परीक्षण मानक का अर्थ एवं महत्व

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मानक का अर्थ एवं महत्व

शिक्षा, मनोविज्ञान व समाजशास्त्र के अधिकांश चरों की प्रकृति
अपरोक्ष होती है जिसके कारण उनके मापन की किसी एक सर्वस्वीकृत मानक
ईकाई का होना सम्भव नही हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में प्राप्तांकों को
अर्थयुक्त बनाने या उसकी व्याख्या करने की समस्या उत्पन्न होती है। इसके
लिए परीक्षण निर्माता कुछ ऐसे सन्दर्भ बिन्दु निर्धारित करता है जिनके
आधार पर प्राप्तांकों की व्याख्या की जा सके। इन सन्दर्भ बिन्दुओं को मानक
कहते है।

अत: परीक्षण मानक वे सन्दर्भ बिन्दु है जिनकी सहायता से या जिनसे
तुलना करके परीक्षण पर प्राप्त अंकों की व्याख्या की जा सकती हो। क्योंकि
मानकों के अभाव में परीक्षण से प्राप्त परिणामों की व्याख्या नही की जा
सकती है इसलिए परीक्षण मानकीकरण (प्रमापीकरण) की प्रक्रिया में मानक
निर्धारण का कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण स्वीकार किया जाता है।
स्टेनली तथा हापे किन्स के अनुसार- ‘‘मानक छात्रों के बडे़ समूहों
की निष्पादनता के आधार पर प्राप्तांकों का किसी अधिक सार्थक पैमाने पर
प्रत्यावर्तनों को प्रतिपादित करना मात्र है।’’

  1. एनेस्तसी (Anastasi) के अनुसार- ‘‘किसी परीक्षण के मानक वास्तव
    में किसी प्रतिनिधि समूह के द्वारा उस परीक्षण पर प्राप्त अंकों का संक्षिप्त रूप
    होता है।’’
  2. ईबिल (Ebel) के अनुसार- ‘‘किसी परीक्षण के मानक बताते है कि
    किसी विशेष सन्दर्भ समूह के सदस्य परीक्षण पर किस प्रकार से अंक प्राप्त
    करते है।’’
  3. रैमर्स गेज तथा रुमेल (Remmers, Gage and Rummel) के अनुसार-
    ‘‘मानक छात्रों के किसी परिभाषित समूह के द्वारा परीक्षण पर प्राप्त निष्पादन
    स्तर है।’’

मानक के प्रकार

मानक कई प्रकार के होते है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण में व्यक्ति के
प्राप्तांकों की व्याख्या करने के लिए मुख्य रूप से चार प्रकार के मानकों का
प्रयोग किया जाता है- 1. आयु मानक 2. कक्षा मानक 3. शंताशीय मानक 4. मानकीकृत प्राप्तांक मानक।

आयु मानक 

पा्रय: ऐसे परीक्षणों में जहाँ आयु के
कारण परिवर्तन दिखाई पड़ता है, वहाँ आयु मानक निर्धारित किया जाता है।
किसी परीक्षण के आयु मानकों का अभिप्राय विभिन्न आयु वर्ग के व्यक्तियों के
द्वारा अर्जित प्राप्तांकों के औसत से है। आयु मानक को ज्ञात करने के लिए
परीक्षण को उस आयु वर्ग के प्रतिदर्श समूह पर प्रशासित किया जाता है तथा
परीक्षण में उस आयु वर्ग के प्रतिदर्श समूह के छात्रों द्वारा अर्जित प्राप्तांकों का
औसत ज्ञात करके ‘मानक’ ज्ञात कर लिया जाता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न
आयु वर्ग के प्रतिनिधि समूहों का अलग-अलग औसत प्राप्तांक की गणना
करके आयु मानक निर्धारित किये जाते है। उदाहरणार्थ यदि 12 वर्ष आयु
वाले लड़कों का प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) लेकर उनकी ऊँचाइयां माप ले
तथा उसकी औसत ऊँचाई ज्ञात कर ले तो हम कह सकते है कि यह औसत
ऊँचाई 12 वर्ष आयु के लड़कों का मानक निर्धारित करती है। इसी प्रकार 7,
8, 9, 10, 11,, 13, 14 वर्ष आदि आयु के लड़कों की औसत ऊँचाई ज्ञात की
जा सकती है अत: प्रत्येक आयु वर्ग के लड़कों की औसत ऊँचाई या मानक
निर्धारित करने के बाद किसी भी लड़के की ऊँचाई के विषय में व्याख्या की
जाती है। मान लिया एक लड़के की आयु 9 वर्ष है परन्तु उसकी ऊँचाई 13
वर्ष के लड़कों की औसत ऊँचाई के बराबर है तो उसे अधिक ऊँचाई वाला
लड़का कहा जायेगा। अत: किसी छात्र द्वारा किसी परीक्षण में प्राप्त अंकों की
व्याख्या करने के लिए उस छात्र की आयु-वर्ग के मानक (औसत प्राप्तांक) से
की जाती है। एनेस्तसी के शब्दो में ‘‘प्रत्येक आयु वर्ग के बालकों के प्रतिनिधि
समूह द्वारा अर्जित प्राप्तांकों के औसत मान किसी परीक्षण के आयु मानकों का
निर्धारण करते है।’’ प्राय: सभी बुद्धि परीक्षणों में आयु मानकों को मानसिक आयु के रूप
में तथा उपलब्धि परीक्षणों में शैक्षिक आयु के रूप में व्यक्त किया जाता है।

आयु मानकों का उपयोग

  1. आयु के साथ परिवर्तित होने वाले गुणों के सन्दर्भ में आयु मानक
    अधिक उपयोगी होते है। जैसे ऊँचाई, वजन, मानसिक योग्यता, शैक्षिक
    उपलब्धि आदि के मापन के लिए आयु मानकों का प्रयोग किया जाता है 
  2. कम आयु के बच्चों अर्थात् प्रारम्भिक अवस्था में बालकों में गुणों
    एवं विशेषताओं में तीव्र गति से परिवर्तन होता है इसलिए इस अवस्था में
    मापन हेतु आयु मानकों का उपयोग किया जाता है।

कक्षा मानक 

कक्षा मानक, आयु मानक की
तरह का दूसरा प्रत्यय है। जिस प्रकार आयु मानकों को ज्ञात करने के लिए
विभिन्न आयु वर्ग के प्रतिदर्शो (प्रतिनिधि समूहों) के छात्रों के प्राप्तांकों का
औसत ज्ञात किया जाता है, उसी प्रकार कक्षा मानक ज्ञात करने के लिए
विभिन्न कक्षाओं के प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) छात्रों के प्राप्तांकों का औसत
ज्ञात किया जाता है।

विभिन्न कक्षाओं के प्रतिनिधि समूहों के औसत प्राप्तांक ही कक्षा
मानक कहे जाते है। यदि किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण का कक्षा मानक
निर्धारित करना है तो इसके लिए विद्यालय की विभिन्न कक्षाओं जैसे छठी,
सातवी, आठवी, नौवी, दसवी आदि के प्रतिनिधि समूहों पर अलग-अलग उस
परीक्षण का प्रशासन करेगे और प्रत्येक कक्षा के प्रतिनिधि समूहों (छात्रों) के
प्राप्तांकों का औसत ज्ञात कर लिया जाता है। यही औसत प्राप्तांक उस
परीक्षण के कक्षा मानक कहलाते है। इस कक्षा मानकों को आधार या सन्दर्भ
बिन्दु मानकर विभिन्न कक्षा के किसी भी छात्र द्वारा अर्जित अंक की व्याख्या
की जा सकती है। जैसे यदि कोई पाँचवीं कक्षा का छात्र छठी कक्षा के लिए
निर्धारित मानक के बराबर अंक प्राप्त करता है तो वह श्रेष्ठ बालक कहा
जायेगा। इसके विपरीत यदि कोई दसवी कक्षा का बालक मात्र सातवीं कक्षा
के मानक (औसत अंक) के बराबर अंक प्राप्त करता है, तो उसे निम्न स्तर का
बालक समझा जायेगा।

कक्षा मानक का उपयोग

  1. इनका प्रयोग मुख्य रूप से विषयों की निष्पत्ति परीक्षणों में किया जाता
    है। 
  2. प्रारम्भिक कक्षाओं के लिए कक्षा मानकों की उपयोगिता अधिक होती
    है क्योंकि छोटी कक्षाओं में बालकों की शैक्षिक प्रगति अपेक्षाकृत अक्षिाक होती है। 
  3. विद्यालय के प्रधानाचार्य तथा अध्यापकगण कक्षा मानकों की सहायता
    से छात्रों के द्वारा प्राप्त अंकों की व्याख्या कर लेते है। इससे छात्रों को
    योग्यतानुसार विभिन्न वर्गो में विभक्त किया जा सकता है। 
  4. किसी विषय के उपलब्धि परीक्षण में छात्र द्वारा अर्जित प्राप्तांक की
    कक्षा मानकों से तुलना करने पर अध्यापक को इस बात का संकेत
    मिलता है कि छात्र उक्त विषय में किस प्रकार प्रगति या उन्नति कर
    रहा है। 
  5. इन मानकों से यह भी पता लगता है कि कक्षा का कोई छात्र किस
    सीमा तक एक निश्चित स्तर का कार्य कर सकता है। 

शंताशीय मानक 

किसी व्यक्ति या छात्र
की स्वयं की आयु समूह एवं कक्षा समूह में तुलना करने के लिए हम शतांशीय
मान की गणना करते है। इसका अर्थ यह है कि शतांशीय मानक की सहायता
से व्यक्ति की तुलना या स्थिति उस समूह में ज्ञात करते है जिसका वह
सदस्य होता है। शतांशीय मानकों का तात्पर्य परीक्षण में छात्रों के किसी
प्रतिनिधि समूह (प्रतिदर्श) के द्वारा प्राप्त अंकों के विभिन्न शतांशों से है। कोई
शतांश वह बिन्दु होता है जिसके नीचे दिए गए प्रतिशत छात्र अंक प्राप्त करते
है। जैसे P10 वह बिन्दु है, जिसके नीचे 10% छात्र अंक प्राप्त करते है।
‘‘शतांशीय मान एक ऐसा बिन्दु है जिसके नीचे किसी वितरण (समूह)
का एक निश्चित प्रतिशत होता है।’’
शतांशीय मान 99 होते है, परन्तु सुविधा के लिए कुछ चुने हुए शतांशें
जैसे P10, P20, P30, P40, P50, P60, P70, P80, P90 आदि को ज्ञात करते है।
समूह के किसी व्यक्ति का परीक्षण में प्राप्तांक ज्ञात होने पर उसकी समूह में
स्थिति ज्ञात करने के लिए शतांशीय क्रम ज्ञात करते है।

शतांशीय मानक का उपयोग

  1. शतांशीय मानक का प्रयोग वहाँ विशेष रूप से किया जाता है,
    जहाँ आयु के साथ गुण या विशेषता में परिवर्तन नही होता है, जैसे बुद्धि
    परीक्षण, अभिरूचि परीक्षण, अभिवश्त्ति तथा व्यक्तित्व परीक्षण आदि के लिए
    शंताशीय मानक का प्रयोग किया जाता है। 
  2. शतांशीय क्रम का प्रयोग बालक की समूह में स्थिति ज्ञात करने
    के लिए किया जाता है।
  3. शतांशीय मानकों का प्रयोग सभी मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षणिक
    परीक्षणों में किया जाता है। चूंकि उनका प्रयोग एक ही सामान्य समूह के
    समस्त व्यक्तियों पर किया जाता हैं इसलिए इसके सम्बन्ध में कहा जा सकता
    कि ‘‘शतांशीय मानक किसी विशेष समूह में व्यक्ति के प्राप्तांक का विवेचन
    हेतु आधार प्रस्तुत करता है।’’ 
  4. विभिन्न समूह के व्यक्तियों के बीच तुलना करने के लिए शतांशीय
    मानक का प्रयोग किया जाता है।
  5. मानकीकृत प्राप्तांक मानक (Standardisedscore Norms)
    विभिन्न प्रकार के मानकीकृत प्राप्तांकों का प्रयोग भी मानक की तरह
    किया जा सकता हैं। मूल प्राप्तांकों (row scores) को अर्थपूर्ण बनाने के लिए
    इन्हें किसी मानक अथवा प्रतिमान सन्दर्भित प्राप्तांक में रूपान्तरित किया
    जाता है। इन्हें व्युत्पन्न प्राप्तांक भी कहते है। मूल प्राप्तांकों को मध्यमान तथा
    मानक विचलन (S.D.) की सहायता से मानकीकृत प्राप्तांकों में परिवर्तित
    किया जाता है।

‘‘मानकीकृत प्राप्तांक किसी व्यक्ति की मध्यमान से प्रामणिक विचलन
की इकाई में विचलन या दूरी को व्यक्त करता है।’’मानकीकृत प्राप्तांक एक प्रकार के व्युत्पन्न प्राप्तांक ही होते है।
मानकीकृत प्राप्तांक निम्नलिखित प्रकार के होते है-

  1. Z प्राप्तांक (z-scores)
  2. टी- प्राप्तांक (T-scores)
  3. स्टेन-प्राप्तांक (Sten-scores)
  4. स्टेनाइन-प्राप्तांक (Stanine-scores)

मानकीकृति प्राप्तांक का उपयोग

  1. मानकीकृत प्राप्तांकों की सहायता से किसी परीक्षण में व्यक्ति द्वारा
    प्राप्त अंक की व्याख्या अर्थपूर्ण ढंग से की जा सकती है।
  2. मानकीकृत प्राप्तांकों द्वारा दो समूहों के छात्रों के निष्पादन क्षमता की
    तुलना आसानी से की जा सकती है।

(1) Z प्राप्तांक (Z-Scores): Z प्राप्तांक, पा्रमणिक मापको (Standard
Scores) का एक प्रकार है, जो यह इंगित करता है कि प्राप्त किये गये मूल
प्राप्तांक उस वितरण के मध्यमान (Mean) से कितने मानक विचलन (S.D)
विचलित होते है।

Z प्राप्तांक यो प्राप्तांक व्यक्ति का यह प्राप्तांक हैं, जिसे मूल
प्राप्तांक में से समूह (वितरण) के मध्यमान को घटाकर व्यक्ति का विचलन
प्राप्तांक ज्ञात कर लिया जाता है। फिर विचलन प्राप्तांक में मानक विचलन
(S.D.) का भाग देकर Z प्राप्तांक या सिगमा प्राप्तांक ज्ञात किया जाता है।’’
यदि किसी छात्र का Z प्राप्तांक शून्य है तो इससे यह संकेत प्राप्त
होता है कि छात्र के मूल प्राप्तांक का मान समूह (वितरण) के मध्यमान के
बराबर है। ऋणात्मक Z प्राप्तांक से संकेत मिलता है कि छात्र का मूल
प्राप्तांक मध्यमान से नीचे है तथा धनात्मक Z प्राप्तांक से स्पष्ट होता है कि
छात्र का मूल प्राप्तांक मध्यमान से ऊपर है। Z प्राप्तांक का मध्यमान 0 तथा
विचलन होता है।

                    X-M 
Z प्राप्तांक =—————-
                       σ

जिसमें Z = एक प्रामणिक माप, X = किसी छात्र का प्राप्तांक M =
वितरण (समूह) का मध्यमान, s = वितरण या समूह का मानक विचलन।

(2) टी- प्राप्तांक (T-Score): Z प्राप्तांक पा्र य: दशमल चिन्हों तथा ऋणात्मक
चिन्हों के साथ होते है जिसके कारण विभिन्न परीक्षाओं की तुलना करने में
असुविधा होती है। ऐसी स्थिति में प्रतिमान प्राप्तांक (Standardscore) के
दूसरे रूप ज् प्राप्तांक का प्रयोग किया जाता है। ज् प्राप्तांक के प्रयोग का
सुझाव सर्वप्रथम मेक्कॉल ने दिया था। T प्राप्तांक के प्रतिमान सामान्यीकृत प्राप्तांक है जिनका मापनी पर मध्
यमान 50 तथा मानक विचलन 10 है।T प्राप्तांकों का प्रयोग प्राय: प्रयोज्य के प्राप्तांकों की तुलना करने के
लिए किया जाता है। T प्राप्तांक (T-Score) ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र
का प्रयोग किया जाता है।

                     10 (x -M) 
T – प्राप्तांक 50 +________ 
                           σ

जहाँ-
X = प्रयोज्य या व्यक्ति का मूल प्राप्तांक
M = समूह के मूल प्राप्तांकों का मध्यमान
s = समूह के मूल प्राप्तांकोंका मानक-विचलन

(3) स्टेन प्राप्तांक (Sten Score)- मलू प्राप्तांकों को स्टने प्राप्तांकों में
रूपान्तरित करने का पहला प्रयास आर.बी. कैटिल ने किया। यह एक मुख्य
प्रतिमान प्राप्तांक है जिसे स्टेन प्राप्तांक कहते है। वास्तव में व्यक्ति के मूल
प्राप्तांक को 1 से 10 तक के प्राप्तांक में रूपान्तरित कर दिया जाता है
इसलिए इसे स्टेन प्राप्तांक कहा जाता है। स्टेन मापनी पर औसत प्राप्तांक 5.
5 होता है। प्रसार के औसत मूल प्राप्तांकों को 4,5,6 एवं 7 बिन्दुओं या
प्राप्तांकों पर अधिक प्राप्तांकों को 8,9,10 तथा कम प्राप्तांकों को 1,2,3 बिन्दुओं
पर अंकित या व्यक्त किया जाता है। इन प्राप्तांकों के विषय में कहा जाता
है- ‘‘स्टेन प्राप्तांक वे प्रतिमान सामान्यीकृत प्राप्तांक है जिनका मध्यमान 5.
5 तथा मानक विचलन 2 होता है।

(4) स्टेनाइन प्राप्तांक (Stanine Scores)- परीक्षण प्राप्तांकों को सुगमता से
व्यक्त करने तथा व्याख्या की सुविधा के लिए स्टेनाइन प्राप्तांकों का प्रयोग
किया जाता है। मूल प्राप्तांकों को स्टेनाइन प्राप्तांकों में रूपान्तरित करने से
परीक्षण के प्राप्तांकों की व्याख्या करना आसान हो जाता है। स्टेनाइन का
प्रसार 1 से 9 तक होता है तथा जिसका औसत 5 होता है। दूसरे शब्दों में
स्टेनाइन मापनी नौ बिन्दु वाली मानकीकृत मापनी है अर्थात जब किसी समूह
के ‘प्राप्तांकों को विभिन्न स्तरों के लिए व्यक्त करना होता है तो उन स्तरों को
स्टेनाइन के रूप में व्यक्त करते है, जिसका अर्थ हुआ सभी प्राप्तांकों को नौ
स्तरों में विभाजित करना। स्टेनाइन प्राप्तांक 1 से 9 तक सामान्य सम्भाव्य वक्र
की तरह फैले होते है।

परीक्षण मानक

स्टेनाइन स्केल जिसमें हर स्टेनाइन के प्रतिशत अंक दर्शाये गये है।

अच्छे मानक की विशेषताएं

परीक्षण पर प्राप्त अंकों की व्याख्या मानकों की सहायता से की जाती
है। किसी भी परीक्षण के मानकों में चार विशेषतायें होनी चाहिए। जो निम्न
है

  1. नवीनता (Recency)- नवीनता से तात्पर्य है कि मानक अनेक
    वर्षो पूर्व तैयार किये हुए नही होने चाहिए। समय के साथ छात्रों की योग्यता
    तथा वितरण में परिवर्तन हो सकता है। अत: मानकों को समय-समय पर
    संशोधित करते रहना चाहिए।
  2. प्रतिनिधित्वता (Representativeness)- अच्छे मानक की दूसरी
    विशेषता है प्रतिनिधित्वता अर्थात मानकों को छात्रों के एक प्रतिनिधि तथा बड़े
    प्रतिदर्श से तैयार किया जाना चाहिये। विभिन्न प्रकार की जनसंख्या जैसे
    छात्र व छात्राएं या ग्रामीण या सामान्य स्कूल व कान्र्वेट स्कूल आदि के लिए
    भी अलग-अलग मानक तैयार किये जाने चाहिए।
  3. सार्थकता (Relevancy)- मानकों में सार्थकता भी होनी चाहिए।
    सार्थकता का सम्बन्ध मानकों के प्रकार से है। विकासात्मक चरों तथा उद्देश्यों
    के मापन के सन्दर्भ में आयु मानक अथवा कक्षा मानक अधिक सार्थक होते है।
    इसके विपरीत अन्य प्रकार के चरों व उद्देश्यों का मापन करते समय शतांक
    मानक अथवा मानकीकृत प्राप्तांक मानक उपयुक्त हो सकते है। परीक्षण के
    मानकों के प्रकार का निर्णय सावधानी पूर्ण ढंग से किया जाना चाहिये।
  4. तुलनीयता (Comparability)- समान योग्यता का मापन करने
    वाले विभिन्न परीक्षणों के मानक परस्पर तुलनीय भी होने चाहिये। ऐसेा न हो
    कि किसी परीक्षण पर मानकों के आधार पर किसी छात्र को श्रेष्ठ बताया जा
    रहा है जबकि उसी योग्यता के दूसरे परीक्षण पर उसी छात्र को औसत या
    निम्नस्तर का कहा जा रहा है। ऐसी स्थिति में कम से कम एक परीक्षण के
    मानक में त्रुटि होने की सम्भावना है।

इसके अतिरिक्त मानकों की व्याख्या स्पष्ट व विस्तृत होनी चाहिये
जिससे छात्रों के प्राप्तांकों की ठीक प्रकार से व्याख्या की जा सके। मानकों
के प्रयोग के लिये यह भी आवश्यक है कि छात्रों पर परीक्षण को ठीक उन्ही
परिस्थितियों में प्रशासित किया जाये जिन परिस्थितियों मे परीक्षण निर्माता ने
मानक तैयार करने के लिये प्रशासित किया था। छात्रों के लिये निर्देश,
परीक्षण अवधि, छात्र अभिप्रेरणा तथा अन्य कोई भी ऐसी परिस्थिति जो छात्रों
के प्राप्तांकों को प्रभावित कर सकती हो, समान होनी चाहिए।

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