वाकाटक राजवंश का इतिहास

अनुक्रम
तीसरी शताब्दी ई0 के मध्य से छठीं शताब्दी ई0 के आरम्भ तक दकन एवं मध्य भारत पर शासन करने वाले वाकाटक राजवंश की गणना प्राचीन भारत के अत्यन्त शक्तिशाली साम्राज्यों में की जाती है। वाकाटकों के इतिहास का ज्ञान मुख्य रूप से उनके अभिलेखों के माध्यम से होता है। सन् 1836 ई0 में प्रवरसेन द्वितीय के सिवनी ताम्रपत्र की प्राप्ति से पहली बार इस वंश का नाम ज्ञात हुआ। तत्पश्चात सन् 1912 ई0 में पूने के एक कसेरे के घर से प्रभावतीगुप्ता का पूना ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। वाकाटकों के इतिहास में इस ताम्रपत्र को विशेष महत्व प्राप्त है। इस ताम्रपत्र की प्राप्ति से ही यह ज्ञात हो पाया कि वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय की अग्रमहिशी तथा युवराज दिवाकरसेन की माता प्रभावतीगुप्ता गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थी। 

वाकाटकों के मूलस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। के0 पी0 जायसवाल का मानना था कि ‘वाकाटक’ सम्भवत: ‘वकाट’ अथवा ‘वाकाट’ से उत्पन्न हुआ है। झाँसी जिले में स्थित चिरगांव के पूर्व में भूतपूर्व ओरछा राज्य में ‘बागाट’ नामक ग्राम को उन्होंने वाकाटकों के मूलस्थान ‘वाकाट’ से समीकृत किया है। अमरावती से तृतीय शताब्दी ई0 के मध्य का एक अभिलेख मिला है। इस अभिलेख में वाकाटक नामक एक गृहस्थ का उल्लेख है, ‘...........गामे वाथवस गह-पतिस वाकाटकस’ जिसने अपनी दो पत्नियों के साथ वहाँ पर दान दिया एवं उसे लेखबद्ध कराया। अमरावती आन्ध्र प्रदेश के गुण्टूर जिले में स्थित है। इस अभिलेख में वाकाटक नामक गृहपति के उल्लेख के आधार पर अल्तेकर एवं मिरासी ने वाकाटकों का मूलस्थान दक्षिण भारत माना है। परन्तु पौराणिक साक्ष्यों के माध्यम से ज्ञात होता है कि उनकी शक्ति का मूलकेन्द्र मध्य प्रदेश का विन्ध्य क्षेत्र था। इस वंश के संस्थापक विन्ध्यशक्ति के नाम से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके प्रारम्भिक प्रयत्नों का केन्द्र विन्ध्य क्षेत्र ही रहा होगा। पॉर्जिटर के अनुसार पुराणों में विदिशा के राजाओं में विन्ध्यशक्ति एवं उसके पुत्र प्रवीर (प्रवरसेन प्रथम) का उल्लेख आया है। परन्तु अजयमित्र शास्त्री का मानना है कि पुराणों के इस अंष ‘नृपान वैदेषिकान्’ को मात्र विदिषा पर शासन करने वाले राजाओं के अर्थ में नहीं लेना चाहिए। उनके मतानुसार पुराणों में इस अंष के अन्तर्गत जिन राजाओं का उल्लेख हुआ है, व े सभी विदिशा के शासक नहीं थे। अत: पुराणों के ‘नृपान वैदेषिकान्’ इस भाव को ‘विदिशा के राजाओं के स्थान पर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर शासन करने वाले राजाओं के अर्थ में लेना अधिक तर्कसगंत लगता है।

विन्ध्य क्षेत्र में अपने राजनीतिक जीवन का आरम्भ करने के पश्चात कालान्तर में साम्राज्य विस्तार की होड़ में उन्होंने े दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। क्योंकि उस समय उत्तर भारत में गुप्तों और नागों का प्रभाव था। अत: साम्राज्यिक गुप्तों और नागों की उभरती हुई शक्ति के सामने उनका उत्तर भारत में राज्य स्थापित कर पाना असम्भव था। जबकि दकन में उस समय ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति का उदय अभी तक नहीं हुआ था। दकन में सातवाहनों के पतन के पश्चात जिन राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ, उनमें इतनी योग्यता नहीं थी कि वे साम्राज्य के उत्तरदायित्व का वहन कर सकें। इनमें विदर्भ में मुण्ड शासकों ने, महाराष्ट्र में ईष्वरदत्त ने, आन्ध्र प्रदेश में इच्छवाकुओं ने, मैसरू में चुटु सातकर्णियों ने, उत्तरी कोकंण में आभीरों ने अपना राज्य स्थापित कर लिया था।

परन्तु इनमें से किसी में भी इतनी शक्ति नहीं थी कि वे दकन में अपना एकछत्र शासन स्थापित कर पाते। कुछ समय तक पश्चिमी क्षेत्रों ने भी सातवाहनों को हराने के पश्चात दकन पर अपना अधिकार कर लिया था। परन्तु तीसरी शताब्दी ई0 के उत्तरार्द्ध तक उनमें इतनी शक्ति “ोश नहीं रह गई थी कि वे दक्षिण भारत की राजनीति में अपना प्रभुत्व कायम रख पाते। अत: वाकाटक राजवंश के लिए दकन की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ एक शक्तिशाली राजवंश स्थापित करने के सर्वथा अनुकूल थीं और इसी राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर उन्होंने दकन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर उसे अपनी सैनिक गतिविधियों का केन्द्र बनाया। 

उनका वंश-क्रम इस प्रकार से है-
  1. विन्ध्यशक्ति प्रथम (250-275 ई0)
  2. प्रवीर अथवा प्रवरसेन प्रथम (275-335 ई0) 
  3. गौतमीपुत्र 
  4. सर्वसेन प्रथम (325-355 ई0) 
  5. रुद्रसेन प्रथम (335-355 ई0) 
  6. विन्ध्यसेन अथवा विन्ध्यशक्ति द्वितीय (355-400 ई0) 
  7. पृथिवीशेण प्रथम (355-385 ई0) 
  8. प्रवरसेन द्वितीय (400-425 ई0) 
  9. रुद्रसेन द्वितीय (385-395 ई0) 
  10. सर्वसेन द्वितीय (425-455 ई0) 
  11. दिवाकर सेन (395-410 ई0)
  12. दामोदर सेन (410-420 ई0)
  13. प्रवरसेन द्वितीय (420-455 ई0) 
  14. देवसेन (455-480 ई0) 
  15. नरेन्द्रसेन (455-480 ई0) 
  16. हरिशेण (480-510 ई0) 
  17. पृथिवीशेण द्वितीय (480-500/505 ई0)

विन्ध्यशक्ति

वाकाटक वंश के संस्थापक के रूप में विन्ध्यशक्ति का नाम पुराणों में मिलता है। अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख में उसे ‘वाकाटकवंशकेतु:’ कहा गया है। चूंकि इस लेख में उसके लिए किसी राजनीतिक उपाधि का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके आधार पर अल्तेकर का मानना था कि सम्भवत: वह आजीवन एक सेनापति रहा और उसने अपना औपचारिक राज्याभिषेक भी नहीं कराया था।

किन्तु अजन्ता का यह लेख पद्यबद्ध है और सम्भवत: इसी कारण से उसमें मात्र विन्ध्यशक्ति  के लिए हीं नहीं अपितु उसके वंशजों के लिए भी राजकीय उपाधि का प्रयोग नहीं किया गया है। यह सम्भावना इसलिए भी व्यक्त की गयी थी क्योंकि अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख के अतिरिक्त उसके विषय में जानने के लिए अन्य कोई अभिलेखक स्रोत उपलब्ध नहीं थे। परन्तु कालान्तर में देवसेन के बीदर ताम्रपत्र एवं उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी हरिशेण के थाल्नेर ताम्रपत्र की प्राप्ति के साथ ही कुछ नये तथ्य प्रकाश में आए हैं। इन दोनों ही लेखों में विन्ध्यशक्ति को वाकाटकों का ‘प्रथम धर्ममहाराज’ कहा गया है। इस आधार पर अजयमित्र शास्त्री मानते हैं कि उसने अपना औपचारिक राज्याभिषेक कराया था एवं राजकीय उपाधि भी ग्रहण की थी।

अल्तेकर का मानना है कि उसका वास्तविक नाम कुछ और था एवं अपनी सैनिक गतिविधियों से विन्ध्याचल तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर उसने ‘विन्ध्यशक्ति ’ विरुद धारण किया था। प्रारम्भ में उसका राज्य विदर्भ (बरार) के एक भाग तक ही सीमित रहा होगा। कालान्तर में अपने सैनिक अभियानों से उत्तर दिषा की ओर अपने राज्य का विस्तार करते हुए उसने बैतूल, इटारसी और होषंगाबाद के जिलों को अपने राज्य में मिला लिया होगा। किन्तु मिरासी पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर यह मानते हैं कि विन्ध्य के क्षेत्रों तक उसका विस्तार उसके राज्यकाल में नहीं अपितु उसके पुत्र प्रवरसेन प्रथम के काल में हुआ था।

इसके अतिरिक्त पुराणों में प्रवरसेन प्रथम के लिए पुरिका एवं चनका नामक दो राजधानियों का उल्लेख किया गया है। चनका को सम्भवत: प्राचीन राजधानी मानते हुए उसे विन्ध्यशक्ति  के साथ सम्बन्धित किया जाता है। उनका मानना है कि विन्ध्यशक्ति चनका से ही निरन्तर शासन करता रहा होगा। इस चनका की पहचान उन्होंने आन्ध्र प्रदेश के मध्य भाग में स्थित किसी स्थान से की है। अल्तके र एवं मिरासी ये दोनों ही विद्वान वाकाटकों की दक्षिण भारतीय उत्पत्ति के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि वाकाटकों ने प्रारम्भ में विदर्भ पर अपना अधिकार स्थापित किया होगा और कालान्तर में उन्होंने उसके उत्तर की आरे अपने राज्य विस्तार के लिए सैनिक गतिविधियाँ आरम्भ की होंगी। परन्तु अजयमित्र शास्त्री का मानना है कि विन्ध्यशक्ति  का मूलस्थान मध्यप्रदेश के विन्ध्यक्षेत्र में था। अत: वाकाटकों का प्रारम्भिक अधिकार विन्ध्य के कुछ क्षेत्रों पर था एवं इसके उपरान्त ही उन्होंने दक्षिण दिषा की ओर अपना प्रभाव स्थापित किया होगा। चूंकि विन्ध्यशक्ति के विषय में हमारा ज्ञान बहुत ही सीमित है। अत: वर्तमान साक्ष्यों के आधार पर उसके विषय में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता।

अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख में उसे ‘द्विज’ कहा गया है। वाकाटकों के अन्य ताम्रपत्रों से भी उनके ‘विश्णुवृद्ध गोत्र‘ के विशय में ज्ञात होता है। अजन्ता के लेख में विन्ध्यशक्ति के विशय में कहा गया है कि वह पुण्य के कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहता था। इससे ऐसा लगता है कि निरन्तर सैनिक गतिविधियों में सम्मिलित रहने के बावजूद भी उसने अपने ब्राह्मणत्व के गुणों का परित्याग नहीं किया था। पुराणों में विन्ध्यशक्ति के साथ 96 वर्ष (समा: शण्णवतिं भ्ूात्वा पृथिवीं तु समेश्यति) का उल्लेख किया गया है। इससे ऐसा लगता है कि उसने दीर्घकालीन जीवन प्राप्त किया था। सम्भवत: उसने 250-275 ई0 अर्थात् पच्चीस वर्षों तक शासन किया था।

प्रवरसेन प्रथम

विन्ध्यशक्ति का उत्तराधिकारी उसका पुत्र प्रवरसेन प्रथम हुआ, जिसे पुराणों में प्रवीर कहा गया है। पुराणों से ज्ञात होता है कि उसने 60 वर्षों (भोक्ष्यते च समा: शश्टिं पुरीं कांचनकां च) तक शासन किया था। आभिलेखिक साक्ष्यों से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने लगभग 275 से 335 ई0 तक शासन किया था। इस दीर्घ शासनकाल में उसके कार्यों का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है। परन्तु निष्चित रूप से वह अपने पिता विन्ध्यशक्ति से अधिक महत्वाकांक्षी एवं साधनसम्पन्न शासक था। सम्भवत: इसी कारण से अधिकांश वाकाटक ताम्रपत्रों में वंशावली प्रवरसेन प्रथम से आरम्भ की गयी है। वत्सगुल्म शाखा के मात्र तीन अभिलेख (देवसेन का बीदर ताम्रपत्र, हरिशेण का थाल्नेर ताम्रपत्र एवं अजन्ता की सोलहवीं गुहा का लेख) ऐसे हैं जिनमें वाकाटकों का वंशावली-वर्णन विन्ध्यशक्ति से आरम्भ किया गया है। स्पष्ट रूप से उसने अपने पिता से कहीं अधिक सफलता अर्जित की थी। उसके शासनकाल में उत्तर भारत में गुप्तों और नागों का वर्चस्व स्थापित था। अत: एसे ी स्थिति में उत्तर भारत में उसका साम्राज्य-विस्तार कर पाना नितान्त कठिन कार्य था और इसी कारणवश उसने नर्मदा के दक्षिण (विदर्भ) में अपने राजवंष की नींव डाली।

प्रवरसेन प्रथम वैदिक धर्म का महान आश्रयदाता था। पुराणों एवं अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने अनेक श्रौत यज्ञ किये थे। इसके अतिरिक्त उसने चार अश्वमेध यज्ञ भी किये थे। अत: हम कह सकते हैं कि सम्भवत: अपने शासनकाल में उसने कुछ सफल सैनिक अभियान किये होंगे और प्रत्येक अभियान की समाप्ति पर एक अश्वमेध यज्ञ किया होगा। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने सप्तसोम यज्ञ भी कराये थे। इनमें अग्निश्टोम, अत्यग्निश्टोम, उक्थ्य, शोडषी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम के नाम उल्लेखनीय हैं। वाजपेय यज्ञ करने के पश्चात ही उसने ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की थी। वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा के कुछ ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि उसने ‘धर्ममहाराज’ की उपाधि भी ग्रहण की थी। परन्तु यह उपाधि उसके दक्षिणी प्रभाव की सूचक मात्र है।

पुराणों और ताम्रपत्रों के लेखकों ने उसके द्वारा किये गये वैदिक यज्ञों का उल्लेख करने में ही अपनी रुचि प्रदर्शित की है। किन्तु ये स्रोत उसकी उन महत्त्वपूर्ण विजयों के विषय में मौन हैं जिनके कारण उसने ‘सम्राट’ की उपाधि ग्रहण की थी। यद्यपि पुराणों एवं आभिलेखिक साक्ष्यों से उसकी महत्त्वपूर्ण  उपलब्धियों का ब्यौरा नहीं मिलता। तथापि कुछ इतिहासकारों ने उसके दीर्घजीवन की मुख्य घटनाओं के विषय में अपना अनुमान प्रस्तुत किया है।

वाकाटक शासकों में एकमात्र उसी ने ‘सम्राट’ की उपाधि ग्रहण की थी। जिसके आधार पर कुछ विद्वानों का यह मानना है कि वाकाटक साम्राज्य के ऐसे प्रदेश जिनके विषय में यह निश्चित रूप से ज्ञात है कि उन्हें बाद के राजाओं ने जीता था, उन्हें छोडक़ र “ोश अधिकांश प्रदेश प्रवरसेन प्रथम के द्वारा ही विजित किये गये होंगे। ‘श्रीषैल-स्थल-माहात्म्य’ में वर्णित एक प्रकरण में कहा गया है कि राजा चन्द्रगुप्त की कन्या चन्द्रावती श्रीषैल के मल्लिकार्जुनदेव को प्रतिदिन चमेली की एक माला चढ़ाया करती थी। इस चन्द्रावती की पहचान गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री एवं वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय की अग्रमहिशी प्रभावतीगुप्ता से की गयी है। इस प्रकरण के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि यह तीर्थ वाकाटकों के राज्यक्षेत्र में रहा होगा। इसके साथ ही यह भी माना गया कि कर्नूल जिले तक का सारा प्रदेश भी वाकाटकों के राज्य में नहीं तो कम से कम उनके प्रभाव-क्षेत्र में अवश्य रहा होगा। परन्तु अजयमित्र शास्त्री इस सम्भावना पर सन्देह व्यक्त करते हैं। विशेषकर श्रीषैल तीर्थ के सन्दर्भ में उनका मानना है कि श्रीषैल तीर्थ में मल्लिकार्जुन शिव की उपासना की जाती है जबकि हम भली प्रकार से यह जानते हैं कि गुप्त शासकों के समान ही प्रभावतीगुप्ता भी वैष्णव धर्म को मानती थी। अत: पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

पुराणों एवं अभिलेखों में जिस प्रकार से उसके यज्ञों का वर्णन किया गया है। उस आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि उसने भौगोलिक रूप से निकट होने के कारण गुजरात और काठियावाड़ पर भी अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया होगा। इस समय गुजरात और काठियावाड़ में चश्टन राजवंश का अन्त हो चुका था। इस राजवंश के अन्तिम शासक भतृदामन को अपदस्थ कर रुद्रसिंह द्वितीय ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और शासक बन बैठा। रुद्रसिंहं द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र यषोदामन द्वितीय गद्दी पर बैठा। इन दोनों ने ही अपने पवूर्वर्ती राजाओं की भाँति ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि धारण नहीं की। अपितु मात्र ‘क्षत्रप’ की छोटी उपाधि से ही सन्तुश्ट रहे।

ऐसा माना जाता था कि यह उपाधि सामन्त अथवा अधीनता की सूचक है। अत: इस आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि प्रवरसेन प्रथम ने शासक राजा भतृदामन के स्थान पर रुद्रसिंह द्वितीय की राज्य हड़पने में सहायता की होगी। इसके पीछे उसकी साम्राज्यवादी नीति काम कर रही थी। इस विशेष सहायता के बदले उसने रुद्रसिंह द्वितीय को वाकाटकों का प्रभुत्व मानने के लिए अनुबन्धित किया होगा एवं इसके साथ ही उसने समय-समय पर उनसे कुछ मुद्राएँ भी प्राप्त की होंगी। जिसकी पुष्टि मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में सोनपुर नामक स्थान से प्राप्त शक शासकों की मुद्रानिधि से की गई है। परन्तु इसके विपरीत कुछ विद्वान ऐसा मानते हैं कि चश्टन राज्य का अन्त प्रवरसेन प्रथम की साम्राज्यवादी नीति के कारण नहीं अपितु सासानी आधिपत्य के कारण हुआ था। सासानी शासकों ने इस समय सिन्ध पर अधिकार कर लिया था और सम्भवत: उनके प्रभावस्वरूप ही रुद्रसिंह द्वितीय एवं उसके पुत्र यषोदामन द्वितीय ने ‘महाक्षत्रप’ उपाधि के स्थान पर उनकी अधीनतासूचक ‘क्षत्रप’ उपाधि ही धारण की।

यद्यपि प्रवरसेन प्रथम के पूर्व विन्ध्यशक्ति के राज्य में नर्मदा के उत्तर का विन्ध्यक्षेत्र ही सम्मिलित था, चूंकि अन्य काइेर् साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर यह माना जा सके कि उसका अधिकार इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों पर भी था। तथापि यह माना गया कि प्रवरसेन प्रथम ने पजंब के कुशाणों को खदेड़कर अफगानिस्तान तक पहुंचा दिया था। परन्तु यह एक निराधार कल्पनामात्र है। हम जानते हैं कि प्रवरसेन प्रथम ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण विन्ध्य क्षेत्र के दक्षिण में साम्राज्य विस्तार करने का प्रयास किया था एवं विदर्भ और सम्भवत: उसके आस-पास के क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया था।

पुराणों से ज्ञात होता है कि प्रवरसेन प्रथम के चार पुत्र थे और ये चारों पुत्र ही आगे चलकर राजा हुए- ‘तस्य पुत्रास्तु चत्वारो भविश्यन्ति नराधिपा:’। ऐसा अनुमान है कि इन पुत्रों ने ही प्रवरसेन प्रथम की ओर से कुछ प्रदेषों पर विजय प्राप्त की हो और उसके बदले में इन्हें भिन्न-भिन्न प्रान्तों का उपराजा नियुक्त किया गया हो। माना जाता है कि प्रवरसेन प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसका साम्राज्य चार भागों में विभक्त हो गया। प्रवरसेन का गौतमीपुत्र नामक एक पुत्र था जिसकी मृत्यु उसके पिता के काल में ही हो गयी थी और उसके स्थान पर प्रवरसेन का पौत्र रुद्रसेन प्रथम वाकाटक शासन का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। वाषीम ताम्रपत्र की प्राप्ति से उसके एक अन्य पुत्र सर्वसेन का नाम भी ज्ञात होता है, जो वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा का सस्ंथापक था। उसके अन्य दो पुत्रों के विषय में कुछ ज्ञात नहीं है और न ही इस बात के प्रमाण हैं कि उनका राज्य कहाँ था।

भारषिव राजा भागदत्त का एक प्रारम्भिक अभिलेख महाराश्ट्र के भण्डारा जिले के पौनी नामक स्थल से प्राप्त हुआ है। जिसके आधार पर ऐसा माना जाता है कि भारषिव नागों का मूलस्थान महाराष्ट्र का विदर्भ क्षत्रे था। कालान्तर में सम्भवत: साम्राज्य-विस्तार करते हुए उन्होंने उत्तर भारत में अपना राज्य स्थापित किया। भारषिव राजा भवनाग के ताँबे के सिक्के भी मध्य प्रदेश के पद्मावती से प्राप्त हुए हैं। वाकाटकों के ताम्रपत्रों के वर्णन से ज्ञात होता है कि भारषिव राजवंश षिवोपासक था। उनके विषय में कहा गया है कि वे अपने कन्धे पर सदैव शिवलिंग धारण करते थे जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें राजपद प्रदान किया था। उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे एवं अपने पराक्रम से भागीरथी का पवित्र जल लाकर अपना मूर्धाभिशेक कराया था। इस वर्णन से यह प्रतीत होता है कि भारषिव राजवंश मध्य भारत का शक्तिशाली राज्य था। वाकाटकों के ताम्रपत्रों में भी इनका वर्णन विस्तार से किया गया है। प्रवरसेन प्रथम ने अपने पुत्र गौतमी पुत्र का विवाह भारषिव राजा भवनाग की पुत्री से किया था। निश्चित रूप से इस वैवाहिक सम्बन्ध के द्वारा वाकाटकों को उत्तर भारत के नाग राजाओं का सरं क्षण प्राप्त हुआ होगा जिससे उनकी राजसत्ता को दृढ़ता एवं स्थायित्व की प्राप्ति हुई होगी।

रुद्रसेन प्रथम

वाकाटक अभिलेखों में प्राप्त वष्ंवली-वर्णन के अनुसार गौतमीपुत्र प्रवरसेन प्रथम का पुत्र था। किन्तु उसके नाम के साथ किसी उपाधि का प्रयोग नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट है कि वह कभी राजा नहीं बना था। उसकी मृत्यु अपने पिता के जीवनकाल में ही युवराज रूप में हुई थी। अत: प्रवरसेन प्रथम के पश्चात लगभग 335 ई0 में उसका पौत्र रुद्रसेन प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ।

वाकाटक अभिलेखों में रुद्रसेन प्रथम को ‘भवनाग-दौहित्र‘ कहा गया है। उसके नाना भवनाग का वाकाटक अभिलेखों में इस प्रकार के वर्णन से एसे ा प्रतीत होता है कि या तो रुद्रसेन प्रथम भवनाग के राज्य का उत्तराधिकारी था अथवा यह भी हो सकता है कि रुद्रसने प्रथम के काल में वाकाटकों पर किसी प्रकार की कोई विपत्ति आयी हो, जिसमें उसकी सहायता उसके नाना भवनाग ने की हो। भारषिव राजा भवनाग पद्मावती के नागवंष का राजा था। भवनाग के पश्चात उसका उत्तराधिकारी गणपतिनाग हुआ था। इससे स्पष्ट है कि रुद्रसेन प्रथम भवनाग का उत्तराधिकारी तो नहीं था परन्तु सम्भव है कि उसने अपने नाती रुद्रसेन प्रथम की सकंट के समय सहायता की हो। वाकाटक अभिलेखों में उसके किसी शत्रु या सघ्ंर्श के विषय में ज्ञात नहीं है। हो सकता है कि ये शत्रु स्वयं उसके सम्बन्धीजन (चाचा) रहे हों जिन्होंने उसे मुख्य शाखा से हटाने का प्रयास किया हो। किन्तु वर्तमान स्थिति में इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है।

रुद्रसेन प्रथम महाभैरव का उपासक था जो कि षिव का ही रौद्र रूप है। ऐसा माना जाता है कि उसने अपने नाना के प्रभाव में आकर शैवधर्म अपना लिया था। चंद्रपुर जिले के देवटेक नामक ग्राम से रुद्रसेन प्रथम का एक अभिलेख मिला है। इस लेख का उद्देश्य यह बताना था कि उस स्थान पर रुद्रसेन प्रथम का धर्मस्थान था। जिसका अर्थ सामान्य रूप से देवालय से लगाया जाता है। परन्तु हम जानते हैं कि प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्मस्थान शब्द का प्रयोग न्याय करने के स्थान के अर्थ में लिया गया है। सम्भव है यहाँ भी इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में लिया गया होगा। रुद्रसेन प्रथम गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का समकालीन था। उस समय उत्तर भारत की स्थिति उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी।

प्रयाग-प्रशस्ति से ज्ञात होता है इस समय समुद्रगुप्त अपने विजय-अभियान पर था। उसने उत्तर भारत के अनेक राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त (उत्तर भारत) के जिन राजाओं का मूलोच्छदे किया था, उसमें रुद्रदेव नामक एक राजा का का उल्लेख है। कुछ विद्वानों का मानना है कि समुद्रगुप्त द्वारा पराजित यह रुद्रदेव वाकाटक राजा रुद्रसेन प्रथम के अतिरिक्त और कोई नहीं था। यह सत्य है कि मध्य प्रदेश का विन्ध्य क्षेत्र रुद्रसेन प्रथम के राज्य का एक भाग था। परन्तु उसका मुख्य राज्य नर्मदा के दक्षिण में स्थित दकन क्षेत्र पर था। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि समुद्रगुप्त द्वारा उच्छिन्न रुद्रदेव उत्तर भारत का राजा था जबकि वाकाटक राजा रुद्रसेन प्रथम का शासन दकन पर था। अत: मात्र मिलते-जुलते नामों के आधार पर हम दोनों को एक ही व्यक्ति नहीं मान सकते।

प्रवरसेन प्रथम के पश्चात वाकाटक साम्राज्य का उसके चार पुत्रों के मध्य विभाजन वाकाटक साम्राज्य की स्थिति को पहले से ही कमजोर कर चुका था। सम्भव है कि वाकाटकों की अन्य शाखा में रुद्रसेन के उत्तराधिकार के प्रश्न पर उत्पन्न मतभेद ने वाकाटक साम्राज्य की स्थिति को और भी शिथिल बना दिया हो। उसके पितामह प्रवरसेन प्रथम ने ‘सम्राट’ की उपाधि ग्रहण की थी किन्तु उसके उत्तराधिकारी रुद्रसेन प्रथम अथवा उसके पश्चात उसके किसी वंशज ने ‘सम्राट’ की उपाधि धारण नहीं की थी। जिसके कारण विद्वानों ने यह अनुमान लगाया कि रुद्रसेन प्रथम द्वारा यह उपाधि त्यागने का कारण किसी पडा़ ेसी द्वारा युद्ध में पराजित होना रहा होगा। यह सत्य है कि उसके पितामह प्रवरसेन प्रथम ने वाजपेय यज्ञ करने के पश्चात ‘सम्राट’ की उपाधि ग्रहण की थी जबकि अन्य किसी भी वाकाटक शासक के विषय में यह ज्ञात नहीं है कि किसी ने भी ‘वाजपेय’ यज्ञ किया हो। यद्यपि प्राचीन भारतीय साहित्य सम्राट अथवा राजन् उपाधि धारण करने के पूर्व क्रमष: वाजपेय अथवा राजसूय यज्ञ का पालन करना अनिवार्य बताता है।

परन्तु प्राचीन भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें कई भारतीय शासकों ने (भारत पर शासन करने वाले विदेशी शासक- क्षहरात एवं कार्दमक राजवंश तथा बौद्ध एवं जैन धर्मों में आस्था रखने वालों ने भी) राजसूय यज्ञ किये बिना ही राजन् उपाधि धारण की थी। ऐसी स्थिति में यह माना जाता है कि यदि प्रवरसेन प्रथम के उत्तराधिकारी उसके समान शक्तिशाली होते तो उन्होंने भी सम्राट की उपाधि अवश्य धारण की होती जिसके लिए वाजपेय यज्ञ करना उतना आवश्यक नहीं था। सम्भव है कि रुद्रसेन प्रथम ने यह उपाधि अपने समकालीन शक्तिषाली गुप्त शासकों के प्रभावस्वरूप त्याग दी हो। गुप्त शासक समुद्रगुप्त अपने समकालीन वाकाटक शासक से कहीं अधिक शक्तिषाली था। जिसने मध्य भारत में शासन करने वाले उसके सम्बन्धी नाग राजवंश को भी उच्छिन्न कर दिया था। इससे वाकाटकों की राजनीतिक शक्ति का भी ह्रास हुआ होगा। हो सकता है कि इसी कारणवश रुद्रसेन प्रथम ने समुद्रगुप्त को स्वयं से श्रेश्ठ मानकर उसके दक्षिणापथ अभियान के समय उसे अपने राज्य से होकर गुजरने की अनुमति दी थी। अत: हम यह मान सकते हैं कि वाकाटक शासक रुद्रसेन प्रथम गुप्त शासक समुद्रगुप्त द्वारा पराजित तो नहीं हुआ था परन्तु परिस्थितिवश गुप्तों के अधीनस्थ मित्र के रूप में शासन करने के लिए बाध्य था।

इस आधार पर ऐसा लगता है कि रुद्रसेन प्रथम एक दुर्बल शासक था। उसके पितामह का वाकाटक साम्राज्य को चार पुत्रों में बाँटने का निर्णय बुद्धिमतापूर्ण न था। उसने लगभग 355 ई0 तक शासन किया था। उसका साम्राज्य उत्तर में मध्य प्रदेश के विन्ध्य क्षेत्र से दक्षिण में विदर्भ के उत्तरी भाग तक तथा खानदेश की पूर्वी सीमा से कोसल की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ था।

पृथिवीशेण प्रथम

रुद्रसेन प्रथम के बाद 355 ई0 में उसका पुत्र पृथिवीशेण प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ। वाकाटक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वह माहेष्वर का भक्त (अत्यन्त-माहेष्वर) था एवं सत्य, ऋजुता, करूणा, शौर्य, विक्रम, बुद्धिमता, योग्यजनों के प्रति आदरभाव, मनोनैर्मल्य आदि गुणों के लिए विख्यात था। उसका शासनकाल शान्ति और समृद्धि का काल था। वाकाटक अभिलेख यह उल्ल्लेख करते हैं कि उसके शासनकाल में वाकाटक वंष ने अपने समृद्धिशाली शासन के सौ वर्ष पूरे किये थे, जिसमें कोष एवं सेना दोनों की ही अभिवृद्धि हुई थी- ‘वर्शषतमभिवर्द्धमानकोषदण्डसाधनसन्तानपुत्रपौत्रिण:।’ अभिलेखों में उसकी तुलना धर्मराज युधिष्ठिर से की गयी है और उसे धर्मविजयी कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अपने शासनकाल में स्वयं कभी भी कोई आक्रामक युद्ध नहीं किया।

एक ओर उत्तर भारत के गुप्त शासकों समुद्रगुप्त एवं उसके पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने आक्रामक नीति का अनुसरण किया और साम्राज्य-विस्तार की ओर ध्यान केन्द्रित किया। वहीं दूसरी ओर उनके समकालीन पृथिवीशेण प्रथम ने शान्तिपूर्ण नीति अपनाकर प्रजाकल्याण को ही अपना लक्ष्य बनाया। पृथिवीशेण प्रथम के पूर्व उसके पिता रुद्रसेन प्रथम ने भी गुप्तों के प्रति शान्तिपूर्ण नीति का ही अवलम्बन किया था और गुप्तों के अधीनस्थ मित्र के रूप में शासन किया था। अत: स्पष्ट है कि पृथिवीशेण प्रथम ने भी अपने पिता की नीतियों का ही अनुसरण किया था। ऐसा माना जाता है कि कुन्तल प्रदेश की विजय स्वयं पृथिवीशेण प्रथम ने की थी। परन्तु अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख से ज्ञात होता है कि कुन्तल प्रदेश की विजय पृथिवीशेण प्रथम ने नहीं अपितु वत्सगुल्म शाखा के शासक विन्ध्यसेन अथवा विन्ध्यशक्ति द्वितीय ने की थी। सम्भव है कि वत्सगुल्म शाखा के साथ पृथिवीशेण प्रथम के मधुर सम्बन्ध रहे हों और यह भी हो सकता है कि पृथिवीशेण प्रथम ने इस युद्ध में धन और जन (सेना) से अपने परिवार की सहायता की हो।

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में नचना एवं गंज नामक स्थानों से व्याघ्रदवे नामक राजा के अभिलेख मिले हैं। इन अभिलेखों में व्याघ्रदेव ने स्वयं को वाकाटक सम्राट पृथिवीशेण का सामन्त कहा है। ये दोनों अभिलेख तिथिविहीन हैं। अत: इस पृथिवीशेण की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। क्योंकि वाकाटक साम्राज्य में पृथिवीशेण नामक दो शासक हुए। पहला रुद्रसेन प्रथम का पुत्र पृथिवीशेण प्रथम और दूसरा नरेन्द्रसेन का पुत्र एवं मुख्यषाखा का अन्तिम शासक पृथिवीशेण द्वितीय। कुछ विद्वान इसकी पहचान पृथिवीशेण द्वितीय से करते हैं। मिरासी इस व्याघ्रदेव की पहचान उच्चकल्प महाराज जयनाथ के पिता महाराज व्याघ्र से करते हैं जो उनके द्वारा निर्धारित कालानुक्रम के अनुसार पृथिवीशेण द्वितीय का समकालीन शासक था। परन्तु मिरासी ने मात्र मिलते-जुलते नामों की समानता के आधार पर एसे ा माना है जा े कि निराधार है। नचना एवं गंज अभिलेखों में उल्लिखित व्याघ्रदेव एक सामन्त शासक था जबकि उच्चकल्प लेखों से ज्ञात शासक मात्र ‘व्याघ्र’ कहा गया है और ‘महाराज’ की उपाधि से विभूषित किया गया है। ऐसी स्थिति में इन दोनों को एक ही व्यक्ति नहीं माना जा सकता।

समुद्रगुप्त के काल से बुन्देलखण्ड-बघेलखण्ड क्षेत्र जिसमें नचना एवं गंज सम्मिलित थे, गुप्तों के अधीन था। मध्य प्रदेश के सीधी जिले में शंकरपुर नामक ग्राम से महाराज हरिवर्मन का गुप्त संवत तिथ्यांकित ताम्रपत्र मिला है। इससे स्पष्ट है कि महाराज हरिवर्मन 487-88 ई0 में गुप्त शासक बुधगुप्त का सामन्त था एवं बघेलखण्ड क्षेत्र जिसमें नचना एवं गंज क्षेत्र भी सम्मिलित थे, महाराजा हरिवर्मन के अधीन थे। इस आधार पर अजयमित्र शास्त्री मानते हैं कि नचना एवं गंज अभिलेख का पृथिवीशेण, पृथिवीशेण प्रथम था। इससे यह भी स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड-बघेलखण्ड क्षेत्र में वाकाटकों का नियन्त्रण पृथिवीशेण प्रथम के आरम्भिक राज्यवर्शों में निरन्तर बना रहा। सम्भव है कि समुद्रगुप्त के शासनकाल में किसी समय यह वाकाटकों के अधिकार क्षेत्र से निकलकर गुप्तों के अधीन हो गया था। जिसकी पुष्टि समुद्रगुप्त के एरण अभिलेख से भी होती है। जिसमें कहा गया है कि उसका प्रत्यक्ष शासन दक्षिण दिषा के सागर जिले तक था।

पृथिवीशेण प्रथम ने अपने पुत्र रुद्रसेन द्वितीय का विवाह गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्ता से किया था। वाकाटक अभिलेखों में गुप्तों के साथ स्थापित इस वैवाहिक सम्बन्ध का उल्लेख बड़े गर्व के साथ किया गया है। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस वैवाहिक सम्बन्ध का उद्देष्य राजनीतिक था। चन्द्रगुप्त द्वितीय पष्चिमी क्षत्रपों पर विजय प्राप्त करना चाहता था। दक्षिण दिषा में उसे एक मित्र राज्य की सहायता मिल सके। इसके लिए उसने वाकाटकों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे। परन्तु यह तर्क असमर्थनीय है।

पश्चिम भारत के शक पहले से ही समुद्रगुप्त की गुरूता स्वीकार करते थे। और अब उनमें अधिक शक्ति “ोश नहीं रह गयी थी। इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमी क्षेत्रों पर विजय 409 ई0 एवं इसके बाद कभी की थी। अत: यह तर्कसगंत नहीं लगता कि उसने दो दशकों पूर्व ही यह योजना बनायी हो और इसी कारण से वाकाटकों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया हो।

मिरासी का मानना है कि पृथिवीशेण प्रथम ने अपनी राजधानी पद्मपुर से नन्दिवर्धन स्थानान्तरित कर दी थी। वे राजनांदगांव जिले से प्राप्त अपूर्ण मोहला (दुर्ग) ताम्रपत्र को नरेन्द्रसेन द्वारा जारी किया हुआ मानते हैं जो कि पद्मपुर से जारी किया गया था किन्तु जारीकर्ता का नाम नहीं बताता। परन्तु शास्त्री का मानना है कि यह अपूर्ण ताम्रपत्र नरेन्द्रसेन का नहीं अपितु पृथिवीशेण प्रथम का है। सम्भव है कि पृथिवीशेण प्रथम ने अपने पूर्वजों की राजधानी अपने सामन्तों को सौंपकर स्वयं पद्मपुर में अपनी राजधानी स्थापित की हो। उसके पुत्र रुद्रसेन द्वितीय के माण्ढळ ताम्रपत्र (5वाँ राज्यवर्श) से ज्ञात होता है कि उसकी राजधानी पद्मपुर थी। अत: मिरासी की यह धारणा निराधार सिद्ध होती है। पृथिवीशेण की मृत्यु लगभग 385 ई0 में हुई थी। उसने प्राय: तीस वर्ष की अवधि तक शासन किया था।

रुद्रसेन द्वितीय

पृथिवीशेण प्रथम के पश्चात उसका पुत्र रुद्रसेन द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसके पिता पृथिवीशेण प्रथम तथा पितामह रुद्रसेन प्रथम दोनों शिव के उपासक थे किन्तु वह स्वयं विश्णु का भक्त था। वाकाटक अभिलेखों में उसके लिए कहा गया है कि उसे विष्णु की कृपा से राज्यश्री प्राप्त हुई थी। 

रुद्रसेन द्वितीय की अग्रमहिशी प्रभावतीगुप्ता गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थी और अपने पिता के समान वह भी विश्णु की उपासिका थी। ऐसा माना जाता है कि रुद्रसेन प्रथम के धार्मिक विष्वास में यह परिवर्तन उसकी पत्नी प्रभावतीगुप्ता के प्रभावस्वरूप हुआ परन्तु प्राचीन भारत में पारिवारिक धर्म जैसा कुछ भी नहीं था। एक ही परिवार के भिन्न-भिन्न सदस्य आस्था के आधार पर किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतन्त्र होते थे।

रुद्रसेन द्वितीय के शासनकाल का एकमात्र ज्ञात ताम्रपत्र माण्ढळ क्षेत्र से प्राप्त हुआ है, जो कि उसके पाँचवें राज्यवर्श में जारी किया गया था। माण्ढळ क्षेत्र नागपुर के समीप एक छोटा-सा गाँव है। इस ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि दान में दिये जाने वाले ग्राम पद्मपुर के पूर्वी प्रषासनिक मार्ग पर स्थित थे। ताम्रपत्र में उल्लिखित पद्मपुर नागपुर-वर्धा क्षेत्र में कहीं स्थित था। वाकाटक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पद्मपुर नामक स्थल को विशेष महत्त्व प्राप्त था। पृथिवीशेण प्रथम के काल से ही यह वाकाटकों की राजधानी था। प्रवरसेन द्वितीय के मसोद ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि कालान्तर में प्रवरपुर के राजधानी बनने के बाद भी यह क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र था।

रुद्रसेन द्वितीय के एकमात्र ज्ञात ताम्रपत्र से उसके पाँचवें राज्यवर्श की तिथि प्राप्त होती है। तथापि यह सम्भव है कि उसने अतिरिक्त पाँच वर्शों तक शासन किया था। इस प्रकार उसका शासनकाल 385-395 ई0 तक लगभग दस वर्श का माना जाता है।

युवराज दिवाकरसेन एवं राजमाता के रूप में प्रभावतीगुप्ता का राज्यकाल रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के समय उसकी अग्रमहिशी प्रभावतीगुप्ता अधिक उम्र की न थी और न ही उसे राजषासन का अनुभव था। पति की अकस्मात् मृत्यु के समय उसके तीनों पुत्र दिवाकरसेन, दामोदरसेन तथा प्रवरसेन द्वितीय भी अल्पायु थे। रुद्रसेन द्वितीय के ज्येश्ठ पुत्र दिवाकरसेन का जन्म अपने पितामह पृथिवीशेण प्रथम के शासनकाल की समाप्ति के पूर्व ही हो गया था। अभिलेखों में पृथिवीशेण प्रथम के विशय में कहा गया है कि उसने काफी समय तक राज्य का सुख भोगा था। अभिलेखों में उसे पुत्र-पौत्रों से घिरा बतलाया गया है। अपन े पिता रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के समय दिवाकरसेन की आयु बारह वर्श से अधिक न थी और सम्भव है कि अन्य दो पुत्रों का जन्म उनके पितामह की मृत्यु के बाद हुआ। तथापि दिवाकरसेन की आयु इतनी अधिक नहीं थी कि वह राजषासन के कर्त्तव्यों का निर्वाह कर पाता। अत: उसकी माता प्रभावतीगुप्ता ने अपने अल्पवयस्क पुत्र की संरक्षिका के रूप में शासन की बागडोर सम्भाली। यद्यपि वत्सगुल्म शाखा के विन्ध्यसेन और सर्वसेन उसके समकालीन थे। तथापि उसने उनसे कोई सहायता नहीं ली। सम्भवत: उसे इस बात का भय था कि वत्सगुल्म शाखा के सदस्य उसकी इस संकटपूर्ण स्थिति का लाभ उठा सकते हैं। अत: उसने अपने पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय की सहायता ली।

ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि उसे अपन े पिता के गोत्र पर बहुत गर्व था। सम्भवत: इसी कारण उसने अपने ताम्रपत्रों में स्वयं को अपने पति के विश्णुवृद्ध गोत्र के स्थान पर अपने पिता के धारण गोत्र का बताया है। परम्परा के अनुसार विवाह के पश्चात स्त्री अपने पति के गोत्र से ही पहचानी जाती है। परन्तु प्रभावतीगुप्ता ने एसे ा नहीं किया। इसके साथ ही ताम्रपत्रों में उसने अपने पति की वंशावली के स्थान पर अपने पिता की वंशावली का उल्लेख किया है। उसके पूना ताम्रपत्र की लिपि गुप्तों में प्रचलित कीलषीर्शक प्रकार की है। जबकि प्रवरसने द्वितीय के उन्नीसवें राज्यवर्श का ऋद्धपुर ताम्रपत्र जो कि प्रभावतीगुप्ता द्वारा ही उत्कीर्ण कराया गया था। उसकी लिपि वाकाटक राजवंश में प्रचलित पेटिका-षीर्श प्रकार की है। इन सब आधारों पर ऐसा माना जाता है कि प्रभावतीगुप्ता के राजषासन पर उसके पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय का बहुत प्रभाव था। जिसके कारण उत्कीर्णक भी उसके पिता के राज्य से ही भेज े गये थे। जिन्होंने लेख का प्रारूप एवं प्रारम्भ में लेख की लिपि भी गुप्तों के अनुरूप ही उत्कीर्ण की। 

परन्तु कालान्तर में प्रभावतीगुप्ता के मरणोपरान्त उसकी स्मृति में लिखवाया गया रामटेक शिलालेख भी कीलषीर्शक लिपि में ही प्राप्त हुआ है। यह लेख उसकी पुत्री द्वारा अपने भाई प्रवरसेन द्वितीय के काल में लिखवाया गया था। इन सब प्रमाणों के आधार पर शास्त्री का मानना है कि लेख में प्रयुक्त होने वाली लिपि के प्रकार का सम्बन्ध मुख्य रूप से प्रशिक्षण पर निर्भर करता है। इस प्रकार वाकाटक ताम्रपत्रों में प्रयुक्त लिपि का शासक वर्ग से कोई सम्बन्ध नहीं था। अपितु यह पूर्ण रूप से उस प्रषिक्षण पर निर्भर है जो कि उत्कीर्णक को लेख उत्कीर्ण करने से पूर्व दिया गया था। यदि उत्कीर्णक भी गुप्तों द्वारा भेजे गये होते तो प्रभावतीगुप्ता के ताम्रपत्रों की वंशावली वाले भाग में इतनी गम्भीर त्रुटियाँ नहीं होतीं। उदाहरण के लिए- उसके पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय को ‘महाराजाधिराज’ के स्थान पर मात्र ‘महाराज’ कहा गया है। श्रीगुप्त के स्थान पर घटोत्कच को गुप्त वंष का पहला राजा बताया गया है।

समुद्रगुप्त से सम्बन्धित कुछ विशेषणों को उसके पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय के लिए प्रयुक्त किया गया है। अत: इन प्रमाणों के आधार पर यह मानना कि प्रभावतीगुप्ता के समय में उत्कीर्णक भी चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा भेज े गये थे, तर्कसगंत नहीं लगता। यदि एसे ा होता तो गुप्तों के वंशावली -वर्णन में इतनी अधिक त्रुटियाँ न होतीं, जिससे वे भली-भाँति परिचित होते।

प्रभावतीगुप्ता का पनू ा ताम्रपत्र वाकाटकों के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। युवराज दिवाकरसेन के विषय में सूचना देने वाला यह एकमात्र ताम्रपत्र है। इस लेख से यह ज्ञात होता है कि दिवाकरसेन तेरह वर्षों तक युवराज ही था और प्रभावतीगुप्ता ने उसकी संरक्षिका के रूप में शासन किया था। श्रीधरदास ने अपने साहित्यिक-संग्रह ‘सदुक्ति-कर्णामृत’ में दिवाकरसेन द्वारा रचित एक अंष उद्धृत किया है। इस ग्रन्थ में दिवाकरसेन का उल्लेख युवराज रूप में किया गया है। इससे स्पष्ट है कि दिवाकरसेन की मृत्यु युवराज रूप में ही हो गयी थी। उसका शासनकाल 410 ई0 तक माना गया है। प्रभावतीगुप्ता का पूना ताम्रपत्र राजधानी नन्दिवर्धन से जारी किया गया था। इस नन्दिवर्धन की पहचान नागपुर से 28 मील की दूरी पर स्थित आधुनिक ग्राम नन्दरधन या नगरधन से की गई है। रुद्रसेन द्वितीय के पाँचवें राज्यवर्श का माण्ढळ ताम्रपत्र पद्मपुर से जारी किया गया था। अत: कहा जा सकता है कि राजधानी पद्मपुर से नन्दिवर्धन का स्थानान्तरण इस समय तक हो गया था।

दामोदरसेन

दिवाकरसेन के पश्चात उसका छोटा भाई दामोदरसेन उसका उत्तराधिकारी हुआ। यदि उसका जन्म उसके पिता के शासनकाल की समाप्ति के दो वर्श पूर्व हुआ था, तो हो सकता है कि अपने बड़े भाई दिवाकरसेन की मृत्यु (सम्भवत: 23वें वर्ष में) के समय वह 17 वर्ष का रहा हो और अपने ज्येष्ठ पुत्र दिवाकरसेन के समान ही प्रभावतीगुप्ता कुछ समय के लिए अपने मंझले पुत्र दामोदरसेन की भी संरक्षिका रही हो। मिरासी दामोदरसेन और प्रवरसेन को एक ही व्यक्ति मानते हैं। उनका मानना है कि दामोदरसेन ने ही अपने राज्यारोहण के समय अपने पूर्वज प्रवरसेन (प्रथम) का नाम धारण किया था। रमेषचन्द्र मजूमदार एवं डी0 सी0 सरकार ऋद्धपुर ताम्रपत्र में वर्णित अंष ‘वाकाटकानाम्महाराजश्रीदामोदरसेन- प्रवरसेनजननी’ के आधार पर यह मानते हैं कि दामोदरसेन एवं प्रवरसेन ये दो नाम वास्तव में दो अलग-अलग शासकों के हैं। इन दोनों ने ही एक के बाद एक शासन किया। 

इस “लोक में प्रभावतीगुप्ता का वर्णन दो शासकों की माता के रूप में किया गया है। शास्त्री92 का मानना है कि ‘विक्रान्तयो:’ एवं ‘वाकाटकनरेन्द्रयो:’ इन दोनों के साथ ही द्विवचन का प्रयोग किया गया है। इससे यह स्पश्ट है कि ये दोनों (दामोदरसेन और प्रवरसेन) दो अलग-अलग व्यक्ति थे। दूसरा ऐसा कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है जिससे यह ज्ञात हो सके कि वाकाटक शासक राज्यारोहण के समय नया नाम अंगीकृत करते थे। यदि ऐसा होता तो अन्य वाकाटक शासकों के लिए भी दो नाम रखने के कोई न कोई प्रमाण अवश्य उपलब्ध होते। इस प्रकार अब इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि दामोदरसेन और प्रवरसेन द्वितीय दो भिन्न व्यक्ति थे और दामोदरसेन ने अपने बड़े भाई प्रवरसेन द्वितीय से पूर्व शासन किया था। उसके द्वारा जारी किसी ताम्रपत्र के विशय में कुछ ज्ञात नहीं है। तथापि यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने मात्र एक दषक तक अर्थात् 420 ई0 तक शासन किया था।

प्रवरसेन द्वितीय

दामोदरसेन के पष्चात् उसका छोटा भाई प्रवरसेन द्वितीय वाकाटक राजवंश का उत्तराधिकारी हुआ। वाकाटक शासकों में मात्र इसी ने सर्वाधिक अभिलेख जारी किये। अभी तक उसके लगभग बीस अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें उन्नीस ताम्रपत्र तथा एक शिलालेख है। उसका एकमात्र ज्ञात शिलालेख उसकी माता प्रभावतीगुप्ता की स्मृति में उसकी अज्ञातनामा बहन के द्वारा रामटेक में लिखवाया गया था। अपने माता-पिता के विपरीत प्रवरसेन द्वितीय शैव था। उसके ताम्रपत्रों में कहा गया है कि उसे भगवान शम्भू के प्रसाद से अपने राज्य में कृतयुग स्थापित करने में सफलता मिली- ‘षम्भो: प्रसादधृतकार्तयुगस्य’ उसके ग्यारहवें राज्यवर्श में जारी किया गया बेलोरा ताम्रपत्र राजधानी नन्दिवर्धन से जारी किया गया था। उसके सोलहवें राज्यवर्श में जारी किया गया माण्ढळ ताम्रपत्र राजधानी प्रवरपुर से जारी किया गया था। अत: ऐसा माना जाता है कि उसने प्रवरपुर नामक नगर की स्थापना कर ग्यारहवें से सोलहवें राज्यवर्श के बीच किसी समय उसे अपनी राजधानी बनाया था। प्रवरपुर की पहचान पवनार से की गयी है जो कि वर्धा जिले के समीप स्थित था।

प्रवरसेन द्वितीय के ताम्रपत्रों में उसकी किसी राजनीतिक सफलता का उल्लेख नहीं मिलता। उनमें न तो उसके किसी शत्रु का उल्लेख है और न ही किसी मित्र राजा का नाम ही है। परन्तु उसके पौत्र पृथिवीशेण द्वितीय के ताम्रपत्रों में उसके लिए कहा गया है कि उसने पूर्व राजाओं के कार्यों का ही अनुसरण किया तथा उत्कृश्ट राजनीति, दृढ़ता एवं भुजबल द्वारा अपने शत्रुओं को जड़ से उखाड़ फेंका। ये शत्रु वास्तव में कौन थे, इनके विषय में कुछ ज्ञात नहीं है। इसी प्रकार का उल्लेख प्रवरसेन द्वितीय के 18वें राज्यवर्श में जारी सिवनी ताम्रपत्र में मिलता है।98 परन्तु उसी के चम्मक ताम्रपत्र में जो कि उसके 18वें राज्यवर्श में ही सिवनी ताम्रपत्र से कुछ माह पूर्व जारी किया गया था, यह अंष अनुपलब्ध है। इस आधार पर ऐसा माना जाता है कि उसने अपने अज्ञात शत्रुओं पर यह विजय अपने 18वें राज्यवर्श में ज्येष्ठ से फाल्गुन माह के मध्य में कभी की होगी।

उसके ताम्रपत्रों से उसके प्रशासन में सैनिक तत्त्वों की प्रमुखता का आभास होता है। अधिकांश ताम्रपत्रों में उसके सेनापतियों के नाम मिलते हैं। ये हैं- चक्रवर्मन, चित्रवर्मन, बाप्पदेव, नेमिदास एवं कात्यायन। ताम्रपत्रों के प्राप्तिस्थलों एवं उनमें उल्लिखित ग्रामों की स्थिति के आधार पर ज्ञात होता है कि अमरावती, बैतूल, छिंदवाड़ा, भण्डारा एवं बालाघाट जिले उसके प्रत्यक्ष शासन के अन्तर्गत थे। इसके अतिरिक्त उसके राज्य में मध्य प्रदेश का अधिकांश भाग, उत्तरी विदर्भ, खानदेश, महाराश्ट्र और हैदराबाद रियासत का उत्तर-पश्चिमी भाग सम्मिलित था।

वत्सगुल्म शाखा में उसके समकालीन शासक का नाम भी प्रवरसेन ही था और वह भी अपने कुल का दूसरा राजा था। किन्तु मुख्य शाखा के प्रवरसेन से वह उम्र में अधिक बड़ा था और उसने लगभग 425 ई0 तक राज्य किया। उसके पश्चात उसका आठवश्र्ाीय पुत्र सर्वसेन द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ। जिसका नाम उसके पुत्र देवसेन के बीदर ताम्रपत्र एवं पौत्र हरिशेण के थाल्नेर ताम्रपत्र से ज्ञात होता है। इसके पूर्व अजन्ता के सोलहवीं गुहा के लेख के अस्पष्ट होने के कारण उसका नाम ज्ञात नहीं हो पाया था। सर्वसेन नामक यह राजा अपने कुल का दूसरा राजा था। दोनों शाखाओं के आपसी सम्बन्धों के विषय में कुछ ज्ञात नहीं है। सम्भव है कि प्रवरसेन द्वितीय ने वत्सगुल्म शाखा के अपने इस अल्पवयस्क सम्बन्धी सर्वसेन द्वितीय की प्रशासन में सहायता की हो। यह भी सम्भव हो सकता है कि दोनों प्रषासनों ने मिलकर एक सरकार के रूप में कार्य किया हो। यदि यह सम्भावना सत्य सिद्ध हो जाए तो स्वयमेव यह ज्ञात हो पायेगाा कि काव्यग्रन्थों में प्रवरसेन द्वितीय को ‘कुन्तलाधीष’ क्यों कहा गया है। जबकि कुन्तल विजय वत्सगुल्म शाखा के विन्ध्यसेन अथवा विन्ध्यशक्ति द्वितीय ने की थी।

प्रवरसेन द्वितीय साहित्यिक रुचि का राजा एवं एक महान प्राकृत कवि था। षिवोपासक होते हुए भी उसने ‘सेतुबंध’ अथवा ‘रावणवहो’ नामक काव्य की रचना की। जिसमें रावण पर राम की विजय का वर्णन है।

प्रवरसेन द्वितीय के राज्यकाल में ही उसकी माता प्रभावतीगुप्ता की मृत्यु हो गयी। मिरेगांव ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि प्रवरसेन द्वितीय के 20वें राज्यवर्श में वह जीवित थी। यह ताम्रपत्र प्रभावतीगुप्ता ने स्वयं जारी करवाया था। प्रवरसेन द्वितीय के 23वें राज्यवर्श के तिरोडी ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि इस समय उसने अपनी माता के पुण्यप्राप्ति के लिए यह दान दिया था। सम्भवत: इस समय तक वह बहुत वृद्ध हो चुकी थी। एक उत्कृष्ट, प्रतिभाशाली जीवन जीने के पश्चात लगभग 85 वर्ष की उम्र में उसका देहावसान हो गया। इस घटना को स्मरणीय बनाने के लिए उसकी अज्ञातनामा पुत्री ने अपने भाई प्रवरसेन द्वितीय की सहायता से ‘प्रभावतीस्वामिन’ नामक एक मन्दिर का निर्माण एवं ‘सुदर्शन’ नामक एक झील का उत्खनन करवाया। यह मन्दिर वास्तव में एक विष्णु (नरसिंह) मन्दिर है।

महाराष्ट्र के भण्डारा जिले के पौनी नामक स्थल से प्रवरसेन द्वितीय का 32वें राज्यवर्श का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।108 जिससे उसके राज्य की नवीनतम तिथि ज्ञात होती है। इसकी प्राप्ति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उसने कम से कम 32 वर्श तक अवश्य शासन किया था। उसका शासनकाल 455 ई0 तक माना जाता है।

नरेन्द्रसेन

प्रवरसेन द्वितीय के पश्चात 455 ई0 में उसका पुत्र नरेन्द्रसेन गद्दी पर बैठा। उसके शासनकाल का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं होता। अत: उसके विषय में जानने के लिए हमें उसके पुत्र पृथिवीशेण द्वितीय के ताम्रपत्रों का आश्रय लेना पड़ता है। उसके पिता प्रवरसेन द्वितीय के माण्ढळ ताम्रपत्र1109 से ज्ञात होता है कि उसका नाम सम्भवत: नरिन्दराज था तथा उसकी माता एवं प्रवरसेन द्वितीय की पत्नी का नाम आज्ञाकभट्टारिका था।

प्रवरसेन द्वितीय ने अपने शासनकाल में ही अपने पुत्र युवराज नरेन्द्रसेन का विवाह कुन्तलराज की पुत्री अजितभट्टारिका के साथ कर दिया था। सम्भव है कि इस विवाह के कुछ राजनीतिक कारण रहे हो। हो सकता है कि अपने राजवंश की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए उसने अपने पड़ोसी कुन्तलराज के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये हो। कोल्हापुर के समीप स्थित एक ग्राम से प्राप्त पांडरंगपल्ली ताम्रपत्र में राश्ट्रकूट वंष के मूलपुरूश मानांक को ‘कुन्तल देश का अधिपति’ कहा गया है। इस आधार पर मिरासी का मानना है कि वाकाटक ताम्रपत्रों से ज्ञात कुन्तलराज मानपुर का तत्कालीन राश्ट्रकूट शासक रहा होगा। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कुन्तल देश (उत्तरी कर्नाटक) पर इस समय कदम्बों का शासन था। उत्तरी कर्नाटक पर इस समय कदम्ब शासक काकुत्स्थवर्मन का शासन था। अधिक सम्भावना यही है कि नरेन्द्रसेन की पत्नी अजितभट्टारिका इसी काकुत्स्थवर्मन की पुत्री अथवा पौत्री हो। काकुत्स्थवर्मन के विशय में कहा जाता है कि उसने अपनी कन्याओं का विवाह गुप्तों और अन्य राजकुलों में किया था। गुप्तों के बाद वाकाटक भी समकालीन महत्त्वपण्ूर् ा राजवंश के रूप में जाने जाते थे। हो सकता है कि इन ‘अन्य राजकुलो’ में वाकाटक भी रहे होगे। इस विवाह के परिणामस्वरूप गुप्तो, वाकाटकों एवं कदम्बों के बीच मैत्री सम्बन्ध और अधिक प्रगाढ़ हुए होगे।

नरेन्द्रसेन के पुत्र पृथिवीशेण द्वितीय के बालाघाट ताम्रपत्र में उसके विशय में कहा गया है कि उसने अपने शारीरिक गुणों से अपने वंष की राजलक्ष्मी का अपहरण किया था, जो इस प्रकार है- ‘पूर्वाधिगतगुणविष्वासादपहृतवंषश्रिय:’ परन्तु कालान्तर में उसके पुत्र पृथिवीशेण द्वितीय का दसवे राज्यवर्श का माण्ढळ ताम्रपत्र प्राप्त हुआ, जिसका यह अंष इस प्रकार है- ‘पूर्वाधिगतगुणवाददायादापहृतवंषश्रिय:’ इस आधार पर ऐसा माना जाता है कि प्रवरसेन द्वितीय की मृत्यु के साथ ही उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ। जिसमें नरेन्द्रसेन ने प्रारम्भ में सफलता प्राप्त की परन्तु कालान्तर में उसके सम्बन्धियों (सम्भवत: उसके भाईयो) द्वारा उससे यह राजलक्ष्मी छीन ली गई। हो सकता है कि राजसिंहासन प्राप्त करने के कुछ समय पश्चात उससे उसका राज्य अथवा राज्य का एक बड़ा भाग हड़प लिया गया हो।

ये सम्बन्धीजन कौन थे, इनका उल्लेख इस ताम्रपत्र में नहीं किया गया है। परन्तु यदि ताम्रपत्र में वर्णित शब्द गुणवाद को गौण शब्द का पर्यायवची मानें तो ज्ञात होगा कि उसके ये शत्रु अन्य कोई नहीं अपितु वत्सगुल्म शाखा के उसके भाई थे। इस समय वत्सगुल्म शाखा में उसका समकालीन सर्वसेन द्वितीय का पुत्र देवसेन शासन कर रहा था। सम्भव है इसी ने नरेन्द्रसेन से उसके राज्य का अधिकांश भाग हड़प लिया हो।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वाकाटक राजवंश की दोनों शाखाओं में नरेन्द्रसेन के समय से द्वंद उत्पन्न हो गया था। इस द्वंद का कारण क्या था, यह ज्ञात नहीं है। सम्भवत: देवसेन के पिता सर्वसेन द्वितीय के समय से ही इस शत्रुता के बीज पनपने लगे थे।

ताम्रपत्रों में कहा गया है कि कोसला, मेकला और मालवा के राजा नरेन्द्रसेन की आज्ञा को षिरोमान्य करते थे। नरेन्द्रसेन के उत्तरवर्ती शासनकाल की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए यह तथ्य ग्राह्य प्रतीत नहीं होता। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में ताम्रपत्रों का यह वर्णन सदैव सन्देहपूर्ण ही रहेगा।

पृथिवीशेण द्वितीय

नरेन्द्रसेन का अजिभट्टारिका से उत्पन्न पुत्र पृथिवीशेण द्वितीय 480 ई0 में वाकाटक राजवंश का अगला शासक हुआ। ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि वह विश्णु का उपासक था। उसके बालाघाट ताम्रपत्र के सन्दर्भ ‘द्विमग्नवंषस्योद्धत्र्तु:’ से ज्ञात होता है कि उसने दो बार अपने वंष का उद्धार किया था।

यह प्रथम प्रयास सम्भवत: उसने अपने वत्सगुल्म शाखा के सम्बन्धियों के विरूद्ध किया था क्योंकि उसके पिता नरेन्द्रसेन के काल में ही वाकाटक राज्य का कुछ भाग वत्सगुल्म शाखा के अधीन हो गया था। स्पष्ट है कि उत्तराधिकार पद प्राप्त करते ही उसने अपने खोये हुए राज्य को वापस पाने का प्रयास किया होगा। बालाघाट ताम्रपत्र से स्पष्ट है कि वह इसमें सफल भी हुआ था। उसके अभी तक कुल चार ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं : (1) माण्ढळ ताम्रपत्र (राज्यवर्श 2), (2) माण्ढळ ताम्रपत्र (राज्यवर्श 10), (3) महुर्झरी ताम्रपत्र (राज्यवर्श 17) एवं (4) अपूर्ण बालाघाट ताम्रपत्र।

उसके बालाघाट ताम्रपत्र में कोई तिथि नहीं मिलती परन्तु विशयवस्तु एवं लिपिगत आधार पर उसे बाद का माना जाता है। उसके दसवें राज्यवर्श के माण्ढळ ताम्रपत्र एवं सत्रहवें राज्यवर्श के महुर्झरी ताम्रपत्र में भी उसके लिए ‘मग्नवंषोद्धत्र्तु:’ सन्दर्भ मिलता है। परन्तु बालाघाट ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में यह विपित्त दो बार आयी थी। स्पश्ट है कि उसने अपन े दसवें राज्यवर्श के पूर्व वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा से अपने खोये हुए प्रदेश प्राप्त कर लिये होगे। उसके सत्रहवें राज्यवर्श के पष्चात् आयी दूसरी विपत्ति सम्भवत: नल राजवंष के आक्रमण से सम्बन्धित थी। नल शासक भवदत्तवर्मन का रिद्धपुर ताम्रपत्र वाकाटकों की पवूर् राजधानी नन्दिवर्धन से जारी किया गया था एवं इससे ज्ञात होता है कि उसने यवतमाल जिले का एक गांव दान में दिया था। उस समय नल राजवंश का अधिकार मध्य प्रदेश के बस्तर क्षेत्र एवं उसके समीप स्थित आन्ध्र प्रदेश के भूभाग पर था। रिद्धपुर ताम्रपत्र से स्पष्ट है कि भवदत्तवर्मन वाकाटकों की प्राचीन राजधानी नन्दिवर्धन तक पहुंच गया था। यह घटना निश्चित रूप से उसके दूसरे राज्यवर्श के पश्चात घटित हुई थी। क्योंकि उसके दूसरे राज्यवर्श का माण्ढळ ताम्रपत्र रामगिरीस्थान से जारी किया गया था। अत: स्पष्ट है कि इस समय तक नन्दिवर्धन उसके अधिकार-क्षेत्र में था। पृथिवीशेण द्वितीय का शासनकाल 500/505 ई0 तक निर्धारित किया गया है।

पृथिवीशेण द्वितीय के बाद वाकाटक वंश की मुख्य शाखा के किसी शासक के विषय में कुछ ज्ञात नहीं है। सम्भवत: उसके पुत्र उत्तराधिकार पद प्राप्त करने के योग्य नहीं थे। अत: ऐसा माना जाता है कि उसकी मृत्यु के बाद वाकाटकों की ज्येष्ठ (नन्दिवर्धन) शाखा वत्सगुल्म शाखा के शासक हरिशेण के साम्राज्य में विलीन हो गयी।127 अजन्ता के सोलहवीं गुहा के लेख में हरिशेण को कुन्तल, अवन्ति, कलिंग, कोषल, त्रिकूट, लाट, और आन्ध्र देश का स्वामी कहा गया है। यह तभी सम्भव हुआ होगा जबकि मुख्य शाखा के राज्यों एवं साधनों पर उसका नियत्रं ण स्थापित हो गया हो।

वत्सगुल्म शाखा

वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा के विषय में जानकारी सन् 1939 ई0 में वाषीम ताम्रपत्र मिलने के साथ ही प्रारम्भ हो पाई। इसकी प्राप्ति के पूर्व वाकाटकों की इस शाखा के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं था। यद्यपि अजन्ता के सोलहवीं गुहा के लेख में वाकाटकों की इस शाखा की वंशावली दी गई है। परन्तु लेख के अस्पष्ट होने के कारण इनसे सम्बन्धित सूचनाएँ अधूरी ही बनी रहीं। 19वीं शताब्दी में जब भगवानलाल और ब्यूलर ने इस लेख का सम्पादन किया तो उनका मानना था कि इस लेख में वाकाटकों की मुख्य शाखा की वंशावली दी गई है। अत: विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से वाकाटकों का इतिहास पुनर्निर्मित करना प्रारम्भ कर दिया। परन्तु सन् 1939 ई0 में विन्ध्यशक्ति द्वितीय के वाषीम ताम्रपत्र एवं सन् 1941 ई0 में मिरासी द्वारा प्रकाषित अजन्ता गुहा संख्या 16 के लेख के संशोधित पाठ द्वारा यह स्पष्ट हो पाया कि अजन्ता की इस सोलहवीं गुहा के लेख का वाकाटकों की मुख्य शाखा से कोई सम्बन्ध नहीं है। कालान्तर में वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा से सम्बन्धित अन्य अभिलेखों की प्राप्ति से इस शाखा से सम्बन्धित हमारे ज्ञान में निरन्तर वृद्धि हो पाई है। इनमें विन्ध्यशक्ति द्वितीय के पुत्र देवसेन का हिस्से-बोराला शिलालेख (षक संवत् 380), देवसेन का बीदर ताम्रपत्र एवं उसके पौत्र हरिशेण का थाल्नेर ताम्रपत्र आदि प्रमुख हैं, जिनसे वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा का इतिहास और अधिक स्पष्ट हो पाया।

सर्वसेन प्रथम

प्रवरसेन प्रथम का पुत्र सर्वसेन प्रथम वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा का संस्थापक था। उसका नाम उसके पुत्र विन्ध्यशक्ति द्वितीय के वाषीम ताम्रपत्र एवं उसके उत्तराधिकारियों के लेखों में मिलता है। उसका राज्य उत्तर में इन्ध्याद्रि पर्वतमाला से दक्षिण में गोदावरी नदी तक विस्तृत था। उसके रवि नामक सचिव का नाम अजन्ता के सोलहवीं गुहा के लेख में मिलता है जिसने इस प्रदेश पर अपना अधिकार स्थापित करने में उसकी सहायता की थी। इस सचिव के वंशज कई पीढ़ियों तक वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा में समान पद पर बने रहे और उन्होंने पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा की।

प्रवरसेन प्रथम के समान ही उसके पुत्र सर्वसेन प्रथम ने भी दक्षिण भारत की प्रथा का अनुसरण करते हुए ‘धर्ममहाराज’ की उपाधि धारण की। सम्भव है कि अपने पिता प्रवरसेन प्रथम के जीवनकाल में ही उसने राजषासन से सम्बन्धित शक्तियाँ अर्जित कर ली थीं और युवराज रूप में ही अपने विजित प्रदेशों में अपने पिता की ओर से शासन करना आरम्भ कर दिया था। इस अनुमान के आधार पर उसका शासनकाल 325 ई0 से 355 ई0 लगभग 30 वर्षों तक का निर्धारित किया गया है। उसकी राजनीतिक गतिविधियों के विषय में कुछ ज्ञात नहीं है। अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख से मात्र इतना ही ज्ञात हो पाया कि उसने सभी दलों पर विजय प्राप्त की थी। अभिलेख में वर्णित ये सम्भावित शत्रु कौन थे, यह ज्ञात नहीं है। तथपि एसे ा माना जाता है कि खानदेश और मराठवाड़ा के समीपस्थ क्षत्रे ों को इसी ने जीता था।

उसकी राजधानी वत्सगुल्म थी जिसकी पहचान अकोला जिले में स्थित वाषीम नामक स्थान से की गयी है। वात्स्यायन के कामसूत्र में वत्सगुल्म में निवास करने वाले लोगों को ‘वत्सगुल्मक’ कहा गया है। वत्सगुल्ममहामात्य के अनुसार ‘वत्स नामक ऋषि ने उस स्थान पर अपने आश्रम के निकट देवों के गुल्म (समूह) का वास कराया था, जिससे उसका नाम ‘वत्सगुल्म’ पड़ा।’ यषोधर ने कामसूत्र की ‘जयमंगला टीका’ में वत्सगुल्म स्थल नाम की व्युत्पत्ति की व्याख्या कुछ अलग ही ढंग से की है। उनके अनुसार ‘वत्स और गुल्म नामक दो सगे भाई दक्षिणापथ के राजपुत्र थे। इन दोनों भाईयों ने अपने नाम पर ही वत्सगुल्म नामक नगर बसाया।’ राजषेखर के अनुसार ‘वत्सगुल्म विदर्भ में ही सम्मिलित था परन्तु वात्स्यायन का मानना है कि वत्सगुल्म विदर्भ से भिन्न था।’

प्राचीनकाल से ही वत्सगुल्म विद्या और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था तथा वाकाटकों के राज्यकाल में इसे और अधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। यह स्थल एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में विख्यात था। उत्कृष्ट प्राकृत काव्यों की सृजनभूमि होने के कारण प्राकृत साहित्य की जिस शैली का यहाँ विकास हुआ उसे ‘वच्छोमी’ (वत्सगुल्मी) की संज्ञा प्रदान की गई। वाकाटक शासक सर्वसेन प्रथम स्वयं एक महान प्राकृत कवि था। उसने महाराश्ट्री प्राकृत में ‘हरिविजय’ नामक महाकाव्य की रचना की। जिसकी प्रशंसा प्रख्यात संस्कृत कवियों एवं आलोचकों ने मुक्तहृदय से की है। इसके लेखक सर्वसेन प्रथम की तुलना साहित्यकारों द्वारा कालिदास से की गयी है जो इस कृति की गुणवत्ता एवं लेखक के साहित्य-सम्बन्धी ज्ञान को स्वयमेव प्रदर्षित करता है।

विन्ध्यशक्ति द्वितीय

सर्वसेन प्रथम के पश्चात उसका पुत्र विन्ध्यशक्ति द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ। अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख में उसे ‘विन्ध्यसेन’ कहा गया है। उसके वाषीम ताम्रपत्र में उसके 37वें वर्श की तिथि मिलती है। निश्चित रूप से उसने दीर्घकाल तक शासन किया था। अनुमानत: उसका शासनकाल 355-400 ई0 तक निर्धारित किया गया है। अपने पिता और पितामह की भाँति उसने भी ‘धर्ममहाराज’ की उपाधि धारण की थी। उसके वाषीम ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसने नान्दीकट जिले में स्थित एक ग्राम दान में दिया था। यह ताम्रपत्र वत्सगुल्म से जारी किया गया था। इस नान्दीकट की पहचान महाराष्ट्र राज्य में स्थित वर्तमान नान्देड़ से की गई है। अत: स्पष्ट है कि इस काल तक मराठवाड़ा क्षेत्र उसके अधीन हो गया था। अजन्ता के लेख में उसके कुन्तल के अधिपति पर विजय प्राप्त करने की सूचना मिलती है। राश्ट्रकूट राजा मानांक के वंशज अविधेय के पाण्डरंगपल्ली ताम्रपत्र में मानांक को कुन्तल देश का अधिपति कहा गया है। इस आधार पर मिरासी का मानना है कि इस काल में कुन्तल देश पर राश्ट्रकूटों का शासन था और इस समय राश्ट्रकूट राजा मानांक विन्ध्यशक्ति द्वितीय का समकालीन था।

परन्तु शास्त्री का मानना है कि कुन्तल देश (उत्तरी कर्नाटक) पर इस समय बनवासी के कदम्बों का शासन था। इस घटना के साथ ही वाकाटकों ने कदम्बों के आन्तरिक विशयों में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया था। कालान्तर में कदम्ब राज्य दो गुटों में बँट गया, जिसमें से एक को वत्सगुल्म शाखा का समर्थन प्राप्त था।

प्रवरसेन द्वितीय

विन्ध्यशक्ति द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र प्रवरसेन द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसकी राजनीतिक गतिविधियों के विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं है। अजन्ता की सोलहवीं गुहा के लेख में कहा गया है कि वह अपने उत्कृष्ट और उदार राजषासन के लिए विख्यात था। इसके साथ ही उसके पौत्र देवसेन के बीदर ताम्रपत्र में उसे ‘महाराज’ कहा गया है। अजन्ता लेख से ज्ञात होता है कि उसकी मृत्यु के समय उसका उत्तराधिकारी उसका आठ वश्र्ाीय पुत्र था। सम्भव है कि उसने अधिक वर्षों तक शासन नहीं किया था अथवा यह भी हो सकता है कि अपने जीवनकाल में उसे पुत्र की प्राप्ति बहुत देर से हुई हो। उसका शासनकाल 400-425 ई0 लगभग 25 वर्षों का निर्धारित किया गया है। उसके श्रीराम नामक सचिव का उल्लेख घटोत्कच गुहालेख में आया है।

सर्वसेन द्वितीय

प्रवरसेन द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका आठ वश्र्ाीय बालक था। अजन्ता के लेख में उसका नाम नश्ट हो गया है। तथापि इस लेख में उसके विषय में कहा गया है कि उसने उत्तम रीति से शासन किया था। कालान्तर में उसके पुत्र देवसेन के बीदर ताम्रपत्र एवं पौत्र हरिशेण के थाल्नेर ताम्रपत्र से उसका नाम ज्ञात हो पाया। मुख्य शाखा का प्रवरसेन द्वितीय इस आठ वश्र्ाीय बालक का समकालीन था। ऐसी सम्भावना है कि मुख्य शाखा के राजा प्रवरसेन द्वितीय ने वत्सगुल्म शाखा के राजा की अल्पवयस्कता की अवधि में राजषासन सम्बन्धी कार्यों में उसकी सहायता की हो अथवा यह भी सम्भव है कि कुछ समय के लिए दोनों शाखाओं ने एकजुट होकर शासन किया था। वयस्क होने पर उस बालक ने शासन की बागडोर सम्भाल ली होगी।

सर्वसेन द्वितीय की राजनीतिक गतिविधियों के विषय में अधिक जानकारी नहीं है। परन्तु कदम्ब शासक सिंहवर्मन के मुद्गिरि ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि ‘महाराज सर्वसेन ने उसका राज्याभिषेक कर उसे सम्मानित किया था।’ इस सर्वसेन की पहचान वाकाटक राजवंश की वत्सगुल्म शाखा के शासक सर्वसेन से की गई है। वत्सगुल्म शाखा में सर्वसेन नामक दो शासक हुए। पहला वत्सगुल्म शाखा का संस्थापक सर्वसेन प्रथम जिसका शासनकाल 325-355 ई0 तक माना जाता है। दूसरा प्रवरसेन द्वितीय का पुत्र सर्वसेन द्वितीय जिसका शासनकाल 425-455 ई0 तक निर्धारित किया गया है। इन दोनों शासकों में सर्वसेन द्वितीय ही उसका समकालीन अथवा समीपस्थ समकालीन रहा होगा। यद्यपि कदम्ब शासक सिंहवर्मन की प्रारम्भिक तिथि 490 ई0 निर्धारित की गई है तथापि उसके मुद्गिरि ताम्रपत्र में उल्लिखित सर्वसेन को वाकाटक शासक सर्वसेन द्वितीय से समीकृत किया जाए तो भी दोनों के मध्य 35 वर्शों का अन्तराल दिखायी पड़ता है। चूंकि अभी तक कदम्बों का कालानुक्रम भी पूर्ण रूप से सुनिष्चित नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि उनके अभिलेखों में सभी शासकों के लिए तिथियाँ शासन करने वाले राजा के राज्यवर्शों में दी गई हैं। इस प्रकार यदि यह मान लिया जाए कि मुद्गिरि ताम्रपत्र का सर्वसेन वत्सगुल्म शाखा का शासक सर्वसेन ही था तो इससे कदम्बों का कालानुक्रम भी स्थायी रूप से निर्धारित किया जा सकेगा।

कदम्ब शासक सिंहवर्मन के मुद्गिरि ताम्रपत्र से वत्सगुल्म शाखा के वाकाटकों े एवं कदम्बों के बीच स्थापित सम्बन्धों का अनुमान लगाया जा सकता है। ताम्रपत्र का यह वर्णन कि ‘महाराज सर्वसेन के हाथों राज्याभिशिक्त होकर सिंहवर्मन ने स्वयं को सम्मानित महसूस किया था।’ यह प्रदर्षित करता है कि कदम्ब शासक सिंहवर्मन वाकाटक शासक सर्वसेन द्वितीय को स्वयं से श्रेष्ठ समझता था। यह सम्भव है कि या तो वह उसका अधीनस्थ मित्र रहा हो या फिर सामन्त। वास्तविकता जो भी हो, इससे कम से कम यह अनुमान तो लगाया जा सकता है कि सर्वसेन द्वितीय वत्सगुल्म शाखा का एक शक्तिषाली शासक था। अपने शासनकाल में उसने अपने पैतृक साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के साथ ही साथ कुन्तल के कदम्ब शासकों को भी अपनी शक्ति का लोहा मनवाया। उसका शासनकाल 425-455 ई0 तक लगभग 30 वर्शों का निर्धारित किया गया है। घटोत्कच गुहालेख से उसके कीर्ति नामक सचिव का नाम ज्ञात होता है।

देवसेन

अपने पिता सर्वसेन द्वितीय के पश्चात 455 ई0 में देवसेन उसका उत्तराधिकारी हुआ। दक्षिणी विदर्भ से उसका एक अपूर्ण ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है। यह ताम्रपत्र वत्सगुल्म से जारी किया गया था। इससे प्रदर्शित होता है कि वत्सगुल्म अन्त तक इस शाखा की राजधानी रहा।163 वर्तमान में यह ताम्रपत्र लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित है।

उसके बीदर ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसने अपने पवूर् जों की भाँति ‘धर्ममहाराज’ की उपाधि धारण की थी। उसके पुत्र हरिशेण के थाल्नेर ताम्रपत्र में उसे मात्र ‘महाराज’ कहा गया है। हरिशेण के सचिव वराहदेव के अजन्ता लेख एवं घटोत्कच गुहा लेख से देवसेन के सचिव हस्तिभोज का नाम ज्ञात होता है जो कि वेल्लूर के प्रसिद्ध ब्राह्मण परिवार से सम्बन्धित था। यह हस्तिभोज नामक सचिव हरिशेण के सचिव वराहदेव का पिता था। उसके विशय में कहा गया है कि वह एक अत्यन्त दक्ष, विनीत एवं गुणी सचिव था। देवसेन ने अपने राज्य का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व उसे सौंपकर स्वयं अपना समय भोग-विलास में व्यतीत किया।

अनुमानत: वराहदेव ने इन लेखों में अपने वंश की प्रशंसा बढ़ा-चढ़ा कर की है और इसे शब्दष: ग्रहण करना तर्कसंगत नहीं लगता।

उसके पाँचवे राज्यवर्श के बीदर ताम्रपत्र में वेल्पकोण्डा नामक ग्रामदान का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में देवसेन के अधिकारी (आज्ञाकर) सामिलदेव (सम्भवत: स्वामिल्लदेव) का नाम आता है। वर्तमान में यह ताम्रपत्र बिरला ऑर्कियोलॉजिकल एण्ड कल्चरल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, हैदराबाद में सुरक्षित है। इस ताम्रपत्र का बीदर कर्नाटक क्षेत्र से प्राप्त होना यह प्रदर्षित करता है कि देवसेन के काल तक वत्सगुल्म शाखा का साम्राज्य उत्तरी कनार्टक तक फैल गया था। ताम्रपत्र में उल्लिखित दान में दिये जाने वाले ग्राम से भी यही प्रदर्षित होता है क्योंकि कोण्डा नामान्त स्थल नाम आन्ध्र कर्नाटक क्षेत्र में सामान्य रूप से मिलते हैं। सम्भव है कि अपने पाँचवें राज्यवर्श अथवा इससे पूर्व ही उसने बीदर (उत्तरी कर्नाटक) एवं आन्ध्र प्रदेश के मध्य में स्थित अन्य क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया हो। इन क्षेत्रों पर उसका अधिकार कब तक बना रहा, यह ज्ञात नहीं है। तथापि यह स्पष्ट है कि देवसेन ने अपने शासनकाल में अपने राजवंष को अति विस्तृत कर लिया था।

देवसेन ने अपनी पुत्री का विवाह विश्णुकुण्डिन शासक माधववर्मन द्वितीय जनाश्रय के साथ किया था। जिसके पुत्र विक्रमेन्द्रवर्मन ने स्वयं को जन्म से ही विश्णुकुण्डिन एवं वाकाटक दोनों कुलों से विभूशित बताया है। विश्णुकुण्डिन कुल में यह विवाह उसने एक राजनीतिक सूझ-बूझ के उद्देश्य से किया था। सम्भवत: अपने समकालीन मुख्य शाखा के शासक नरेन्द्रसेन एवं कदम्बों के विरूद्ध अपने राजवंश की स्थिति को सुदृढ़ करने एवं विश्णुकुण्डिनों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से उसने उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे। ज्ञात है कि नरेन्द्रसेन के राज्यारोहण के समय उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। जिसमें प्रारम्भ में उत्तराधिकार पद प्राप्त करने में नरेन्द्रसेन को सफलता मिली। परन्तु कुछ समय पश्चात ही उसके सम्बन्धियों द्वारा उसके राज्य के कुछ भाग उससे छीन लिये गये। यह सम्बन्धी अन्य कोई नहीं अपितु वत्सगुल्म शाखा का शासक देवसेन ही था। स्पष्ट है कि इन दोनों शासकों में अच्छे सम्बन्ध नहीं थे।

इसके विपरीत नरेन्द्रसेन के कदम्ब राजवंश के साथ मधुर सम्बन्ध थे। क्योंकि उसकी अग्रमहिशी कदम्ब राजकुल की थी जो कदम्ब शासक काकुत्स्थवर्मन की पुत्री अथवा पौत्री थी। अत: देवसेन का इन दोनों राजवंषों के प्रति शत्रुता रखना स्वाभाविक था। सम्भव है कि इनसे प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से ही उसने उनके राज्य का कुछ भाग हड़प लिया था और सम्भवत: इसी कारणवश विश्णुकुण्डिनों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से उसने उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे।

देवसेन के हिस्से-बोराला शिलालेख से सुदर्शन झील के निर्माण का उल्लेख मिलता है। यह अभिलेख विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। प्रथमत: इसमें उसके अधिकारी स्वामिल्लदेव का नाम मिलता है। सम्भवत: यह वही स्वामिल्लदेव है जिसका उल्लेख उसके पाँचवें राज्यवर्श के बीदर ताम्रपत्र में किया गया है। द्वितीयत: इस अभिलेख में अन्य वाकाटक अभिलेखों की अपेक्षा तिथि शक सवंत् 380 अर्थात् 458 ई0 में दी गई है। इस तिथि का वाकाटक इतिहास में विशेष महत्व है। अभी तक वाकाटकों के जितने भी अभिलेख प्राप्त हुए हैं। उनमें तिथियाँ शासन करने वाले राजा के राज्यवर्शों में ही अंकित की गई हैं। अत: इस अभिलेख से न केवल देवसेन की तिथि निर्धारित करने में सहायता मिलती है अपितु इससे सभी वाकाटक शासकों का कालानुक्रम भी निश्चित करने में विशेष सहायता मिलती है। तृतीयत: इससे ज्ञात होता है कि वाकाटक शासकों ने भी जनकल्याणकारी कार्यों में अपनी रुचि प्रदर्षित की थी। चतुर्थत: हम जानते हैं कि सुदर्शन झील का मौर्य काल से लेकर गुप्त काल तक अपना एक इतिहास रहा है। इसकी महत्ता के कारण ही उत्तरी दकन में झीलों के लिए सुदर्षन नाम प्रसिद्ध हो गया और वाकाटकों ने भी अपने शासनकाल में निर्मित झीलों को भी यही नाम देना उचित समझा। रामटके शिलालेख से ज्ञात होता है कि प्रभावतीगुप्ता की स्मृति में जिस झील का उत्खनन कराया गया उसका नाम भी सुदर्शन ही रखा गया। 

वाकाटकों की मुख्य शाखा के साथ ही वत्सगुल्म शाखा में भी यह नाम उतना ही प्रसिद्ध था। स्पष्ट है कि हिस्से-बोराला शिलालेख से ज्ञात आर्य स्वामिल्लदेव, जिसने देवसेन के काल में सुदर्शन झील का उत्खनन कराया था, वह मूलरूप से सौराष्ट्र क्षेत्र का निवासी था जहाँ वास्तविक सुदर्शन झील स्थित थी। सम्भवत: इसी कारण उसने उस क्षेत्र में प्रचलित शक संवत् तिथि का प्रयोग भी इस शिलालेख में किया जो कि अन्य वाकाटक लेखों में नहीं मिलती। देवसेन का शासनकाल 455-480 ई0 से निर्धारित किया गया है।

हरिशेण

देवसेन के पश्चात उसका पुत्र 480 ई0 में उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसके थाल्नेर ताम्रपत्र (प्राचीन स्थालकंगर, धुले जिला) में उसके लिए ‘धर्ममहाराज’ की उपाधि का प्रयोग नहीं किया गया है। जबकि उसके पवूर्जों ने यह उपाधि धारण की थी। इस ताम्रपत्र में गोमिकराज नामक राजा का उल्लेख मिलता है, जिसकी आज्ञा से यह ताम्रपत्र जारी किया गया था (गोमिकराजानुज्ञातम)। मिरासी इस गोमिकराज को स्थालकंगर (आधुनिक थाल्नेर) का शासक मानते हैं, जिसे हरिशेण ने पराजित किया था। परन्तु शास्त्री का मानना है कि निस्संदेह गोमिकराज इस राजवंश का कोई वयोवृद्ध सदस्य था। उनका मानना है कि एक विजेता कभी भी अपने परास्त शत्रु से उसके राज्य में दान देने की अनुमति कभी नहीं माँगेगा। अत: वाकाटक अभिलेखों से ज्ञात पृथिवीराज, नरिन्दराज एवं देवराज की भाँति ही गोमिकराज भी वाकाटक राजवंश का सदस्य था।

उसके विशय में कहा गया है कि वह शूर और महत्वाकांक्षी शासक था और उसने राज्य की समस्त दिशाओं में विजय प्राप्त की थी। अजन्ता लेख के जिस भाग में उसकी विजयों का वर्णन था, वह भाग अब नष्ट हो चुका है। लेख के अवषिश्ट भाग में उसके द्वारा विजित निम्नलिखित प्रदेशों का उल्लेख है- उत्तर में अवन्ति (मालवा), पूर्व में कोसला (छत्तीसगढ़ और उससे लगा हुआ प्रदेश), कलिंग (उड़ीसा का पुरी-गंजाम क्षेत्र एवं आन्ध्र प्रदेश का विषाखापट्नम-श्रीकाकुलम् क्षेत्र) एवं आन्ध्र, पश्चिम में लाट (गुजरात का नवसारी-भड़ौंच क्षेत्र) और त्रिकूट (उत्तरी कोकंण के त्रैकूटक शासक), दक्षिण में कुन्तल (उत्तरी कर्नाटक)।

बुधगुप्त के पश्चात गुप्त साम्राज्य तीव्रता से बिखरने लगा था। अवन्ति क्षेत्र जो बुधगुप्त के काल में गुप्तों के अधीन था। वह अब गुप्तों के हाथ से निकलकर दषपुर के औलिकरवष्ं ाीय शासकों के अधीन हो गया था। ये औलिकरवंषीय शासक कभी गुप्तों के सामन्त हुआ करते थे। परन्तु तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठाकर उन्होने स्वयं को गुप्तों से अलग कर लिया था। एसे ा प्रतीत होता है कि हरिशेण ने इस अवन्ति राज्य पर आक्रमण किया था। कन्हेरी से हरिशेण के विजयसूचक कुछ आभिलेखिक प्रमाण मिले हैं, जिसमें उसकी अपरान्त विजय का भी उल्लेख है। जिसके आधार पर यह माना जाता है कि कुछ समय के लिए हरिशेण ने अपरान्त पर भी अपना अधिकार कर लिया था। दक्षिण कोसल पर इस समय शरभ नामक राजा का शासन था। जिसने अपने नाम पर इस क्षेत्र में शरभपुरीय राजवंष की स्थापना की थी। सम्भव है कि हरिशेण ने शरभ के शासनकाल में इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था। लाट देश के लिए उसने अपना विजयी अभियान महाराष्ट्र के खानदेश से होकर प्रारम्भ किया होगा क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही वाकाटकों के अधीन था। त्रिकूट का उल्लेख सम्भवत: उत्तरी कोकंण पर राज्य करने वाले त्रैकूटकवष्ं ाीय शासकों के लिए किया गया है। यह उनके पतन का काल था। लगभग 492 ई0 तक व्याघ्रसेन नामक अन्तिम त्रैकूटक राजा ने इस क्षेत्र पर शासन किया था। सम्भव है कि हरिशेण ने इनकी संकटपूर्ण स्थिति का लाभ उठाकर इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया था। कुन्तल पर इस समय कदम्बों का शासन था। ज्ञात है कि हरिशेण के पितामह सर्वसेन द्वितीय ने कदम्बों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया था। हरिशेण के पिता देवसेन ने कदम्ब राज्य का कुछ भाग अपने अधीन कर लिया था। किन्तु अजन्ता लेख का अधिकांश भाग नष्ट होने के कारण हरिशेण की विजयों का स्पष्ट ब्यौरा नहीं मिलता। तथापि सम्भव है कि हरिशेण ने अपने पिता देवसेन की कुन्तल विजय में सहायता की थी। मिरासी का मानना है कि हरिशेण के आक्रमणस्वरूप कलिंग तथा आन्ध्र में राजनीतिक क्रान्ति हुई थी। जिसके फलस्वरूप नये राजवंशों का उदय हुआ। 

उनका मानना है कि हरिशेण के काल में ही लगभग 498 ई0 में गंग राजवंश का के स्थापनासूचक गंग संवत् का आरम्भ हुआ। जिनके उदय में सम्भवत: हरिशेण की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। आन्ध्र देश पर इस समय कम से कम 470-71 या 478-79 ई0 से लगभग 518 ई0 तक हरिशेण के बहनोई माधववर्मन द्वितीय जनाश्रय का शासन था। ऐसा माना जाता है कि हरिशेण ने इस समय आन्ध्र में अपने समसामयिक शालंकायनवंषीय राजा को पदच्युत कर उसके स्थान पर अपने सम्बन्धी विश्णुकुण्डिन माधववर्मन द्वितीय जनाश्रय को आन्ध्र राज्य सौंप दिया था।

इतने विस्तृत प्रदेश को हरिशेण द्वारा अपने अधिकार में करना सम्भव प्रतीत नहीं होता। एसे ा प्रतीत होता है कि हरिशेण की इन राज्यों के शासकों से उनकी सीमा पर कुछ झड़प हुई थी। जिसे उसके राजकवि ने उसके द्वारा विजित प्रदेशों का नाम दे दिया है। यह भी हो सकता है कि उसने इन भारतीय राजाओं के राज्यों पर विजय प्राप्त कर उन्हें वार्शिक कर देने के लिए विवष किया हो और इस शर्त पर उन्हें उनके राज्य लौटा दिये हो। ऐसे में हरिशेण के राजकवि वराहदेव का अपने स्वामी की सैनिक उपलब्धियों का विवरण पण्ूर् ात: विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता। अत: उसके राजकवि का अपने राजा हरिशेण के विषय में यह कहना कि हरिशेण का राज्य उत्तर में मालवा से दक्षिण में कुन्तल तक तथा पश्चिम में अरब सागर से पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था, शब्दष: सत्य प्रतीत नहीं होता।

परन्तु यह सत्य है कि भारत के सभी राज्यों में वाकाटकों का राज्य उसकी मृत्यु (लगभग 510 ई0) के समय सर्वाधिक शक्तिशाली था। उसने अपने शासनकाल में न केवल अपने पैतृक राज्यों को अक्षुण्ण बनाये रखा अपितु पृथिवीशेण द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसके निर्बल उत्तराधिकारियों की राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर मुख्य शाखा के राज्य को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया। निष्चित रूप से उसकी महत्ता प्रवरसेन प्रथम से किसी भी प्रकार से कम नहीं थी। वह कला का महान संरक्षक था। यद्यपि उसके एकमात्र ज्ञात थाल्नेर ताम्रपत्र में ब्राह्मणों को ग्राम दान देने का उल्लेख है। तथापि एसे ा प्रतीत होता है कि उसका बौद्ध धर्म के प्रति विशेष झुकाव था। अजन्ता एवं गुलवाड़ा में कई बौद्ध गुहाओं का निर्माण उसी के काल में हुआ था। इसके साथ ही उन्हें मूर्तियों एवं चित्रकारी की सहायता से सुन्दर और सजीव रूप प्रदान किया गया है।

वह वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा का अन्तिम शासक था। उसके पष्चात् वाकाटक साम्राज्य के अवषेशों पर भिन्न-भिन्न राजवंशों का उदय हुआ। चूिं क विश्णुकुण्डिन शासक वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा के सम्बन्धी थे अत: सम्भव है कि वाकाटक साम्राज्य के पश्चात उन्होने स्वयं को वाकाटकों का उत्तराधिकारी समझकर कुछ समय के लिए उनका राज्य अपने अधीन कर लिया हो।

नल राजवंश की भी वाकाटकों की मुख्य शाखा के साथ शत्रुता थी। सम्भव है कि कुछ समय के लिए उन्होंने वाकाटक साम्राज्य अथवा उसके एक बड़े भाग पर अपना अधिकार कर लिया हो। इसके अतिरिक्त कुन्तल के कदम्ब राजवंश की वाकाटकों की वत्सगुल्म शाखा के अन्तिम दो शासकों देवसेन एवं हरिशेण के साथ कटु सम्बन्ध थे। सम्भव है कि हरिशेण की दुर्बलता का लाभ उठाकर उन्होंने वत्सगुल्म शाखा के राज्यों को अपने अधीन कर लिया हो। इन दोनों राजवंशों का अन्त बादामी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मा प्रथम (566/67-597/98 ई0) द्वारा किया गया। हो सकता है कि इन दोनों राजवंश ने इसके पूर्व तक वाकाटक राज्य के भिन्न-भिन्न भागों पर अपना-अपना नियंत्रण रखा था।

स्वामिराज के नगरधन ताम्रपत्र195 से जो कि कल्चुरी-चेदि संवत् 322 में तिथ्यांकित है, से ज्ञात होता है कि अन्तत: छठीं शताब्दी ई0 के मध्य में मुख्य शाखा के भूभाग माहिश्मती के प्रारम्भिक कल्चुरियों के प्रथम ज्ञात शासक कृश्णराज के नियत्रं ण में आ गये थे। जिसने अपने सामन्तों को इस क्षेत्र पर नियुक्त कर रखा था। इस प्रकार लगभग तीन शताब्दियों (अनुमानत: 260 वर्षों) तक शासन करने वाले शक्तिशाली वाकाटक साम्राज्य का अन्त हो गया।

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