विदेशी व्यापार क्या है?

By Bandey 2 comments
मनुष्य की आवश्यकताए अनन्त हैं। कुछ आवश्यकता की वस्तुए तो देश में ही प्राप्त
हो जाती है तथा कुछ वस्तुओं को विदेशों से मॅंगवाना पड़ता है। भोगोलिक परिस्थितियों
के कारण प्रत्येक देश सभी प्रकार की वस्तुए स्वयं पैदा नहीं कर सकता है। किसी देश में
एक वस्तु की कमी है तो दूसरे देश में किसी दूसरी वस्तु की। इस कमी को दूर करने के
लिए विदेशी व्यापार का जन्म हुआ है।

दो देशों के मध्य होने वाले वस्तुओं के परस्पर विनिमय या आदान’-प्रदान
को विदेशी व्यापार कहते हैं। जो देश माल भजेता है उसे निर्यातक एवं जो देश माल
मॅंगाता है उसे आयातक कहते हैं एवं उन दोनों के बीच होने वाल े आयात-निर्यात को
विदेशी व्यापार कहते हैं।

विदेशी व्यापार के प्रकार

  1. आयात व्यापार – जब विदेशों से माल मॅंगाया जाता है तो उसे आयात
    व्यपार कहते हैं।
  2. निर्यात व्यापार – जब माल विदेशों को भेजा या विक्रय किया जाता है तो उसे
    निर्यात व्यापार कहते है।
  3. पुन: निर्यात व्यापार – जब किसी एक देश से माल आयात करके पुन: किसी
    दूसरे देश को निर्यात किया जाता है, तो उसे पुन: किसी दूसरे देश को निर्यात किया जाता
    है तो उसे पुन: निर्यात व्यापार कहते हैं।

विदेशी व्यापार का महत्व

प्रत्येक देश के लिये विदेशी व्यापार बहुत अधिक बढ़ गया है क्योंकि-

  1. विदेशी मुद्रा अर्जित करने का यह महत्वपूर्ण साधन है। 
  2. किसी भी देश की उन्नति का यह मूल आधार है।  
  3. यह पारस्परिक सहयोग में वृद्धि करता है। 
  4. संकटकालीन स्थिति में एक देश दूसरे देश को सहायता प्रदान करता है। 
  5. अतिरिक्त उत्पादित वस्तुओं को अन्य देशों के बाजारा में बेचा जा सकता है। 
  6. निर्यातकर्ता देश, अधिक प्रगतिशील माना जाता है।

विदेशी व्यापार के लाभ

  1. विभिन्न वस्तुओं की उपलब्धि- ऐसी वस्तुए जिनका विदेशों में उत्पादन हो रहा है किन्तु
    जिन्हें हमारे देश में उत्पन्न नहीं किया जा सका है, उनका उपभोग भी विदेशी व्यापार के
    कारण किया जा सकता है। 
  2. अतिरिक्त उत्पत्ति से विदेशों मुद्रा की प्राप्ति- देश में आवश्यकता से अधिक उत्पादन
    को विदेशों में बेचकर विदेशी मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। 
  3. प्राकृतिक साधनों का पूर्ण उपभोग- विदेशी व्यापार के कारण बाजारों का विस्तार हो
    जाता है, जिससे अतिरिक्त उत्पादनों को विदेशी मंडियों में आसानी से बेचा जा सकता है।
    न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करके प्राकृतिक साधनों का पूर्ण उपभोग किया
    जाता है। 
  4. क्षेत्रीय श्रम विभाजन तथा विशिष्टीकरण- अधिकतर राष्ट्र अपने देश की जलवायु तथा
    प्राकृतिक साधनों की उपलब्धि के अनुरूप ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिनके
    उत्पादन में उन्हें पूर्ण कुशलता प्राप्त हो। परिणामस्वरूप ऐसे उत्पादन की मात्रा बढ़ाकर
    क्षेत्रीय श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण के लाभ उठाने लगते हैं। 
  5. जीवन-स्तर तथा आय में वृद्धि- विदेशी व्यापार के कारण सभी उपभोक्ताओं को
    सस्ती, सुन्दर, टिकाऊ वस्तुए मिलने से उनका जीवन-स्तर ऊॅंचा उठाने लगता है तथा
    उनकी वास्तविक आय में वृद्धि होती है। 
  6. उत्पादन विधि में सुधार- विदेशी व्यापार में प्रतिस्पर्धा होने के कारण कम लागत पर
    अच्छा माल उत्पन्न करने के लिए उत्पादन विधियों में समय-समय पर सुधार किये जाते
    हैं, जिससे उपभोक्ताओं को अच्छा माल मिलने लगता है। 
  7. संकट में सहायक- बाढ़, भूकम्प, सूखा आदि प्राकृतिक संकटों के आने पर विदेशों से
    खाद्य सामग्री आयात कर इन संकटों का सामना किया जा सकता है। भारत ने विगत वर्षों
    में खाद्य संकट आने पर विदेशों से भारी मात्रा में खाद्य सामग्री का आयात किया था। 
  8. अन्तर्राष्ट्रीय श्शान्ति एवं सद्भावना- विदेशी व्यापार के कारण वस्तुओं के साथ-साथ
    विचारों के आदान-प्रदान के भी अवसर प्राप्त होते रहते हें, जिससे ज्ञान एवं संस्कृति का
    भी आदान’-प्रदान होता रहता है तथा सद्भावना का जन्म होता है। 
  9. औद्योगिकरण को प्रोत्साहन- विदेशी व्यापार से बाजार का विस्तार हो जाने के कारण
    नये-नये उद्योगों का जन्म होता है एवं पुराने उद्योगों का विकास हाने े लगता है। 
  10. यातायात के साधनों में वृद्धि- विदेशी व्यापार के कारण वायु, जल एवं थल यातायात
    के साधनों में पर्याप्त वृद्धि होने लगती है। नये-नये परिवहन एवं संचार साधनों का विकास
    होता है। 
  11. मूल्य में स्थायित्व- वस्तुओं की पूर्ति में कमी होने के कारण बाजार में वस्तुओं के मूल्यों
    में वृद्धि हो जायेगी, परिणामत: विदेशों से वस्तुओं का आयात प्रारंभ हो जाएगा। वस्तुओं
    की पूर्ति में वृद्धि के कारण भाव पुन: कम हो जायेंगे। इस प्रकार विदेशी व्यापार से वस्तुओं
    के मूल्यों में स्थिरता बनी रहती है। 

उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त विदेशी कार्यकुशलता एवं रोजगार में वृद्धि,
एकाधिकार की समाप्ति, श्शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक विकास में विदेशी व्यापार सहायक
होता है।

विदेशी व्यापार के दोष 

  1.  विदेशों पर निर्भरता- विशिष्टीकरण के कारण सम्पूर्ण वस्तुओं का उत्पादन न करने
    से कुछ वस्तुओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस कारण आत्मनिर्भरता
    कम हो जाती है। 
  2. विदेशियों का हस्तक्षेप – कुछ विकासशील देश विदेशी व्यापार के साथ-साथ अन्य
    देशों की राजनैितक गतिविधियों में भी रूचि लेने लगते हैं तथा अपना वर्चस्व बढा़ ने का
    प्रयत्न करते हैं। जैसे- भारत में अंग्रेजों ने अपना वर्चस्व बढ़ाया था। 
  3. देशी उद्योगों से प्रतिस्पर्धा – विदेशों में निर्मित माल स्वदेश में निर्मित माल से
    हैं, जिससे उपभोक्ताओं को अच्छा माल मिलने लगता है। 
  4. संकट में सहायक- बाढ़, भूकम्प, सूखा आदि प्राकृतिक संकटों के आने पर विदेशों से
    खाद्य सामग्री आयात कर इन संकटों का सामना किया जा सकता है। भारत ने विगत वर्षों
    में खाद्य संकट आने पर विदेशों से भारी मात्रा में खाद्य सामग्री का आयात किया था। 
  5. अन्तर्राष्ट्रीय श्शान्ति एवं सद्भावना- विदेशी व्यापार के कारण वस्तुओं के साथ-साथ
    विचारों के आदान-प्रदान के भी अवसर प्राप्त होते रहते हें, जिससे ज्ञान एवं संस्कृति का
    भी आदान’-प्रदान होता रहता है तथा सद्भावना का जन्म होता है। 
  6. औद्योगिकरण को प्रोत्साहन- विदेशी व्यापार से बाजार का विस्तार हो जाने के कारण
    नये-नये उद्योगों का जन्म होता है एवं पुराने उद्योगों का विकास हाने े लगता है। 
  7. यातायात के साधनों में वृद्धि- विदेशी व्यापार के कारण वायु, जल एवं थल यातायात
    के साधनों में पर्याप्त वृद्धि होने लगती है। नये-नये परिवहन एवं संचार साधनों का विकास
    होता है। 
  8. मूल्य में स्थायित्व- वस्तुओं की पूर्ति में कमी होने के कारण बाजार में वस्तुओं के मूल्यों
    में वृद्धि हो जायेगी, परिणामत: विदेशों से वस्तुओं का आयात प्रारंभ हो जाएगा। वस्तुओं
    की पूर्ति में वृद्धि के कारण भाव पुन: कम हो जायेंगे। इस प्रकार विदेशी व्यापार से वस्तुओं
    के मूल्यों में स्थिरता बनी रहती है। 
  9. अन्य लाभ- उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त विदेशी कार्यकुशलता एवं रोजगार में वृद्धि,
    एकाधिकार की समाप्ति, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक विकास में विदेशी व्यापार सहायक
    होता है।

विदेशी व्यापार की कठिनाइयॉं

विदेशी व्यापार में अनेक लाभ होने के बाद भी इसके विकास में कठिनाइयॉं एवं बाधाओं
का सामना करना पड़ता है जो है-

  1. सम्पर्क स्थापित करने की कठिनार्इ – दूर-दूर के देशों में सम्पर्क स्थापित करने में
    कठिनार्इ आती हैं। जल, थल एवं वायु यातायात के पर्याप्त विकास होने के बाद भी ये साध्
    ान जनसाधारण को सस्ते मूल्य पर उपलब्ध नहीं हैं। इस कारण किस देश में कौन से माल
    की खपत या उपलब्धियॉं हैं, इसकी जानकारी प्राप्त करने में कठिनार्इ आती है। 
  2. अत्यधिक जोखिम – विदेशी व्यापार में अधिकतर माल सामुद्रिक मार्ग से आता-जाता
    है इस कारण जहाज के डूबने, लुटने, उलटने या तूफान से नष्ट होने का भय हमेशा बना
    रहता है। इस कारण इसमें अत्यधिक जोखिम होने के कारण देशी व्यापार की तरह इसका
    श्शीघ्र विकास नहीं हो सका है। 
  3. अयात-निर्यात लायसेंस की प्राप्ति – विदेशी व्यापार पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण
    रहता है वे अपने-अपने देश के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर ही आयात-निर्यात
    लायसेंस देते हैं, साथ ही सेंस प्राप्त करने की विधि से भी अपरिचित होने के कारण विदेशी
    व्यापार वृद्धि में कठिनार्इ आती है। 
  4. वस्तुओं का आकार-प्रकार – विदेशी वस्तुओं के आकार-प्रकार का स्पष्ट अनुमान न
    होने के कारण, नमूना, ट्रेडमार्क, भावसूची, आदि मॉंगने, उनसे पत्र व्यवहार करने में काफी
    देरी लगती है। 
  5. नापतौल की भिन्नता – अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्रकार की नापतौल की
    लियॉ प्रचलित होने से वस्तु की मात्रा एवं मूल्य निश्चित करने में कठिनार्इ आती है।
  6. विदेशी मुद्रा की उपलब्धि – विदेशों में माल खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध है
    या नहीं, के भुगतान हेतु प्राप्त हो सकेगी अथवा नहीं इस बात की भी श्शंका नहीं रहती
    है। इस कारण व्यापारी निश्चिततपूर्वक व्यापार करने में कठिनार्इ आती हैं। 
  7. माल भेजने की कठिनार्इ – विदेशों से माल मॅंगवाने एवं भेजने के लिए यातायात के साध्
    ान शीघ्रगामी एवं समय पर उनका उपलब्ध होना जरूरी है। ये साधन श्शीघ्रतापूर्वक
    उपलब्ध नहीं हो इस कारण भी विदेशी व्यापार में कठिनाइर् आती है। 
  8. भाषाओं की भिन्नता – अलग-अलग देशों में अलग-अलग भाषाए प्रचलित होने के
    कारण व्यवहार द्वारा जानकारी प्राप्त करने, सम्पर्क स्थापित करने में कठिनार्इ आती है। 
  9. भुगतान – जिस देश से माल खरीदा जाता है उस देश की मुद्रा में भुगतान करना
    आवश्यक है। की उपलब्धता सुलभ होना चाहिए एवं मुद्राओं के भाव भी न बढ,े़ विनिमय
    दर में स्थिरता होना आवश्यक है। इसके अभाव में भुगतान में कठिनार्इ आती है।

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2 Comments

How To Advertis

Jul 7, 2018, 6:25 pm

Videshi vyapar ke uddesh,chetr,visheshtayen

Plzzzz send me it's very important

Reply

Chandani gaud

May 5, 2020, 9:33 am

Videshi Vyapar kya hai bahut acche samjhaya Gaya

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