रुचि का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, रुचि मापन की विधियां

हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि एक व्यक्ति यदि प्रोफेसर बनना चाहता है तो दूसरा डॉक्टर, इंजीनियर अथवा वकील बनना पसंद करता है। इसी प्रकार, विद्यालय में जहा प्रतीक को गणित, अनुभा को गृह विज्ञान, सोनल को संगीत, फराह को राजनीति शास्त्र पढ़ना अच्छा लगता है, वहीं सुशान्त हर समय पिक्चर की ही बातें करता है, मेघा उपन्यास व कहानियों में ही खोई रहती है, बाला को गप्पें मारना हँसने-हँसाने से ही फ़ुरसत नहीं मिलती है। 

इस दृष्टि से हम अनुभव करते हैं कि व्यक्ति में रुचि नाम की कोई वस्तु अवश्य होती है तथा जिसमें व्यक्तिगत विभिन्नताए स्पष्ट परिलक्षित होती हैं। यदि व्यक्ति किसी कार्य के प्रति रुचि रखता है, तो वह उस कार्य को अधिक सफलतापूर्वक एवं सरलता से पूरा कर लेगा, इसके विपरीत यदि उसकी कार्य में अरुचि है तो वह उस कार्य से शीघ्र ही ऊब जायेगा और बीच में ही छोड़ देगा।

साधारण शब्दों में हम यह कह सकते है कि रूचि किसी वस्तु व्यक्ति, तथ्य प्रतिक्रिया आदि को पसंद करने तथा उसके प्रति आकर्षित होने की प्रवृत्ति है।

रुचि का अर्थ

किसी वस्तु, व्यक्ति, प्रक्रिया, तथ्य, कार्य आदि को पसन्द करने या उसके प्रति आकर्षित होने, उस पर ध्यान केन्द्रित करने या उससे संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति केा ही रूचि कहते हैं। रूचि का व्यक्ति की योग्यताओं से केाई सीधा सम्बन्ध नहीं होता है परन्तु जिन कार्यों में व्यक्ति की रूचि होती है वह उसमें अधिक सफलता प्राप्त करता है। रूचियां जन्मजात भी हो सकती हैं तथा अर्जित भी हो सकती है। 

रुचि की परिभाषा

रूचि के अर्थ के संबंध में कुछ मनोवैज्ञानिक विचार निम्न प्रकार से है।

गिलफोर्ड के अनुसार - ‘‘रूचि किसी क्रिया, वस्तु या व्यक्ति पर ध्यान देने, उसके द्वारा आकर्षित होने, उसे पसन्द करने तथा उससे संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति है।’’

बिंधम के अनुसार ‘‘रूचि किसी अनुभव में संविलिन होने व इसमें संलग्न रहने की प्रवृत्ति है, जबकि विरक्ति उसके दूर जाने की प्रवृत्ति है।

गिलफोर्ड के अनुसार शब्दो में ‘‘रूचि किसी क्रिया, वस्तु या व्यक्ति पर ध्यान देने उसके द्वारा आकर्षित होन, उसे पसंद करने तथा उससे संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति है।’’

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी वस्तु व्यक्ति प्रक्रिया तथ्य कार्य आदि को पसंद करने अथवा उसके हानि आकर्षित होने उस पर ध्यान केन्द्रित करने तथा उससे संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति को ही रूचि कहते है।

रूचि की प्रकृति

  1. रूचियाँ व्यक्ति की पसंद को इंगित करती है।
  2. रूचि अभिक्षमता का लाक्षणिक रूप होता है।
  3. रूचियाँ जन्मजात भी होती है और अर्जित भी हो सकती है।
  4. रूचि तथा ध्यान में गहरा संबंध होता है, जिस वस्तु या विषय में हमे रूचि होती है हम उसे ज्यादा ध्यान देते है।
  5. टपनी रूचि के अनुसार कार्य करना हमेशा संतुष्टि प्रदान करता है। इससे व्यक्ति को अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों के प्राप्ति में सहायता मिलती है।
  6. रूचि का संबंध आवश्यकता, इच्छा तथा लक्ष्यों से होता है।
  7. रूचियाँ परिवर्तनशील होती है। परिपक्वता, शिक्षा तथा अन्य आंतरिक तथा बाह्य तत्वों के कारण बदलती है।
  8. रूचि से सीखने में आने वाली असामान्य रूकावटों को दूर करने में सहायता मिलती है। इससे व्यक्ति को थकावट का सामना करने और असफलता से बचने में सहायता मिलती है।रूचि अभिप्रेरित करने का कार्य करती है ज्यों व्यक्ति को ज्ञानात्मक, क्रियात्मक या भावनात्मक व्यवहार की ओर अग्रसर करती है।
  9. रूचि किसी भी वस्तु को व्यक्तिगत अर्थ प्रदान करती है किसी भी वस्तु में रूचि होने के कारण हम सभी वस्तुआंें की उसी रूचि के दृष्टिकोण से व्याख्या करते है।

रुचि के प्रकार

सुपर के अनुसार रूचियां चार प्रकार की होती हैं।
  1. अभिव्यक्त रूचियाँ - जिन्हें व्यक्ति की स्वयं उल्लिखित क्रियाओ कार्यो या पसन्दों के आधार पर जाना जाता है।
  2. प्रदर्शित रूचियाँ - जिन्हे व्यक्ति या बालक की विभिन्न क्रियाओं से पहचाना जा सकता है।
  3. आकंलित रूचियाँं- जिन्हें विभिन्न सम्प्राप्ति परीक्षणों पर व्यक्ति के द्वारा अर्जित प्राप्तांको के आधार पर आंकलित किया जाता है।
  4. सूचित रूचियाँ- जिन्हें पम्रापीकतृ रूचि सूचियों की सहायता से मापा जाता है।

रूचि मापन की प्रविधियाँ

रूचियों का मापन करने हेतु निम्न प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है जैसे

(अ) प्रश्नावली

प्रश्नावली रूचिमापन का लिखित माध्यम है। प्रश्नावली में प्रश्न लिखित अथवा मुद्रित रूप में होते है। प्रश्नावली एक साथ अनेक व्यक्तियों पर प्रशासित की जाती है। इसमें लिखकर या चिन्ह लगाकर अपने उत्तर देने होते है। प्रश्नावली की सहायता से हम शैक्षिक तथा व्यावसायिक क्षेत्र में रूचियों का मापन सरलता से कर सकते है।

(ब) अवलोकन

जब रूचियों को अनौपचारिक ढंग से ज्ञात करना हो तब अवलोकन का उपयोग अत्यंत सुविधाजनक ढंग से किया जाता है। जैसे किसी शिक्षक को अपने छात्रों की रूचियाँ अवलोकन द्वारा ज्ञात कर सकते है। अथवा माता पिता अपने बच्चों की रूचियां अवलोकन द्वारा ज्ञात कर सकते है। परन्तु अवलोकन से प्रदर्शित रूचियों का ही ज्ञान हो पाता है।

(स) साक्षात्कार

साक्षात्कार में सीधे-सीधे प्रश्न पुछकर व्यक्ति की रूचियों को जाना जाता है। इस विधि में व्यक्ति अपनी रूचियों के संबंध में खुद बताता है। शैक्षिक तथा व्यावसायिक परामर्शदाता, रोजगार तथा प्रवेश के लिए साक्षात्कार विधि का उपयोग करते है। साक्षात्कार द्वारा प्रदर्शित रूचियों की जानकारी मिल पाती है।

हम जानते है कि जिस कार्य में हम रूचि रखते है उसमें हम सफलता अर्जित करते है। विभिन्न विषयों में छात्रों की सफलता-असफलता से उनकी रुचियां से संबंध में कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते है। इसी तरह विभिन्न कार्यो को सफलतापूर्वक संपन्न करने के आधार पर व्यक्तियों की रुचियों का आकलन किया जा सकता है। उपलब्धि परीक्षणों पर छात्रों के द्वारा प्राप्त अंकों या विभिन्न कार्यों की संपादित करने में अर्जित निपुणता आकलित रुचियों का ज्ञान होता है।

रूचियों के औपचारिक मापन के लिए रूचियों का उपयोग किया जाता है। रूचि सूचियों कार्यो आदि के संबंध में सावधानीपूर्वक तैयार की गई तथा विधिवत् मूल्यांकित की गई सूचियाॅ होती है। जिनकी सहायता से व्यक्ति विधिवत मूल्यांकित की गई सूचियाॅ होती है। जिनकी सहायता से व्यक्ति अपनी पसंद-नापसंद को इंगित करता है।
यह दो प्रकार की होती है -
  1. निरपेक्ष पसन्द-नापसन्द - इस प्रकार की रूचि सूचियों में व्यवसायों, क्रियाओं, वस्तुओं, मनोरंजन साधनों, अध्ययन विषयों आदि का वर्णन प्रस्तुत किया जाता है तथा व्यक्तियों से यह पूछा जाता है कौन से व्यवसाय, वस्तु, अध्ययन विषय उन्हें पसन्द हैं, कौन-कौन से नापसन्द हैं तथा किन-किन के प्रति उदासीन है।
  2. तुलनात्मक पसन्द-नापसन्द - इसमें दो-दो, तीन-तीन या चार-चार के समूहों में व्यवसायों, अध्ययन विषयों, क्रियाओं, वस्तुओं केा प्रस्तुत किया जाता है।
रूचि प्रशिक्षण के क्षेत्र में सर्वप्रथम मानकीकृत परीक्षण का निर्माण सन् 1914 में कर्नीगी इंस्टीटयूट आफ टेक्नोलॉजी द्वारा किया गया। जी.एफ.कूडर द्वारा निर्मित कूडर प्राथमिकता रिकार्डस व्यावसायिक व व्यक्तिगत प्रपत्र (Kudar’s Preferene Records – Vocational and Personal Forms) तथा स्ट्रांग व्यावसायिक रूचि प्रपत्र का प्रयोग मुख्य रूप से रूचि मापन के लिए प्रयोग किया जाता है।

Reference -
1. Dandapani, S., Advanced Educational Psychology, New Delhi, Anmol Publication Pvt. Ltd., 2000.
2. Mangal S.K., Advanced Educational Pyshcology, Prentice Hall of India Pvt. Ltd., 1999.
3. Mathur, S.S., Educational Psychology, Vinod Pustak Mandir, Agra.

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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