उपभोक्ता शिक्षा क्या है?

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उपभोक्ता शिक्षा सामान्य शिक्षा की वह शाखा है, जो किसी वस्तु, माल या सेवा
का उपभोग करने वाले व्यक्ति को ऐसी वस्तु, माल या सेवा के संबंध में दी जाती है। दूसरे
शब्दों में, उपभोक्ता वर्ग को उसके अधिकारों एवं कर्तव्यों से अवगत कराना ही उपभोक्ता
शिक्षा है। उपभोक्ता शिक्षा में निम्नलिखित के बारे में जानकारी या ज्ञान सम्मिलित किया
जाता है-

  1. बाजार में उपलब्ध वस्तुओं के गुण 
  2. मोल-भाव की शक्ति या अनुबन्ध
    शक्ति। 
  3. आय के अनुसार उपभोक्ता वस्तुओं का चयन। 
  4. हानिकारक वस्तुओं के
    बारे में चेतावनी। 
  5. उपभोक्ताओं के संगठन। 
  6. उपभोक्ता संरक्षण कानून के प्रावधान
    जेसे माल के क्रय-विक्रय में धोखाधड़ी, बेर्इमानी, उपभोग से हुर्इ हानि की पूर्ति के संबंध में कानूनी कार्यवाही आदि।

उपभोक्ता शिक्षा की आवश्यकता या महत्व

वर्तमान युग व्यावसायिक जटिलताओं का युग है। जिसमें नित नए तकनीकी
परिवर्तन होते रहते हैं। उपभोक्ता की प्रभुता सीमित होती जा रही है। विकसित तथा प्रगत
देशों की तुलना में अविकसित तथा पिछड़े देशों में उपभोक्ता की प्रभुता अधिक सीमित
तथा सीमाबद्ध होती है। श्रीमति बारबरा वूटन ने ठीक ही कहा है कि उसके समक्ष वस्तुओं
की इतनी विभिन्नताएॅं रखी जाती हैं कि वह किंकर्तव्य-विमूढ़ बनकर ही रह जाता है तथा
विवेकपूर्ण चयन नहीं कर पाता। विवेक चयन करने के लिए उसके पास न्यूनतम तकनीकी
जानकारी का अभाव होता है। जब तक उपभोक्ता को भली-भॉंति शिक्षित नहीं किया
जाता, तब तक वह शोषण का शिकार होता रहेगा। यह बात भारत जैसे देश के लिए
अधिक लागू होती है। उपभोक्ता शिक्षा की आवश्यकता या महत्व निम्नलिखित बातों द्वारा
स्पष्ट हो जाता है-

  1. सही वस्तु खरीदने की क्षमता का विकास होना – उपभोक्ता शिक्षा से सही
    वस्तुओं या सेवाओं को खरीदने की क्षमता का विकास होता है।
  2. हानिकारक वस्तुओं के उपभोग पर रोक – उपभोक्ता शिक्षा से उपभोक्ताओं को
    यह ज्ञात हो जाता है कि कौनसी वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और कौनसी वस्तु
    जीवन-स्तर में सुधार करने मे भी सहायक होती है। कौन सी वस्तु किस उद्देश्य केक
    लिए और किस उपयोग के लिए सर्वाधिक उपयोगी होगी, यह जानकारी उपभोक्ता शिक्षा
    के माध्यम से हो जाती है।

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