पर न खरीदने के लिये स्वतंत्र है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की विशेषताएँ

  1. यह अधिनियम वस्तुओं एवं सेवाओं (बिजली, यातायात, टेलीफोन) दोनो पर लागू होता है। 
  2. इस अधिनियम के तहत उपभोक्ता मंच बनाये गये है। जो कि न्यायिक कल्प तंत्र के द्वारा कार्य करते है जिला, राष्ट्र, राष्ट्र स्तर पर कार्यरत मंच क्रमश: जिला, राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग होता है। जिसकी अध्यक्षता क्रमश: जिलाधीश, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश एवं उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश करता है। 
  3. इस अधिनियम उपभोक्ता द्वारा दर्ज शिकायतो का शीघ्र निवारण किया जाता है। 
  4. इसके अन्र्तगत उपभोक्ता के अधिकारों को उजागर किया गया है। इसमें शिकायत दर्ज करने पर उपभोक्ता को न्यायालय में कोर्ट फीस नही देनी पड़ती। इसके अन्तर्गत उपभोक्ता को थोडे समय में ही क्षतिपूर्ति हो जाती है। 

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